Friday, December 31, 2010

पाक सेना ने गायब किए हजारों विद्रोही

देर से ही सही पर अमेरिका ने यह स्वीकार कर लिया है कि पाकिस्तान जंग में उसकी मदद के नाम पर अपने हित साध रहा है। पिछले महीने अमेरिकी विदेश मंत्रालय द्वारा कांग्रेस को सौंपी गई एक गोपनीय रिपोर्ट में कहा गया है कि पाक पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने हजारों राजनैतिक अलगाववादियों और तालिबान लड़ाकों को गायब कर दिया है। माना जा रहा है कि इनमें से अधिकतर को या तो मार दिया गया या फिर किसी गुप्त जगह प्रताडि़त किया गया। ओबामा प्रशासन ने इस रिपोर्ट पर गहरी चिंता प्रकट की है। आठ पेज कि इस रिपोर्ट की एक कॉपी न्यूयॉर्क टाइम्स के पास है। इसके अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि 9/11 के बाद पाकिस्तान, खासतौर पर बलूचिस्तान में मानवाधिकारों का खुले तौर पर उल्लंघन कर रहा है। जंग के नाम पर पाक पुलिस और सेना ने बलूचिस्तान में बलूच नेशनल अपोजिशन पार्टी के हजारों सदस्यों को हिरासत में ले रखा है। ये वे लोग हैं जो गुरिल्ला संगठनों के जरिए अलग बलूचिस्तान के लिए सालों से संघर्ष कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार इन लोगों को बिना किसी आरोप के उठाया गया है और इन्हें लेकर कई मामले में कोर्ट में चल रहे हैं। पाक के भी कई मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि पिछले दस साल में सुरक्षा एजेंसियों ने हजारों लोगों को गलत तरीके से गायब कर दिया है। न्यूयॉर्क टाइम्स का मानना है कि यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका और पाक के संबंध बड़े नाजुक चल रहे हैं। निहत्थे तालिबान का कत्ल : विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि पाक सेना ने बगैर किसी ट्रायल के बहुत से निहत्थे तालिबान को मौत के घाट उतार दिया। रिपोर्ट में उन कारणों का भी जिक्र है जिस वजह से अमेरिकी सेना ने हाल ही में पाक सैनिकों को ट्रेनिंग देने से मना किया था। अमेरिकी सेना को पता चला था कि पाक सेना की एक टुकड़ी ने तालिबान के खिलाफ अभियान के दौरान निहत्थे कैदियों और आम नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया था। वॉशिंगटन ने चिंता जताई है कि पाक सरकार मानवाधिकार हनन मामलों अब तक बहुत मामूली प्रगति कर पाई है और सेना द्वारा ऐसे मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
गायब लोगों का सही आंकड़ा नहीं : लाहौर में ह्यूमन राइट्स वॉच के वरिष्ठ शोधकर्ता अली दयान हसन का कहना है कि गायब लोगों का सही आंकड़ा बताना बेहद मुश्किल है। हालांकि अगस्त 2009 तक ऐसे 1291 लोगों का पता चला था जिन्हें सुरक्षा एजेंसियों ने जांच के नाम पर गायब कर दिया है। इस बीच बलूचिस्तान से गायब हुए लोगों की एक याचिका पर पाक सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अख्तिायार किया है।

