Wednesday, December 29, 2010

विश्व शांति के नए युग का स्टार्ट

स्टार्ट संधि अभी अमेरिका और रूस के बीच हुई है लेकिन अगर इस पर अमल हो गया तो ब्रिटेन, फ्रांस और चीन को भी दुनिया बाध्य करेगी कि वे इसका अनुकरण करें। इसकी पूरी संभावना है कि समग्र परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी), जिसे सीनेट ने 1993 में रद्द कर दिया था, फिर जी उठे। इस संधि ने विश्व के शक्ति-गणित को शीष्रासन करवा दिया है। पहले माना जाता था कि शस्त्रों की संख्या बढ़ाते जाने से सुरक्षा होगी पर अब माना जाने लगा है कि शस्त्रों को घटाने में ही सबकी सुरक्षा ह
स्टार्टनामक संधि पर मुहर लगाकर अमेरिकी सीनेट ने न सिर्फ ओबामा की प्रतिष्ठा में चार चांद लगा दिए हैं बल्कि विश्व निरस्त्रीकरण और विश्व शांति को नया आयाम भी प्रदान कर दिया है। यह वह संधि है जिस पर अप्रैल माह में अमेरिका और रूस ने मिलकर प्राहा में दस्तखत किए थे। स्टार्टयानी स्टेटजिक आर्म्स रिडक्शन टीटी! अब उक्त दोनों राष्ट्रों ने घोषणा की है कि वे 1550 से ज्यादा परमाणु शस्त्र नहीं रखेंगे और 700 से ज्यादा प्रक्षेपण- सुविधाएं तैनात नहीं करेंगे। यानी दोनों महाशक्तियां अपने र्वतमान शस्त्रागारों में अभूतपूर्व कटौती करेंगी। यह कटौती असाधारण है। इस समय अमेरिका के पास 5576 परमाणु शस्त्र और 1198 प्रक्षेपण-सुविधाएं हैं जबकि रूस के पास 3909 परमाणु शस्त्र और 814 प्रक्षेपण-सुविधाएं हैं। दोनों राष्ट्रों की शस्त्र-क्षमताओं में काफी अंतर है। रूस के मुकाबले अमेरिका की क्षमता डेढ़-दो गुनी है लेकिन अब दोनों महाशक्तियों की परमाणु-शक्ति लगभग बराबर हो जाएगी। इस दृष्टि से अमेरिका ने स्टार्टको स्वीकार करके रूस के मुकाबले ज्यादा त्याग किया है। इस संधि में यह प्रावधान भी है कि दोनों राष्ट्र एक-दूसरे के परमाणु-शस्त्रागारों की खुली निगरानी करेंगे। जाहिर है दोनों राष्ट्र र्सफ वियना के परमाणु ऊर्जा अभिकरण के इंस्पेक्टरों की रिपोर्ट के ही भरोसे नहीं रहेंगे। वे अपने-अपने इंस्पेक्टरों को एक-दूसरे के यहां भेजेंगे। इस प्रावधान को रखने के दो अभिप्राय हैं। एक तो यह कि दोनों इस मामले में कोई भी पोल नहीं रहने देंगे। हर तथ्य को खुद ही ठोक-बजाकर देखेंगे। दूसरा यह कि पारस्परिक जांच का यह प्रावधान दोनों राष्ट्रों के बीच पारस्परिक विश्वास और सद्भाव को बढ़ाएगा। जो राष्ट्र अभी दस-पंद्रह साल पहले तक एक-दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए थे और एक-दूसरे के सामरिक शस्त्रों की जानकारी निकालने के लिए अपने जासूसों को भिड़ाए रखते थे, वे आज अपने शस्त्रागारों को एक-दूसरे के लिए पूरी तरह खोल देंगे। दूसरे शब्दों में स्टार्टनामक इस संधि ने विश्व राजनीति में पारस्परिक विश्वास के नए युग का सूत्रपात कर दिया है। विश्व शांति की दिशा में बढ़ा हुआ यह ऐतिहासिक कदम है। सच पूछें तो इस स्टार्टसंधि तक पहुंचना आसान नहीं था। अब से पहले दोनों राष्ट्रों के नीति-निर्माता इस मुद्दे पर एक-दूसरे से सशंकित रहते थे। सबसे पहले तो वे अन्य पक्ष द्वारा पेश किए गए आंकड़ों पर ही विश्वास नहीं करते थे। वे कहते थे कि जो बताए गए हैं, उन शस्त्रास्त्रों की संख्या तो ठीक है लेकिन जो नहीं बताए गए हैं, उनकी संख्या कितनी है, क्या पता? या कौन-से शस्त्र कहां छिपाए गए हैं, किसको पता है? इसके अलावा अमेरिका के सीनेटरों और कांग्रेसमेनों की सबसे बड़ी शिकायत थी और कुछ की अब भी है कि यह स्टार्टसंधि अपने आप में भेदभावपूर्ण है। अमेरिका को अपने शस्त्र उसी अनुपात