Saturday, July 2, 2011

अमेरिका-चीन की चालाकियां

पाकिस्तान में जब अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन मारा गया तो अमेरिका की नजरें कुछ समय के लिए पाकिस्तान के प्रति टेढ़ी हो गई। तब चीन ने इशारे-इशारे में कह दिया कि वह पाकिस्तान का बाल बांका नहीं होने देगा। इसके अलावा जब कोरियाई प्रायद्वीप में उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया आपस में लड़ रहे थे तो अमेरिका दक्षिण कोरिया की मदद में जुटा था, जबकि चीन उत्तर कोरिया का कवच बना बैठा था। न जाने इस तरह के कितने उदाहरण हैं, जिससे यह प्रतीत होता है कि अमेरिका और चीन के बीच जबरदस्त कटुता है। लेकिन हकीकत कुछ और है। दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्ते दुनिया को बरगला रहे हैं। अगर इतिहास पर नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि अमेरिका और चीन के बीच के रिश्ते काफी मधुर रहे हैं। आज भले दिखावे के लिए दोनों देश एक-दूसरे की समय-समय पर खिंचाई कर दें, लेकिन इनके बीच की प्रगाढ़ता कुछ और ही बयां कर रही है। संदेश यह है कि भारत समेत दुनिया के अन्य देश यह गलतफहमी कतई न पालें कि चीन और अमेरिका के आपसी रिश्ते तल्ख हैं। इस तल्खी का उन्हें लाभ मिल सकता है। नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिकी राजनयिक और पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने अपनी किताब में खुलासा किया है कि 1971 के पाकिस्तान-बांग्लादेश युद्ध में अमेरिका चाहता था कि पाकिस्तान का साथ देने के लिए चीन अपनी सेना भेजे। इसके लिए उसने चीन से पहल भी की थी। अमेरिका की पेशकश थी कि अगर पाकिस्तान का साथ देने के लिए चीन पर रूस हमला करता है तो चीन की ओर से अमेरिका भी मैदान में उतर जाएगा, जबकि रूस उस वक्त भारत का गहरा दोस्त था। ऑन चाइना किताब में हुए इस खुलासे को पाकिस्तानी मीडिया अमेरिका को पाकिस्तान का पुराना और वफादार दोस्त बताने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित कर रहा है। किताब में इस बात का भी उल्लेख है कि 1971 में बांग्लादेश और पाकिस्तान युद्ध के दौरान पाकिस्तान के लिए सैन्य मदद मांगने के लिए किसिंजर खुद चीन से मिले थे। उन्होंने चीन से यह वादा किया था कि यदि रूस युद्ध में आता है तो चीन और पाकिस्तान के साथ अमेरिका भी खड़ा हो जाएगा। यह पहला मौका था, जब चीन-रूस और अमेरिकी रिश्तों के बीच युद्ध को लाने का खतरा उठाया गया था। उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति रहे रिचर्ड निक्सन के विरोधी हमेशा ही उन पर पाकिस्तान की ओर झुके होने का आरोप भी लगाते रहे थे। अब इस खुलासे को पाकिस्तानी मीडिया अमेरिका को पाकिस्तान का पुराना दोस्त बताते हुए भुना रहा है। पाकिस्तानी मीडिया इस बात पर जोर दे रहा है कि हम पाकिस्तानी अपने दुश्मन और दोस्त के बीच फर्क करना भी नहीं जानते। हम यह भी भूल जाते हैं कि हमारे दोस्तों की भी अपने मुल्क की आंतरिक राजनीति के चलते कुछ मजबूरियां हैं। उस वक्त अंतरराष्ट्रीय माहौल भी पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के लोगों के पक्ष में था। ऐसे हालात में अमेरिका और चीन खुलकर पाकिस्तान की मदद नहीं कर पा रहे थे। हालांकि कभी चीन को अमेरिका का दोस्त बताने वाले हेनरी किसिंजर की चीन के बारे में राय अब बदल गई है। किसिंजर मानते हैं कि चीन इस समय अमेरिका के सामने एक बड़ी चुनौती है। यों तो अमेरिका और चीन के बीच रिश्ते पिछले 40 साल से एक जैसे रहे हैं, लेकिन अब समीकरण बदल रहा है। वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद चीन में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ी है, जो मानते हैं कि अब दुनिया में विश्व शक्ति की धुरी बदल चुकी है। चीन अब बड़ी शक्ति बनकर