भारत के आयोग भेजने के प्रस्ताव पर पाक की आनाकानी

 मुंबई हमले के साजिशकर्ताओं से पूछताछ के लिए आयोग पाकिस्तान भेजने संबंधी भारत के प्रस्ताव पर पाक सरकार ने आनाकानी शुरू कर दी है। प्रस्ताव भेजे जाने के कुछ दिनों बाद ही गुरुवार को पाकिस्तान सरकार की तरफ से कहा गया है कि भारतीय आयोग को यहां आकर संदिग्धों से पूछताछ करने की कोई कानूनी जरूरत नहीं है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अब्दुल बासित ने कहा कि भारत में जिंदा पकड़े गए आतंकवादी अजमल कसाब और हमले की जांच कर रहे अधिकारियों से पूछताछ के लिए पाकिस्तान की ओर से आयोग भेजने के प्रस्ताव की कानूनी जरूरत है ताकि संदिग्धों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाई जा सके। भारत के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारतीय आयोग के यहां आकर मुंबई हमले से जुड़े संदिग्धों से पूछताछ करने की कोई कानूनी जरूरत नहीं है। बासित ने कहा कि हमारे न्यायिक आयोग का भारत जाना एक कानूनी जरूरत है ताकि मुंबई हमले से जुड़े मुकदमे को आगे बढ़ाया जा सके। जहां तक भारत का प्रस्ताव है, उसकी हमें कोई कानूनी जरूरत नजर नहीं आ रही है। बासित साप्ताहिक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। पूछताछ के बारे में नई दिल्ली और इस्लामाबाद के आग्रहों पर उन्होंने कहा कि हमारा आग्रह और भारत का प्रस्ताव दोनों अलग हैं। इन दोनों को अलग परिपे्रक्ष्य में देखने की जरूरत है। हम भारत के प्रस्ताव पर अपने कानूनों के मुताबिक विचार करेंगे। भारत की ओर से यह पेशकश की गई थी कि वह लश्कर-ए-तैयबा के स्वयंभू कमांडर जकीउर रहमान लखवी सहित मुंबई हमले के सभी साजिशकर्ताओं से पूछताछ के लिए एक आयोग पाकिस्तान भेजना चाहता है ताकि इस जघन्य हमले के षड्यंत्रकारियों के आवाज के नमूने लिए जा सकें। इससे पहले पाकिस्तान ने प्रस्ताव दिया था कि वह कसाब और मामले से संबंधित अधिकारियों से पूछताछ के लिए एक आयोग भारत भेजना चाहता है। आंतरिक मामलों के मंत्री रहमान मलिक का कहना है कि मामले की सुनवाई को आगे बढ़ाने के लिए कसाब और अन्य लोगों से पूछताछ करना आवश्यक है।

Thursday, December 30, 2010

कोरिया में तनाव से चिंतित चीन का शक्ति प्रदर्शन

 उत्तर-दक्षिण कोरिया के बीच युद्ध की आशंका के बीच चीन शक्ति प्रदर्शन में जुट गया। बुधवार को चीन के रक्षा मंत्री जनरल लियांग गुआंगली के हवाले से सरकारी अखबार चाइना डेली ने लिखा, फिलहाल हम नहीं कह सकते हैं कि कोरियाई प्रायद्वीप में युद्ध होगा या नहीं, लेकिन क्षेत्रीय विवाद के और बढ़ने की आशंका है। ऐसे में हमें राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा को सबसे ऊपर रखना होगा। उन्होंने कहा कि सत्तासीन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना का भी यही मानना है। हमारे 23 लाख सैनिक आधुनिक हथियारों लैस हैं और वे किसी भी क्षेत्रीय सैन्य विवाद से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उनकी यह प्रतिक्रिया अमेरिकी मीडिया की उस रिपोर्ट के बाद आई है, जिसमें कहा गया था कि चीन की सैन्य ताकत के बारे में दुनिया का आकलन गलत है। वो जितना दिखता है तकनीक रूप से उतना सक्षम नहीं है। उल्लेखनीय है कि एशिया की प्रमुख ताकत बनकर उभरे चीन बीते 30 वर्षो से किसी युद्ध अथवा बड़े विवाद में नहीं पड़ा, लेकिन इस दौरान पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने अपनी तैयारियां और चौकसी चाक-चौबंद रखीं। गौरतलब है कि पाकिस्तान के निकट सहयोगी चीन का भारत के साथ भी सीमा विवाद लंबे समय से चला आ रहा है। भारत और चीन इसे वार्ता के जरिए सुलझाने में लगे है।

