Wednesday, November 30, 2011
नाटो हमला : रूस ने भी की र्भत्सना
Tuesday, November 29, 2011
चीन ने दलाई लामा समर्थक देशों को धमकाया
वैश्विक बौद्ध सम्मेलन के विरोध में सीमा विवाद पर भारत के साथ वार्ता से मुकरे चीन ने एक बार फिर दलाई लामा समर्थक देशों को चेताया है। सीमा विवाद पर वार्ता टलने के मुद्दे पर चुप्पी तोड़ते हुए बीजिंग ने कहा है कि वह दलाई लामा और उनकी चीन विरोधी गतिविधियों को मंच प्रदान करने वाले किसी भी देश का विरोध करेगा। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता होंग ली ने सोमवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में ने कहा कि दलाईलामा कोई आध्यात्मिक गुरू नहीं हैं और वे लंबे समय से अध्यात्म की आड़ में अलगाववादी गतिविधियां चला रहे हैं। हालांकि होंग ने कहा कि सीमा विवाद पर वार्ता की नई तारीख तय करने के लिए चीन नई दिल्ली के संपर्क में है। गौरतलब है कि नई दिल्ली में हो रहे वैश्विक बौद्ध सम्मेलन को चीन विरोधी समागम की संज्ञा देते हुए बीजिंग ने इसे रद करने की मांग भारत के सामने रखी थी। मांग खारिज होने के बाद चीन ने सीमा विवाद पर 28-29 नवंबर को होने वाली वार्ता में शामिल होने से इंकार कर दिया था। चीन ने बौद्ध सम्मेलन में दलाई लामा का संबोधन रोके जाने की मांग भी भारत से की थी। पड़ोसी मुल्क ने किसी भी देश की ओर से चीन विरोधी गतिविधियों को मंच देने का भी विरोध किया था।चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता कहा कि दोनों देश सीमा विवाद मामले पर वार्ता का समय और एजेंडा तय करने की प्रक्रिया में हैं। उन्होंने कहा कि उनका देश चीन-भारत सीमा विवाद मामले पर विशेष प्रतिनिधियों की 15वीं बैठक पर बहुत ध्यान दे रहा है। इस वक्त दोनों देश बैठक के लिए तारीख तय करने में लगे हैं। यह पूछने पर कि क्या चीन ने नई दिल्ली में होने वाले बौद्ध सम्मेलन, जिसे तिब्बती आध्यात्मिक गुरू दलाई लामा संबोधित करने वाले थे, को रद करने के लिए भारत पर दबाव बनाया था। होंग ने कहा कि वह बताना चाहते हैं कि दलाई लामा विशुद्ध आध्यात्मिक गुरू नहीं हैं वह लंबे समय से अध्यात्म की आड़ में अलगाववादी गतिविधियां चला रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम किसी भी रूप में चीन विरोधी गतिविधियों को मंच प्रदान करने वाले देश का विरोध करते हैं। यह पूछने पर कि क्या भारत ने वार्ता टालने पर कुछ कहा है और चीन की क्या आशाएं हैं, होंग ने कहा कि दोनों पक्ष सीमा विवाद बैठक से जुड़े मुद्दों पर बात कर रहे हैं और साथ ही उसके लिए विशेष एजेंडा भी बना रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन और चीन के शीर्ष राजनयिक दाई बिंगुओं के बीच होने वाली वार्ता रद होने का मसला भारत में छाया रहा। हालांकि चीन के आधिकारिक समाचार पत्रों, चैनलों या वेबसाइट में इस बारे में कुछ नहीं प्रकाशित हुआ।
Monday, November 28, 2011
अरब लीग ने सीरिया पर लगाई पाबंदी
अरब लीग ने शांति प्रस्ताव पर तय समय सीमा में अमल न कर पाने के कारण सीरिया के खिलाफ प्रतिबंध के प्रस्ताव को अपार समर्थन के साथ पारित कर दिया। यह प्रतिबंध गत आठ माह से शांतिपूर्ण प्रदर्शनकर्ताओं के खिलाफ सीरिया सरकार द्वारा अपनाए गए हिंसक दमन को समाप्त करने के लिए लगाए गए हैं। लीग की ओर से किसी अरब देश के खिलाफ यह कदम अभूतपूर्व है। मतदान से पहले दमिश्क ने इस कदम को अरब एकजुटता के साथ धोखाधड़ी करार देते हुए इसकी निंदा की थी। पहले से ही संकट से जूझ रही सीरिया सरकार के लिए यह निर्णय बड़ा झटका है क्योंकि वह स्वयं को अरब राष्ट्रीयता का ऊर्जा गृह मानता है। काहिरा में एक संवाददाता सम्मेलन में कतर के विदेश मंत्री हमद बिन जासीम ने कहा कि अरब लीग के 22 में से 19 सदस्यों ने सीरिया पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव का समर्थन किया। इराक और लेबनान मतदान में अनुपस्थित रहे। लीग के प्रतिबंधों में सीरिया के केन्द्रीय बैंक के साथ लेन-देन करने, सीरिया सरकार के कार्यक्रमों को सहायता देने आदि पर प्रतिबंध लगाया है। जासीम ने कहा, हमारा लक्ष्य सीरिया के लोगों की तकलीफों को कम करना है। सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल असद के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लोगों के खिलाफ हिंसा के कारण उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक मार्च से अभी तक हिंसा की इन घटनाओं में 3,500 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। यूरोपीय संघ और