Wednesday, July 27, 2011

दिल्ली आते ही हिना ने दिखाया रंग


 पाक विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार ने हिंदुस्तान आते ही अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। उन्होंने विदेश मंत्री एसएम कृष्णा से मुलाकात से पहले मंगलवार को कश्मीर के अलगाववादी नेताओं से मिल कर साफ कर दिया कि उनका एजेंडा क्या है। हालांकि भारत ने रब्बानी के दौरे को अंतिम रूप देने से पहले ही साफ कर दिया था कि नई दिल्ली अलगाववादियों से भेंट से खुश नहीं होगा। एक साल बाद दोनों देशों के बीच हो रही विदेश मंत्री स्तर वार्ता बुधवार सुबह 11 बजे शुरू होगी। वार्ता के बाद दोनों खेमें मीडिया से अलग-अलग मुखातिब होंगे। साझा प्रेस कांफ्रेंस न करने का फैसला पिछली बार के कड़वे अनुभवों को देखते हुए लिया गया है। इस प्रेस कांफ्रेंस में कुरैशी ने तत्कालीन गृह सचिव जीके पिल्लै की तुलना लश्कर सरगना हाफिज सईद से कर दी थी। दौरे में रब्बानी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी मुलाकात करेंगी। रब्बानी गुरुवार दोपहर लाहौर रवाना हो जाएंगी। पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने मंगलवार को हुर्रियत के कट्टरपंथी नेता सैयद अली शाह गिलानी और नरमपंथी गुट के प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक और जेकेएलएफ के यासीन मलिक सहित विभिन्न कश्मीरी अलगाववादियों से लंबी मुलाकात की। इनमें आतंकी गतिविधियों में शामिल रहे लोगों से लेकर लोगों को हिंसा के लिए उकसाने वाले तक शामिल थे। इनमें से किसी ने भी कभी चुनाव नहीं लड़ा। बताया जाता है कि इस मुलाकात में उन्होंने अलगाववादियों से कहा कि वे विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के साथ मुलाकात में कश्मीर के मसले को खुल कर उठाना चाहती हैं। मुलाकात के बाद बयान में पाक विदेश मंत्री ने कहा कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार की हिमायत करता है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर के लोगों की आकांक्षा के मुताबिक इस मामले के समाधान का भी समर्थन किया। सूत्रों के मुताबिक खार के कार्यक्रम तय किए जाने के दौरान ही यह साफ कर दिया गया था कि भारत उन्हें इस मुलाकात से रोकना नहीं चाहता, लेकिन इससे बचा जाए तो बेहतर होगा। यह सलाह भी दी गई थी कि अगर वो अलगाववादियों से मुलाकात कर ही रही हैं तो कम से कम उनसे हिंसा का रास्ता छोड़ कर मुख्य धारा में शामिल होने की अपील जरूर करें। रब्बानी से मुलाकात से उत्साहित गिलानी ने भारत विरोधी आग उगली। उन्होंने कहा कि जब तक हिंदुस्तान की सरकार जम्मू-कश्मीर के लिए आजादी की मांग को नहीं मान लेती और दूसरी मांगों को पूरा नहीं करती, इससे वार्ता का कोई फायदा नहीं।

Monday, July 18, 2011

China red flags India move to join NSG

China is learnt to have questioned India’s membership proposal before the Nuclear Suppliers Group (NSG) on grounds that an exception should not be made for just one country. In a clear attempt to build a case for Pakistan too, China has told the 46-member grouping that all potential candidates must be considered for membership.



According to details that have emerged from the June 23-24 meeting of the NSG at Noordwijk in the Netherlands, there was fair amount of concern expressed by many members over considering India’s membership given that it is not a signatory to the Non-Proliferation Treaty. Some countries also urged the US and other countries like France and UK, which were backing India’s case, to reassess the impact this may have on the non-proliferation regime.



However, it was China that took a totally different line and asked for rules of membership to be framed for all potential candidates than make an exception for India. Pakistan and Israel are the only remaining two nuclear-enabled countries that have not signed the NPT and clearly, sources said, the Chinese emphasis was aimed at benefiting Islamabad. In the end, such a move would end up complicating India’s case.


On the other hand, sources pointed out that Beijing has in the past backed a criteria-based approach within the NSG rather than granting country-specific exemptions. To that extent, this is being seen as a somewhat consistent position.