भारत-पाक रेल व्यापार आज से

पाकिस्तान ने दिया भारतीय रेलवे ड्राइवरों को वीजा
सात दिन में एक हजार करोड़ का व्यापार थमा
अमृतसर पिछले सात दिन से बंद पड़ा भारत-पाक रेल व्यापार गुरुवार से पटरी पर दौड़ेगा। पाकिस्तान ने मंगलवार को भारतीय रेलवे के तीन ड्राइवरों को वीजा दे दिया है। अब गुरुवार को दोनों देशों के बीच व्यापार दोबारा शुरू होने की उम्मीद बंधी है। 23 दिसंबर से रेल कारगो अमृतसर में लोडिंग-अनलोडिंग का बंद पड़ा काम बुधवार दोपहर एक बार फिर शुरू हुआ। पाकिस्तान जाने के लिए मालगाड़ी के 49 वैगन में लोडिंग हुई। हालांकि, अभी भी पाकिस्तान जाने वाले सामान के लोड ट्रक रेल कारगो में खड़े हैं। द अमृतसर चेंबर ऑफ कामर्स के महासचिव राजेश सेतिया की मानें तो पिछले सात दिन में भारत-पाक के बीच करीब एक हजार करोड़ का व्यापार रुक गया था। पाकिस्तान सीमेंट इंपो‌र्ट्स एसोसिएशन के प्रधान एमपीएस चड्ढा कहते हैं कि पाकिस्तान से भारत आने के लिए सीमेंट से लोड मालगाड़ी के 900 वैगन खड़े हैं। पाकिस्तान के साथ सीमेंट का कारोबार करने वाले अमृतसर के सरबदीप सिंह कहते हैं कि पिछले सात दिन में सीमेंट के व्यापारियों को भारी नुकसान हुआ है। सिंह ने बताया कि पाकिस्तान के व्यापारियों ने भारत भेजा जाने वाला सीमेंट पाकिस्तान रेल में लोड कराकर बैंक से पैसे भी रिलीज करा लिए हैं। जबकि भारतीय व्यापारियों को सीमेंट अभी तक मिला ही नही है। उधर, बुधवार को अटारी रेलवे स्टेशन पर फिरोजपुर से आई रेल अधिकारियों की टीम ने दौरा किया। गुरुवार से दोनों देशों के बीच मालगाड़ी की आवाजाही शुरू होने की उम्मीद है।

ईरान ने भारत को दी तेल आपूर्ति रोकने की धमकी

ईरान की तेल बेचने वाली सरकारी कंपनी नेशनल ईरानीयन ऑयल कंपनी ने भारत को तेल आपूर्ति रोकने की धमकी दी है। कंपनी ने कहा है कि अगर भारतीय रिजर्व बैंक भुगतान की गांरटी नहीं लेता है तो वह भारत को तेल आपूर्ति बंद कर देगी। ईरान ने यह बात रिजर्व बैंक के हालिया बयान के बाद कही है। रिजर्व बैंक ने कहा था कि ईरान के साथ तेल बिक्री के सौदे एशियन क्लियंरिंग यूनियन (एसीयू) सिस्टम से बाहर होने चाहिए। ईरान की इस धमकी के बाद भारत में तेल की किल्लत पैदा होने की आशंका जताई जा रही है। तेल कंपनियों के सूत्रों का कहना है कि ईरान भारत को कच्चा तेल निर्यात करने वाला प्रमुख राष्ट्र है। भारत में होने वाले कुल कच्चे तेल आयात का 12 फीसदी हिस्सा ईरान से ्रआता है। उद्योग सूत्रों ने कहा है कि रिजर्व बैंक बिना वैकल्पिक व्यवस्था किए इस एसीयू से बाहर हो गया है, जो वर्ष 1976 से चल रहा था। इतनी बडी मात्रा का विकल्प आसानी से नहीं तलाशा जा सकता है। कच्चे तेल की कीमतें बढ रही है ऐसे में तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका से कीमतों को और बल मिलेगा।