में घटाने चाहिए, जिसमें रूस घटा रहा है। इस संधि से अमेरिका घाटे में रहेगा। अब तक विश्व की सबसे शक्तिशाली एक मात्र महत्तम शक्ति अमेरिका ही था लेकिन इस, संधि ने इस संख्या को एक के बजाय दो में बदल दिया है। अब अमेरिका और रूस का सामरिक शक्ति-संतुलन लगभग बराबर हो गया है। यह संधि अभी तो केवल अमेरिका और रूस के बीच हुई है लेकिन अगर इस पर अमल हो गया तो ब्रिटेन, फ्रांस और चीन को भी दुनिया बाध्य करेगी कि वे इसका अनुकरण करें। इस समय दुनिया में ज्ञात और गुप्त सामरिक हथियारों की संख्या लगभग 20 हजार है। ये हथियार इतने ज्यादा हैं कि मिलकर हमारी इस दुनिया का ही नहीं, ब्रह्मांड के अन्य अनेक ग्रहों का भी समूल-नाश कर सकते हैं। आज अमेरिका और रूस ने अपने आपको 1550 हथियारों पर राजी किया है, हो सकता है कि पांच सालों के बाद वे सिर्फ 500 पर राजी हो जाएं और फिर कुछ र्वष बाद वे तथा अन्य परमाणु-राष्ट्र इन विनाशकारी हथियारों से पूर्ण मुक्ति का मार्ग चुन लें। यह भी असंभव नहीं कि वे आगे चलकर पारंपरिक शस्त्रास्त्रों के नियंतण्रपर भी विचार करने लगें। 1959 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण देते हुए पं. जवाहरलाल नेहरू ने जिस व्यापक और समग्र निरस्त्रीकरण की मांग की थी, यह स्टार्टसंधि उसी महान स्वप्न का स्टार्टसिद्ध हो सकती है। यह संधि अचानक नहीं हुई है। इसकी नींव ओबामा ने पांच अप्रैल 2008 को अपने प्राहा भाषण में रखी थी। ढाई साल पहले जब ओबामा ने परमाणु-मुक्त विश्व का आह्वान किया था तो दुनिया समझ रही थी कि वे अभी नए-नए राष्ट्रपति बने हैं। वे नेहरू की तरह अपने आत्म-निर्मित स्वप्न-लोक में विचरण कर रहे हैं। उन्हें जब शांति का नोबेल पुरस्कार मिला तो लोगों ने उनका मजाक भी उड़ाया लेकिन यह संधि संपन्न करके उन्होंने अपने आप को नोबेल का सच्चा हकदार बना लिया है। 19 साल पहले जो स्टार्ट-1’ संधि संपन्न हुई थी, उसकी अवधि पांच दिसम्बर 2009 को समाप्त होनी थी लेकिन जनवरी 1993 में जो स्टार्ट-2’ तैयार हुई थी, वह बीच में ही लटक गई। इसे अब स्टार्ट-3’ कह सकते हैं। इसस्टार्ट-3’ के फलस्वरूप अब रूस और अमेरिका का रक्षा र्खच तो घटेगा ही, उनके आपसी संबंध भी सुधरेंगे। ओबामा ने रिपब्लिकन सीनेटरों से र्समथन मांगते समय यह र्तक भी दिया था कि अब ईरान को पटरी पर लाने में रूस का विषेष सहयोग मिलेगा। यद्यपि इस संधि के पक्ष में ओबामा को सीनेट के 71 वोट मिले लेकिन 26 सीनेटरों ने इसका विरोध भी किया। इस संधि पर मुहर लगाने के साथ सीनेट ने यह मंशा भी जाहिर की है कि बुश ने यूरोप में जो मिसाइल डिफेंसकी योजना बनाई थी, यह संधि उसके आड़े नहीं आएगी। संधि की प्रस्तावना और सीनेट के प्रस्ताव में कुछ अन्र्तविरोध दिखाई पड़ता है। हो सकता है, इसको मुद्दा बनाकर रूसी दूमा (संसद) कुछ अड़ंगा लगा दे लेकिन ओबामा की अनाक्रामक मुद्रा और सद्भावपूर्ण यूरोप-नीति रूस को प्रेरित करेगी कि वह इस संधि का पुष्टिकरण कर दे। इस संधि का पुष्टिकरण होते ही इस बात की पूरी संभावना है कि समग्र परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी), जिसे सीनेट ने 1993 में रद्द कर दिया था, फिर से जी उठे। इस संधि ने विश्व के शक्ति-गणित को शीष्रासन करवा दिया है। पहले माना जाता था कि शस्त्रों की संख्या बढ़ाते जाने से अपनी सुरक्षा होगी पर अब माना जाने लगा है कि शस्त्रों को घटाने में ही सबकी सुरक्षा है। (लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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