Monday, November 14, 2011

आसान नहीं ’ड्रैगन‘ को पछाड़ना

हाल ही में वैिक सलाहकार कंपनी अर्नस्ट एंड यंग ने शोध पर आधारित अपनी रिपोर्ट में कहा है कि औद्योगीकरण के बल पर भारत वर्ष 2013 में चीन से अधिक तेज गति से विकास करेगा और उसकी विकास दर चीन की विकास दर से अधिक तकरीबन साढ़े नौ प्रतिशत होगी। भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर दुनिया की तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में सबसे ज्यादा होगी। इनमें भारत, चीन, ब्राजील, रूस समेत वे 25 देश हैं; जहां मजबूत विकास की संभावनाएं हैं और उन्हें व्यापार की दृष्टि से अहम माना जा रहा है। रिपोर्ट कहती है, भारत में अपेक्षाकृत ऊंची बचत और निवेश दरों का फायदा है। साथ ही बढ़ता हुआ बाजार और खपत आधारित अर्थव्यवस्था देश को अत्यंत ही आकषर्क निवेश स्थल बनाए रखेगी। पहले भी इस तरह की कई और अध्ययन रिपोर्टे आई हैं लेकिन विकास दर के मोच्रे पर चीन को दो साल में पछाड़ना कोई सरल काम नहीं है। आर्थिक सुधार, बुनियादी ढांचा, आंतरिक व्यापार, शिक्षित-प्रशिक्षित श्रम शक्ति, वैज्ञानिक अनुसंधान, जवाबदेह प्रशासन, भ्रष्टाचार कम करने के प्रयास, विकास की राष्ट्रीय भावना आदि जिन आधारों पर विकास दर बढ़ती है, उनकी कसौटी पर चीन की तुलना में भारत बहुत पीछे है। चीन में 1980 से तेज गति से आर्थिक सुधार आगे बढ़े हैं जबकि भारत में यह प्रक्रिया 1991 में शुरू हुई और वह भी धीमी गति से। चीन में अर्थव्यवस्था को देशी-विदेशी निवेशकों के लिए ज्यादा खुला बनाया गया, कृषि और सिंचाई में निवेश को प्रोत्साहित किया गया, प्रतिस्पर्धा में सतत् सुधार पर ध्यान दिया गया, वित्तीय मानदंडों के प्रति जवाबदेही बरती गई। वहीं इन मामलों में भारत चीन से बहुत पीछे है। चीन ने आधारभूत ढांचे के तहत सड़कों, पुलों, फ्लाईओवर, हवाई अड्डों आदि का जाल बिछा दिया जबकि भारत में आधारभूत ढांचा बुनियादी कमजोरी के रूप में दिखाई दे रहा है। उल्लेखनीय है कि चीन का आंतरिक व्यापार और निर्यात भारत के सापेक्ष बहुत ज्यादा है। जहां वि निर्यात में भारत का हिस्सा एक फीसद है, वहीं चीन का दस फीसद है। वर्ष 2009 में निर्यात में जबरदस्त इजाफे के बाद 1.20 लाख करोड़ डॉलर का निर्यात रिकार्ड बनाते हुए चीन, जर्मनी से आगे निकलकर दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। भारत की तुलना में चीन तेजी से श्रम बल को मानव संसाधन के रूप में बदलते हुए दिखाई दे रहा है। चीन जिस गति से शिक्षित-प्रशिक्षित श्रम बल और पेशेवर तैयार करने में जुटा है, उससे इस क्षेत्र में भारत की दावेदारी को बहुत जल्द चुनौती मिल सकती है। चीन में ज्यादातर छात्र अंग्रेजी माध्यम में इंजीनियरिंग, मैनजमेंट और साइंस विषयों की पढ़ाई और उच्च शोध कार्य में रुचि दिखा रहे हैं। इसके विपरीत भारतीय परिदृश्य को देखें तो पाते हैं कि देश की शिक्षा व्यवस्था में ठहराव है। विकास दर वृद्धि के लिए जिस भ्रष्टाचार रहित प्रशासन व्यवस्था और प्रशासनिक सेवकों की जवाबदेही को अहम माना जाता है, उस दृष्टि से भी चीन के प्रयास भारत से ज्यादा हैं। ऐसे में दो साल में चीन को विकास दर की दृष्टि से पीछे करना बहुत कठिन है। हालांकि असंभव नहीं है। कुछ ऐसे चमकीले आर्थिक बिंदु