Friday, July 1, 2011

म्यांमार के प्रति भारत का दोहरापन

कभी बर्मा के नाम से प्रसिद्ध म्यांमार के प्रति भारतीय प्रतिक्रिया में एक विचित्र दोहरापन देखने को मिला है। विदेश मंत्री एस एम कृष्णा पिछले सप्ताह म्यांमार के संक्षिप्त दौरे पर थे। यह म्यांमार में नई नागरिक सरकार के साथ पहला आधिकारिक संपर्क था। दौरे के दौरान विदेश मंत्री नई सरकार के अनेक प्रमुख हस्तियों से मिले लेकिन वह म्यांमार के जिन नेताओं से मिले, उनमें एक महत्वपूर्ण शख्सियत गायब थी। वह लोकतांत्रिक आंदोलन की प्रमुख नेता आंग सान सू ची से नहीं मिले जिन्हें पिछले वर्ष चुनावों के ठीक बाद नजरबंदी से आजाद किया गया था। यह काम मंत्री के साथ म्यांमार गईं विदेश सचिव निरुपमा राव पर छोड़ दिया गया। भारतीय प्रतिनिधिमंडल आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की मजार पर भी गया, जिन्हें १८५७ में अंग्रेजों द्वारा निर्वासित करके रंगून भेज दिया गया था।

अगर भारतीय विदेश मंत्री ने आंग सान सू ची से मुलाकात की होती तो क्या वह एक बड़ी कूटनीतिक घटना होती? क्या मेजबान इससे काफी नाराज होते, क्योंकि मंत्रालय की सर्वोच्च अधिकारी से उनकी मुलाकात से मेजबानों यानी म्यांमार की नई नागरिक सरकार को कोई परेशानी नहीं हुई? विदेश सचिव निरुपमा राव ने अपने तीन दिवसीय दौरे के पहले दिन नोबेल पुरस्कार विजेता और १९९१ के जवाहरलाल नेहरूअवार्ड फॉर इंटरनेशनल अंडरस्टैंडिंग प्राप्त करने वाली आंग सान सू ची से मुलाकात की और इस मुलाकात का मंत्रिमंडलीय दौरे पर प्रभाव पड़ने के लिए पर्याप्त समय था। संयोगवश, म्यांमार में भारत के राजदूत पहले ही अब भंग कर दिए गए नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) की महासचिव से उनके रिहा होने के एक माह बाद ही दिसंबर में मिल चुके थे।

म्यांमार सरकार ने विदेशी राजनयिकों द्वारा लोकतंत्र समर्थक नेता से मिलने पर कोई पाबंदी नहीं लगाई है। जापानी संसदीय उप विदेश मंत्री किकुता म्यांमार के विदेश मंत्री के साथ सू ची से भी मिले और यूरोपीय संघ के एक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल ने भी उनसे बात की। यह भारतीय विदेश मंत्री द्वारा विपक्ष की नेता से मिलने से इनकार को और भी रोशनी में ला देता है। श्री कृष्णा ने राष्ट्रपति थेन सेन और प्रथम उप राष्ट्रपति टिन आंग मिंत ओ से बात की, वह म्यांमार के विदेश मंत्री वुना मुंग ल्विन और म्यांमार संसद, नेशनल असेंबली तथा पीपुल्स असेंबली के अध्यक्षों खिन आंगन मिंत और श्वे मान से भी मिले। दोनों पक्षों में दोनों देशों के सांसदों के बीच बैठकों तथा विचार-विमर्शों के लिए सहमति हुई। यह एकस्पष्ट संकेत था कि भारत नई सरकार को म्यांमार की निर्वाचित नागरिक सरकार और संसद सदस्यों को म्यांमार लोगों के प्रतिनिधियों के रूप में स्वीकार करता है। स्वीकार्यता के ऐसे संकेतों के समय विपक्ष की नेता से मुलाकात को अनुचित नहीं माना जाता।

