प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे ने भी इस बात की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का यह बयान अनौपचारिक था और गलती से प्रकाशित हो गया था, जिसमें अब सुधार कर लिया गया है। सवाल तो यह है कि आखिर प्रधानमंत्री इस तरह की बचकाना बातें संपादकों से कर ही क्यों रहे थे..से एक गलती कहेंगे, या पाकिस्तानी पंजाब की सुपीरियरिटी कि हमारे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का जन्म आज के जिस पाकिस्तानी पंजाब में हुआ था, उनपर वहां वाली सोच हावी है। मनमोहन सिंह के अनुसार 25 प्रतिशत बांग्लादेशी कट्टर हैं और जमात-उल-इस्लामी के प्रभाव में हैं। यह सोच पाकिस्तानी पंजाबियों की सोच से मेल खाती है, जो पृथक पाकिस्तान बनने के बाद पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लाभाषी मुसलमानों को हिंदू समर्थक, हिंदू रीति रिवाज मानने वाले बताते थे। इसी सोच का परिणाम था पृथक बांग्लादेश का उदय। जी हां, भारतीय प्रधानमंत्री के एक ऑफ द रिकार्ड बयान ने भारत-बांग्लादेश संबंधों को नुकसान पहुंचाया है। यही नहीं, बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष परंपरा को और मजबूत करने की कोशिश कर रही शेख हसीना के प्रयासों को भी इससे नुकसान पहुंचा है। दरअसल, पिछले दिनों पांच संपादकों के साथ मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा था कि कम से कम 25 फीसदी बांग्लादेशी जमात-उल-इस्लामी के प्रभाव में हैं और वे भारत के खिलाफ हैं। आईएसआई जैसी संस्थाओं ने इन लोगों पर पकड़ बना ली है। उन्होंने कहा था कि ये लोग पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के असर में हैं। आगे उन्होंने कहा कि ऐसे में बांग्लादेश में राजनीतिक परिदृश्य कभी भी बदल सकता है। यों तो प्रधानमंत्री का यह बयान ऑफ द रिकॉर्ड था, लेकिन यह प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ की वेबसाइट पर जारी हो गया। पीएमओ ने हालांकि करीब 30 घंटे बाद अनौपचारिक तौर पर दिए गए डॉ. मनमोहन सिंह के इस बयान को वेबसाइट से हटा लिया। मगर यह बयान ऐसे समय सार्वजनिक हुआ, जब विदेश मंत्री एसएम कृष्णा को एक हफ्ते बाद बांग्लादेश जाना है।
पीएम के बयान को बुधवार की रात पीएमओ की वेबसाइट पर जारी किया गया था। शुक्रवार की सुबह संपादकों से बातचीत का यह लिखित ब्यौरा यानी ट्रांसस्क्रिप्ट सुधार कर फिर से जारी किया गया। इसमें बांग्लादेश को लेकर पीएम के बयान को पूरी तरह से हटा दिया गया। प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे ने भी इस बात की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का यह बयान अनौपचारिक था और गलती से प्रकाशित हो गया था, जिसमें अब सुधार कर लिया गया है। सवाल तो यह है कि आखिर प्रधानमंत्री इस तरह की बचकाना बातें संपादकों से कर ही क्यों रहे थे। अभी भी इस देश के लोग जानते हैं कि बांग्लादेश ही एक मुल्क है, जहां पर हिंदुओं की आबादी बाकी इस्लामी देशों से ज्यादा है। यही नहीं, अगर कुछ पीरियड को छोड़ दिया जाए तो वहां हिंदू पूरी तरह से अपने अधिकारों के साथ जीता है। वहां न तो जबरदस्ती धर्म परिवर्तन की शिकायत अभी तक आई, न ही हिंदुओं के अधिकारों में कटौती की गई। बीच में खालिदा जिया के शासन में जरूर कुछ कट्टरपंथी आंख उठा रहे थे, लेकिन अब शेख हसीना के शासन में हालात वैसे नहीं हैं। आज बांग्लादेश एक धर्मनिरपेक्ष देश के हर नियम का पालन कर रहा है।
भारतीय प्रधानमंत्री का जन्म आज के पाकिस्तानी पंजाब के चकवाल में हुआ था। तो क्या यह माना जाए कि उनकी सोच उसी पंजाबी मानसिकता का परिचायक है, जो बांग्लादेश की उत्पत्ति के लिए जिम्मेवार बना। अगर पंजाबियों ने बंगालियों पर जुल्म नहीं किया होता तो पाकिस्तान से अलग बांग्लादेश का वजूद नहीं होता। वास्तव में बंगालियों का धर्मनिरपेक्ष चरित्र ही पाकिस्तानी पंजाबियों को पसंद नहीं आया था और वे पाकिस्तानी स्टैबलिशमेंट पर कब्जा कर चुके थे। वे उन बंगालियों को हिंदुओं का एजेंट बताने लगे थे, जो बांग्लादेश की मांग करने लगे थे, क्योंकि पाकिस्तान के अंदर उन्हें वे अधिकार नहीं मिल रहे थे, जो मिलने चाहिए थे। बंगाली भाषा का दमन किया गया था और सत्ता में अच्छी संख्या होने के बावजूद सरकार बनाने की इजाजत मुजीब को नहीं दी गई थी। आज भी 1971 की बुरी हार के बाद पाकिस्तानी पंजाब की मानसिकता यही कहती है कि जो बंगाली पाकिस्तान से विद्रोह करके बांग्लादेश बनाने में कामयाब हुए, वे वास्तव में हिंदू टीचरों के स्टूडेंट थे। जिन्हें उनके टीचर स्कूलों में लगातार पाकिस्तान के खिलाफ भड़काते रहे। हमारे प्रधानमंत्री को वास्तव में कई आंकड़े नहीं पता हैं। आज का बांग्लादेश आर्थिक फ्रंट पर काफी तेजी से विकास कर रहा है। व्यापार के क्षेत्र में वह आगे निकल रहा है और पश्चिमी देशों से भी उसके संबंध इसलिए अच्छे हैं कि धर्मनिरपेक्ष चरित्र लेकर यह मुल्क आगे बढ़ रहा है। हालत यह है कि बांग्लादेश का सालाना कपड़ा निर्यात का कारोबार ही आज 12 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। अगर वहां पर इस्लामी कट्टरपंथियों का इतना प्रभाव होता तो निश्चित तौर पर व्यापार और उोग का विकास नहीं होता। ढाका में जन्माष्टमी पर जुलूस निकालने की पाबंदी लग जाती। जबकि दिलचस्प बात है कि हमारे प्रधानमंत्री उस पाकिस्तान से बातचीत के लगातार हिमायती हैं, जहां पर साक्षात रूप से सरकार, सेना और हर स्टैबलिशमेंट में अलकायदा और तालिबान की घुसपैठ हो चुकी है। जहां पर आजादी के 60 साल बाद भी भूमिसुधार नहीं हो पाया और आजादी के बाद भी कठमुल्लापन की आड़ में जमींदारी बची रही। आज भी लाहौर शहर के बाहर निकलें तो 20 किलोमीटर के अंदर ही आपको जमींदारों की अपनी जेलें नजर आएंगी। जो जमींदारों की बात नहीं मानते, उन्हें कुत्तों से नुचवाया जाता है। इसी मुल्क में ब्लासफेमी लॉ की आड़ में सलमान तासिर और शहबाज भट्टी जैसे हाई प्रोफाइल लोगों की हत्या हो जाती है।
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