हैं, जो भारत के आर्थिक विकास के मोच्रे पर आगे बढ़ने की संभावनाएं प्रस्तुत कर रहे हैं। आर्थिक क्षेत्र में भारत ने वि की उभरती हुई शक्ति के रूप में पहचान बनाई है। भारत के पास कुशल पेशेवरों की फौज है। आईटी, फार्मास्युटिकल्स, धातु क्षेत्र, बीपीओ, सॉफ्टवेयर, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक एवं केमिकल्स में दुनिया की जानी-मानी कम्पनियां हैं, आर्थिक व वित्तीय क्षेत्र की शानदार संस्थाएं हैं। इस वैिक सव्रेक्षण को भी दुनिया ध्यान से देख रही कि भारत आगामी वर्षो में दवा और रसायन निर्माण तथा बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सबसे तेजी से उभरने वाला देश बनेगा। भारत की श्रम शक्ति के कुछ ऐसे सकारात्मक पक्ष हैं, जिनके कारण भारत का पलड़ा चीन से भारी है। चीन को पछाड़ने के लिए भारत को औद्योगिक विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना होगा। चीन के साथ व्यापार के परिदृश्य को अपने अनुकूल करना होगा। भारत-चीन के बीच व्यापार का आंकड़ा 2011-12 में 70 अरब डॉलर की ऊंचाई पर पहुंचता दिख रहा है, जिसमें अगले चार वर्षो में दोगुने इजाफे की उम्मीद जताई जा रही है लेकिन प्रतिकूल व्यापार संतुलन भारत की प्रमुख चिंता है। भारत जहां चीन को प्रमुख रूप से जींस और कच्चे माल का निर्यात करता है, वहीं चीन भारत को प्रमुख रूप से महंगे बिजली सामान और दूरसंचार उपकरणों का निर्यात करता है, जिसके कारण आपसी व्यापार चीन के पक्ष में झुका हुआ है। ऐसे में व्यापार घाटे को समाप्त करने के लिए भारत से चीन को विविध प्रकार के निर्यात बढ़ाए जाने होंगे। चीन को निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा निर्यातकों को हरसंभव प्रोत्साहन देना होगा और चीन की आर्थिक चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी। इस समय वि व्यापार में चीनी व्यापार का हिस्सा दस प्रतिशत है, जबकि भारत का हिस्सा एक प्रतिशत से भी कम है। चीन का विदेशी मुद्रा भंडार भी भारत के मुकाबले दस गुना है। भारत को चीन से आगे निकलने के लिए कई बातों पर ध्यान देना होगा। देश की मैन्यूफैक्चरिंग पॉलिसी शीघ्र लागू करनी होगी। सरकार द्वारा जिस मैन्यूफैक्चरिंग पॉलिसी को अंतिम रूप दिया जा रहा है, उसका मकसद अगले 15 वर्षो में 22 करोड़ नौकरियां सृजित करना और 2020 तक इस सेक्टर का देश की जीडीपी में कुल योगदान बढ़ाकर 25 फीसद तक ले जाना है। चीन को विकास दर में पीछे छोड़ने के लिए गुणवत्तापूर्ण एवं विशिष्ट तकनीकी शिक्षा को आगे बढ़ाना होगा। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ढांचागत और भौतिक सुविधाएं विकसित करनी होंगी। संचार संपर्क सरल और सुचारु बनाने होंगे। चूंकि चीन, भारत से औसतन 30 प्रतिशत कम लागत पर वस्तुओं का उत्पादन कर रहा है, इसलिए उससे व्यापार में मुकाबला करने के लिए भारत को कम लागत पर गुणवत्तापूर्ण उत्पादन करने वाले देश के रूप में बाजार पहचान बनानी होगी। भारत को गवन्रेस में भी सुधार करना होगा। प्रतिस्पर्धा में सतत सुधार तथा वित्तीय मानदंडों के प्रति जवाबदेही पर ध्यान देना होगा। ऐसा करने काबिलियत से ही भारत विकास दर वृद्धि में चीन को पीछे छोड़ सकेगा।

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