Wednesday, July 6, 2011

हथियार छोड़ राजनीति करें तालिबान लड़ाके

अफगानिस्तान की दो दिवसीय यात्रा पर सोमवार को काबुल पहुंचे ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने तालिबान लड़ाकों से हथियार छोड़कर राजनीति में आने की अपील की है। कैमरन ने अफगान तालिबान के साथ सुलह संबंधी वार्ता के बारे में पूछे गए सवाल का स्पष्ट जवाब देते हुए कहा, यह सच है कि उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के देश तालिबान नेताओं के संपर्क में है। हमारे सैन्य अधिकारियों से भी उनकी बात हो रही है। मुझे लगता है कि पश्चिमी सेना की वापसी और अफगानिस्तान के भविष्य के लिए यह बेहद जरूरी है। अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई से मुलाकात के दौरान कैमरन ने कहा कि आयरिश रिपब्लिकन आर्मी (आइआरए) की तर्ज पर अफगान तालिबान के साथ भी समझौता हो सकता है। आइआरए ने उत्तरी आयरलैंड को अलग राष्ट्र बनाने के लिए सशस्त्र संघर्ष किया था। उन्होंने अपनी जिद के लिए ब्रिटिश सुरक्षाकर्मियों का खून भी बहाया, लेकिन बाद में हमने उन्हें सत्ता में स्थान दिया। इन्हीं प्रयासों के बाद उत्तरी आयरलैंड में शांति स्थापित हो सकी। ध्यान रहे कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अफगान युद्ध से चरणबद्ध सैन्य वापसी की घोषणा कर चुके हैं। उनके साथ ही ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य देशों ने भी सैनिकों की वापसी का कार्यक्रम घोषित कर दिया है। इस प्रकार से 2014 तक अफगानिस्तान से पूर्ण सैन्य वापसी होनी है। ऐसे में अमेरिका, ब्रिटेन और अफगानिस्तान सरकार तालिबान के अलग-अलग धड़ों से सुलह संबंधी वार्ता करने में जुटे हैं। दरअसल, तालिबान के साथ वार्ता को लेकर सभी के अपने-अपने हित हैं। अमेरिका, ब्रिटेन का मकसद अफगानिस्तान से सैन्य वापसी है तो पाकिस्तान काबुल में उस तालिबान धड़े को सत्ता दिलाना चाहता है जिस पर उसका नियंत्रण है। इन गुटों में हक्कानी नेटवर्क उसके सबसे करीब है। दूसरी ओर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई तालिबान की सरकार में भूमिका को लेकर असमंजस की स्थिति में हैं। वह यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर, जलालुद्दीन हक्कानी, सिराजुद्दीन हक्कानी, गुलबुद्दीन हिकमतयार जैसे नेता या फिर उनके द्वारा समर्थित तालिबान लड़ाकों के सरकार में आने के बाद एक लोकतांत्रिक सरकार काबुल में कैसे चल पाएगी। यही कारण है कि तालिबान के साथ सुलह संबंधी वार्ता के मुद्दे पर करजई और पश्चिमी देशों के बीच मतभेद गहरा रहे हैं। बहरहाल, जानकार कैमरन के इस बयान को जल्द से जल्द सैन्य वापसी के एक सूत्रीय एजेंडे का हिस्सा मान रहे हैं। तालिबान को सत्ता में शामिल करना अफगानिस्तान के भविष्य के लिए कितना सही होगा यह देखना रोचक होगा। अफ-पाक के सीमाई क्षेत्रों में होगी निर्णायक जंग अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना और नाटो के कमांडर पद से सेवानिवृत्त होने जा रहे जनरल डेविड पेट्रियास का कहना है कि आने वाले महीनों में तालिबान के खिलाफ लड़ाई अफगानिस्तान के पूर्वी हिस्से में केंद्रित होगी। यह इलाका पाकिस्तान की सीमा से सटा है। तालिबान लड़ाके अफगान सीमा में घुसते हैं और संघर्ष के बाद पाकिस्तान लौट जाते हैं। पेट्रियास सीआइए के नए निदेशक बनने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान के पूर्वी इलाकों में ज्यादा सैनिकों की तैनाती की जाएगी। उन्होंने कहा, सैनिकों को उस ओर भेजा जाएगा। इसके अलावा हेलीकॉप्टरों और अन्य उपकरणों को भी पूर्वी हिस्से की ओर भेजा जाएगा। दूसरी ओर कनाडा ने अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को हटाना शुरू कर दिया है। उसके करीब 3,000 सैनिक यहां तैनात हैं। बीते नौ वर्षो के दौरान 157 कनाडाई सैनिक मारे जा चुके हैं|

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