सात अरब होने पर मचा हौवा
वि जनसंख्या के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार अक्टूबर के अंत में धरती पर हम लोगों की तादाद सात अरब हो जाएगी। 1999 में हम छह अरब हुए थे और अब 12 वर्ष बाद हम सात अरब हो रहे हैं। इस समय एक वर्ष में 8 करोड़ 30 लाख लोग दुनिया से नए जुड़ते हैं। यह आंकड़ा जन्म दर से मृत्यु दर घटा कर प्राप्त किया जाता है। आगे के लिए संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष का अनुमान यह है कि 2050 में वि की जनसंख्या बढ़कर 900 करोड़ तक पहुंच जाएगी। लेकिन इन आंकड़ों का उपयोग प्राय: इस ढंग से किया जाता है जैसे कोई बड़ी आफत आ गई है या आने वाली है। वास्तव में जनसंख्या वृद्धि को लेकर स्थिति ऐसी नहीं है। कुल मिलाकर दुनिया में प्रति परिवार बच्चों की संख्या में कमी आ रही है और संयुक्त राष्ट्र को उम्मीद है कि 2050 के आसपास लगभग 920 करोड़ के आंकड़े पर पहुंचकर वि जनसंख्या में स्थिरता आ जाएगी। इतना ही नहीं, उसके कुछ समय बाद इसमें कमी आनी भी शुरू हो सकती है। यह प्रवृत्ति ऐसे अनेक देशों के अनुभव के अनुकूल है जिनमें एक विशेष दौर में जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई तथा उसके बाद वहां की जनसंख्या में स्थिरता आ गई या इसमें कुछ कमी भी आने लगी। हालांकि इन संभावनाओं से कई किंतु-परंतु जुड़े हैं पर कुल मिलाकर यह भविष्य में जनसंख्या वृद्धि की अभी तक उपलब्ध सबसे मान्य तस्वीर है। फिलहाल इतना निश्चित है कि इस समय हम वि स्तर पर तेज जनसंख्या वृद्धि के दौर से गुजर रहे हैं और इस दौर की विशेष चुनौतियों का सामना हमें बहुत समझदारी से करना होगा अन्यथा कई स्तरों पर वि की समस्याएं और विकट हो सकती हैं। यह समय बहुत गंभीर पर्यावरण समस्याओं और विशेषकर जलवायु बदलाव का है। बढ़ती जनसंख्या के इस दौर में ही हमें ग्रीनहाउस गैसों, विशेषकर कार्बन डायआक्साईड के उत्सर्जन में तेजी से कमी लानी है। यह कार्य कठिन जरूर है पर असंभव नहीं है। जनसंख्या के परिप्रेक्ष्य में देखें तो वास्तविकता यह है कि कई गरीब देशों में जहां जन्मदर अधिक है वहां प्रति व्यक्ति कार्बन डायआक्साईड का उत्सर्जन बहुत कम है। दूसरी ओर अधिक धनी व औद्योगिक देशों में, जहां वि की मात्र 20 प्रतिशत जनसंख्या रहती है, इस गैस का मानवीय गतिविधियों पर आधारित उत्सर्जन 80 फीसद तक है। स्पष्ट है कि इस संदर्भ में मुख्य भूमिका जनसंख्या कम करने की उतनी नहीं है जितनी कि धनी औद्योगिक देशों की जीवनशैली व ऊर्जा उपयोग में इस तरह के बदलाव लाने की है, जिससे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में महत्वपूर्ण कमी आ सके। इसके साथ विकासशील व गरीब देशों के धनी लोगों को भी अपनी जीवनशैली में जरूरी बदलाव लाने होंगे। अधिक जनसंख्या वृद्धि का बड़ा क्षेत्र वे गरीब और विकासशील देश हैं, जहां पहले ही बड़ी संख्या में लोग बुनियादी जरूरतों से वंचित हैं। ऐसे में यदि उन लोगों की बुनियादी जरुरतों को पूरा करने को उच्चतम प्राथमिकता नहीं दी गई तो अभाव और गरीबी की स्थिति हाथ से बाहर निकल जाएगी और व्यापक स्तर पर असंतोष उत्पन्न होगा। तेजी से बढ़ती जनसंख्या के इस दौर में पर्यावरण की रक्षा और गरीबी दूर करने का एक ही रास्ता है कि धनी देशों व वगरे से