मिस्र में लोकतंत्र समर्थक हजारों प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पों में तीन लोगों की मौत के साथ ही पांच दिनों में दंगों में मरने वालों की संख्या 41 हो गई और राजनीतिक संकट गहरा गया। प्रदर्शनकारी तहरीर चौराहे से बिल्कुल हटने को तैयार नहीं थे और उन्होंने तुरंत सैन्य शासन खत्म करने की मांग की। उन्होंने नागरिक प्रशासन को सत्ता हस्तांतरण के लिए जनमत सव्रेक्षण के प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया। चौराहे से महज कुछ दूर मोहम्मद महमूद इलाके में हिंसा भड़क गई। बाद में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने बताया कि 10 साल के एक बालक समेत तीन मृत लोग अस्पताल लाए गए। यह इलाका सेना विरोधी प्रदर्शन का केंद्र बन गया है। हालांकि पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने चौराहे को जाने वाली सभी सड़कों पर अवरोधक लगा दिए थे। जब सेना और पुलिस के आह्वान पर प्रदर्शनकारी हटने को तैयार नहीं हुए तब उन्होंने उन पर आंसू गैस के गोले दागे और लाठीचार्ज किया। प्रदर्शनकारियों ने कहा ‘हमें तांतवी पर विास नहीं है। तांतवी भी मुबारक ही हैं, बिल्कुल उन्हीं की तरह। वह सैन्य वर्दी में मुबारक हैं।’ फरवरी में हुस्नी मुबारक के सत्ताच्युत होने के बाद फील्ड मार्शल हुसैन तांतवी के हाथों में देश की बागडोर सौंपी गई। वह मुबारक की सरकार में रक्षा मंत्री रह चुके हैं। ‘सेना, गद्दी छोड़ो’ के नारे के साथ ही प्रदर्शनकारियों ने बुधवार को पांचवें दिन भी पुलिस से जोर आजमाइश की। पिछले पांच दिनों की अशांति में 2000 से अधिक घायल हुए हैं। इस गतिरोध से देश एक नए संकट में फंस गया है क्योंकि प्रशासन संसदीय चुनाव से सप्ताह भर समय से भी पहले हो रहे इस प्रदर्शन को रोकने में नाकाम है। मुबारक की सरकार के पतन के बाद यह पहला संसदीय चुनाव है। मंगलवार रात तांतवी ने टीवी पर अपने संबोधन में जून के अंत तक राष्ट्रपति चुनाव कराने का वादा किया था। उन्होंने यह भी कहा कि यदि जनता जनमत सव्रेक्षण में इच्छा व्यक्त करती है तो वह तत्काल सत्ता हस्तांतरण को तैयार हैं। लेकिन प्रदर्शनकारी ने उनकी पेशकश ठुकरा दी और सैन्य शासन के तुरंत अंत की मांग की है। उन्होंने राष्ट्रीय मुक्ति सरकार के गठन की मांग की है। ताजा प्रदर्शनों के चलते पहले ही एस्साम शराफ मंत्रिमंडल ने महत्वपूर्ण संसदीय चुनाव से पहले सोमवार को इस्तीफा दे दिया था। देश में 28 नवम्बर को चुनाव है। विरोध प्रदर्शनों को दूसरी क्रांति बताने वाले मीडिया ने चेतावनी दी है कि सेना और जनता के बीच संबंध टूट की कगार पर पहुंच गया है।
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