The US had agreed to pilot India’s membership to the four sensitive technologies export control regimes including the NSG which has the most stringent controls. This commitment was confirmed through the Indo-US joint statement during US President Barack Obama’s visit to India.



While the US has circulated a non-paper among member countries and India too has conducted its own outreach effort, the roadblocks could be a quite a few with China making its intention uncharacteristically clear quite early in the process

सीआइए का भरोसेमंद था करजई के भाई का हत्यारा

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई के भाई अहमद वली करजई की हत्या करने वाला उनका अंगरक्षक तालिबान में भर्ती होने से पहले अमेरिका की विशेष सेना और सीआइए के साथ काम कर चुका था। द वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, मंगलवार को कंधार स्थित वली के घर में गोली मारकर उनकी हत्या करने वाला सरदार मुहम्मद अक्सर ब्रिटिश अधिकारियों के साथ बैठक करता था। सीआइए संचालित अ‌र्द्धसैनिक बल, कंधार स्ट्राइक फोर्स में उसके दो जीजा कार्यरत रहे हैं। हालांकि अब तक के सबूतों से पता चला है कि सरदार मुहम्मद, अहमद वली के विश्वसनीय लोगों में से था। करजई के दूसरे भाई महमूद करजई ने कहा कि हमारी जांच बताती है कि पिछले तीन महीनों से वह सामान्य व्यवहार नहीं कर रहा था। वह काफी चिंतित और परेशान रहता था। आधी रात को उसके फोन आते थे। हमें पता चला है कि उसने पाकिस्तान स्थित क्वेटा जाकर कुछ तालिबान से मुलाकात की थी। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह सच है तो इससे नाटो से नियंत्रण अपने हाथों में ले रही अफगान सेना और पुलिस के लिए भविष्य में समस्याएं दिखती हैं। साथ ही तालिबानी सक्रियता भी नजर आती है। विश्लेषकों का कहना है कि तालिबान के पास कुशल खुफिया अधिकारी हैं, जो अफगान सेना में घुसपैठ करते हैं। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान के सरकारी अधिकारियों पर तालिबान द्वारा बड़े हमले होते रहें हैं और कई तालिबान गुप्तचर सेना में घुस गए हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति के कत्ल की साजिश रच रहा था लादेन

अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना के कमांडर जनरल डेविड पेट्रियास की हत्या की योजना बना रहा था। पाकिस्तान के एबटाबाद में उसके घर से मिले दस्तावेज के हवाले से मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। दो मई को अमेरिकी कमांडरों ने ओसामा को उसके घर में मार गिराया था। सीएनएन ने सूत्रों के हवाले से बताया कि पाकिस्तान में ओसामा की वजीरिस्तान हवेली से बरामद दस्तावेज ये दर्शाते हैं कि अलकायदा बराक ओबामा और पेट्रियास पर हमले की योजना बना रहा था। दस्तावेज में ओबामा और पेट्रियास को अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र में ले जाने वाले विमान पर हमला करने की बात कही गई है। अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल की शुक्रवार को प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया था कि अलकायदा सरगना 9/11 हमले की 10वीं बरसी पर अमेरिका पर हमले की साजिश रच रहा था। सीएनएन ने एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से बताया, ओसामा और उसके चीफ ऑपरेशनल कमांडर अतियाह अब्दल रहमान में हमलावरों की टीम को लेकर मतभेद था। अधिकारी ने बताया कि हमले की यह योजना सिर्फ बातचीत की दौर में थी। एबटाबाद से मिले दस्तावेजों से ये जाहिर होता है कि ओसमा अपने संगठन के दूसरे नेताओं के साथ इस तरह की योजना पर काम कर रहा था। अधिकारियों के मुताबिक लादेन और उसके सहयोगी अतियाह अब्दल रहमान के बीच हमलों की इस योजना पर अमल के लिए कई नामों की चर्चा हुई और ओसामा ने कई नामों को अस्वीकार भी किया। इन अधिकारियों के मुताबिक एबटाबाद से मिले दस्तावेजों और सामान में भारी मात्रा में अश्लील सामग्री भी है।

