शर्म की बात है कि नेपाली सांसदों द्वारा 16 बार के मतदान के बावजूद नेपाल नए प्रधानमंत्री का चयन करने में असफल रहा है। लिहाजा नेपाली जनता भी यह सोचने पर मजबूर हो उठी है कि आखिर नेता क्या कर रहे हैं? आजीज होकर एक साधारण नेपाली नागरिक द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा गया कि नेपाली प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नेपाली कांग्रेस के रामचंद्र पोडेल को ही प्रधानमंत्री बनाया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री पद के समर्थन में 301 मतदाताओं की संख्या हो। संसद में जब भी सांसदों की बैठक हो, उन्हें अनिवार्य रूप से मतदान कर प्रधानमंत्री का चुनाव करना ही होगा। नेपाली राजनीति पूरी तरह से अस्थिरता की कगार पर खड़ी हो चुकी है। प्रमुख दलों के शीर्ष नेता या तो विदेश घूमने में मस्त हैं या दिल्ली की दौड़ लगा रहे हैं या फिर अपनी पार्टी की बैठकों में व्यस्त हैं। प्रधानमंत्री माधव नेपाल को अपने पद से इस्तीफा दिए हुए पांच महीने हो रहे हैं। इसका सीधा असर नेपाल में संविधान लेखन कार्य पर पड़ रहा है। संविधान लेखन का काम दो सालों की निश्चित अवधि में भी नहीं हो सका है। अत: पुन: विगत में संविधान लेखन के कार्यकाल को एक साल के लिए बढ़ाया गया। समय-सीमा के छह महीने यानी आधा समय व्यतीत होने के बावजूद संविधान लेखन कार्य में कोई उल्लेखनीय प्रगति हुई ही नहीं है। नेपाल की संविधान सभा के प्रमुख सुभाष नेवांग चाहे कितना भी दावा क्यों न कर लें कि संविधान लेखन का 75 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है, लेकिन प्रमुख मुद्दों पर ही असहमति होने के कारण संविधान लेखन में अब तक हुए काम का कोई महत्व नहीं रह जाता है। नेपाल के सभी राजनीति दल सत्ता के दावपेंच में उलझ कर रह गए हैं। आज नेपाली राजनीति के घोडे़ एक ही दिशा में दौड़ रहे हैं और दिशा-निर्देशन केवल चीन से ही लिया जा रहा है। पिछले दिनों चीन का पक्षधर बनते हुए चीन के एजेंटों की तरह माओवादी नेता पूर्व मंत्री एवं सभासद गोपाल किरांती ने तो अपनी सारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया है। पिछले दिनों उनके नेतृत्व में माओवादी कार्यकर्ताओं ने भारतीय राजदूत राकेश सूद पर जूता तक उछाल दिया, जिसकी जितनी भी निंदा की जाए, कम है। फिरकापरस्ती से घिरी नेपाली राजनीति ने अब तो दिवालिएपन की सीमा ही पार कर दी है। नेपाल के राजनितिज्ञ जोड़-तोड़कर अपने फायदे और नुकसान को तराजू पर तौल रहे हैं। जरूरत पड़ने पर अपने सियासी दुश्मनों पर भी हमला बोलने से भी नहीं चूक रहे हैं। कोई भी नेता किसी से भी कम दोषी नहीं है। राजनितिक समीकरणों के हिसाब से नेपाल में इतने चेहरे बदले हैं कि आम नेपाली जनता के लिए उन्हें पहचानना और समझना नामुमकिन-सा हो गया है। आज नेपाली सरकार के सर्मथन के सवाल पर राजनीतिक दलों में अंतद्र्वद देखा जा रहा है। बहाना यह है कि विभिन्न दलों के अधिकांश सभासद परिणामदायी पक्ष में मतदान करना चाहते हैं। बहरहाल, सार्क बिरादरी के नन्हे देश में ठप नेतृत्व की वापसी के लिए सकारात्मक पहल की आवश्यकता है। नेपाल में प्रधानमंत्री की जिस कुर्सी पर नेपाली सांसद बैठने को लालायित हो रहे हैं, वहीं नेपाली संसद का सत्र बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गया है। अगले सत्र में शायद इसका नतीजा निकल जाए। लेकिन नेपाल में अगला पीएम कौन होगा, इसके लिए नेपाली नेताओं में देश से बाहर चीन और भारत जाने के लिए बकायदा होड़ शुरू हो गई है। पीएम इन वेटिंग कौन है, यह सवाल नेपाली रडार पर लगातार घूम रहा है। नेपाली जनता मूक-दर्शक होकर यह नौटंकी लगातार देख रही है। अब जबकि सुप्रीम कोर्ट का आदेश आ चुका है कि नेपाली सांसद प्रधानमंत्री का चयन करें, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि नेपाली सांसद सुप्रीम कोर्ट को तवज्जो देंगे। क्योंकि दलों के स्वार्थपूर्ण रवैये एवं नेताओं के निकम्मेपन से देश संकट के भंवरजाल में फंस चुका है। नेपाल की तीन करोड़ जनता को सिर्फ निराशा ही हाथ लगने वाली है। माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड एक तरफ सियासी चीते की तरह अपने शिकार पर नजर गड़ाए हुए हैं तो दूसरी तरफ लोमड़ी की तरह चलाकी से समय-समय पर अपना पासा भी पलटते नजर आ रहे हैं। पिछले दिनों प्रचंड ने राजनीति की बिसात पर भारत के साथ मधुर संबंध की नई गोट भारत के पाले में फेंकने की कोशिश की है। कहना न होगा कि यह सब ड्रैगन के इशारे पर वह कर रहे हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी देने से लेकर वापस लेने तक के घटनाक्रम का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि कुर्सी की लालसा ही इस गतिरोध की मुख्य वजह है। बहरहाल, अपने अलावा किसी अन्य नेता को प्रधानमंत्री न बनने देने की जिद में अब तक प्रचंड कामयाब रहे हैं। माओवादियों की रणनीति यह थी कि चाहे उन्हें विपक्ष में बैठना पडे़, लेकिन नेपाली कांग्रेस को वह सत्ता से दूर रखने की पूरी कोशिश करेंगे। इसमें उन्हें किसी हद तक सफलता भी मिली है। हालांकि प्रचंड को शक्तिशाली बनाने में किरण वैद्य और बाबूराम भट्टाराई की अहम भूमिका रही है। लेकिन प्रचंड सात बार तक भी अपने पक्ष में 60 सभासदों का मत हासिल करने में कामयाब नहीं हो पाए, उन्हें आंतरिक दबाव और चीनी सलाह पर अपनी उम्मीदवारी वापस लेनी पड़ी, लेकिन उन्होंने कूटनीति की ऐसी चाल चली कि एमाले और कांग्रेस के बीच फल-फूल रहे गठबंधन में ही दरार डालकर माधव नेपाल को प्रधानमंत्री की कुर्सी से वंचित कर दिया। एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल की प्रधानमंत्री नहीं बनने की झल्लाहट का फायदा उठाते हुए राष्ट्रीय सहमति के नाम पर एमाले के सांसदों को मतदान से ही बाहर रहने को मजबूर कर दिया गया। हां, प्रचंड ने झलनाथ खनाल को प्रधानमंत्री बनाने का लॉलीपाप दिखाया जरूर है। इसके पीछे एमाले द्वारा नेपाली कांग्रेस का साथ नहीं देने की शर्त रखी गई है। इस नई प्रक्ति्रया में एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन देना है। ऐसे गुप्त समर्थन के बाद ही माओवादियों और एमाले के बीच यह नया गठबंधन बन पाया है। इस तरह की फूट डालो, राज करो की चीनी नीति को प्रचंड ने अमल करके यह जता दिया है कि बिना उनके नेपाली राजनीति की स्थिति पंगु हो चुकी है। बहुमत मिलते-मिलते भी झलनाथ खनाल प्रधानमंत्री का ताज हासिल नहीं कर पाए। हालांकि इसके लिए झलनाथ खनाल ने दिल्ली तक दौड़ लगाई थी और साउथ ब्लॉक का वह आशीर्वाद लेकर ही काठमांडू लौटे थे। अपनी इस पीड़ा को वह जहर की तरह नहीं पी पा रहे है। लिहाजा, पार्टी के अंदर बढ़ रही गुटबंदी में अपना वर्चस्व रखने के लिए अब तक राष्ट्रीय सहमति का राग अलापते हुए तटस्थता का खेल-खेल रहे हैं, लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि क्या अपने इस कदम से वह अपना मकसद साध पाएंगे? पहले चरण के निर्वाचन से नाम वापस लिए जाने के बाद से झल्लाए खनाल किसी भी कीमत पर कांगे्रस व माओवादीओं के नेतृत्व में सरकार नहीं बनने देने के लिए अपनी सभी चालों का मोहरा अलग-अलग बिसात पर बिछा रहे हैं। खनाल की रणनीति काम कर गई। उन्होंने प्रचंड को भी चुनावी मैदान से हटवा दिया। अब खनाल नेपाली कांग्रेस पार्टी के रामचंद्र पोडेल पर लगातार दबाव बना रहे हैं। खनाल को विश्वास है कि माओवादी सर्मथन से वह एक दिन नेपाल के प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे। जब नई चुनावी प्रक्रिया दोबारा संसद सत्र में शुरू होगी। बहरहाल, नेपाल की स्थिति भयावह बनती जा रही है। इस पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो तिब्बत वाली स्थिति नेपाल में भी कायम होते देर नही लगेगी। नेपाल के नेताओं और नेपाली जनता को चीन की साम्राज्यवादी-विस्तारवादी नीति को गंभीरता से समझना होगा। नेपाली सरकार का कायापलट कब तक होगा, यह कहना तो मुश्किल है, लेकिन यदि समय रहते नेपाली जनता और नेपाल के राजनीतिज्ञों ने नेपाल राष्ट्र की सुध नहीं ली तो इसका खमियाजा जनता को भुगतना पडे़गा। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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