Wednesday, December 29, 2010

विश्व शांति के नए युग का स्टार्ट

स्टार्ट संधि अभी अमेरिका और रूस के बीच हुई है लेकिन अगर इस पर अमल हो गया तो ब्रिटेन, फ्रांस और चीन को भी दुनिया बाध्य करेगी कि वे इसका अनुकरण करें। इसकी पूरी संभावना है कि समग्र परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी), जिसे सीनेट ने 1993 में रद्द कर दिया था, फिर जी उठे। इस संधि ने विश्व के शक्ति-गणित को शीष्रासन करवा दिया है। पहले माना जाता था कि शस्त्रों की संख्या बढ़ाते जाने से सुरक्षा होगी पर अब माना जाने लगा है कि शस्त्रों को घटाने में ही सबकी सुरक्षा ह
स्टार्टनामक संधि पर मुहर लगाकर अमेरिकी सीनेट ने न सिर्फ ओबामा की प्रतिष्ठा में चार चांद लगा दिए हैं बल्कि विश्व निरस्त्रीकरण और विश्व शांति को नया आयाम भी प्रदान कर दिया है। यह वह संधि है जिस पर अप्रैल माह में अमेरिका और रूस ने मिलकर प्राहा में दस्तखत किए थे। स्टार्टयानी स्टेटजिक आर्म्स रिडक्शन टीटी! अब उक्त दोनों राष्ट्रों ने घोषणा की है कि वे 1550 से ज्यादा परमाणु शस्त्र नहीं रखेंगे और 700 से ज्यादा प्रक्षेपण- सुविधाएं तैनात नहीं करेंगे। यानी दोनों महाशक्तियां अपने र्वतमान शस्त्रागारों में अभूतपूर्व कटौती करेंगी। यह कटौती असाधारण है। इस समय अमेरिका के पास 5576 परमाणु शस्त्र और 1198 प्रक्षेपण-सुविधाएं हैं जबकि रूस के पास 3909 परमाणु शस्त्र और 814 प्रक्षेपण-सुविधाएं हैं। दोनों राष्ट्रों की शस्त्र-क्षमताओं में काफी अंतर है। रूस के मुकाबले अमेरिका की क्षमता डेढ़-दो गुनी है लेकिन अब दोनों महाशक्तियों की परमाणु-शक्ति लगभग बराबर हो जाएगी। इस दृष्टि से अमेरिका ने स्टार्टको स्वीकार करके रूस के मुकाबले ज्यादा त्याग किया है। इस संधि में यह प्रावधान भी है कि दोनों राष्ट्र एक-दूसरे के परमाणु-शस्त्रागारों की खुली निगरानी करेंगे। जाहिर है दोनों राष्ट्र र्सफ वियना के परमाणु ऊर्जा अभिकरण के इंस्पेक्टरों की रिपोर्ट के ही भरोसे नहीं रहेंगे। वे अपने-अपने इंस्पेक्टरों को एक-दूसरे के यहां भेजेंगे। इस प्रावधान को रखने के दो अभिप्राय हैं। एक तो यह कि दोनों इस मामले में कोई भी पोल नहीं रहने देंगे। हर तथ्य को खुद ही ठोक-बजाकर देखेंगे। दूसरा यह कि पारस्परिक जांच का यह प्रावधान दोनों राष्ट्रों के बीच पारस्परिक विश्वास और सद्भाव को बढ़ाएगा। जो राष्ट्र अभी दस-पंद्रह साल पहले तक एक-दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए थे और एक-दूसरे के सामरिक शस्त्रों की जानकारी निकालने के लिए अपने जासूसों को भिड़ाए रखते थे, वे आज अपने शस्त्रागारों को एक-दूसरे के लिए पूरी तरह खोल देंगे। दूसरे शब्दों में स्टार्टनामक इस संधि ने विश्व राजनीति में पारस्परिक विश्वास के नए युग का सूत्रपात कर दिया है। विश्व शांति की दिशा में बढ़ा हुआ यह ऐतिहासिक कदम है। सच पूछें तो इस स्टार्टसंधि तक पहुंचना आसान नहीं था। अब से पहले दोनों राष्ट्रों के नीति-निर्माता इस मुद्दे पर एक-दूसरे से सशंकित रहते थे। सबसे पहले तो वे अन्य पक्ष द्वारा पेश किए गए आंकड़ों पर ही विश्वास नहीं करते थे। वे कहते थे कि जो बताए गए हैं, उन शस्त्रास्त्रों की संख्या तो ठीक है लेकिन जो नहीं बताए गए हैं, उनकी संख्या कितनी है, क्या पता? या कौन-से शस्त्र कहां छिपाए गए हैं, किसको पता है? इसके अलावा अमेरिका के सीनेटरों और कांग्रेसमेनों की सबसे बड़ी शिकायत थी और कुछ की अब भी है कि यह स्टार्टसंधि अपने आप में भेदभावपूर्ण है। अमेरिका को