अमेरिका ने असद और उनकी सरकार के खिलाफ कई प्रतिबंध लगाए हैं जिनमें सीरिया से तेल के आयात पर प्रतिबंध भी शामिल है। बहरीन और कतर ने रविवार को अपने नागरिकों को सीरिया छोड़ने की सलाह दी। संयुक्त अरब अमीरात पहले ही अपने नागरिकों को ऐसी सलाह जारी कर चुका है। प्रदर्शनों का बुरी तरह दमन करने वाले दमिश्क के खिलाफ प्रतिबंध पर विचार करने के लिए अरब लीग की हुई बैठक के दिन यह सलाह जारी की गई। बहरीन के विदेश मंत्रालय ने बताया कि सीरिया में अस्थिरता की वजह से यह सलाह जारी की गई है। वहीं, सीरिया के विदेश मंत्री वालिद अल-मुअल्लिम ने अरब लीग पर देश में आठ महीने पहले शुरू हुए लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों से पैदा हुए जानलेवा संकट के अंतरराष्ट्रीयकरण करने का आरोप लगाया है। सरकारी टीवी ने प्रतिबंधों को सीरिया के लोगों के खिलाफ अप्रत्याशित कदम बताया है। सूत्रों के मुताबिक, प्रतिबंध के बाद भी सीरियाई सरकार के रुख में परिवर्तन की संभावना नही है। सीरिया में जारी हिंसा में साढ़े तीन हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। रूस ने कहा है कि सीरिया में हिंसा का स्रोत चाहे कुछ भी हो, उसे रोकना और जारी असंतोष खत्म करना सर्वोच्च प्राथमिकता वाला काम है। रूसी विदेश उपमंत्री मिखाइल बोगदानाव ने सीरिया के राजदूत रियाद हद्दाद से भेंट में कहा, सीरिया में मुख्य लक्ष्य हिंसा को तत्काल रोकना है। उन्होंने कहा, तमाम सीरियावासियों के हित में लोकतांत्रिकरण, राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक सुधार की दिशा में राष्ट्रीय संवाद है।
चीनी उपराष्ट्रपति के भारत दौरे पर दलाई लामा का साया
तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा की एक बौद्ध सम्मेलन में उपस्थिति पर उभरे मतभेदों के कारण चीन के उपराष्ट्रपति झी जिनपिंग के प्रस्तावित भारत दौरे पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है। चीन के विशेष प्रतिनिधि दई बिंगुओ, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन के साथ 15वें दौर की सीमा वार्ता के लिए सोमवार को दिल्ली आने वाले थे। लेकिन इसे स्थगित कर दिया गया। इस वार्ता के दौरान दोनों वरिष्ठ अधिकारियों के बीच झी जिनपिंग के प्रस्तावित दौरे को लेकर भी चर्चा होने की संभावना थी। गौरतलब है कि जिनपिंग अगले वर्ष पद से हट रहे चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ का स्थान ले सकते हैं। जिनपिंग के दौरे की तारीखें हालांकि अभी तक तय नहीं हो पाई हैं, लेकिन ऐसे संकेत हैं कि वे जनवरी में भारत का दौरा कर सकते हैं। भारत जिनपिंग के जोरदार स्वागत के लिए उत्सुक है, ताकि अगले वर्ष हू के पद छोड़ने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के पांचवीं पीढ़ी के नेतृत्व के साथ सामंजस्य स्थापित किया जा सके। जिनपिंग शक्तिशाली केंद्रीय सैन्य आयोग के अध्यक्ष भी हैं। लेकिन दलाई लामा को लेकर पैदा हुए विवाद के कारण सीमा वार्ता स्थगित होने से अब जिनपिंग के दौरे पर भी सवाल उठने लगा है। गौरतलब है कि 28-29 नवंबर को होने वाली सीमा वार्ता स्थगित कर दी गई, क्योंकि भारत ने चीन की उस मांग को मानने से इंकार कर दिया था, जिसमें उसने चार दिवसीय वैश्विक बौद्ध सम्मेलन को रद करने के लिए कहा था। इस सम्मेलन में दलाई लामा समापन भाषण देने वाले थे। समझा जाता है कि भारत ने अपने इस रुख से चीन को अवगत कराया कि दलाई लामा एक धर्मगुरु और सम्मानित अतिथि हैं, लिहाजा वह धार्मिक मुद्दों पर बोलने के लिए स्वतंत्र हैं। उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि चीन ने इस पर अपना रुख कड़ा करते हुए सम्मेलन रद करने की मांग की, लेकिन भारत ने झुकने से इंकार कर दिया। तिब्बत समाधान के लिए ढूंढे बीच का रास्ता : सांगेय धर्मशाला, एजेंसी : तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री लोबसांग सांगेय ने कहा कि चीन चीनी राज्य के अधीन स्वायत्तता के लिए बीच का रास्ता निकालने में तिब्बत की मदद करे। जर्मनी के टेलीविजन चैनल डॉयचे वेली के साथ साक्षात्कार में बर्लिन में लोबसांग ने कहा, एक देश, दो व्यवस्था का मॉडल हांगकांग तथा मकाऊ में पहले से ही है। बीजिंग ताइवान को भी अधिक स्वायत्तता देना चाहता है, जबकि तिब्बतियों को लेकर चीन का रुख बिल्कुल अलग है। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार, लोबसांग ने हदलाई लामा को दक्षिण अफ्रीका द्वारा वीजा दिए जाने से इंकार किए जाने पर निराशा जताई। तिब्बत में आत्मदाह की घटनाओं पर दलाई लामा के रुख को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि यह लोगों में गहरी निराशा को दर्शाता है।