अफगानिस्तान की सत्ता के और करीब आए तालिबान संयुक्त राष्ट्र,

तालिबान के 14 पूर्व नेताओं के नाम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतिबंधित लोगों की सूची से हटा दिए गए हैं। संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध समिति ने यह कदम अफगानिस्तान सरकार के अनुरोध पर उठाया है। परिषद ने कहा कि इन नामों को सूची से हटाया जाना अफगानिस्तान सरकार द्वारा किए जा रहे सुलह के प्रयासों के प्रति ठोस समर्थन का संकेत होगा। इन 14 तालिबानियों में से चार पिछले साल तालिबान के साथ वार्ता के लिए गठित उच्च शांति परिषद में भी शामिल थे। हालांकि यह भी पता चला है कि अफगानिस्तान ने सूची से हटाने के लिए कुछ और नाम भेजे थे, जिन्हें सुरक्षा परिषद की मंज़ूरी नहीं मिली। परिषद की ओर से जारी बयान में कहा गया है, अंतरराष्ट्रीय समुदाय शांति, स्थायित्व और सुलह कायम करने के लिए उच्च शांति परिषद के प्रयासों को स्वीकार करती है। इन प्रयासों में शामिल होने के लिए सभी अफगानियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इन पर प्रतिबंध 1999 में लगाए गए थे। उन दिनों तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज था। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और उत्तर अटलंाटिक संधि संगठन (नाटो) इस बात से बखूबी वाकिफ हैं कि युद्ध समाप्त हुए बगैर और अफगान सरकार और तालिबान के बीच राजनीतिक समझौते के बिना अफगानिस्तान से 2014 तक सफलतापूर्वक फौजें हटाना संभव नहीं होगा। अफगानिस्तान सरकार पिछले कुछ समय से तालिबान को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करने के प्रयासों में लगी है। अमेरिका ने भी कहा है कि वह तालिबान से शांति वार्ता कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने इन प्रयासों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करते हुए पिछले दिनों तालिबान और अलकायदा को अलग-अलग सूची में रखते हुए उन पर अलग-अलग तरह के प्रतिबंध लागू करने की घोषणा की थी। पहले संयुक्त राष्ट्र दोनों को एक ही तरह के चरमपंथी गुटों की तरह से देखता था सरकार ने भेजे थे 20 नाम : अफगान अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने 20 नेताओं का नाम सूची से हटाने का अनुरोध किया था, लेकिन सुरक्षा परिषद के कुछ सदस्य तालिबान नेताओं के नाम हटाने को लेकर सचेत रहना चाहते हैं। इनमें रूस भी एक है। सुरक्षा परिषद के इस महीने के अध्यक्ष और संयुक्त राष्ट्र में जर्मनी के राजदूत पीटर विटिंग ने कहा, इस निर्णय के जरिए एक बड़ा संदेश दिया गया है कि संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय अफगानिस्तान सरकार की इस पहल का समर्थन करता है कि तालिबान के साथ राजनीतिक वार्ता की जाए जिससे शांति और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। ाुक्रवार को 14 नाम हटाए जाने के फैसले से पहले सुरक्षा परिषद की काली सूची में 137 नाम थे। इस सूची में नाम होने का अर्थ होता है यात्राओं पर प्रतिबंध और संपत्ति जब्त करने का आदेश। उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान में वर्ष 2001 से पहले तालिबान का शासन था। न्यूयॉर्क में 9/11 के हमले के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर इस आधार पर हमला कर दिया था कि तालिबान सरकार ने ओसामा बिन लादेन को पनाह दे रखी है। दस साल लंबे युद्ध के बाद अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई तालिबान को फिर से राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करना चाहते हैं, लेकिन अब तक तालिबान इस प्रस्ताव के जवाब में कहते रहे हैं कि पहले सभी विदेशी फौजों को देश छोड़कर जाना होगा।