भारत सरकार ने म्यांमार के साथ अपने संबंधों में काफी सावधानी रखी है। १९८८ में एनएलडी की चुनावी जीत के बाद सैन्य कार्रवाई के दौरान आंग सान सू ची को पूरा समर्थन देने के बाद नई दिल्ली ने अपना रुख बदला और १९९० के दशक की शुरुआत में म्यांमार सरकार के साथ धीरे-धीरे संपर्क बढ़ाना शुरूकिया। भारतीय सुरक्षा बलों से बचने के लिए सुरक्षित स्थान के रूप में म्यांमार की जमीन का स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल करने वाले पूर्वोत्तर राज्यों के उग्रवादी संगठनों ने म्यांमार के सैन्य सरकार के साथ न्यूनतम संबंधों की नई दिल्ली की नीति पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर दिया। ऐसी आशंकाएं भी थीं कि चीन सैन्य सरकार के मित्र और समर्थक के रूप में म्यांमार में महत्वपूर्ण हो रहा है। संपर्क की धीमी प्रक्रिया तीव्र आर्थिक और राजनीतिक संपर्कों में विकसित हो गई है, जबकि पश्चिमी देश म्यांमार की सैन्य सरकार को अलग-थलग करने पर जोर दे रहे थे।

संपर्क की नीति एक प्रभावी नीति रही है। सीमा क्षेत्र में सहयोग ने भारतीय सुरक्षा बलों को उग्रवादी संगठनों पर शिकंजा कसने में मदद की है और व्यापार बढ़ा है। भारत को महसूस हुआ है कि प्रतिबंध थोपने या लोकतंत्र को लेकर प्रत्यक्ष रूप से धमकाने की जगह म्यांमार सरकार से आराम से बात करना और उसे समझाना अधिक प्रभावी तरीका है। नरगिस चक्रवात द्वारा देश के व्यापक इलाकों में तबाही मचाने के बाद म्यांमार सरकार ने भारत द्वारा भेजी गई राहत सामग्री और चिकित्सा सहायता को खुशी से स्वीकार कर लिया जबकि उसने अन्य देशों की सहायता को अस्वीकार कर दिया। इस दृष्टिकोण ने भारत और म्यांमार को राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक सहयोग विकसित में मदद की है लेकिन भारत अपना प्रभाव दो अन्य पड़ोसियों चीन या थाईलैंड के आस-पास भी नहीं बना पाया है।

द्विपक्षीय व्यापार प्रभावी ढंग से विकसित हुआ है, २००६ के बाद से द्विपक्षीय व्यापार दोगुना होकर २०१० में १.५७ अरब डॉलर पहुंच गया है। थाईलैंड, सिंगापुर और चीन के बाद भारत म्यांमार का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है। बहरहाल, चीन म्यांमार में सबसे बड़ा विदेशी निवेशकर्ता है। कृष्णा के दौरे के बाद भारत के पूर्वोत्तर में मिजोरम से लेकर चिन राज्य तक ८० किलोमीटर लंबी सड़क बनाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को मांडले में १२वीं सदी के एक हिंदू मंदिर का जीर्णोद्धार करना है। भारत में एक कृषि अनुसंधान केंद्र और एक व्यावसायिक कौशल केंद्र स्थापित करेगा। नवंबर के चुनावों ने इस सरकार को एक नागरिक चोला प्रदान किया, जो अब भी सेना द्वारा समर्थित सरकार है। चौथाई संसदीय सीटें सेना के लिए आरक्षित थीं और सेना के समर्थन वाली पार्टी भारी बहुमत से जीती। सैन्य शासन ने एक नया संविधान लाया है, जिसने प्रभावी तरीके से सू ची को चुनाव लड़ने से रोक दिया है और उनकी एनएलडी को भंग कर दिया गया है क्योंकि वह नए नियमों के अंतर्गत नहीं आ रही थी।

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