दक्षिण चीन सागर में उलझा रिश्तों का पुल
दक्षिण चीन सागर को लेकर भारत और चीन के मतभेदों ने रिश्तों की गाड़ी को फिर से ब्रेक लगाना शुरू कर दिया है। नई दिल्ली में सोमवार से शुरू हो रहे अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन में दलाई लामा की शिरकत का बहाना बना चीन ने जिस तरह सीमा वार्ता टाली है, उससे कतार में खड़े अन्य कूटनीतिक कार्यक्रमों पर आशंका के बादल घिरने लगे हैं। महत्वपूर्ण है कि चीन और भारत वार्षिक रक्षा वार्ता के लिए नौ दिसंबर की तारीख तय कर चुके हैं। सरकारी सूत्रों के मुताबिक बीजिंग की ओर से इनमें फेरबदल के लिए अभी तक कोई सूचना नहीं है। लेकिन चीन की ओर से जिस तरह एन मौके पर 28-29 नवंबर को होने वाली 15वें दौर की सीमा वार्ता को टाला गया उसने आशंकाएं जरूर खड़ी कर दी हैं। उल्लेखनीय है कि भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर तल्खी के चलते दोनों देश बीते तीन सालों में साझा सैन्य अभ्यास की जमीन तैयार नहीं कर पाए। वहीं अगस्त 2010 में एक भारतीय जनरल को चीन का वीजा देने से इंकार के बाद भारत ने नाराजगी जताते हुए चीन के साथ करीब आठ महीने तक अपने सैन्य रिश्तों को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला लिया था। चीन मामलों के विशेषज्ञ प्रो. श्रीकांत कोंडापिल्लै कहते हैं कि विशेष प्रतिनिधि स्तर सीमा वार्ता से इंकार को लेकर चीन ने बहाना भले ही बौद्ध सम्मेलन का बनाया हो, लेकिन इसकी जड़ में दक्षिण चीन सागर को लेकर जारी रस्साकशी ही है। उन्होंने बताया कि इस तरह वार्ता की मेज से हटना चीन के लिए कोई नया नहीं है। इससे पहले 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद डेढ़ साल तक दोनों मुल्कों के बीच सीमा मामले पर कोई वार्ता नहीं हुई थी। इतना ही नहीं बीते एक दशक में भी कई बार विशेष प्रतिनिधि स्तर वार्ता की तारीखें निर्धारित कैलेंडर से पिछड़ती रही हैं। वैसे दोनों देश सीमा विवाद सुलझाने के लिए बीते तीन दशक में 36 दौर की वार्ता कर चुके हैं। दूसरी तरफ जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बौद्ध सम्मेलन को निरस्त करने की चीन की मांग के आगे नहीं झुकने पर केंद्र सरकार की सराहना की है। इस आयोजन में तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा भी संबोधित करेंगे। उमर ट्वीट किया कि यह देखकर अच्छा लगा कि भारत सरकार ने चीन को स्पष्ट जवाब दिया है। चीन ने मांग की थी कि नई दिल्ली में कल से शुरू हो रहे अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन को स्थगित कर दिया जाए, जिसमें बुधवार को दलाई लामा भी शामिल होंगे। नई दिल्ली के इंकार के बाद चीनी पक्ष ने दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के 15वें दौर को रद कर दिया। चीन की हरकतों से रहें खबरदार : फारूक अब्दुल्ला कठुआ, वरिष्ठ संवादददाता : सत्ताधारी नेशनल कांफ्रेंस के प्रमुख एवं केंद्रीय अक्षय ऊर्जा मंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने रविवार को कहा कि चीन एक तरफ भारत से दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है तो दूसरी ओर सीमाओं पर साजिश रच रहा है। हमें ऐसे देशों से खबरदार रहते हुए राष्ट्र की अखंडता के लिए एकजुट होकर काम करना है। जम्मू-कश्मीर भारत का अटूट अंग है और हमेशा रहेगा। उन्होंने रिटेल कारोबार में विदेशी निवेश को मंजूरी देने के सरकार के फैसले पर सहमति भी जताई।
Saturday, November 26, 2011
मिस्र : जनता का सेना को अल्टीमेटम
मिस्र में सत्तारूढ़ जनरलों के नए प्रधानमंत्री नियुक्त करने जैसे कदमों को नामंजूर करते हुए यहां तहरीर चौराहे पर हजारों प्रदर्शनकारियों ने सैन्य जनरलों को सत्ता नागरिकों को सौंपने का ‘अंतिम अवसर’ अल्टीमेटम दिया। इसी बीच एक अप्रत्याशित कदम के तहत अल अजहर के वयोवृद्ध इमाम सुन्नियों के सर्वोच्च धार्मिक नेता ने तहरीर चौराहे पर करीब एक सप्ताह से एकत्रित प्रदर्शनकारियों के प्रति अपना पूरा समर्थन जताया है। इमाम के एक सहयोगी ने प्रदर्शनकारियों से कहा, वयोवृद्ध इमाम शेख अहमद अल तैयब आपका समर्थन करते हैं और आपकी जीत की कामना करते हैं। इन नवीनतम प्रदर्शनों के साथ ही पिछले कुछ दिनों में प्रदर्शनकारियों और दंगोरोधी पुलिसकर्मियों के बीच संघर्ष में 41 लोग मारे गए हैं और 3000 से अधिक घायल हुए हैं। तहरीर चौराहे पर ही सबसे अधिक हिंसा हुई है जो