दलाइलामा को अमेरिकी न्योते से भडका चीन

चीन के कई बार मना करने के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा आज तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा से मिलने वाले हैं। इससे बीजिंग भड़क गया है। चीन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति को ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिए जो हमारे अंदरूनी मामलों में दखल दे। उन्हें दलाई लामा से मुलाकात नहीं करनी चाहिए। उधर, इन सब बयानों से बेपरवाह ओबामा आज दलाई लामा से मुलाकात करने जा रहे हैं। व्हाइट हाउस के एक बयान में कहा गया है, यह बैठक तिब्बत की अनोखी धार्मिक सांस्कृतिक, भाषाई पहचान और तिब्बत के मानवाधिकारियों की हिफाजत के प्रति राष्ट्रपति के पुरजोर समर्थन को रेखांकित करती है। ओबामा ने फरवरी 2010 में भी दलाई लामा से मुलाकात की थी। इस बार की बैठक व्हाइट हाउस के मैप रूम में होगी, न कि ओबामा के ओवल कार्यालय में, जहां वह राष्ट्राध्यक्षों का स्वागत करते हैं। इस बैठक से प्रेस को दूर रखा गया है। बयान में कहा गया है, राष्ट्रपति मतभेदों का हल करने के लिए दलाई लामा के प्रतिनिधियों और चीनी सरकार के बीच वार्ता का समर्थन किए जाने की बात को रेखांकित करेंगे। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हॉन्ग लेई ने सरकारी वेबसाइट पर जारी बयान में कहा है, हम किसी भी देश के वरिष्ठ अधिकारियों की दलाई लामा से मुलाकात का विरोध करते हैं। हॉन्ग ने अमेरिका से अपील की है कि बराक ओबामा जितनी जल्दी हो सके दलाई लामा के साथ अपनी मुलाकात रद करें। वह ऐसा कुछ ना करें जो चीन के अंदरूनी मामले में दखलंदाजी हो और जिससे दोनों देशों के रिश्तों में नुकसान पहुंचे। दलाई लामा 1959 से ही भारत में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उनका कहना रहा है कि तिब्बतियों को शांतिपूर्ण ढंग से उनके अधिकार दे देने चाहिए। वह चीन के शासन को भी स्वीकार करते हैं।

Saturday, July 16, 2011

पाक के नापाक इरादे


इस बात की संभावना तो थी ही कि आतंकवादियों का सफाया करने के लिए पाक पर पड़ने वाले अमेरिकी दबाव का प्रभाव भारत पर भी पडे़गा। जब अमेरिका ने उत्तर और दक्षिण वजीरिस्तान की पाकिस्तानी कबाइली पट्टी में मौजूद आतंकवादियों के ठिकानों और सुरक्षित पनाहगाहों पर ड्रोन हमलों को रोकने से इनकार कर दिया तो पाकिस्तान के चहेते आतंकवादी संगठन, लश्करे-तैयबा ने इस काम को पूरा किया। पिछले एक सप्ताह में अमेरिकी ड्रोनों ने कम से कम दस ठिकानों पर हमले किए हैं और हर हमले में औसतन दर्जन भर आतंकवादियों का सफाया किया। इस्लामाबाद की इन सामरिक संपत्तियों पर हमलों में तेजी पाकिस्तान और उसके संरक्षक चीन दोनों को चुभ रही थी। इसलिए चीन ने अमेरिका को दोटूक कह दिया कि पाकिस्तान पर किसी भी हमले को चीन पर हमला माना जाएगा। यह इसलिए कि पाकिस्तान और चीन की सामरिक संपत्तियां समान और संयुक्त हैं। इस कारण अफगानिस्तान पर सोवियत हमले के बाद से पोषित आतंकवादी पाकिस्तान की बलूचिस्तान तटरेखा पर ग्वादार बंदरगाह के रास्ते फारस की खाड़ी तक सीधी पहंुच हासिल करने में चीन के अग्रिम दस्ते का अंग होंगी। कुछ ही दिन पहले अपनी जमीन पर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने में पाकिस्तान की मदद करने के लिए आवंटित 80 करोड़ अमेरिकी डॉलर की मदद रोक दी। जवाब में पाकिस्तान ने कहा कि वह अफ-पाक सीमा पर सभी सैन्य ऑपरेशनों को रोक देगा और वहां से अपने सैनिकों को हटा लेगा। अपनी नियमित सेना और अफगानिस्तान के साथ लगने वाली सीमा पर सुरक्षित पनाहगाहों में मौजूद करीब पांच लाख प्रशिक्षित जिहादी आतंकवादियों को हटाने और उन्हें भारत के मुकाबले खड़ा करने की लंबे समय से चली आ रही धमकी पर अमल कभी भी हो सकता है। इस अमल के तहत ही बुधवार की रात को मुंबई के दादर, झावेरी बाजार और ओपेरा हाउस इलाकों में तीन धमाके हुए। आने वाले समय में देश के विभिन्न व्यापारिक और प्रौद्योगिक प्रतिष्ठानों समेत शहरी इलाकों को निशाना बनाया जा सकता है। मुंबई हमले के बाद गठित राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी एनआइए के लिए यह कड़ा इम्तिहान होगा। शहरी ठिकानों पर आतंकवादी हमलों का कारण कश्मीर को शेष भारत से अलग करने में पाक सेना और आइएसआइ की नाकामी है। दो दशक पहले पाकिस्तान ने पंजाब को भारत से अलग करने की बजाय अपना ध्यान कश्मीर पर केंद्रित किया था। उसे उम्मीद थी कि मजहब के नाम पर वह कश्मीर में बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय को पाकिस्तान में आने के लिए राजी कर लेगा लेकिन कश्मीरियों में पाकिस्तान के भीतर के हालात से वितृष्णा हो रही है। पाकिस्तान की मुराद पूरी नहीं हो पाई इसीलिए वह चीन को इसमें शामिल कर रहा है। भारत के खिलाफ आतंकवाद को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने में पाकिस्तान और चीन में सांठगांठ है। पाकिस्तान ने राष्ट्रपति हामिद करजई को चीन के निकट आने की सलाह दी थी। इसी से अमेरिका ने ड्रोन हमलों में वृद्धि कर दी। अगर पाकिस्तान सैनिकों को हटाने की धमकी पर अमल करता है तो अमेरिका ड्रोन हमले और तेज कर सकता है। जहां तक पाकिस्तान की परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी का सवाल है तो यह अमेरिकियों द्वारा भारत के खिलाफ इस्तेमाल की गई चाल से अधिक कुछ नहीं है। लगता है पाकिस्तान को यह अहसास हो रहा है कि धमकी को कार्रवाई में तब्दील करने का यही सही समय है। भारत इस क्षेत्र में चीन-पाक प्रभुत्व के रास्ते में दीवार की तरह खड़ा है। इसीलिए पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ फिर से आतंकवादी हमले शुरू करा दिए हैं। इन हमलों के माध्यम से पाकिस्तान न केवल भारत को, बल्कि अमेरिका को भी झुकाने की कोशिश कर रहा है।

