Tuesday, December 21, 2010

फटे बांस से मुरली की तान

चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के भारत दौरे से देश को क्या हाथ लगा? वह अपने साथ चार सौ चीनी उद्योगपतियों को लेकर आए और भारत के साथ कई व्यापारिक समझौता कर वापस हो लिए। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और वेन जियाबाओ के बीच हुई बातचीत के बाद जारी संयुक्त बयान में कश्मीर के निवासियों को दिए जाने वाले नत्थी वीजा में बदलाव करने का कोई संकेत नहीं है। चीन ने अरुणाचल प्रदेश और जम्मज्-कश्मीर पर भारत के प्रभुत्व को स्वीकार नहीं किया है। भारत-चीन के बीच के अन्य विवाद भी ठंडे बस्ते में पड़े रहे। सत्ता अधिष्ठान भले ही जियाबाओ के दौरे को दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की बड़ी उपलब्धि माने, किंतु वास्तव में यह विशुद्ध रूप से एक व्यापारिक यात्रा मात्र थी। वर्ष 2000 के बाद से अब तक भारत और चीन के बीच व्यापार में लगातार वृद्धि हुई है। 2010 तक यह व्यापार तीस गुना बढ़ा है। एक अनुमान के अनुसार दोनों देशों के बीच आर्थिक व्यापार साठ अरब डॉलर से भी अधिक होने को है। यह व्यापार भी भारत के लिए घाटे का सौदा है। भारत निर्यात कम और आयात ज्यादा करता है। भारत से ज्यादातर लौह अयस्क और कीमती पत्थर निर्यात किए जाते हैं। चीन उन्हीं कच्चे मालों से सामान तैयार कर भारत और अन्य देशों को बेचता है। स्वाभाविक तौर पर जियाबाओ का ध्यान व्यापार को और विस्तार देने पर केंद्रित रहा, किंतु देश के सामने चीन को लेकर अन्य चिंताएं भी हैं। वर्ष 2005 में जियाबाओ ने बेंगलज्र की यात्रा के दौरान सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए समर्थन देने की बात की थी, किंतु चीन जाते ही वह अपने वादे को भज्ल गए। इस दौरे में भी उन्होंने भारत-चीन के सदियों पुराने रिश्तों की दुहाई देते हुए आपसी सहयोग बढ़ाने की बात की, किंतु जमीनी हकीकत क्या है? भारत की दो हजार मील अंतरराष्ट्रीय सीमा चीन के साथ लगती है। आजादी से लेकर अब तक इस सीमा पर विवाद बरकरार है। चीन ने अक्साई चिन के 38 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर जहां अवैध कब्जा कर रखा है वहीं अरुणाचल प्रदेश को भारत का अंग नहीं मानता। सन 2007 में चीन ने अरुणाचल प्रदेश के एक प्रशासनिक अधिकारी को इसीलिए वीजा देने से मना कर दिया था। 2009 में उसने एशियन विकास बैंक द्वारा अरुणाचल में विकास के लिए दिए जा रहे ऋण को रोकने का प्रयास किया था। अरुणाचल प्रदेश के हाल के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुनावी सभाओं का उसने कड़ा विरोध किया। कश्मीर को वह विवादग्रस्त क्षेत्र मानता है। हाल में उसने भारतीय सेना के जम्मज्-कश्मीर मामलों के प्रभारी लेटिनेंट जनरल वीएस जसवाल को वीजा देने से इनकार कर भारत का अपमान किया। भारतीय क्षेत्र में चीनी सेना की घुसपैठ की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के बंदरगाहों में चीन ने अपने सैन्य अड्डे स्थापित कर रखे हैं। नेपाल में चीन ने माओवादियों के सहयोग से एक ऐसा वर्ग पोषित किया है जो घोर भारत विरोधी और चीनपरस्त है। भारत की अर्थव्यवस्था को तबाह करने के लिए चीनी तकनीक से बने जाली नोटों की खेप पाकिस्तान से निरंतर आ रही है। भारत का औषध कारोबार बज्म पर है। उसको क्षति पहुंचाने के लिए चीन में नकली दवाइयां बनाई जा रही हैं और उन पर मेड इन इंडिया का लेबल लगाकर दज्सरे देशों में बेचा जा रहा है। ऐसे में चीन की कुटिलता और उसकी साम्राज्यवादी मंशा से आंख मज्ंदना सन 62 की गलती दोहराने के समान है। 