अपने शस्त्र उसी अनुपात में घटाने चाहिए, जिसमें रूस घटा रहा है। इस संधि से अमेरिका घाटे में रहेगा। अब तक विश्व की सबसे शक्तिशाली एक मात्र महत्तम शक्ति अमेरिका ही था लेकिन इस, संधि ने इस संख्या को एक के बजाय दो में बदल दिया है। अब अमेरिका और रूस का सामरिक शक्ति-संतुलन लगभग बराबर हो गया है। यह संधि अभी तो केवल अमेरिका और रूस के बीच हुई है लेकिन अगर इस पर अमल हो गया तो ब्रिटेन, फ्रांस और चीन को भी दुनिया बाध्य करेगी कि वे इसका अनुकरण करें। इस समय दुनिया में ज्ञात और गुप्त सामरिक हथियारों की संख्या लगभग 20 हजार है। ये हथियार इतने ज्यादा हैं कि मिलकर हमारी इस दुनिया का ही नहीं, ब्रह्मांड के अन्य अनेक ग्रहों का भी समूल-नाश कर सकते हैं। आज अमेरिका और रूस ने अपने आपको 1550 हथियारों पर राजी किया है, हो सकता है कि पांच सालों के बाद वे सिर्फ 500 पर राजी हो जाएं और फिर कुछ र्वष बाद वे तथा अन्य परमाणु-राष्ट्र इन विनाशकारी हथियारों से पूर्ण मुक्ति का मार्ग चुन लें। यह भी असंभव नहीं कि वे आगे चलकर पारंपरिक शस्त्रास्त्रों के नियंतण्रपर भी विचार करने लगें। 1959 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण देते हुए पं. जवाहरलाल नेहरू ने जिस व्यापक और समग्र निरस्त्रीकरण की मांग की थी, यह स्टार्टसंधि उसी महान स्वप्न का स्टार्टसिद्ध हो सकती है। यह संधि अचानक नहीं हुई है। इसकी नींव ओबामा ने पांच अप्रैल 2008 को अपने प्राहा भाषण में रखी थी। ढाई साल पहले जब ओबामा ने परमाणु-मुक्त विश्व का आह्वान किया था तो दुनिया समझ रही थी कि वे अभी नए-नए राष्ट्रपति बने हैं। वे नेहरू की तरह अपने आत्म-निर्मित स्वप्न-लोक में विचरण कर रहे हैं। उन्हें जब शांति का नोबेल पुरस्कार मिला तो लोगों ने उनका मजाक भी उड़ाया लेकिन यह संधि संपन्न करके उन्होंने अपने आप को नोबेल का सच्चा हकदार बना लिया है। 19 साल पहले जो स्टार्ट-1’ संधि संपन्न हुई थी, उसकी अवधि पांच दिसम्बर 2009 को समाप्त होनी थी लेकिन जनवरी 1993 में जो स्टार्ट-2’ तैयार हुई थी, वह बीच में ही लटक गई। इसे अब स्टार्ट-3’ कह सकते हैं। इसस्टार्ट-3’ के फलस्वरूप अब रूस और अमेरिका का रक्षा र्खच तो घटेगा ही, उनके आपसी संबंध भी सुधरेंगे। ओबामा ने रिपब्लिकन सीनेटरों से र्समथन मांगते समय यह र्तक भी दिया था कि अब ईरान को पटरी पर लाने में रूस का विषेष सहयोग मिलेगा। यद्यपि इस संधि के पक्ष में ओबामा को सीनेट के 71 वोट मिले लेकिन 26 सीनेटरों ने इसका विरोध भी किया। इस संधि पर मुहर लगाने के साथ सीनेट ने यह मंशा भी जाहिर की है कि बुश ने यूरोप में जो मिसाइल डिफेंसकी योजना बनाई थी, यह संधि उसके आड़े नहीं आएगी। संधि की प्रस्तावना और सीनेट के प्रस्ताव में कुछ अन्र्तविरोध दिखाई पड़ता है। हो सकता है, इसको मुद्दा बनाकर रूसी दूमा (संसद) कुछ अड़ंगा लगा दे लेकिन ओबामा की अनाक्रामक मुद्रा और सद्भावपूर्ण यूरोप-नीति रूस को प्रेरित करेगी कि वह इस संधि का पुष्टिकरण कर दे। इस संधि का पुष्टिकरण होते ही इस बात की पूरी संभावना है कि समग्र परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी), जिसे सीनेट ने 1993 में रद्द कर दिया था, फिर से जी उठे। इस संधि ने विश्व के शक्ति-गणित को शीष्रासन करवा दिया है। पहले माना जाता था कि शस्त्रों की संख्या बढ़ाते जाने से अपनी सुरक्षा होगी पर अब माना जाने लगा है कि शस्त्रों को घटाने में ही सबकी सुरक्षा है। (लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ हैं)