उस आंदोलन का केंद्र रह चुका है जिसने फरवरी में राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक को सत्ता से बेदखल कर दिया था। चौराहे पर प्रदर्शन के आयोजकों ने कहा कि शुक्रवार का प्रदर्शन लाखों लोगों के लिए अंतिम अवसर है यानी सैन्य शासकों के पास उनकी मांग पर झुक जाने के लिए अब ज्यादा समय नहीं बचा है। इमाम शेख मजहर शाहीन ने सत्तारूढ़ सर्वोच्च सशस्त्र बल परिषद से सत्ता राष्ट्रीय मुक्ति सरकार को सौंपेने की अपील की और कहा कि जब तक ऐसा नहीं होगा, प्रदर्शनकारी यहां से टस से मस नहीं होगे। इससे पहले दिन में मीडिया ने खबर दी थी कि नागरिक सरकार की प्रदर्शनकारियों की मांग के प्रति रियायत बरतते हुए परिषद ने पूर्व प्रधानमंत्री कमाल अल-गंजुरी को नया मंत्रिमंडल गठित करने की जिम्मेदारी सौंप दी है। अपदस्थ राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के शासनकाल में वर्ष 1996 से 1999 तक प्रधानमंत्री के पद पर रह चुके अर्थशास्त्री कमाल सैन्य परिषद् प्रमुख फील्ड मार्शल मुहम्मद हुसैन तंतावी से मुलाकात के बाद नई सरकार के प्रमुख बनने पर राजी हो गए हैं। मुबारक शासन से दूरी बनाने वाले गंजूरी को राष्ट्रपति पद के भी दावेदार माने जा रहे हैं। सैन्य परिषद ने मंगलवार को कार्यवाहक प्रधानमंत्री एसाम शराफ के मंत्रिमंडल का इस्तीफा मंजूर कर लिया था। बृहस्पतिवार को सैन्य शासकों ने शनिवार से अब तक हिंसा में मारे गए लोगों के लिए माफी मांगी और अपराधियों को दंडित करने का निश्चय किया। अशांति का आज सातवां दिन है। सैन्य शासकों ने कहा कि वे नागरिकों को सत्ता सौंप देंगे लेकिन इसमें हड़बड़ी नहीं होनी चाहिए ताकि अराजकता न फैले। मुबारक के अपदस्थ होने के बाद सोमवार को मिस में पहली बार संसदीय चुनाव होने वाले हैं। सैन्य परिषद् के मेजर जनरल ममदौह शाहीन ने बृहस्पतिवार को यहां कहा था कि चुनाव का कार्यक्र म तय योजना के अनुसार चलेगा और प्रदर्शनकारियों को आासन दिया था कि उनके साथियों की हत्या करने और उन्हें नुकसान पहुंचाने वालों को सजा मिलेगी। सोमवार को होने वाले चुनाव में भारी हिंसा की आशंका जताई गई है। जहां जहां तहरीर चौराहे पर सैकड़ों लोग परिषद के खिलाफ प्रदर्शन कर रहें है वहीं अब्बासियो में हजारों लोगों ने परिषद से सत्ता में बने रहने की मांग करते हुए रैली निकाली। इसी बीच अमेरिकी व्हाइट हाऊस के प्रवक्ता जय कार्नी ने कहा, हम विास करते हैं कि नागरिक सरकार को सत्ता का हस्तांतरण उचित और समग्र तरीके हो और यह मिस की जनता की आकांक्षाओं का यथासंभव पूरा करे। राष्ट्रीय मुक्ति सरकार का संभावित हिस्सा बताए जा रहे संयुक्त राष्ट्र के पूर्व परमाणु निगरानी प्रमुख मोहम्मद अलबरदेई भी तहरीर चौराहे पहुंचे।
Friday, November 25, 2011
मिस्र में तीन दिन बाद संसदीय चुनाव, नहीं थम रहे प्रदर्शन
टीवी पर दिए संदेश में मुबारक से तुलना न करने की अपील काइरो, एजेंसी : मिस्र में सैन्य शासन के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों के बीच दो सबसे वरिष्ठ जनरलों ने काइरो और अन्य शहरों में प्रदर्शनकारियों की मौत के लिए जनता से माफी मांगी है। मिस्त्र में हाल के प्रदर्शनों के शुरू होने के बाद यह पहला मौका है जब सैन्य शासन ने नरम रवैया अपनाया है। पिछले छह दिन के प्रदर्शनों में कम से कम 30 लोगों की मौत हो चुकी है और 1000 से अधिक लोग घायल हुए हैं। इस साल की शुरुआत में दशकों से सत्ता में बने हुए होस्नी मुबारक के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए थे। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम की जाए और होस्नी मुबारक इस्तीफा दें। फरवरी में कई हफ्तों के प्रदर्शनों के बाद होस्नी मुबारक ने सत्ता छोड़ दी थी और अब उनके खिलाफ अभियोग चलाया जा रहा है। इसके बाद सैन्य परिषद ने सत्ता संभाली, लेकिन पिछले कुछ दिनों में सेना के खिलाफ भी प्रदर्शन शुरू हो गए। मिस्रवासी अब मांग कर रहे हैं कि सेना तत्काल सत्ता छोड़े और आम चुनावों के बाद राष्ट्रपति चुनाव कराए जाएं। उनका आरोप है कि सैन्य परिषद सत्ता में बने रहने की वजह से राष्ट्रपति चुनाव में देर कर रही है। चुनाव निर्धारित समय पर बुधवार देर रात सैन्य परिषद के दो जनरलों ने टीवी पर संदेश दिया। इनमें से एक मेजर जनरल मोहम्मद अल असर ने पूरी फौज की तरफ से माफी मांगी। उन्होंने कहा, जो हुआ उसे देखकर हमारे दिलों से खून बहने लगता है। हम उम्मीद करते हैं कि यह संकट खत्म होगा और उपरवाले की मर्जी से दोबारा फिर ऐसा नहीं होगा। मिस्त्र की सेना की