मुअम्मर गद्दाफी ने कई मौकों पर भारत लिए असहज स्थिति पैदा कर दी थी। संयुक्त राष्ट्र महासभा में वर्ष 2009 में अपना पहला भाषण देते हुए गद्दाफी ने भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को स्वतंत्र देश बनाने का सुझाव दे डाला था। वैसे तो गद्दाफी के साथ भारत के रिश्ते कभी बहुत अच्छे नहीं रहे, लेकिन संयुक्त राष्ट्र महासभा में उनके भाषण ने तो हमारी दुखती रग को छू लिया था। गद्दाफी ने कहा था, कश्मीर एक स्वतंत्र देश होना चाहिए। इसे न तो भारत में रखा जाए और न ही पाकिस्तान में। यह पहली बार था जब भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर किसी मुस्लिम नेता ने कश्मीर की पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत की थी। अपने भाषण में गद्दाफी ने कश्मीर के अलावा अन्य कई मुद्दों पर बेलाग राय रखी थी। ताकतवर देशों को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से बाहर रखने की दलील देते हुए तानाशाह ने कहा था, बड़ी शक्तियों के लिए सुरक्षा परिषद के दरवाजे खोलने से गरीबी बढ़ेगी। दुनिया में अन्याय और तनाव में इजाफा होगा। संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के साथ बराबरी का व्यवहार किए जाने पर जोर देते हुए गद्दाफी ने कहा था कि चूंकि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं, इसलिए अगर भारत को सुरक्षा परिषद में सीट दी गई तो पाकिस्तान भी इसकी मांग करेगा। इस साल फरवरी में भी अरब देश के इस तानाशाह ने कश्मीर का हवाला देकर भारत के लिए अप्रिय स्थिति पैदा कर दी थी। लीबिया के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में मतदान की पूर्व संध्या पर गद्दाफी ने अपने देश में विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई की तुलना कश्मीर में भारत की कार्रवाई से की थी। लीबिया में इस साल गृह युद्ध शुरू होने के बाद इस तानाशाह ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखकर विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई पर भारत का समर्थन मांगा था।
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