लीबिया पर 42 वर्ष तक शासन करने वाले मुअम्मर गद्दाफी की मौत के तीन बाद रविवार को विद्रोहियों की राष्ट्रीय आपात परिषद के चेयरमैन मुस्तफा अब्देल जलील ने तानाशाही से आजादी की आधिकारिक घोषणा की। इस समारोह के साथ ही लीबिया में चल रहा खूनी संघर्ष समाप्त हो गया। आठ महीने पहले लीबिया के शहर बेनगाजी और मिस्राता से ही गद्दाफी के विरोध में प्रदर्शन शुरू हुए थे जिन्होंने बाद में सशस्त्र विद्रोह की स्वरूप अख्तियार कर लिया। इस मौके पर आयोजित समारोह के दौरान जलील ने देशवासियों और दुनिया के नाम संदेश देते हुए कहा, तानाशाही के खिलाफ संघर्ष अब समाप्त हुआ। लीबिया की सत्ता सुरक्षित हाथों में है। यह चुनौती भरा समय है और हमें धैर्य, ईमानदारी के साथ एक-दूसरे के प्रति सद्भाव की भावना बनाए रखनी है। लीबिया में चले संघर्ष न केवल गद्दाफी और उनकी क्रूर सेना की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित किया बल्कि विद्रोहियों की क्षमताओं को लेकर भी सवाल हैं। मुअम्मर गद्दाफी को जिस प्रकार से मारा गया उससे भी उन पर सवाल खड़े हैं। कई देशों ने पूर्व तानाशाह की मौत की जांच की मांग की है। सवाल यह भी हैं कि क्या एक कबाइली संस्कृति वाले देश को लोकतांत्रिक तरीके से चलाया जा सकता है। ऐसे में विद्रोहियों की राष्ट्रीय आपात परिषद पर भारी दबाव है। वह आने वाले दिनों में किस प्रकार की अंतरिम सरकार का प्रारूप लेकर आते हैं। इस पर पूरे विश्व की नजरें लगी हैं। यह भी साफ है कि परिषद के सदस्यों में सत्ता संघर्ष जोर पकड़ रहा है। परिषद के चेयरमैन जलील और प्रधानमंत्री महमूद जिब्रिल से देश और दुनिया को बड़ी उम्मीदें हैं। खबर लिखे जाने तक जलील का भाषण जारी था, इसलिए यह बात अभी सामने नहीं आ सकती है कि उनकी भविष्य की योजनाएं क्या हैं। हालांकि एक महीने के भीतर अंतरिम सरकार का गठन और आठ महीने बाद आम चुनावों का वादा परिषद पहले ही कर चुकी है। इसके अलावा 200 सदस्यों की राष्ट्रीय परिषद का गठन भी किया जाना बाकी है। जिन लड़ाकों ने गद्दाफी को सत्ता से बेदखल किया उन्हें हथियार विहीन कर नई सेना और पुलिस के गठन कार्य भी बेहद अहम है। इन दोनों बातों पर ही लीबिया का लोकतांत्रिक भविष्य टिका हुआ है।
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