विकसित देशों का आम आदमी उद्वेलित है। अमेरिका में सैकड़ों लोग वाल स्ट्रीट के सामने पार्क में धरना दिए बैठे हैं। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर के सिटी स्क्वायर में तथा सिडनी में रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया के सामने धरने चल रहे हैं। एथेंस, टोक्यो, मनीला, ताइपे, सियोल एवं हांगकांग में भी लोग ऐसे ही धरने पर बैठे हुए हैं। संपूर्ण विकसित दुनिया का आम आदमी उद्वेलित है। कारण है बेरोजगारी और असमानता। ये युवा समझ रहे हैं कि दुनिया के बैंकरों और शेयर ब्रोकरों ने लालच के चलते पहले बढ़-चढ़कर सौदे किए, फिर इन सौदों में घाटा खाया और अपने साथ संपूर्ण विश्व अर्थव्यवस्था को मंदी के दौर में धकेल दिया है। लोगों की मांग है कि सरकार इन वित्तीय संस्थाओं पर नकेल कसे, परंतु सरकारें इन्हें उत्तरोत्तर पोस रही हैं। यह सही है कि विकसित देशों के वर्तमान आर्थिक संकट का तात्कालिक कारण अमेरिका के लेहमन ब्रदर्स जैसे बैंकों द्वारा सट्टेबाजी एवं ग्रीस जैसी सरकारों द्वारा ऋण लेकर फिजूलखर्ची करना है, परंतु यह समस्या का मौलिक कारण नहीं है। लेहमन ब्रदर्स जैसे बैंक इसलिए फेल हुए हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अपेक्षित विकास नहीं हुआ। अमेरिकी कंपनियों को लाभ कम होने से वे श्रमिकों को कम संख्या में रोजगार दे रही हैं और सरकार को टैक्स भी कम दे रही हैं। ग्रीस जैसी सरकारें ऋण के भार से इसलिए दब गईं, क्योंकि कंपनियों को अपेक्षित लाभ नहीं हुए और उनके द्वारा टैक्स कम अदा किए गए। अत: बैंकरों पर दोषारोपण उचित नहीं है। होटल जर्जर हो तो मुसाफिर के न आने को मैनेजर के व्यवहार पर थोपना अनुचित होता है। इसी प्रकार खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को बैंकरों पर थोपना अनुचित है। यह एकतरफा आरोप है। असल समस्या है कि आम आदमी के रोजगार समाप्त हो रहे हैं, जबकि बैंकरों और अमीरों की आय बढ़ रही है। यह समस्या विकासशील देशों में उतनी ही है जितनी कि विकसित देशों में। अन्ना हजारे के आंदोलन के समर्थन में उठा जनसैलाब इस अंदरूनी असंतोष का द्योतक है। माओवादी आंदोलन भी इस असंतोष की एक कड़ी है। मूल समस्या मध्यधारा अर्थशास्त्र की ट्रिकल डाउन थ्योरी में निहित है। सोच है कि आर्थिक विकास से अमीरों की आय बढ़ेगी तो गरीबों के घर में भी उस आय का एक अंश रिसेगा। बैंकर की आय तब ही बढ़ेगी जब उसके द्वारा खरीदे गए शेयर के दाम बढ़ेंगे। शेयर के दाम तब ही बढ़ेंगे जब उत्पादन बढ़ेगा। उत्पादन बढ़ाने में अधिक संख्या में श्रमिकों की जरूरत होगी। इस प्रकार अमीरों की आय का एक हिस्सा गरीबों तक पहुंचेगा। इस थ्योरी के आधार पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने संकटग्रस्त बैंकों की मदद की थी। इसी सोच के चलते प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बड़ी कंपनियों को खुली छूट देने को तत्पर हैं। ट्रिकल डाउन थ्योरी में समस्या है कि उत्पादन बढ़ाने को रोजगार सृजन आवश्यक नहीं है। उद्यमियों के लिए लाभप्रद है कि वे ऑटोमैटिक मशीनों से उत्पादन बढ़ाएं। ऐसे में कंपनियों का लाभ एवं उत्पादन बढ़ता है, परंतु रोजगार घटते हैं। यह आर्थिक विकास की सहज प्रक्रिया है। विकास के कारण लोग समृद्ध होते हैं। उनके पास उपलब्ध पूंजी बढ़ती है। पूंजी की अधिकता के कारण ब्याज दर में