उभरा है और अंतरराष्ट्रीय मामलों में चीन के दखल में यह बात दिखनी चाहिए। इसे लोगों को अमेरिका की गलती के रूप में नहीं देखना चाहिए, क्योंकि पिछले दो हजार वर्षो में से 1800 वर्षो पर चीन का दबदबा रहा है, जबकि पिछले 40 वर्षो पर ही अमेरिका का दबदबा है। अब विश्व के हालात ऐसे हो रहे हैं कि न ही अमेरिका अकेली विश्व शक्ति बना रह सकता है और न ही वह पीछे हट सकता है। यह अमेरिका के लिए चुनौतीपूर्ण समय है। चीन शक्ति के रूप में अमेरिका का मुकाबला करने के लिए विश्व में सबसे प्रबल दावेदार है और चीन के जटिल इतिहास की रोशनी में अमेरिका के लिए यह चुनौती और भी मुश्किल हो जाती है। बकौल किसिंजर, चीन को लेकर अमेरिक के राष्ट्रपति बराक ओबामा की रणनीति भी साफ है। अमेरिका को चाहिए की वह चीन के साथ समझ को बढ़ाए और ऐसे रिश्ते स्थापित करे, जिनमें दोनों देशों को लगे की सबकुछ ठीक हो रहा है। इतना ही नहीं, तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री वन चापो ने 23 सितंबर 2008 को न्यूयार्क कहा था कि अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के बाद ह्वाइट हाउस का स्वामी चाहे कोई बने, लेकिन चीन अमेरिका के रिश्ते पहले से मधुर रहे हैं और रहेंगे। यह ऐतिहासिक धारा उल्टी नहीं बह सकेगी। वन चापो ने पिछले वर्षो में चीन-अमेरिका संबंधों के विकास का सिंहावलोकन किया और दोनों देशों के बीच राजनीति और अर्थ-व्यापार के क्षेत्रों में निरंतर मजबूत हुए सहयोग के तथ्यों और आंकड़ों के अलावा अनेक मैत्री की कहानियां भी बताई, जिससे वहां मौजूद लोगों में मित्रता की स्नेहपूर्ण याद ताजाहो गई। चीन और अमेरिका प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं। दोनों सहयोग के साझेदार हैं और हमेशा दोस्त बने रह सकते हैं। इस दौरान उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि चीन तेजी से आर्थिक प्रगति कर रहा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इससे अमेरिका को क्षति पहुंचेगी, बल्कि अमेरिका भी चीन के विकास से लाभ पा सकता है। अमेरिका और चीन दोनों एक साथ विकसित हो सकते हैं। चीन की हार्दिक अभिलाषा है कि चीन-अमेरिका मैत्रीपूर्ण सहयोग भिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में बड़े देशों के मेल-मिलाप से सह अस्तित्व होने और समान विकास के रास्ते पर आगे चलने की मिसाल बनेगा। वन चापो ने कहा कि उन्हें इसलिए चीन-अमेरिका संबंधों पर पक्का विश्वास हुआ है, क्योंकि दोनों देशों के बीच व्यापक समान हित मौजूद हैं। सहयोग के क्षेत्र द्विपक्ष के दायरे से कहीं अधिक विस्तृत हैं और उसका सारे विश्व पर अहम प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए दोनों पक्षों को समानता वाली वार्ता के जरिए एक दूसरे के प्रति आशंकाओं को दूर करना चाहिए, आपस में विश्वास बढ़ाना चाहिए। चीन और अमेरिका अब एक-दूसरे से सीख रहे हैं और एक-दूसरे के प्रशंसक बन गए हैं। अमेरिकी श्रम मंत्री सुश्री एलेइन लान चाओ ने कहा कि चीन-अमेरिका संबंधों की मजबूती विश्व शांति और स्थिरता के लिए बहुत जरूरी है। इसलिए अमेरिका को चीन के साथ संपर्क और सहयोग बनाए रखना चाहिए। बहरहाल, ताजा हालात तो यही बयां कर रहे हैं कि अमेरिका और चीन के पास दिखाने और खाने के दांत अलग-अलग हैं। आज पूरी दुनिया में यह संदेश फैला है कि चीन की आर्थिक व तकनीकी प्रगति से अमेरिका चिढ़ रहा है और दोनों देशों के बीच संबंध ठीक नहीं हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। जरूरत पड़ने पर दोनों एक साथ खड़े हो सकते हैं। दिलचस्प यह भी है कि भारत विरोधी पाकिस्तान की मदद करने की इनमें होड़ लगी हुई है। इसलिए खासकर भारत को चीन और अमेरिका दोनों से सचेत रहने की जरूरत है|

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