Friday, December 24, 2010

भारत का बढ़ता कद

तीन महीने के अंतराल में पी-5 देशों के नेताओं का भारत आना महज एक संयोग नहीं है। ये दौरे भारत की बढ़ती शक्ति और प्रभाव की पुष्टि करते हैं। चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ को छोड़कर सुरक्षा परिषद के अन्य चार देशों ने भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया है। भारत की सुरक्षा परिषद में अस्थायी सदस्यता दिसंबर 2012 तक है। दरअसल, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की रेस में भारत के साथ जर्मनी, जापान और ब्राजील भी शामिल हैं। अगर भारत की योग्यता को ध्यान में रखा जाए तो कई ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य हैं जो भारत की सदस्यता को आवश्यक बनाते हैं। पहला, पूरी दुनिया में आंतरिक कलह और युद्ध की स्थिति में जहां भी शांति वाहिनी सेना भेजी गई है उसमें भारतीय सेना की टुकड़ी भी शामिल रही है। भारत दुनिया का तीसरा ऐसा देश है जिसकी सेना हर मुकाम पर शांति और स्थायित्व की स्थापना के लिए जूझ रही है। 1950 से लेकर अभी तक 43 देशों में भारतीय सेना को भेजा जा चुका है। इन अभियानों में भारत के 90 हजार से ज्यादा सैनिक अपनी सेवा दे चुके हैं। प्रशिक्षण से लेकर सामूहिक प्रयास को अंजाम तक पहुंचाने में भारत की टुकड़ी हर तरह से सक्षम देखी गई है। भारत की सेना पर यह आरोप अभी तक नहीं लगा है कि उसने समस्याग्रस्त देश की राजनीति में घुसकर उस देश को या समाज को खंडित करने का प्रयास किया है। प्रत्यक्ष उदाहरण अफगानिस्तान का है। अफगानिस्तान में भारत की टुकड़ी न केवल संसाधन के निर्माण में लगी हुई है, बल्कि विखंडित समाज को जोड़कर एक नया स्वरूप देने की कोशिश भी कर रही है। इसके अलावा भारत न केवल सैन्य टुकड़ी के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ की सहायता करता है, बल्कि कई अन्य रूपों में भी मदद करता है। मसलन गृहकलह से जूझ रहे देशों में पुल के निर्माण के लिए इंजीनियर को भेजना, स्वास्थ्य समस्या को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर की टीम भेजना जैसे कई महत्वपूर्ण उतरदायित्वों का भारत ने वहन किया है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंात्रिक देश है। आर्थिक और सैनिक रूप से भारत शक्ति केंद्र बन चुका है। कई पश्चिमी देशों के लिए भारत का मध्यवर्गीय समाज दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बन गया है। इन सकरात्मक तथ्यों के बावजूद कई ऐसे तथ्य हैं जो भारत के लिए चुनौती बन सकते हैं। 1996 में स्थायी सदस्यता की दौड़ में भारत ने जापान से पटखनी खाई थी। कुछ वर्षों तक भारत ने इस मुहिम पर सोचना भी बंद कर दिया था। लेकिन परमाणु विस्फोट के उपरांत अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन की भारत यात्रा के बाद से परिस्थितियां बदलने लगीं। अब पश्चिमी देश भारत को गंभीरता से लेने लगे हैं। भारत-अमेरिका के बीच नागरिक परमाणु संधि ने भारत की साख को बढ़ाया है। भारत की पहचान एक गंभीर और स्थायी परमाणु देश के रूप में हाने लगी। फिर भी स्थायी सदस्यता के रास्ते में कई कांटे हैं। पहला, भारत को सदस्यता के लिए अपनी दावेदारी को अलग से पेश करना होगा। अगर भारत सामूहिक रूप से मामला पेश करने की कोशिश करेगा तो बात बिगड़ सकती है। दूसरा, अमेरिका सहित अन्य देशों के प्रति भारत पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हो सकता। परिस्थितियों के अनुसार सर्मथन की गति और धारा भी बदल सकती है। इसलिए भारत को दो वर्षों तक कठिन कूटनीतिक अभ्यास के दौर से गुजरना होगा। 192 देशों के मत को हासिल करने के लिए हरसंभव प्रयास करने होंगे। अस्थायी सदस्यता के लिए भारत ने 192 में से 187 देशों का सर्मथन प्राप्त किया था। खुद विदेश मंत्री ने 130 देशों के मंत्रियों से बातचीत की थी। इसलिए स्थायी सदस्यता पर भारत की दावेदारी ज्यादा तार्किक दिख रही है। अगर ऐसा होता है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख और बढ़ जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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