सर्वोच्च परिषद ने कहा, हमें मिस्र के इन बेटों की मौत पर दुख है। दूसरी ओर सैन्य परिषद के सदस्य जनरल मुख्तार अल ने कहा कि मिस्त्र में चुनाव समय पर ही होंगे। ये चुनाव सोमवार से शुरू होने वाले हैं। इससे पहले अटकलें लगाई जा रही थीं कि मौजूदा तनाव को देखते हुए यह चुनाव स्थगित कर दिए जाएंगे। टीवी संदेश में जनरलों का अंदाज बदला हुआ था और मंगलवार को फील्ड मार्शल मोहम्मद तंतावी के टकराव वाले अंदाज के संदेश से बिल्कुल अलग था। उन्होंने मिस्त्र की जनता से अपील की कि वह इस सैन्य शासन की तुलना होस्नी मुबारक के शासन से न करे। एक जनरल ने कहा, हम बिल्कुल अलग हैं। हमें सत्ता का शौक नहीं है और हम सत्ता में बने नहीं रहना चाहते। पिछले दिनों की हिंसा के बाद मंगलवार रात से तहरीर चौक के आसपास हिंसा थमी हुई है, लेकिन हजारों प्रदर्शनकारी अब भी सड़कों पर हैं और फिलहाल स्पष्ट नहीं है कि इस माफी से उनके रुख में कोई बदलाव आएगा या नहीं? इन चुनावों पर आम राय अभी विभाजित है। कुछ लोग चाहते हैं कि चुनाव समय पर हों जबकि दूसरे लोगों का मानना है कि सबसे पहले सेना को सत्ता छोड़नी होगी। इससे पहले बुधवार को संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संस्था की अध्यक्ष नवी पिल्लई ने मिस्त्र में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग को जरूरत से अधिक बताया। दूसरी ओर ब्रितानी विदेश मंत्री विलियम हेग ने भी उन रिपोटरें पर चिंता जताई थी जिनमें कहा गया था कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ खतरनाकगैसों का इस्तेमाल किया गया है। बहरीन ने प्रदर्शनों के पीछे ईरान का हाथ बताया मनामा : बहरीन ने कहा कि उसके पास इस बात के गोपनीय सबूत हैं कि देश में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के पीछे ईरान का हाथ है। दूसरी तरफ एक स्वतंत्र आयोग ने जांच में कहा कि ईरान का हाथ होने संबंधी दावों में कोई सचाई नहीं है। बहरीन के विरोध प्रदर्शनों के पीछे ईरान का हाथ होने संबंधी आरोप खाड़ी देशों की नीतियों के केंद्र में रह चुका है। हालांकि, देश की अशांति की जांच करने वाले एक विशेष आयोग ने 500 पन्नों की अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि ईरान का हाथ होने संबंधी बातें झूठी हैं।
Thursday, November 24, 2011
अब शेरी रहमान अमेरिका में पाकिस्तान की राजदूत
अमेरिका में पाकिस्तानी राजदूत हुसैन हक्कानी के इस्तीफे के बाद उनकी जगह पूर्व सूचना मंत्री शेरी रहमान को नियुक्त किया गया है। शेरी दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के काफी करीब थीं। संभावित सैन्य तख्तापलट के डर से राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी द्वारा अमेरिका को सौंपे गए गुप्त ज्ञापन से नाम जुड़ने के बाद हक्कानी ने मंगलवार को पद से इस्तीफा दे दिया था। प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के कार्यालय ने बुधवार को बतौर राजदूत शेरी की नियुक्ति की घोषणा की। इससे कुछ देर पहले ही शेरी ने गिलानी से मुलाकात की थी। सेना के साथ संबंधों के चलते विदेश सचिव सलमान बशीर का नाम भी इस पद के लिए लिया जा रहा था, लेकिन बाजी शेरी मार ले गई। सत्ताधारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के शीर्ष नेतृत्व से मनमुटाव के बाद 50 वर्षीया शेरी ने मार्च, 2009 में सूचना मंत्री का पद छोड़ दिया था। यहां तक कि मीडिया के साथ सरकार के संबंधों को लेकर जरदारी के साथ भी उनके मतभेद थे। मगर पिछले कुछ महीनों में उन्होंने फिर से मुख्यधारा में आने के लिए पार्टी के साथ अपने संबंधों को पटरी पर लाने के प्रयास शुरू कर दिए थे। वह अपना एक गैर सरकारी संगठन जिन्ना इंस्टीट्यूट चलाती हैं। इसके जरिए वह भारत और अफगानिस्तान के साथ रिश्तों सहित विदेश नीति से जुड़े कई मुद्दों पर भूमिका निभाती रही हैं। पीएमएल-एन जांच की मांग लेकर हाईकोर्ट पहुंची पाकिस्तान में ज्ञापन मामले के कारण पैदा हुए विवाद पर देश की मुख्य विपक्षी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर मामले की जांच की मांग की। पीएमएल-एन के इस कदम को सरकार को घेरने के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी प्रमुख नवाज शरीफ के वकील की तरफ से दायर इस याचिका में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, संघीय सरकार, सैन्य और आइएसआइ प्रमुखों और विदेश सचिव को पक्ष बनाया है। इस याचिका में अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी और पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी व्यापारी मंसूर एजाज को भी नामित किया गया है। इस याचिका में एजाज द्वारा किए गए खुलासे का हवाला देते हुए न्यायालय से मांग की गई है कि वह राष्ट्रपति जरदारी और हक्कानी को यह स्पष्ट करने का निर्देश दे कि उन्होंने शुरूआत में एजाज द्वारा किए गए दावों को क्यों खारिज कर दिया था। इसके साथ याचिका में यह दावा भी किया गया कि राष्ट्रहित में उच्चतम न्यायालय को अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
