भारत के लिए अफगानिस्तान बड़ा रणनीतिक महत्व रखता है। असल में यह पाकिस्तान से कहीं अधिक महत्व रखता है, जो अफगानी समाज का ताना-बाना तोड़ने में व्यस्त रहा है। वास्तव में भारत का रणनीतिक हित अफगानिस्तान से कहीं आगे है। इसका विस्तार पश्चिम में होर्मुज जलसंधि और फारस की खाड़ी और यहां तक कि इस रणनीतिक क्षेत्र की सबसे पश्चिमी सीमा के रूप में अफ्रीका के पूर्वी तट तक विस्तृत है, जबकि पूर्व की ओर इसमें मलक्का जलसंधि और दक्षिणी चीन सागर शामिल है। इसी तरह उत्तर की ओर इसमें मध्य एशिया है और दक्षिण की ओर यह अंटार्कटिका तक फैला हुआ है। अफ्रीका इन सभी क्षेत्रों का एक महत्वपूर्ण लिंक है। विस्तृत रूप से देखें तो अफगानिस्तान में भारत का हित दक्षिणी एशिया से आगे अपने हितों को सुरक्षित करने की उसकी व्यापक इच्छा का एक छोटा हिस्सा भर है। भारत अपना रणनीतिक हित समझता है और इसीलिए उसे सुरक्षित करने के लिए चुपचाप और दीर्घकालिक कूटनीतिक और व्यवस्थित रूप से काम कर रहा है। अपने राजनीतिक हित को सुरक्षित करने में भारतीय कूटनीति का सबसे महत्वपूर्ण कदम जरंज-डेलारम सड़क का निर्माण और चाबाहर पोर्ट को विकसित करना रहा है। ये दोनों अफगानिस्तान को पाकिस्तान पर अनन्य निर्भरता से आजाद करेंगे और भारत को अफगानिस्तान तथा मध्य एशिया तक सीधा संपर्क प्रदान करेंगे।
आज के भारत ने एशिया में क्षेत्रीय शक्ति का दर्जा हासिल कर लिया है। उसका एकमात्र प्र्रतिस्पर्धी चीन है, यद्यपि पाकिस्तान भी वह दर्जा हासिल करना चाहता है। हो सकता है कि इसी वजह से वह अमेरिका और चीन के साथ रणनीतिक संबंध विकसित कर रहा हो। तालिबान को एक बड़ी ताकत के रूप में उभरने में मदद करने का भी वही कारण हो सकता है, जो पूरी दुनिया में लोकतांत्रिक व्यवस्था को बर्बाद करना चाहता है। पाकिस्तान रणनीतिक रूप से भारत पर निशाना साध रहा है क्योंकि उसका विश्वास है कि अगर भारत विफल होता है तो एशिया उसके रणनीतिक अधिकार में होगा। जहां तक चीन का प्रश्न है, इसलामी आतंकवाद ने वहां भी फन उठा लिया है। पाकिस्तान को यह उम्मीद हो सकती है कि अगर भारत का पतन होता है तो आतंकवाद के हथियार से चीन पर भी काबू पाया जा सकता है।
यह पिछले कुछ सालों का घटनाक्रम नहीं है। अगर पाकिस्तान की विदेश नीति और महाशक्तियों से संबंध स्थापित करने की उसकी कार्यप्रणाली का विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होगा कि वह अपनी स्थापना के बाद से ही चीन की तुष्टि करता रहा है। उसने चीन को कश्मीर के अधिकृत हिस्से पर गैरकानूनी ढंग से नियंत्रण करने दिया। उसके बाद वह राजमार्गों के निर्माण और बंदरगाहों के विकास की अनुमति देते हुए अपने इलाकों पर रणनीतिक नियंत्रण का मौका देता रहा है। पाकिस्तान इस भ्रम में हो सकता है कि वह चीन को अमेरिका से लड़वा सकता है।
भारत यह जानता है क्योंकि यहां एक स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्था और परिपक्व तथा अनुभवी नौकरशाही है। बीच-बीच में लड़खड़ाने के बावजूद एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कुछ देशों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए कुल मिलाकर भारतीय राजनीतिक व्यवस्था संतोषजनक रूप से काम कर रही है। भारत की विदेश नीति और मुख्य क्षेत्रीय शक्तियों के साथ उसके संबंध तथा उसकी सैन्य व आर्थिक क्षमता का सशक्तीकरण इसका एक संकेत है। वह दुनिया की प्रमुख ताकतों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंधों और एक उपयुक्त विदेश नीति की नीति पर चलता है। वह रक्षा, अंतरिक्ष और पर्यावरण सुरक्षा में पारस्परिक सहयोग के लिए एशिया और अफ्रीका के मित्र देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है और साथ ही अपनी सैन्य क्षमता और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर अपनी अंतरराष्ट्रीय पकड़ को भी मजबूत कर रहा है।
भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण से दक्षिणी और पश्चिमी एशिया में अफगानिस्तान सबसे महत्वपूर्ण देश है। इसकी महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक स्थिति मध्य पूर्व को मध्य एशिया और दक्षिणी एशिया के साथ जोड़ती है। अनवरत लड़ाइयों और हिंसा के कारण उसने अपने आधुनिक इतिहास में अत्यंत अस्थिरता और संघर्ष का सामना किया है और उसकी अर्थव्यवस्था तथा बुनियादी ढांचा नष्ट हो चुके हैं। यह एक खनिज संपन्न देश है जो प्राकृतिक गैस को छोड़कर अधिकांशतः अविकसित है।
अफगानिस्तान में भारत की मुख्य दिलचस्पी कई वजहों से है। पहला, १९९० के दशक में अफगानिस्तान पर तालिबानी शासन के बाद से भारत को कई उल्लेखनीय सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। १९७९ में अफगानिस्तान पर रूसी हमले के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को कई उग्रवादी दलों जैसे लश्कर-ए-तैयबा, हरकत-उल-मुजाहिदीन, हरकत-उल-अंसार और हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी आदि को प्रोत्साहित किया और उनका समर्थन किया। इन आतंकी संगठनों ने भारत को भी निशाना बनाया। सोवियत संघ के पतन के बाद भारत पर तालिबान के हमले बढ़े। भारत नहीं चाहता कि अफगानिस्तान फिर से इस्लामी कट्टरपंथियों के हाथों में चला जाए और आतंकवादियों के लिए सुरक्षित शरणगाह बन जाए।
दूसरा, भारत अफगानिस्तान को मित्र देश बनाए रखना चाहता है क्योंकि वहां से पाकिस्तान की गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सकती है। वह पाकिस्तान की इच्छा के विरुद्ध संसाधनों को विकसित करने में भी मदद कर सकता है। अफगानिस्तान से जेहादी तत्वों को साफ करना भारत के हित में होगा।
तीसरा, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के घटनाक्रम न केवल बड़े पैमाने पर भारत की राष्ट्रीय खासकर आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित करते हैं बल्कि उसके सामाजिक ढांचे पर भी असर डालते हैं। पाक प्रायोजित आतंकवाद से भारत में यह धारणा बनी है कि वह भारत को जीतना चाहता है क्योंकि मुगलों के वंशज होने के कारण वह उपमहाद्वीप पर राज करना अपना हक समझता है।
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