Tuesday, December 28, 2010

25 हिंदू परिवार ने भारत से शरण मांगी

पाकिस्तान में हत्या और अपहरण के डर से सहमे हिंदुओं ने भारत की शरण में आने की गुहार लगाई है। बलूचिस्तान प्रांत के 25 से अधिक हिंदू परिवार भारत में राजनीतिक शरण लेना चाहते हैं। पाकिस्तान के अखबार डॉन ने मानवाधिकारों के प्रांतीय मंत्रालय के उच्च अधिकारी के हवाले से यह जानकारी दी है। अधिकारी के अनुसार, कम से कम 27 हिंदू परिवारों ने इस्लामाबाद स्थित भारतीय दूतावास से उन्हें भारत भेजने का आवेदन किया है। मंत्रालय के स्थानीय निदेशक सईद अहमद खान ने बताया कि बलूचिस्तान में हिंदू परिवार सदियों से रह रहे हैं। मगर पिछले कुछ समय से यहां अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के खिलाफ अपराधों में इजाफा होने से लोग भयभीत हैं। धन के लिए यहां उनका अपहरण किया जा रहा है। आए दिन हत्याएं हो रही हैं। खान ने बलूचिस्तान की राजधानी, क्वेटा में आयोजित एक सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा, यह काफी चिंता का विषय है। हमने यहां कानून व्यवस्था को सुधारने के लिए सरकार से उचित कदम उठाने का आग्रह किया है।