मिस्र में प्रदर्शन, मृतकों की संख्या 41 हुई
मिस्र में लोकतंत्र समर्थक हजारों प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पों में तीन लोगों की मौत के साथ ही पांच दिनों में दंगों में मरने वालों की संख्या 41 हो गई और राजनीतिक संकट गहरा गया। प्रदर्शनकारी तहरीर चौराहे से बिल्कुल हटने को तैयार नहीं थे और उन्होंने तुरंत सैन्य शासन खत्म करने की मांग की। उन्होंने नागरिक प्रशासन को सत्ता हस्तांतरण के लिए जनमत सव्रेक्षण के प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया। चौराहे से महज कुछ दूर मोहम्मद महमूद इलाके में हिंसा भड़क गई। बाद में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने बताया कि 10 साल के एक बालक समेत तीन मृत लोग अस्पताल लाए गए। यह इलाका सेना विरोधी प्रदर्शन का केंद्र बन गया है। हालांकि पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने चौराहे को जाने वाली सभी सड़कों पर अवरोधक लगा दिए थे। जब सेना और पुलिस के आह्वान पर प्रदर्शनकारी हटने को तैयार नहीं हुए तब उन्होंने उन पर आंसू गैस के गोले दागे और लाठीचार्ज किया। प्रदर्शनकारियों ने कहा ‘हमें तांतवी पर विास नहीं है। तांतवी भी मुबारक ही हैं, बिल्कुल उन्हीं की तरह। वह सैन्य वर्दी में मुबारक हैं।’ फरवरी में हुस्नी मुबारक के सत्ताच्युत होने के बाद फील्ड मार्शल हुसैन तांतवी के हाथों में देश की बागडोर सौंपी गई। वह मुबारक की सरकार में रक्षा मंत्री रह चुके हैं। ‘सेना, गद्दी छोड़ो’ के नारे के साथ ही प्रदर्शनकारियों ने बुधवार को पांचवें दिन भी पुलिस से जोर आजमाइश की। पिछले पांच दिनों की अशांति में 2000 से अधिक घायल हुए हैं। इस गतिरोध से देश एक नए संकट में फंस गया है क्योंकि प्रशासन संसदीय चुनाव से सप्ताह भर समय से भी पहले हो रहे इस प्रदर्शन को रोकने में नाकाम है। मुबारक की सरकार के पतन के बाद यह पहला संसदीय चुनाव है। मंगलवार रात तांतवी ने टीवी पर अपने संबोधन में जून के अंत तक राष्ट्रपति चुनाव कराने का वादा किया था। उन्होंने यह भी कहा कि यदि जनता जनमत सव्रेक्षण में इच्छा व्यक्त करती है तो वह तत्काल सत्ता हस्तांतरण को तैयार हैं। लेकिन प्रदर्शनकारी ने उनकी पेशकश ठुकरा दी और सैन्य शासन के तुरंत अंत की मांग की है। उन्होंने राष्ट्रीय मुक्ति सरकार के गठन की मांग की है। ताजा प्रदर्शनों के चलते पहले ही एस्साम शराफ मंत्रिमंडल ने महत्वपूर्ण संसदीय चुनाव से पहले सोमवार को इस्तीफा दे दिया था। देश में 28 नवम्बर को चुनाव है। विरोध प्रदर्शनों को दूसरी क्रांति बताने वाले मीडिया ने चेतावनी दी है कि सेना और जनता के बीच संबंध टूट की कगार पर पहुंच गया है।
Wednesday, November 23, 2011
जनता के आगे झुके सैन्य शासक
मिस्र की राजधानी काहिरा के ऐतिहासिक तहरीर चौक पर चार दिन से असैन्य सरकार के खिलाफ जुटे हजारों लोगों का प्रदर्शन रंग लाया है। देश के सैन्य शासक राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया तेज करने पर सहमत हो गए हैं। तहरीर चौक पर प्रदर्शन कर रहे लोगों की यह प्रमुख मांग थी। सेना की सुप्रीम काउंसिल के प्रमुख फील्ड मार्शल मोहम्मद हुसैन तंतावी ने राष्ट्रीय टेलीविजन पर दिए अपने संबोधन में कहा है कि अगले साल जून अंत तक राष्ट्रपति चुनाव करा लिए जाएंगे। उन्होंने यह भी बताया कि कैबिनेट का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है। देश में संसदीय चुनाव अगले सप्ताह तय कार्यक्रम के मुताबिक ही होंगे। तहरीर चौक पर जुटे प्रदर्शनकार देश में सुधारों की गति को लेकर नाराज हैं। बीबीसी ने प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से बताया है कि प्रदर्शनकारी सेना की ओर से रियायतों की घोषणा से संतुष्ट नजर नहीं आते। वे नारे लगा रहे हैं कि तहरीर चौक से नहीं जाएंगे। वे तंतावी के त्यागपत्र की मांग कर रहे हैं। अपने संबोधन में तंतावी ने कहा कि सेना सिर्फ लोगों की सुरक्षा के लिए है और वो स्थायी सत्ता नहीं चाहती। सेना की सुप्रीम काउंसिल शासन करना नहीं चाहती। उसके लिए देशहित सवरेपरि है। पिछले कुछ दिनों से तहरीर चौक पर हुए हिंसक प्रदर्शनों को देखते हुए सुप्रीम काउंसिल की आपात बैठक हुई। इसमें सैनिक शासन के प्रतिनिधि और राजनीतिक गुटों के लोग शामिल हुए। इससे पहले शनिवार से जारी हिंसा के बाद सेना की ओर से नियुक्त अंतरिम सरकार ने प्रधानमंत्री एसाम शराफ की अगुआई में इस्तीफा दे दिया था। उधर, मंगलवार को प्रदर्शनकारियों ने ‘दूसरी क्रांति’ बताते हुए एक साथ प्रदर्शन का आह्वान किया था। हजारों लोगों ने सोमवार की रात तहरीर चौक पर ही गुजारी।