गिरावट आती है। ब्याज दर में कमी आने से मशीनों में निवेश लाभप्रद हो जाता है। दूसरी तरफ उसी आर्थिक विकास से श्रमिकों का जीवन स्तर उठता है। उनके वेतन बढ़ते हैं। इससे श्रमिकों को रोजगार देना हानिप्रद हो जाता है। आर्थिक विकास का तार्किक परिणाम है कि रोजगार घटेंगे और बेरोजगारी बढ़ेगी। विकसित देशों की समस्या ज्यादा गहरी है, क्योंकि ये वैश्वीकरण से भी त्रस्त हैं। विकसित देशों की कंपनियों के लिए लाभप्रद हो गया है कि वे गरीब देशों में उत्पादन करके माल का आयात करें। अमेरिका की मशहूर रिटेल कंपनी वालमार्ट लगभग 80 प्रतिशत खरीद चीन एवं दूसरे गरीब देशों से कर रही है। ये रोजगार अमेरिका से चीन को हस्तांतरित हो रहे हैं। इसी प्रकार आइटी क्षेत्र में रोजगार भारत को हस्तांतरित हो रहे हैं। अमेरिकी कंपनियां महंगे अमेरिकी इंजीनियरों को बर्खास्त करके सस्ते भारतीय इंजीनियरों को रोजगार दे रही हैं। अत: विकसित देशों के आम आदमी पर दोहरी मार पड़ रही है। ट्रिकल डाउन न होने से नए रोजगार सृजित नहीं हो रहे हैं। ऊपर से उपलब्ध रोजगार गरीब देशों को हस्तांतरित हो रहे हैं। दूसरी ओर बैंकरों और कंपनियों के लाभ दिनोंदिन बढ़ रहे हैं। कारण यह कि इनका कारोबार पूरे विश्व में फैल गया है। उद्यमी ऑटोमैटिक मशीनों से चीन में उत्पादन करें तो कंपनी, शेयर ब्रोकर एवं बैंकर सभी को लाभ होता है, जबकि विकसित देश का आम आदमी मारा जाता है। वर्तमान में संपूर्ण विश्व में जो असंतोष दिख रहा है उसकी मूल समस्या ऑटोमैटिक मशीनों का उपयोग एवं वैश्वीकरण है, न कि बैंकरों की सट्टेबाजी। आपदा में कोई व्यवसायी आलू महंगा बेचकर लाभ कमाए तो इस बिक्री को आपदा का कारण नहीं बताया जा सकता है। इसी प्रकार ऑटोमैटिक मशीनों के उपयोग एवं रोजगार के गरीब देशों को हस्तांतरण से बढ़ रही बेरोजगारी को बैंकरों पर थोपना अनुचित है। अर्थशास्ति्रयों को नए ढंग से सोचना पड़ेगा। ऑटोमैटिक मशीनों एवं इंटरनेट के कारण ही श्रम अप्रासंगिक होता जा रहा है। एक प्रकार से यह एक सुखद उपलब्धि है। मनुष्य को जीवित रहने के लिए श्रम करना अनिवार्य नहीं रह गया है। समय का सदुपयोग वह अपने आत्म विकास के लिए कर सकता है, जैसे क्रिकेट खेलने, चित्रकारी करने, संगीत का रियाज करने में, परंतु श्रम के साथ-साथ उसका जीवन भी व्यर्थ होता जा रहा है। आत्म विकास करने को आवश्यक संसाधन उसके पास नहीं हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था बनानी होगी कि श्रम की मांग बढ़े और हर परिवार को जीविकोपार्जन और आत्म विकास के संसाधन उपलब्ध हों। सुझाव है कि पूंजी सघन आर्थिक विकास के स्थान पर श्रम सघन आर्थिक विकास हासिल करना होगा। मशीनों पर टैक्स और श्रम पर सब्सिडी देनी होगी। इससे आर्थिक विकास धीमा पड़ेगा जिसे स्वीकार करना होगा। जाड़े में सिगड़ी रख कर सोने से आराम मिलता है, परंतु मृत्यु भी हो जाती है। उसी प्रकार पूंजी-सघन आर्थिक विकास से कुल उत्पादन बढ़ रहा है, परंतु संपूर्ण मानवता मृतप्राय होती जा रही है। आर्थिक विकास पर लगाम लगाकर मानव विकास को लक्ष्य बनाना होगा। इसका एक तरीका श्रम-सघन उद्योगों को प्रोत्साहन देना है। मनमोहन सिंह एवं बराक ओबामा को समझना होगा कि बड़ी कंपनियों के कंधे पर वे आम आदमी के असंतोष को नहीं थाम पाएंगे। (लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
No comments:
Post a Comment