Monday, December 27, 2010

भारत-रूस: ट्रैक पर लौटे रिश्ते

वर्ष 2010 लेखा जोखा
मास्को (एजेंसी)। भारत और रूस के वर्षों पुराने रिश्तों के लिहाज से यह साल बेहतरीन रहा। राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव के भारत दौरे के बाद दोनों देशों के बीच व्याप्त संदेह के बादल पूरी तरह छंट गए और परस्पर द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा मिली। मेदवेदेव साल के आखिर में दिल्ली पहुंचे और इस दौरान दोनों राष्ट्रों के बीच अरबों डॉलर के समझौते हुए। इसमें पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के विकसित करने संबंधी 29.5 करोड़ डॉलर का करार हुआ। इसके अलावा 29 अन्य समझौतों पर भी दस्तखत किए गए। हाल के वर्षों में अमेरिका के प्रति भारतीय विदेश नीति के झुकाव को देखते हुए मास्को और नई दिल्ली के बीच पुराने रिश्ते को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जाने लगी थीं, लेकिन रूसी राष्ट्रपति के दौरे ने इन पर विराम लगाया और फिर से साबित कर दिया कि भारत और रूस के रिश्तों की डोर बेहद मजबूत है। एडमिरल गोर्शकोव की कीमत के मुद्दे पर भी दोनों के बीच कुछ तनातनी पहले दिखी थी, लेकिन संयुक्त बयान में सामरिक साझेदारी से जुड़ी सभी अकटलें खत्म हो गईं। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि स्वदेशी अत्याधुनिक पनडुब्बी और नयी पीढ़ी के विमानों के निर्माण को लोकर भारत अपने पुराने मित्र राष्ट्र पर ही निर्भर कर सकता है। इससे पहले मार्च में रूसी प्रधानमंत्री ब्लादिमीर पुतिन ने भारत का दौरा आशावादी द्विपक्षीय रिश्तों की बुनियाद को मजबूती दी थी। सेंटर फार इंडियन स्टडीजकी डॉक्टर तातियाना शौम्यन ने कहा, दोनों देश के रिश्तों की मौजूदा स्थिति को देखते हुए मैं यह सकती हूं कि मेदवेदेव और पुतिन की यात्राएं ऐतिहासिक मानी जाएंगी। दोनों देशों आर्थिक सहयोग को भी नई ऊंचाइयां प्रदान करने पर सहमत हुए हैं। दोनों ने वर्ष 2015 तक द्विपक्षीय व्यापार को 20 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। 

भारत-रूस: ट्रैक पर लौटे रिश्ते

वर्ष 2010 लेखा जोखा
मास्को (एजेंसी)। भारत और रूस के वर्षों पुराने रिश्तों के लिहाज से यह साल बेहतरीन रहा। राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव के भारत दौरे के बाद दोनों देशों के बीच व्याप्त संदेह के बादल पूरी तरह छंट गए और परस्पर द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा मिली। मेदवेदेव साल के आखिर में दिल्ली पहुंचे और इस दौरान दोनों राष्ट्रों के बीच अरबों डॉलर के समझौते हुए। इसमें पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के विकसित करने संबंधी 29.5 करोड़ डॉलर का करार हुआ। इसके अलावा 29 अन्य समझौतों पर भी दस्तखत किए गए। हाल के वर्षों में अमेरिका के प्रति भारतीय विदेश नीति के झुकाव को देखते हुए मास्को और नई दिल्ली के बीच पुराने रिश्ते को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जाने लगी थीं, लेकिन रूसी राष्ट्रपति के दौरे ने इन पर विराम लगाया और फिर से साबित कर दिया कि भारत और रूस के रिश्तों की डोर बेहद मजबूत है। एडमिरल गोर्शकोव की कीमत के मुद्दे पर भी दोनों के बीच कुछ तनातनी पहले दिखी थी, लेकिन संयुक्त बयान में सामरिक साझेदारी से जुड़ी सभी अकटलें खत्म हो गईं। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि स्वदेशी अत्याधुनिक पनडुब्बी और नयी पीढ़ी के विमानों के निर्माण को लोकर भारत अपने पुराने मित्र राष्ट्र पर ही निर्भर कर सकता है। इससे पहले मार्च में रूसी प्रधानमंत्री ब्लादिमीर पुतिन ने भारत का दौरा आशावादी द्विपक्षीय रिश्तों की बुनियाद को मजबूती दी थी। सेंटर फार इंडियन स्टडीजकी डॉक्टर तातियाना शौम्यन ने कहा, दोनों देश के रिश्तों की मौजूदा स्थिति को देखते हुए मैं यह सकती हूं कि मेदवेदेव और पुतिन की यात्राएं ऐतिहासिक मानी जाएंगी। दोनों देशों आर्थिक सहयोग को भी नई ऊंचाइयां प्रदान करने पर सहमत हुए हैं। दोनों ने वर्ष 2015 तक द्विपक्षीय व्यापार को 20 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है।