लीबिया संकट सुलझाने के लिए नाटो देशों की नई कूटनीतिक पहल


: लीबिया में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के नेतृत्व में जारी सैन्य कार्रवाई में शामिल देशों के प्रतिनिधियों की इस्तांबुल में शुक्रवार को बैठक हुई। नाटो नेताओं को उम्मीद है कि विद्रोही लीबियाई शासक मुअम्मर गद्दाफी को गद्दी से हटाने के करीब पहुंच चुके हैं। अल जजीरा के अनुसार, तथाकथित लीबिया संपर्क समूह की इस बैठक की अध्यक्षता तुर्की के प्रधानमंत्री, रिसेप तईप एरडोगन कर रहे हैं। बैठक में संकट के समाधान के लिए तुर्की समर्थित राजनीतिक खाके का आकलन किया जाएगा और बेनगाजी स्थित राष्ट्रीय अस्थायी परिषद की मदद से आगे के कदमों पर चर्चा होगी। मार्च के बाद अपने तरह की यह चौथी बैठक है। बीबीसी डॉट को डॉट यूके के अनुसार, इस्तांबुल में जुटे 15 नाटो नेताओं में अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन, ब्रिटेन के विदेश मंत्री विलियम हेग, इटली के फ्रैंको फ्रैटिनी, और फ्रांस के एलेन जुपे और नाटो महासचिव एंडर्स फोघ रासमुसेन शामिल हैं। इंस्ताबुल स्थित अलजजीरा संवाददाता बामाबी फिलिप्स ने कहा, बैठक का मुख्य फोकस गद्दाफी से यथासम्भव जल्द से जल्द छुटकारा पाने और उसके बाद की स्थिति पर विचार करने पर होगा। ब्रिटिश विदेश विभाग की वेबसाइट पर जारी एक बयान में विदेश मंत्री विलियम हेग ने कहा है, सैन्य कार्रवाई लगातार तेज होगी और विपक्ष की ताकत लगातार बढ़ेगी। यहां संपर्क समूह की बैठक में अबतक सर्वाधिक प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं, यहां तक कि अफ्रीका और मध्य पूर्व के प्रतिनिधि भी हैं। संपर्क समूह 40 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को एकजुट करेगा। फ्रांस के नेता जुपे इस सप्ताह से कर्नल मुअम्मर गद्दाफी सरकार के साथ संपर्को पर आधारित एक राजनीतिक समाधान की संभावनाओं का राग अलाप रहे हैं। फ्रांस ने लीबिया में संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के तहत नागरिकों की हिफाजत के लिए नाटो के नेतृत्व में हमले शुरू कराने में एक प्रमुख भूमिका निभाई थी। क्लिंटन के साथ आए वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के हवाले से कहा गया है, नाटो देश, गद्दाफी के बाद की परिस्थिति पर चिंतन शुरू कर रहे हैं। गद्दाफी का समय समाप्त होने वाला है और यह बैठक परिस्थिति के आकलन करने व बदलाव की तैयारी करने हेतु महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। बैठक में बेनगाजी स्थित राष्ट्रीय अस्थायी परिषद के प्रतिनिधि भी उपस्थित होंगे, लेकिन चीन और रूस को बैठक में आमंत्रित नहीं किया गया है।

