Sunday, December 26, 2010

भारत-रूस मैत्री का सच

रूस की पालकी कब तक हम ढोते रहेंगे और वह भी अपने हितों की कीमत पर। अमेरिका विरोध की रूसी गुटनिरपेक्ष मोहरा की पालकी हमने ढोयी और अमेरिकी कुदृष्टि का शिकार बने। आज रूस, चीन, उत्तर कोरिया और ईरान के बीच रणनीतिक गठबंधन के बाद भी रूस की पालकी ढोने से हमें परहेज नहीं है। रूस की अविश्र्वसनीयता आखिर क्यों नहीं हमारे कूटनीतिज्ञ समझ पाते? रूस ने एडमिरल गोर्शकोव पर दो अरब डॉलर की अवैध वसूली हमसे की है। 1965 के युद्ध में जीते महत्वपूर्ण चोटियों को पाकिस्तान के हवाले करने के लिए लाल बहादुर शास्त्री को किसने मजबूर किया था। लाल बहादुर शास्त्री और हमारे परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा की विवादास्पद मौत का आखिर कारण क्या था? क्या यह सब हमारी सरकारों को नहीं मालूम है? फिर भी रूस की जय करते हम नहीं थकते और चीन से दोस्ती की अपेक्षा करते हैं। आज विश्र्व के विकसित देशों के लिए भारत एक ऐसा उभरता हुआ बाजार है जिसके सहारे वे अपनी अर्थव्यवस्था को गति दे सकते हैं, बेरोजगारी से निजात पा सकते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी चौधराहट भी कायम रख सकते हैं। पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए और भारत के साथ विभिन्न समझौतों से अपने देश में करीब एक लाख नौकरियों वाली अर्थव्यवस्था खड़ी कर ली। फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी व चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ भारत आए और व्यापारिक सौदे हासिल कर चलते बने। रूस भी दुनिया की एक शक्ति है और उसके पास भी सुरक्षा परिषद के वीटो का हथकंडा है। रूसी राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव ने भी सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता का लॉलीपाप थमाया और नागरिक परमाणु सहयोग सहित 30 रक्षा समझौते हासिल कर लिए। इसके पहले रूसी राजदूत ने भारत को धमकी पिलाई और कहा कि भारत एक दुल्हन है और उसे सोच-समझकर दूल्हा खोजना चाहिए। रूसी राजदूत का कथन था कि भारत को अमेरिका, फ्रांस और इजरायल जैसे देशों से ज्यादा विश्र्वास उस पर करना चाहिए और असैन्य परमाणु कार्यक्रम सहित अन्य रक्षा जरूरतों के लिए भारत को रूस पर ही निर्भर रहना चाहिए। रूस की वर्तमान नीति दोगली है और उस पर विश्र्वास नहीं किया जा सकता है। सुरक्षा परिषद की सदस्यता पर उसकी नीति ढुलमुल वाली है और वह भारत को ब्लैकमेलिंग की स्थिति में रखे हुए है। रूस ने चीन, उत्तर कोरिया और ईरान के साथ एक गठबंधन कायम कर रखा है, जो हमारे पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं। रूस की सर्वोच्च सत्ता राष्ट्रपति के पास होती है। राष्ट्रपति के पास ही विदेशी कूटनीति और देश की राजनीतिक-विधायी शक्तियां होती है। रूस के संविधान में लगातार तीन बार कोई राष्ट्रपति नहीं रह सकता है। इस कसौटी पर रूस के वर्तमान प्रधानमंत्री ब्लादीमिर पुतिन को राष्ट्रपति की कुर्सी खाली करनी पड़ी थी, लेकिन उन्हें राजनीतिक शक्ति चाहिए थी इसलिए। राष्ट्रपति के पद पर अपने चहेते दमित्री मेदवेदेव को बैठाया और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर खुद बैठ गए। विकिलीक्स खुलासे में कहा गया है कि पुतिन पर भरोसा करना महंगा सौदा है।। पुतिन को एक तानाशाह के तौर पर भी देखा जाता है। रूसी राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव को पुतिन का मोहरा बताया जाता है। पुतिन ने भारत को कभी भी विश्र्वसनीयता की नजर से नहीं देखा। पुतिन ने सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता पर विरोधाभाषी बयान दिए। आधुनिक रक्षा की जरूरतों की कसौटी पर रूस की रक्षा तकनीक कहीं भी नहीं ठहरती है। रूस में निर्मित लड़ाकू विमान और अन्य रक्षा उपकरण भी भारत के गर्म जलवायु में खरे नहीं उतरते हैं। मिग 21 का उदाहरण सामने हैं। चीन की चुनौतीं को देखते हुए भी हमें दुनिया की आधुनिक टेक्नोलॉजी चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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