कांग्रेस के बुराड़ी अधिवेशन के राजनीतिक भाषणों और प्रस्तावों पर तो सबका ध्यान गया लेकिन विदेश नीति पर पारित प्रस्ताव और प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर लोगों ने ज्यादा गौर नहीं किया। इसका मूल कारण तो यही रहा कि भ्रष्टाचार और ‘भगवा आतंकवाद’ के मुद्दे सम्पूर्ण अधिवेशन पर छाये रहे। जहां तक विदेश नीति का प्रश्न है, उसे लेकर कोई इतना तगड़ा विवाद आजकल छिड़ा हुआ नहीं है कि उस पर कांग्रेसजन और मीडिया का ध्यान बरबस चला जाता। यही अधिवेशन दो-ढाई वर्ष पहले हुआ होता तो भारत-अमेरिकी परमाणु सौदा सुर्खियों में रहता। कांग्रेस के प्रस्ताव में अमेरिका के साथ भारत के घनिष्ठ सम्बंधों पर जो संतोष व्यक्त किया गया है, वह सही है। यदि ओबामा की भारत-नीति बुश से भिन्न होती तो यह माना जाता कि पिछले 8- 10 साल में भारत-अमेरिकी सम्बन्धों में जो नयी सुगंध पैदा हुई थी, वह अब उड़ने लगी है लेकिन ओबामा की भारत-यात्रा ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि अमेरिका भारत के साथ व्यापारिक, सामरिक और राजनीतिक सम्बंधों को घनिष्ठतर बनाना चाहता है। तो भी राजनीतिक स्तर पर वह अब भी ठिठका हुआ है। ओबामा ने सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सीट के सवाल पर बड़ा जलेबीदार जवाब दिया है। उसने रूस, फ्रांस और ब्रिटेन की तरह अभी तक भारत को महाशक्ति के तौर पर स्वीकार नहीं किया है। वह देखना चाहता है कि भारत की वर्तमान दो साल की अस्थायी सदस्यता के दौरान उसका आचरण कैसा रहता है? अगर अमेरिका यह ठाने बैठा है कि भारत उसके हर गलत- सलत कदम पर मुहर लगाता रहेगा तो यह उसकी गलतफहमी है। परमाणु-सौदे की खींचातानी के दौर में भारत ने वियना के परमाणु ऊर्जा अभिकरण में ईरान के खिलाफ पलटा जरूर खाया लेकिन इस तरह का द्रविड़ प्राणायाम यह सरकार दोबारा करेगी तो हमारी संसद उसे सहन नहीं करेगी। सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट पाने के लालच में क्या भारत अपनी स्वतंत्र और निष्पक्ष विदेश नीति को
प्रतिहत होने देगा ? अमेरिका भारत से लाख सामरिक सम्बंध बढ़ाना चाहे, पाकिस्तान को कंधे पर बिठाये रखना उसकी मजबूरी है। उसे पता है कि पाकिस्तान उसे ब्लेकमेल करता रहता है और वह दक्षिण एशिया का उद्दंड राष्ट्र (रोग़ स्टेट) है लेकिन वह भारत के इस अनवरत सिरदर्द को ठीक करने के लिए तैयार नहीं है। उसकी इस झिझक को बढ़ाने में अफगानिस्तान का अपना योगदान है। अफगानिस्तान की विषम स्थिति ने अमेरिका को पाकिस्तान पर अत्यधिक निर्भर कर दिया है। समझ में नहीं आता कि दलदल में फंसे अमेरिका ने अभी तो भारत को अफगानिस्तान का ठेका क्यों नहीं दिया है? अमेरिका और अफगानिस्तान चाहें तो अकेला भारत साल भर में पांच लाख जवानों की अफगान फौज खड़ी कर सकता है, जो तालिबान ही नहीं, जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान को भी सीधा कर सकती है। इस तरह की कोई रचनात्मक और गम्भीर बहस क्या बुराड़ी अधिवेशन में हो सकती थी? 15 हजार प्रतिनिधियों में से क्या कोई15 भी ऐसे थे जो ऐसी बहस वहां चला सकते थे? इसीलिए जब एकाध ने फिलिस्तीन और गुटनिरपेक्षता की याद दिलायी तो वह खबर बन गयी। असलियत तो यह है कि अमेरिका ही नहीं, शेष चारों वीटोधारी महाशक्तियां भी भारत के लम्बे-चौड़े बाजार और सामरिक सौदों पर लार टपका रही हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला मौका है, जबकि पांचों महाशक्तियों के शासनाध्यक्ष एक के बाद एक भारत दौड़े आये हैं। हर महाशक्ति के साथ बन रहे द्विपक्षीय सम्बंधों