लगातार चौथे दिन पुलिस ने हजारों प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस छोड़ी।
यमन में सालेह पद छोड़ने को तैयार लंदन (एजेंसी)। यमन से आ रही खबरों के मुताबिक राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह सत्ता स्थानांतरण के लिए राजी हो गए हैं। यमन की राजधानी सना में मौजूद संयुक्त राष्ट्र के दूत के अनुसार सालेह उपराष्ट्रपति को सत्ता सौंप सकते हैं। राष्ट्रपति के इस फैसले का प्रमुख विपक्षी दल ने स्वागत किया है। बहरीन में पुलिस-प्रदर्शनकारी भिड़े लंदन (एजेंसियां)। बहरीन की पुलिस और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों के बीच झड़पें होने की खबर है। यह झड़पें उत्तर- पूर्वी शहर सितरा से शुरू हुई। पुलिस ने लगभग 3000 प्रदशर्नकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस छोड़ी है। ये झड़पें उस समय हुई हैं जब पुलिस ने माना था कि सैनिकों ने इस साल फरवरी में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया।
लोगों में गुस्सा क्यों
प्रदर्शनों की शुरु आत शनिवार से हुई जब सैन्य परिषद की ओर से नियुक्त अंतरिम सरकार ने संविधान में संशोधनों का प्रस्ताव रखा। इन संशोधनों के अनुसार सेना के बजट को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। राष्ट्रपति चुनाव को वर्ष 2012 के अंत तक या 2013 के शुरू तक टाले जाने के प्रस्ताव से भी लोग नाराज हुए। प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि नवम्बर में हो रहे संसदीय चुनाव के बाद ही राष्ट्रपति के चुनाव हों। पर्यवेक्षक के मुताबिक, लोगों को डर है कि सैन्य परिषद किसी तरह से सत्ता में बनी रहना चाहती है।Tuesday, November 22, 2011
काहिरा में कोहराम, 35 मरे
मिस्र के ऐतिहासिक तहरीर चौक पर फिर से झड़पें शुरू होने के कारण कम से कम 35 लोगों की जान चली गई और 1700 से अधिक लोग घायल हो गए। इन झड़पों के कारण हुस्नी मुबारक की सत्ता खत्म हो जाने के बाद होने वाले पहले 28 नवम्बर को होने वाले चुनाव पर संकट के बादल घिरने लगे हैं। पुलिस और सेना ने लाठियों, आंसू गैस और एयरगन चलाकर प्रदर्शनकारियों को तितरबितर करने का प्रयास किया। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि सैन्य शासन सत्ता असैन्य अधिकारियों को सौंप दे। सरकारी टीवी ने तहरीर चौक की तस्वीरें दिखाई जो फरवरी में मुबारक की सत्ता को हटाने के लिए हुए आंदोलन का प्रतीक चिन्ह बन गया था। टीवी में दिखाया जा रहा है कि पूरा तहरीर चौक आंसू गैस से आच्छादित है। सोमवार दिन में एक सरकारी टेलीविजन ने खबर दिखाई थी कि तहरीर चौक पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच संघषर्विराम हो गया है। इसे करवाने में तहरीर चौक पर स्थित उमर मकरम मस्जिद के इमाम शैख मजहर शाहीन ने मध्यस्थता की। इस समझौते के तहत प्रदर्शनकारी चौक पर बने रहेंगे जबकि सेना के साथ सुरक्षा कर्मी गृह मंत्रालय के आसपास तैनात रहेंगे। सुबह हुए इस संघर्ष विराम से पहले रविवार को कई लोग मारे गये थे। यह हिंसा हुस्नी मुबारक के 30 साल के लंबे शासन के बाद हो रहे पहले चुनाव से पूर्व हुई है। कल रात से हुए संघर्ष में तहरीर चौक पर कई लोग मारे गए जबकि 1700 लोग घायल हो गए। गत शुक्र वार को सैन्य विरोधी जन रैली के शांतिपूर्ण आयोजन के बाद मिस्र की राजधानी में दूसरे दिन हिंसा हुई है। अल तहरीर चौक की घटनाओं के विरोध में सैकड़ों लोगों ने सैद बंदरगाह, सिटी हाल और सुरक्षा निदेशालय के समक्ष प्रदर्शन किए। इस्कंदरिया में सुरक्षा बलों ने सुरक्षा निदेशालय के समक्ष दंगे में शामिल होने के आरोप में करीब 80 लोगों को गिरफ्तार किया है। केना में स्थानीय सुरक्षा निदेशालय के आसपास सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है ताकि प्रदर्शनकारियों को इमारत पर पथराव करने से रोका जा सके। इससे पूर्व निदेशालय के सामने प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष छिड़ गया था। मिस्र के मंत्रिमंडल ने संकट के मुद्दे पर कई घंटे तक विचार विमर्श किया और बाद में एक अन्य बैठक के लिए वे सत्तारूढ़ सशस्त्र बल की सर्वोच्च परिषद गए। मंत्रिमंडल ने एक बयान में कहा कि 28 नवम्बर को होने वाले संसदीय चुनाव पूर्व निर्धारित कार्यक्र म के अनुसार होंगे। सरकारी टेलीविजन पर पढ़े गए परिषद के एक बयान में उसने जो कुछ भी हो रहा है उस पर खेद जताया है। उसने कहा कि वह चुनाव कार्यक्र म पर प्रतिबद्ध है।
