Friday, October 21, 2011

अफ्रीका में पश्चिमी देशों के लिए चुनौती बन गए थे कर्नल गद्दाफी


मुअम्मर अल गद्दाफी ने चार दशक से अधिक समय तक लीबिया की सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाकर रखी। इस दौरान उन्हें पश्चिमी देशों का भरपूर साथ मिला। इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी, फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी और ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर समेत कई देशों के नेताओं का गद्दाफी को भरपूर समर्थन मिला। 1969 में जब गद्दाफी ने सम्राट इदरिश का तख्तापलट कर सत्ता हथियाई तब वह अमेरिका के दुलारे थे। हालांकि बीच-बीच में लॉकरबीकांड और लीबिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर टकराव हुआ, लेकिन कभी ऐसी नौबत नहीं आई कि पश्चिम को गद्दाफी शासन के अंत के बारे में सोचना पड़े। इसके विपरीत 2010 के अंत में जब ट्यूनीशिया और मिस्र से जनांदोलन की लहर उठी तब पश्चिमी देशों ने गद्दाफी शासन के खिलाफ आवाज उठाने वालों को धन और हथियार भी मुहैया कराए। दरअसल, गद्दाफी 2007 के बाद से पश्चिमी हितों के लिए खतरा बने हुए थे। ऑयल एंड गैस जर्नल के मुताबिक 2007 में लीबिया के तेल भंडारों की कीमत 41.5 अरब डॉलर आंकी गई थी। कर्नल गद्दाफी ने लीबिया के सभी तेल कुओं के दोहन का कार्य विदेशी कंपनियों के हाथों में सौंप रखा था। 2009 में गद्दाफी ने अमेरिका की जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के छात्रों को संबोधित किया और कहा, तेल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, इसलिए मैं सोच रहा हूं कि लीबिया के तेल कुओं पर हमारे देश की कंपनियों का पूर्ण प्रभुत्व हो। इसके बाद 2009 में लीबिया की राष्ट्रीय तेल कंपनी ने कनाडा की कंपनी को धमकी दी कि अगर उनके विदेश मंत्री ने गद्दाफी के बारे में कहे अपशब्द वापस नहीं लिए तो उसे तेल निकालने का अधिकार खोना पड़ सकता है। इससे पहले 2008 में गद्दाफी ने अमेरिकी सामरिक हितों को सीधी चोट पहुंचाई। उन्होंने यूनाइटेड स्टेट्स अफ्रीकन कमांड (अफ्रीकॉम) के लिए विभिन्न देशों में ठिकाने बनाने की व्हाइट हाउस की कोशिश को नाकाम करने का प्रयास किया। दरअसल, अमेरिका ने ठिकाने बनाने के लिए विभिन्न अफ्रीकी देशों को लाखों डॉलर देने का प्रस्ताव रखा था। दूसरी ओर गद्दाफी ने उन देशों को ठिकाने नहीं बनाने देने पर अमेरिका से दोगुना पैसा देने की बात कही। इसके अलावा लीबिया अफ्रीका के लिए बड़े निवेशक के रूप में भी उभर रहा था। 2007 में लीबिया ने पहला अफ्रीकी सैटेलाइट लांच किया। इससे यूरोपीय कंपनियों को अफ्रीकी देशों से प्राप्त हो रहे 50 करोड़ डॉलर का नुकसान हुआ। लीबिया ने अफ्रीकी यूनियन के पांच प्रोजेक्टों के लिए 30 अरब डॉलर की राशि भी दी। इसका मकसद अफ्रीकी देशों की यूरोप पर वित्तीय निर्भरता को कम करना था। अफ्रीकी इन्वेस्टमेंट बैंक का मुख्यालय भी लीबिया में ही था। इससे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की भूमिका के लिए खतरा पैदा हो रहा था। मुअम्मर गद्दाफी अफ्रीकी यूनियन के साथ मिलकर स्वर्ण आधारित मुद्रा लाने पर भी विचार कर रहे थे। सद्दाम हुसैन भी अमेरिकी हमले से पहले डॉलर को चुनौती दे रहे थे। गद्दाफी अफ्रीका में पश्चिमी हितों के लिए खतरा बन गए थे। इसके अलावा उन्होंने 2010 में संयुक्त राष्ट्र को 50 लाख डॉलर दिए। उन्होंने यह पैसा फलस्तीनियों की मदद के लिए दिया और इजराइल के खिलाफ जेहाद की अपील भी की। गद्दाफी अमेरिका के दुश्मन ईरान के साथ भी खुलकर खड़े थे। वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यगो शावेज के साथ गद्दाफी दोस्ती और चीन तथा रूस के साथ उनके आर्थिक साझेदारी के लगातार हो रहे विस्तार ने भी पश्चिम को गद्दाफी के खिलाफ खड़ा कर दिया।

No comments:

Post a Comment