में अगर रेवड़ियां हैं तो कुछ कंकड़ भी हैं। उन्हें चीन्हने और बीनने का अवकाश ऐसे अधिवेशनों में आजकल कहां होता है। गांधी और नेहरू की कांग्रेस के अधिवेशनों में ऐसे मुद्दों पर कभी-कभी जमकर बहस होती थी लेकिन ये सब मुद्दे आजकल प्रस्ताव ड्राफ्ंिटग कमेटी के मत्थे मढ़कर सारे नेता निश्ंिचत हो जाते है। पार्टी और सरकार भी विदेश नीति को अपने सुयोग्य आईएफएस अधिकारियों के भरोसे छोड़ देती हैं। इसलिए अधिवेशन में खड़े होकर कोई प्रतिनिधि यह नहीं पूछता कि चीन से बात करते हुए हमें हकलाने की जरूरत क्यों है? जब वह कश्मीर और अरुणाचल को भारत का अंग नहीं मानता तो तिब्बत, ताइवान और शिन्चयांग के बारे में हम अपना मुंह क्यों नहीं खोलते? हम भी चीनी नागरिकों को वीजा का अलग कागज पकड़ाना शुरू क्यों नहीं करते? सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए हमें चीन के आगे अपनी झोली फैलाने की जरूरत क्या है? वह सीट तो हमारे पास खुद चलकर आएगी। चीन का जैसा राजनीतिक रवैया आजकल भारत के प्रति है, उस स्थिति में अगर वह स्वत: समर्थन दे भी तो भारत को उससे कह देना चाहिए कि इसे आप अपने पास ही रखिए। आप चाहें तो परमाणु तकनीक की तरह इसे भी पाकिस्तान को दे दीजिए। भारत जब तक चीन की पाकिस्तानपरस्ती पर खुलकर प्रहार नहीं करेगा, चीन के साथ उसके सम्बंध सहज नहीं होंगे। अन्य महाशक्तियों के साथ भारत के सम्बंधों का स्वरूप कुछ इस तरह उभरना चाहिए कि यह विश्व बहुध्रुवीय बन सके और समृद्धि ज्यादा से ज्यादा राष्ट्रों में बंट सके। पड़ोसी राष्ट्रों से भारत के सम्बंध प्राय: अच्छे ही हैं लेकिन पाकिस्तान से सम्बंध तभी सुधरेंगे जब हमारे नीति-निर्माता तुलसीदासजी की इस पंक्ति को हृदयंगम कर लेंगे कि ‘भय बिनु होइ न प्रीति।’
पाकिस्तान का फौजी सत्ता-प्रतिष्ठान अनुनय-विनय की भाषा कभी नहीं समझेगा। उसे मनमोहनी मधुर भाषा नहीं, इंदिराई दहाड़ समझ में आती है। इसी प्रकार हम नेपाल में गालियां खाते हैं और फिर भी बेमजा नहीं होते हैं। नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और अफगानिस्तान में चीन अपनी सामरिक उपस्थिति दिनों-दिन बढ़ाते चला जा रहा है और हम क्षेत्रीय महाशक्ति के मधुर सपनों में खोये हुए हैं। अफगानिस्तान में हम अपना रुपया और खून बहाते चले जा रहे हैं और हमें मिल क्या रहा है? यह तमगा कि हम अमेरिका के अनुचर हैं। कांग्रेस अधिवेशन में अगर कुछ प्रतिनिधि ऐसे मुद्दे उठाते तो सरकार के सिर पर भी जूं रेंगती लेकिन विदेश नीति में धरा क्या है? इसमें न नोट बनते हैं न वोट! कांग्रेसी ऐसे फिजूल के कामों में अपना वक्त खराब क्यों करें? विदेशों में भारत की छवि, पहचान और शक्ति बढ़ाने का काम हमारा सुयोग्य विदेश मंत्रालय बराबर करता ही रहता है लेकिन इस जिम्मेदारी को निभाने में जब राजनीतिक और सामाजिक संगठन हाथ बंटाने लगते हैं तो कुछ नया ही समां बंधता है। पाकिस्तान और चीन जैसे राष्ट्रों के साथ यदि भारत का गैर-सरकारी सम्बंध या जन- संवाद बढ़े तो उसके परिणाम चमत्कारी हो सकते हैं। इन देशों के आम आदमियों में भारत के प्रति जो सद्भाव है, उसके दोहन और प्रोत्साहन का काम ऐसे अधिवेशनों के जरिए बखूबी हो सकता है।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला मौका है, जबकि पांचों महाशक्तियों के शासनाध्यक्ष एक के बाद एक भारत दौड़े आये हैं। हर महाशक्ति के साथ बन रहे सम्बंधों में अगर रेवड़ियां हैं तो कुछ कंकड़ भी हैं
(लेखक विदेशी मामलों के विशेषज्ञ पत्रकार है)
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