Tuesday, July 12, 2011

अमेरिकी मदद बिना भी चलेंगे पाकिस्तान के सैन्य अभियान

अमेरिका द्वारा सैन्य सहायता रोके जाने के एक दिन बाद पाकिस्तान ने कहा है कि इससे उसके सैन्य अभियानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। वह अमेरिकी सहायता के बिना भी अपने अभियान जारी रख सकता है। साथ ही उसने यह भी कहा कि सैन्य सहायता और उपकरणों के लिए दी जानेवाली 80 करोड़ डॉलर (करीब 36 अरब रुपये) की सहायता राशि रोके जाने की उसे कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है। पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने कहा, सेना ने बिना किसी बाहरी मदद के अपने संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए अतीत और वर्तमान में कई अभियानों को सफलतापूर्वक संचालित किया है। आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान के ढुलमुल रवैये को देखते हुए अमेरिका ने रविवार को पाकिस्तान सेना को प्रति वर्ष दी जानेवाली दो अरब डॉलर से अधिक की सहायता राशि का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा रोकने का निर्णय किया। ह्वाइट हाउस चीफ ऑफ स्टॉफ टाम डोनिलॉन ने इस खबर की पुष्टि की। पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी के हाल ही में दिए गए बयान को दोहराते हुए कहा कि सैन्य सहायता के लिए मिलने वाली अमेरिकी मदद का इस्तेमाल नागरिकों के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने अमेरिकी सहायता रद होने के बारे में कोई भी टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा, हमें इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली हैं। सहायता राशि के तहत 30 करोड़ डॉलर (करीब 13 अरब रुपये) आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए पाकिस्तान को अफगानिस्तान सीमा पर एक लाख से ज्यादा की सैनिकों की तैनाती पर आने वाले व्यय केभुगतान के संबंध में दिया जाता है। दूसरी ओर सैनिकों के प्रशिक्षण और उपकरणों की खरीद के लिए करोड़ों डॉलर की सहायता भी इसका मुख्य भाग है। अमेरिका आतंकी संगठन अलकायदा से जुड़े संगठन हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पाकिस्तान पर दबाव बना रहा है। हक्कानी नेटवर्क पाकिस्तानी सरजमीं का इस्तेमाल अफगानिस्तान में अमेरिकी और नाटो सैनिकों को निशाना बनाने के लिए करता है। अमेरिकी मीडिया का दावा है कि पाकिस्तानी सेना की खुफिया एजेंसी के तार हक्कानी नेटवर्क से जुडे़ हैं। पाक को अमेरिकी सैन्य मदद में कटौती सही : भारत नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो : पाकिस्तान को अमेरिकी सैन्य मदद पर लगातार चिंता जताते रहे भारत ने इसमें 80 करोड़ डॉलर (करीब 36 अरब रुपये) की सहायता रोकने के फैसले का स्वागत किया है। विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने दक्षिण एशिया के सैन्य संतुलन को प्रभावित कर रही इस सैनिक इमदाद में कमी को सही फैसला करार दिया है। कृष्णा के अनुसार, भारत हमेशा मानता है कि इस इलाके में अमेरिका का भारी सशस्त्रीकरण शक्ति संतुलन की इबारत को गड़बड़ा सकता है। खासकर भारत-पाक संबंधों की नजाकत देखते हुए हम सीमित संदर्भो में इसका स्वागत करते हैं। उल्लेखनीय है कि अमेरिका के साथ भारत हर महत्वपूर्ण द्विपक्षीय मंच पर यह बात उठाता रहा है कि पाक इस सैनिक सहायता का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर रहा है। हालांकि विदेश मंत्री कृष्णा ने पाकिस्तान के साथ विश्वास बहाली की कोशिशों में सकारात्मक प्रगति की भी उम्मीद जताई। उनका कहना था कि इस महीने के अंत में पाकिस्तानी विदेश राज्यमंत्री हिना रब्बानी खार के नई दिल्ली दौरे में वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

