Monday, July 4, 2011
नापाक चेहरे की झलक
पाकिस्तानी हुकूमत की शह पर एक और मानवाधिकार कार्यकर्ता को मौत के घाट उतार दिया है। बलूचिस्तान के जाफराबाद जिले में मीर रुस्तम बारी को डेरा अल्लाहयार इलाके में उनके घर के सामने ही मोटरसाइकिल सवाल बंदूकधारियों ने मार डाला। यह पाकिस्तान की तथाकथित सिविलियन हुकूमत के उस अभियान की एक कड़ी मात्र है जिसमें फौज के इशारे पर उन लोगों को मार दिया जाता है जो सरकार और फौज के लिए मुश्किल पैदा करने की कोशिश कर रहे होते हैं। पिछले हफ्ते पाकिस्तानी रेंजर्स ने कराची शहर के बीचोबीच उन्नीस साल के एक लड़के सरफराज शाह को राह चलते मार डाला था। सरफराज शाह की हत्या को सबने देखा, क्योंकि किसी वीडियो कैमरामैन ने उसकी फिल्म उतार ली थी और न्यूज चैनलों ने उसे सार्वजनिक कर दिया था। सरफराज शाह की हत्या मीर रुस्तम बारी से अलग तरह की हत्या है। इस नौजवान को तो रेंजर्स के सिपाहियों ने मजा लेने के लिए मार डाला था। इसके पीछे कहीं कोई राजनीतिक मंशा नहीं थी। इसीलिये यह हत्या ज्यादा खतरनाक मानी जा रही है, क्योंकि जिस समाज में तफरीह के लिए किसी राह चलते इंसान को मार डाला जाए उसका अधोपतन लगभग पूरी तरह से मुकम्मल माना जाता है। पूरे पाकिस्तान ने टीवी चैनलों पर देखा कि किस तरह रेंजर्स की गोली का शिकार होकर वह नौजवान चिल्लाता रहा कि उसे अस्पताल पहुंचा दिया जाए, लेकिन कोई नहीं आया। सरफराज शाह की हत्या पाकिस्तानी राष्ट्र और समाज के लिए एक खतरे की घंटी है, क्योंकि जो पाकिस्तानी फौज और आईएसआई अब तक उन लोगों को मार रही थी जो हुकूमत के लिए मुश्किलें पैदा कर रहे थे उसने राह चलते लोगों को अपना शिकार बनाना शुरू कर दिया है। पाकिस्तानी बुद्धिजीवियों का कहना है कि देश बहुत ही बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है। यह संकट 1971 के उस संकट से भी बड़ा है जब मुल्क का एक बड़ा हिस्सा अलग होकर स्वतंत्र बांग्लादेश बन गया था। पाकिस्तान के ताजा हालत के बारे में जो बात हैरानी की है वह यह कि लोकतांत्रिक अधिकारों की बात करने वालों की लगभग रोज ही हो रही हत्याओं के बावजूद बाकी दुनिया में कहीं भी उसके विरोध में आवाज नहीं उठ रही है। जहां तक सभ्य समाज के लोगों की हत्या का सवाल है तो ऐसी हत्याएं वहां रोज ही हो रही है। मीर रुस्तम बारी की हत्या के एकाध दिन पहले ही क्वेटा में प्रोफेसर सबा दश्तियारी को मार डाला गया था। उसके कुछ दिन पहले खोजी पत्रकार सलीम शहजाद को मौत के घाट उतार दिया गया था। इन हत्याओं में जो बात उभर कर सामने आती है वह यह कि मारे गए सभी लोग उस बिरादरी से संबंधित हैं, जो फौज के इशारे पर काम करने वाली अमेरिका परस्त सिविलियन हुकूमत की गैर-जिम्मेदार नीतियों से लोगों को आगाह कर रहे थे। इस बिरादरी के लोगों को खत्म कर देने का सिलसिला पिछले कुछ वर्षो से चल रहा है। हालांकि इस तरह से मारे गए लोगों की पूरी सूची तो नहीं बनाई जा सकती, लेकिन कुछ ऐसे नाम जो मीडिया की नजर में आए हैं वे किस्से की कई परतों को बयान कर देते हैं। पाकिस्तानी पंजाब के गवर्नर सलमान तसीर की उनके ही सुरक्षा गार्ड के हाथों हुई हत्या को इस डिजाइन की एक अहम कड़ी के रूप में देखा जाता है। सलमान तसीर के बाद अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री शाहबाज भट्टी और पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के संयोजक नईम साबिर को मारा गया था। पाकिस्तान के मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि जो लोग भी मारे जा रहे हैं लगभग सभी लोग अल कायदा के प्रभाव वाले सैनिक और आतंकवादी संगठनों के शिकार हो रहे हैं। प्रोफेसर सबा दश्तियारी से जिहादी संगठन खास तौर से नाराज थे, क्योंकि उनके काम से नौजवानों में लोकतांत्रिक चेतना आती। वे छात्रों को लोकतंत्र के बारे में जागरूकता का संदेश दे रहे थे। बलूचिस्तान में पाकिस्तानी फौज का डंडा बहुत ही जबर्दस्त तरीके से चल रहा है। ऐसा शायद इसलिए हो रहा है कि उस इलाके में जमीन के नीचे कच्चे तेल के बड़े जखीरों का पता चला है और सरकार उसे पूरी तरह से अपने कब्जे में रखना चाह रही है। वहां अक्सर निर्दोष बलोच युवकों को पकड़ कर उनको सेना के कब्जे में रखा जाता है और उन्हें हर किस्म की यातनाएं दी जाती हैं। आतंक फैलाने के उद्देश्य से ऐसे लोगों को मार दिया जाता है जो बिल्कुल सीधे सादे होते हैं। अभी पिछले दिनों बलूचिस्तान विश्वविद्यालय की एक महिला प्रोफेसर नाजिमा तालिब को भी गोली मार दी गई थी। एकाध को छोड़कर मारे गए ज्यादातर लोग पाकिस्तानी समाज में चेतना फैलाने का काम कर रहे थे। कुछ को पाकिस्तानी सेना के लोगों ने सीधे तौर पर मार डाला था, लेकिन कुछ को किसी आतंकवादी संगठन के लोगों ने मारा और जिम्मेदारी ली। जानकार बताते हैं कि पाकिस्तान में आतंकवादी संगठन लगभग पूरी तरह से आइएसआइ और फौज की कृपा से चलते हैं इसलिए वहां पर लोकतंत्र और मानवाधिकारों का जो भी खात्मा हो रहा है उसके लिए आइएसआइ और फौज ही पूरी तरह से जिम्मेदार है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
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