1 अक्टज्बर, 1949 को पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चीन की स्थापना हुई थी। पश्चिमी देशों के विरोध के बावजज्द पं. नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में चीन को शामिल किए जाने की वकालत की। कोरिया के साथ छिड़े संघर्ष पर भी पं. नेहरू ने चीन का साथ देते हुए उसे आक्रमणकारी मानने से इनकार किया। हिंदी-चीनी भाई-भाई के शोर में पं. नेहरू चीन की साम्राज्यवादी मानसिकता को पढ़ने में चज्क गए। 1950 में माओ द्वारा सैनिक कार्रवाई कर तिब्बत को चीन के नियंत्रण में ले लेने की घटना पर वह तटस्थ बने रहे। सरदार पटेल, डॉ. भीमराव अंबेडकर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक गुरु गोलवलकर सहित कई राष्ट्रवादी ताकतों ने उन्हें आगाह करने की भी कोशिश की, किंतु उनका अटज्ट विश्वास था कि जब भारत ने अपने पज्रे इतिहास में कभी किसी पर हमला नहीं किया तो कोई उस पर आक्रमण क्यों करेगा? उनकी यह भ्रांति 20 अक्टज्बर, 1962 में टज्ट गई, जब चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया। सरदार पटेल ने सन पचास में ही चीन की साम्राज्यवादी मंशा से आगाह करते हुए चेतावनी दी थी कि तिब्बत में चीन का हस्तक्षेप भारत में हस्तक्षेप समझा जाए, किंतु पं. नेहरू अपने वैचारिक आदशरें में खोए रहे। सरदार पटेल से भी काफी पहले प्रखर राष्ट्रवादी महर्षि अरविंद ने चेताते हुए कहा था, चीन दक्षिण-पश्चिम एशिया और तिब्बत पर पज्री तरह छा कर उसे हजम करने का खतरा पैदा कर सकता है और भारतीय सीमाओं तक के सारे क्षेत्र पर कब्जा जमा लेने की हद तक जा सकता है। तिब्बत पर चीनी आक्रमण और उसकी प्रतिक्रिया में नेहरू की तटस्थता पर डॉ. भीमराव अंबेडकर ने टिप्पणी की थी, यदि भारत ने तिब्बत को मान्यता प्रदान कर दी होती, जैसा कि उसने 1949 में चीनी गणराज्य को प्रदान की थी तो आज भारत-चीन विवाद न होकर तिब्बत-चीन सीमा विवाद होता। ये सारी आशंकाएं सन 62 में सत्य साबित हुईं। हमें चीन के हाथों शर्मनाक पराजय का मुंह देखना पड़ा। पंडित नेहरू का मानना था कि चीन से दोस्ती करने से भारत का हिमालय क्षेत्र सुरक्षित हो जाएगा। युद्ध से प‌र्ज्व चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन. लाई भारत आए और पंचशील के सिद्धांतों को स्वीकार करने का छलावा किया, जबकि तिब्बत पर कब्जा करने के बाद से ही चीन की निगाह लेह-लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश व सिक्किम पर गड़ी थीं। नेहरू और चीनपरस्त उनके कम्युनिस्ट सखा चीन की विस्तारवादी कुटिलता के मज्कदर्शक बने रहे। तत्कालीन रक्षामंत्री कृष्ण मेनन ने खुफिया सज्चनाओं के बावजज्द सेना को साधनविहीन रखा। इस वैचारिक उहापोह की हमें भारी कीमत चुकानी पड़ी। वेन जियाबाओ के वर्तमान दौरे से एक नए युग की शुरुआत की आशा करना व्यर्थ है। चीन की कुटिल नीतियों की विद्रज्पता हमारी आंखों के सामने है। फटे बांस से मुरली की मधुर तान नहीं निकलती। चीन से उद्योग और व्यापार क्षेत्र में प्रतिस्पद्र्धा व सहयोग स्वाभाविक है, किंतु उसकी साम्राज्यवादी मानसिकता के प्रति हमें सदैव सतर्क रहना होगा। (लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं)

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