आर्थिक संसाधनों को गरीब देशों व वगरे की ओर इस तरह मोड़ा जाए जिससे एक ओर तो पर्यावरण की क्षति करने वाली जीवनशैली बदले तथा दूसरी ओर सभी लोगों की बुनियादी जरुरतें पूरी हो सकें। अब मूल सवाल यह है कि समय रहते विषमतािवलासिता को कम करने व समता- सादगी को बढ़ाने की इस राह को अपनाया जा सकेगा या नहीं। जनसंख्या वृद्धि के दौर में सबसे बड़ा सवाल विकास के मॉडल को सही करना है, जिससे दुनिया समता और सादगी की राह पर चलकर पर्यावरण की रक्षा व गरीबी दूर करने का लक्ष्य प्राप्त कर सके। जनसंख्या वृद्धि की चर्चा प्राय: मात्र परिवार नियोजन व गर्भ निरोधक उपायों के संदर्भ में ही होती है। यह अत्यंत सीमित सोच है। इस अति सीमित सोच के कारण ही जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के प्रयास भी विफल होते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि मौजूदा दौर में परिवार नियोजन जरूरी है। छोटे परिवारों का स्वागत होना चाहिए और यह प्रवृत्ति बढ़ भी रही है। पर जनसंख्या का सवाल महज परिवार नियोजन व गर्भ निरोधकों की उपलब्धि तक निश्चित ही सीमित नहीं है। यह तो इस महत्वपूर्ण मुद्दे की बहुत संकीर्ण अभिव्यक्ति होगी। सबसे महवपूर्ण बात तो यह है कि जनसंख्या वृद्धि के इस दौर में न्यायसंगत व पर्यावरण रक्षा की नीतियों की ओर बढ़ना अब पहले से भी कहीं और जरूरी हो गया है। इस तरह जनसंख्या के सवाल को विकास के व्यापक सवालों से जोड़कर ही देखना-समझना चाहिए। यदि जन्म-दर को सही व स्थायी ढंग से कम करना है तो इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा में व्यापक सुधार बेहद जरूरी है। केवल परिवार नियोजन की सुविधाएं फैलाने से ही काम नहीं चलेगा। महिलाओं की शिक्षा व प्रगति का जन्मदर में कमी लाने में अति महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। ऐसा नहीं है कि सरकारी स्तर पर इस व्यापकता की जरूरत की समझ नहीं है। कई अनुसंधानों के आधार पर ऐसी समझ तो स्थापित हो चुकी है पर व्यावहारिक स्तर पर परिवार नियोजन अभी भी एक व्यापक समझ पर आधारित कार्यक्रम नहीं बन पाया है। तेज जनसंख्या वृद्धि कोई हौवा नहीं है बल्कि यह मानव इतिहास का एक विशेष दौर है जिसमें हमें विशेष जिम्मेदारी व सावधानी से जीना होगा। मनुष्य की क्षमताएं असीमित हैं। सवाल यह है कि इनका उचित उपयोग धरती पर जीवन की रक्षा के लिए होगा, या यह क्षमताएं चंद निहित स्वाथरे की गिरफ्त में कैद होकर रह जाएंगी। यह सवाल सदैव हमारे सामने थे पर तेज जनसंख्या वृद्धि के मौजूदा दौर में इनकी संजीदगी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। पहले से चली आ रही गलतियों व विकृतियों को दूर करने में और देर की गई तो पर्यावरण विनाश, गरीबी, अभाव और इससे जुड़े असंतोष व हिंसा की स्थिति नियंतण्रसे बाहर हो जाने का खतरा है। इसलिए तेज जनसंख्या वृद्धि के इस दौर को विशेष सावधानी और समझदारी से संभालना व निहित स्वाथरे के असर से मुक्त होकर समता व सादगी की राह को अपनाना इस समय की सबसे बड़ी चुनौती है। तेज जनसंख्या वृद्धि को हौवा कतई नहीं बनाना चाहिए, अपितु इसके अनुकूल नीतियों को अपनाने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
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