पाक में पहचान को मोहताज शादीशुदा हिंदू

पाकिस्तान में शादी के पंजीकरण के लिए कानून बनाने की मांग कर रहे अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय ने सरकार का ध्यान खींचने की कोशिशें तेज कर दी हैं। एक हिंदू युगल ने यहां प्रेस क्लब के सामने सोमवार को सादगी से विवाह रचाया। एक्सप्रेस ट्रिब्यून की खबर के मुताबिक, सिंध प्रांत के दूसरे सबसे बड़े शहर हैदराबाद में प्रेस क्लब के सामने मुकेश और पद्मा ने अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लिए। इस शादी को आम हिंदू शादियों की तरह तड़क-भड़क से दूर रखा गया था ताकि अल्पसंख्यक समुदाय की शादी के पंजीकरण के लिए कानून की मांग को उठाया जा सकें। शादी संपन्न कराने वाले गुरु सुख देव ने कहा, 1947 से हिंदू युगल को कानूनी तौर पर पति-पत्‍‌नी की तरह स्वीकार नहीं किया जाता। इससे कई घरेलू, सामाजिक और मानसिक समस्याएं हिंदू परिवारों के लिए खड़ी हो जाती हैं। खास तौर पर महिलाओं के लिए। यात्रा के दौरान शादी का कोई सुबूत न होने के कारण अक्सर पुलिस परेशान करती है। हिंदुओं की शादी का पंजीकरण न होना गंभीर समस्या है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को अल्पसंख्यक हिंदुओं को कंप्यूटरीकृत पहचान पत्र जारी करने का आदेश दिया है, इसके बावजूद इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। सुखदेव ने कहा कि पाकिस्तान बनने के बाद से हिंदू विवाह के लिए कोई कानून नहीं बना। उन्होंने कहा, उनके समुदाय की कई लड़कियों का अपहरण करके जबरन धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जाता है। हिंदू लड़कियों के संरक्षण के लिए कोई कानून नहीं है। इस शादी में शामिल होने वाले प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी से कानून के प्रभावी होने तक हिंदू विवाह पंजीकरण के लिए अध्यादेश जारी करने का आग्रह किया। प्रदर्शनकारियों में शामिल सपना देवी ने कहा, मेरी शादी को 17 साल हो गए, लेकिन इसका कोई कानूनी सुबूत नहीं है। भगवान न करे, लेकिन अगर मेरे पति को कुछ हो जाता है तो मैं प्रापर्टी के लिए दावा भी पेश नहीं कर सकती।

