Friday, December 24, 2010

अब ईरान को घेरने की कोशिश

लंबे समय से ईरान अपनी परमाणु और सैनिक क्षमता बढ़ाने के लिए जैसी सक्रियता दिखा रहा है, उसे अमेरिकी खुफिया एजेंसी मध्य पूर्व मेंसाइकोलॉजिकल वॉरका नाम दे रही है। क्या मध्य पूर्व में ईरान वाकई किसी मनौवैज्ञानिक युद्ध का वातावरण तैयार कर रहा है या फिर अमेरिका तथा उसके सहयोगी दुनिया को भ्रम में डालने का प्रयास कर रहे हैं? सऊदी अरब द्वारा अमेरिका से सांप का फन कुचलने का आग्रह इसी स्थिति का नतीजा है या इसकी वजह कुछ और है?
ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से चूहे-बिल्ली का खेल चल रहा है। एक तरफ ईरान परमाणु क्षमता के विस्तार के साथ सतत सैन्य युद्धाभ्यास के जरिये अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ सऊदी अरब ईरान को घेरने की रणनीति पर काम करता दिखाई दे रहा है, जिसमें अमेरिका और इस्राइल भी शामिल हैं। ब्रिटेन के एक समाचार पत्र ने अमेरिकी रक्षा अधिकारी के हवाले से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें कहा गया है कि सऊदी अरब ने इस्राइली लड़ाकू विमानों को ईरान के परमाणु संयंत्रों पर बमबारी करने के लिए अपने वायुक्षेत्र से गुजरने की इजाजत दे दी है। सऊदी अरब के इस निर्णय को यू-टर्न तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन एक मौलिक सवाल तो उठता ही है कि क्या अब मध्य पूर्व में अरब और इस्राइल का टकराव केंद्रीय विषय नहीं रह गया है? क्या एक बार फिर टकराव का वास्तविक केंद्र सुन्नी और शिया के बीच सिमट गया है?
बेशक इस्राइल और ईरान एक-दूसरे के शत्रु नंबर एक हैं, पर अब जब सऊदी अरब इस्राइल को ईरान पर आक्रमण के लिए रास्ता मुहैया कर रहा है, तो यह निश्चित हो चुका है कि मध्य पूर्व में दो नए ध्रुव बन चुके हैं, जिसमें एक तरफ ईरान और उसके सहयोगी (हिजबुल्ला और हमास) हैं, तो दूसरी तरफ इस्राइल, सऊदी अरब और शेष सुन्नी दुनिया के साथ अमेरिका भी है। ये स्थितियां ईरान के लिए अनुकूल नहीं लगतीं। शायद इन्हीं परिस्थितियों में ईरान परमाणु बम हासिल करना चाहता है। जबकि इसके उलट वैश्विक कूटनीतिक हलकों में यह बात प्रचारित की जा रही है कि सुन्नी अरब दुनिया शिया ईरान की ताकत से भयभीत है, इसलिए वह उसके खिलाफ लामबंदी की तैयारियां कर रहा है। अरब दुनिया को महफूज रखने के लिए अमेरिकी परमाणु और सैन्य छतरी उपलब्ध है, लेकिन ईरान के मामले में यह बात लागू नहीं होती। ऐसे में ईरान का यह सोचना, कि परमाणु हथियार ही उसके वास्तविक रक्षा कवच बन सकते हैं, तर्कसंगत है। इसलिए बम बनाना और छिपाए रखना ईरान की विवशता है।
ईरान लगातार बडे़ पैमाने पर गुपचुप सैन्य युद्धाभ्यास भी कर रहा है और अपनी मिसाइल शृंखला एवं परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है। उसने उत्तर कोरिया से 19 आधुनिक मिसाइलें हासिल कर ली हैं, जिनके पश्चिमी यूरोपीय देशों पर हमले के लिए इस्तेमाल किए जाने की आशंका है। इन मिसाइलों के डिजाइन के आधार पर ईरान को लंबी दूरी की मिसाइलें तैयार करने में भी मदद मिलेगी। ऐसी भी खबर है कि फारस की खाड़ी में गश्त के लिए ईरान गुप्त रूप से खतरनाक विस्फोटकों से युक्त एक आत्मघाती जहाजी बेड़ा बना रहा है। द सनके मुताबिक ईरानी नौसेना ध्वनि से भी तेज आत्मघाती नौकाएं बना रही है। यह बेड़ा फारस की खाड़ी में गश्त लगाएगा, जहां अमेरिका और ब्रिटेन की सेना सक्रिय है।
कुछ समय पहले अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की एक रिपोर्ट में खुलासा किया गया था कि सुरक्षा परिषद के कड़े प्रतिबंधों और अमेरिका सहित विश्व समुदाय के भारी दबाव के बावजूद ईरान ने लगभग 22 किलो संवर्द्धित यूरेनियम बनाने में सफलता हासिल कर ली है। बताते हैं कि उसके पास जितना यूरेनियम है, वह समूचे क्षेत्र में तबाही फैलाने के लिए काफी है। मगर अकेले उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि सुन्नी बम (पाकिस्तानी) से ईरानी शिया बम अधिक खतरनाक नहीं है। ईरान पर आरोप है कि वह हिजबुल्ला और हमास को परमाणु हथियार सौंप सकता है, दूसरी तरफ पाकिस्तान भी लश्कर, जैश और अलकायदा-तालिबान को बम सौंप सकता है। ये तर्क अपनी जगह हैं, देखना यह है कि मनोवैज्ञानिक युद्ध के बहाने ईरान के ध्वंस की रणनीति निर्मित की जाएगी या फिर शांति का कोई तरीका ईजाद किया जाएगा। यदि सुन्नी और शिया दुनिया को केंद्र में रखकर लगातार तनाव बढ़ते हैं, तो नतीजे अच्छे नहीं होंगे।

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