ग्रीस : इधर कुआं, उधर खाई
अपने पद पर बने रहने की तमाम कोशिशों के बाद अंतत: पापेंद्रू की विदाई हो गई और हार्वड, कोलम्बिया एवं एथेंस विविद्यालय के प्रोफेसर तथा प्रसिद्ध ग्रीक अर्थशास्त्री ल्युकास पापाडेमोस ने अंतरिम प्रधानमंत्री का कार्यभार संभाल लिया। इस बात की संभावना पहले से ही थी कि ग्रीस में किसी ऐसे गैर राजनीतिक व्यक्ति का अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में चुनाव होगा जो देश को कर्ज संकट से बाहर लाने की क्षमता रखता हो। चूंकि पापाडेमोस यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ईसीबी) के उपाध्यक्ष और बैंक ऑफ ग्रीस के गवर्नर रह चुके हैं, साथ ही अराजनीतिक व्यक्ति हैं; इसलिए उनसे यह उम्मीद की जा सकती है। लेकिन उनके सामने बेहद कठिन चुनौतियां हैं, जिनसे निपट पाना आसान नहीं होगा। उन्हें 130 बिलियन यूरो के ऋण को संसद से मंजूरी दिलानी है, ग्रीस को यूरो जोन से बाहर होने से बचाना है और 19 फरवरी को विधिवत चुनाव कराने हैं। सबसे बड़ी बात यह कि निराशा की ओर बढ़ रही जनता में विास लौटाना है। क्या वे यह सब इतने कम समय में वास्तव में कर पाएंगे? पैंसठ वर्षीय अर्थशास्त्री पापाडेमोस सोशलिस्ट और विपक्षी कंजरवेटिव पार्टी की समर्थित सरकार का नेतृत्व करेंगे और फरवरी में होने वाले चुनाव तक प्रधानमंत्री का पद संभालेंगे। वित्तीय संकट का हल न ढूंढने के कारण जॉर्ज पापेद्रू को अपना पद गंवाना पड़ा और उनकी छवि खलनायक की बन गई। हालांकि उन्होंने संसद में 145 मतों के मुकाबले 153 मतों से विास हासिल किया था, लेकिन इससे पहले ही उनके वित्त मंत्री इवांनगेलोस वेनिजेलोस यह चेतावनी दे चुके थे कि कर्ज संकट से जूझ रहे देश की मुसीबतें अभी खत्म नहीं हुई हैं। इसका सीधा मतलब था कि पापेंद्रू का अब सरकार से हट जाना ही बेहतर होगा। इसलिए उन्होंने राष्ट्रपति कोरोलास पापुलियास से मुलाकात के बाद अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी। पापेंद्रू के सामने सबसे बड़ी चुनौती 130 बिलियन यूरो के दूसरे बेलआउट को संसद में मंजूर दिलाने की थी। पहले इस मसले पर उन्होंने जनमत लेने का निर्णय लिया था क्योंकि जिन शतरे के साथ बेलआउट ग्रीस को मिलना है, उसे जनता किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगी। कर्ज के इस दूसरे पैकेज में 50 प्रतिशत कर्ज माफी के अलावा कुछ नकदी सहायता की बात तो शामिल है लेकिन इसके साथ जो शत्रें हैं उन्हें स्वीकार करने का मतलब होगा कर्मचारियों की संख्या में कमी के साथ-साथ उनके वेतनों में कटौती। इससे दिक्कत यह कि जनता क्रांति पर उतारू हो जाएगी, साथ ही घरेलू मांग में भी कमी आ जाएगी और दोनों ही स्थितियां ग्रीस के लिए अच्छी नहीं हैं। ल्युकास पापाडेमोस ग्रीस के बड़े अर्थशास्त्रियों में से एक हैं, जो फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ बोस्टन में काम करने के बाद 1985 में बैंक ऑफ ग्रीस से मुख्य अर्थशास्त्री के बतौर जुड़े और 1994 से लेकर 2002 तक बैंक ऑफ ग्रीस के गवर्नर रहे। इसे छोड़ने के बाद बाद वे यूरोपियन सेंट्रल बैंक(ईसीबी) के उपाध्यक्ष बने। पिछले साल वे निवर्तमान प्रधानमंत्री पापेंद्रू के सलाहकार बने। इस लिहाज से उन्हें ग्रीस की ही नहीं बल्कि यूरोपीय अर्थव्यवस्था की अच्छी समझ है। यूरोप के कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि वे कभी राजनीति में नहीं उलझे और उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि कब क्या करने की जरूरत है। साथ ही बाजारों में उनकी साख भी बहुत अच्छी है। इसलिए संभावना अधिक है कि बाजार उन पर भरोसा कर ले। वैसे बाजारों के लिए भी कोई रास्ता नहीं है। बाजार यदि ऐसा नहीं करता है तो ग्रीस तो डूबेगा ही, साथ ही नई मंदी आने की आशंका बढ़ जाएगी, जो अंतत: पूरी दुनिया के वित्त बाजार को संकट के दलदल में फंसा देगी। पापाडेमोस वह शख्सियत हैं जिन्होंने कहा था कि यूरो से यूरोप की अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता आएगी और ग्रीस को मैक्रो और माइक्रो (व्यष्टि और समष्टि) इकोनॉमी, दोनों ही मोचरे पर सुविधाएं प्राप्त होंगी। उन्होंने यूरो की प्रशंसा में यहां तक कह डाला था कि यूरो की ही वजह से यूरो जोन अमेरिकी र्वल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमले के बाद पैदा होने वाले आर्थिक संकट से बचा रहेगा। शायद इसी आशावाद के कारण अंतरिम सरकार के मुखिया पद की दौड़ में पापाडेमोस ने पेट्रास मालिविएटिस, लुकास पोपइमास और पापेंद्रू के वित्तमंत्री रहे इवांजेलोस वेनिजेलोस को पीछे छोड़ दिया। जो भी हो, अब अगले लगभग सौ दिनों के लिए एक अस्थायी व्यवस्था बन गई है। अब देखना यह है कि पापाडेमोस ट्रोइका ऑफ ग्रीक लेण्डर्स को भरोसे में कैसे लेते हैं और यदि कहीं कमरे में बंद हाथी यानी इटली की भी बीमारी लाइलाज हो गई, तब क्या होगा? अभी तो ऐसा लगता है कि पापेंद्रू का जाना केवल राजनीतिक संकट का समाधान मात्र है। लेकिन ग्रीस का संकट तो आर्थिक है, फिर इलाज भी आर्थिक ही होना चाहिए था। दरअसल, असली बीमारी तो उस पूंजीवाद में ही छिपी है जिसे कभी पश्चिम वालों ने दुनिया की नियति की तौर पर पेश किया था और उसे समाप्त किया नहीं जा सकता है। तब फिर कैंसर के इलाज में एस्प्रिन देने का मतलब क्या है?
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