Monday, November 21, 2011
सिंगापुर को भारी निवेश का न्योता
भारत की महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा विकास योजना में सिंगापुर को महत्वपूर्ण सहयोगी बताते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उसे दक्षिण एशियाई देश में निवेश का न्योता दिया। भारत को बुनियादी ढांचा क्षेत्र में अगले पांच साल में 1000 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत है। दो दिवसीय यात्रा पर यहां आए डा. सिंह ने सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली सिएन लूंग के साथ सुरक्षा तथा रक्षा क्षेत्र में सहयोग समेत विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के उपायों पर चर्चा की और निवेश की पुरजोर वकालत की। सिंगापुर के प्रधानमंत्री द्वारा आयोजित दोपहर भोज के दौरान डा. सिंह ने कहा, ‘हमारी सरकार सिंगापुर के साथ संबंधों को खासी अहमियत देती है। हमारा सहयोग बहुलवाद, धर्मनिरपेक्ष तथा लोकतंत्र के साझा मूल्य तथा क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर दृष्टिकोण की समानता पर निर्भर है।’ उन्होंने कहा, ‘सिंगापुर हमारी बुनियादी ढांचा विकास की महत्वाकांक्षी योजना के लिए एक प्रमुख सहयोगी के रूप में उभरा है। आसियान देशों में यह भारत का सबसे बड़ा व्यापार और निवेश सहयोगी है।’ उन्होंने कहा, ‘हम सिंगापुर से बड़े पैमाने पर निवेश तथा प्रौद्योगिकी के प्रवाह का स्वागत करते हैं।’
दोपहर भोज से पहले ली के साथ बातचीत के दौरान डा. सिंह ने निवेश के मुद्दे पर चर्चा की। उन्होंने यह रेखांकित किया कि भारत को अपने बुनियादी ढांचा तथा अन्य क्षेत्रों के विकास के लिये बड़े पैमाने पर कोष की जरूरत है। सरकार ने अगले साल में केवल बुनियादी ढांचा क्षेत्र में 1000 अरब डालर के निवेश की जरूरत का अनुमान जताया है। सिंगापुर में भारत के उच्चायुक्त टीसीए राघवन ने कहा कि सिंगापुर का भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) 14 अरब डालर है जो दूसरा सबसे बड़ा संचयी एफडीआई है।
सूत्रों ने कहा कि भारत, सिंगापुर से एफडीआई में उल्लेखनीय वृद्धि चाहता है। इसका कारण सिंगापुर में चीन का निवेश है जो आठ गुना अधिक है। दोनों देशों के बीच व्यापार पिछले साल 17 अरब अमेरिकी डालर का रहा। इसमें भारतीय निर्यात की हिस्सेदारी 10 अरब डालर रही। मनमोहन सिंह की यात्रा की पूर्व संध्या पर भारत और सिंगापुर ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सिंगापुर में शहरी विकास के क्षेत्र में भारतीय नौकरशाहों को प्रशिक्षण देने को लेकर दो सहमति पत्र पर दस्तखत किए। डा. सिंह ने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि 1990 के दशक में सिंगापुर के साथ संबंधों में नया आयाम जुड़ा जब भारत की विदेश और आर्थिक नीतियों में रणनीतिक बदलाव आए और आज यह ‘पूर्व की ओर देखो नीति’ में बदल गया है। ली की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि सिंगापुर के प्रधानमंत्री दोनों देशों के बीच मजबूत संबंधों के पैरोकार रहे हैं। सिंह ने कहा कि ली की 2005 में भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते पर दस्तखत किए। उन्होंने कहा, ‘इस समझौते से हमारे व्यापार और निवेश संबंधों में नई ऊंचाई आई।’ डा. सिंह ने कहा कि आज हम जिस अनिश्चितता वाली दुनिया में रह रहे हैं, वहां सिंगापुर में आए त्वरित बदलाव और आर्थिक वृद्धि माडल एक उम्मीद की किरण है। ‘आपने न केवल एशिया के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण दिया है।’ ली को अगले साल भारत आने का निमंतण्रदेते हुए मनमोहन सिंह ने कहा, ‘इससे आपको भारत में पिछले कई साल से हो रहे विकास और उसमें सिंगापुर के योगदान को देखने का मौका मिलेगा।’ उन्होंने कहा कि भारत-सिंगापुर का संबंधों का दायरा राजनीति, सुरक्षा तथा रक्षा सहयोग के क्षेत्र में बढ़ा है। ‘हम इन क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग को महत्व देते हैं।’
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