Saturday, July 9, 2011

स्थिरता की आस में थाईलैंड

राजनीतिक अस्थिरता के लिए खासे बदनाम हो चुके थाईलैंड में शासन की बागडोर अब एक महिला नेत्री के हाथ में आ गई है, जो राजनीति में पूर्ण रूप से अनुभवहीन हैं। इंगलक शिनवात्रा देश की नई प्रधानमंत्री चुनी गई हैं और उनके सामने कई कठिन चुनौतियां खड़ी हैं। हालांकि इंगलक कोई आम महिला नहीं हैं, वह देश के पूर्व प्रधानमंत्री थाकसिन शिनवात्रा की छोटी बहन हैं। इंगलक को देश चलाने के लिए बड़े भाई से लगातार सहयोग भी मिलेगा, क्योंकि इस जीत में उनकी बड़ी भूमिका मानी जा रही है। इंगलक शिनवात्रा ने सत्तासीन दल डेमोक्रेटिक पार्टी को हराया है। इस आम चुनाव में इंगलक की फू थाई पार्टी ने 500 सीटों वाली थाई संसद में 265 सीटें जीत ली हैं, जबकि निवर्तमान प्रधानमंत्री अभिसित वेज्जाजीवा की पार्टी को महज 159 सीटें ही मिली हैं। इंगलक को चार और पार्टियों का समर्थन हासिल है, जिससे उनके पक्ष में बहुमत 299 का हो गया। परिणाम आने के बाद ब्रिटिश मूल के अभिसित वेज्जाजीवा ने अपनी हार स्वीकार कर ली है और उन्होंने इंगलक शिनवात्रा को महिला प्रधानमंत्री के रूप में सरकार के गठन व चलाने में मदद करने का आश्वासन दिया है। इन परिणामों से माना जा रहा है कि थाईवासियों ने अपने देश की राजनीति में सेना के हस्तक्षेप को नकार दिया है। राजनीतिक अस्थिरता के कारण वहां भी सेना ने सत्ता में पकड़ बनाते हुए हस्तक्षेप शुरू कर दिया था और इसे लेकर आमजन में काफी नाराजगी थी। दूसरी ओर इंगलक की जीत में माना जा रहा है कि उनके बड़े भाई पूर्व प्रधानमंत्री थाकसिन की नीतियों का बड़ा योगदान है और इसी को आधार बनाते हुए वह चुनाव मैदान में उतरीं, जिसमें उन्हें आशातीत सफलता भी मिली। राजनीति में बिना किसी अनुभव के प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचने वाली इंगलक शिनवात्रा को अपने भाई से काफी मदद मिलने की संभावना है। कहा जा रहा है कि दुबई में स्व-निर्वसन जीवन जीने वाले थाकसिन के हाथों में सत्ता की मुख्य चाभी रहेगी यानी वह अपनी बहन की सरकार में अप्रत्यक्ष रूप से सलाहकार की भूमिका निभाते रहेंगे। यह चुनाव इस मायने में भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि देश ने इस चुनाव को लेकर काफी हिंसा देखी है। रेड शर्ट (लाल कमीजधारी) कहलाने वाले ये प्रर्दशनकारी पूर्व प्रधानमंत्री थाकसिन शिनवात्रा के समर्थक हैं, जो फिर से चुनाव कराने की मांग कर रहे थे। उनका कहना था कि वर्तमान अभिसित वेज्जाजीवा सरकार अवैध है। वह चुनकर सत्ता में नहीं आई है, इसलिए संसद को भंग किया जाए और नए सिरे से चुनाव कराकर सरकार का गठन किया जाए। पूरे विवाद की शुरुआत 2006 से होती है, जब थाकसिन की सरकार को सितंबर में सैन्य विद्रोह के बाद अपदस्थ कर दिया गया था। सैन्य विद्रोह के बाद दिसंबर 2007 में पहली बार चुनाव हुए, जिसमें शिनवात्रा के समर्थकों की जीत हुई, लेकिन येलो शर्ट (पीपुल्स एलायंस फार डेमोक्रेसी) समर्थकों ने एक साल बाद विरोध शुरू कर दिया, जिसमें दिसंबर 2008 में शिनवात्रा के समर्थकों की सरकार गिर गई और अभिजीत ने सरकार बनाई। विरोध की चिंगारी आगे भी जलती रही और दो साल बाद इसने प्रचंड रूप धारण कर लिया और मार्च 2010 से रेड शर्ट समर्थकों ने अभिजीत की सरकार गिराने के वास्ते बैंकाक में हर जगह विरोध आंदोलन शुरू कर दिया। 12 मार्च से लेकर 19 मई 2010 तक इन प्रदर्शनकारियों ने बैंकाक में खूब तबाही मचाई। जबरदस्त विरोध प्रदर्शन के कारण बैंकाक के हवाई अड्डों को बंद करना पड़ा। प्रदर्शनकारियों ने स्टॉक एक्सचेंज समेत कई इमारतों में आग लगा दी। विरोध को देखते हुए सेना को सड़क पर उतरना पड़ा और काफी जद्दोजहद के बाद बैंकाक में शांति की स्थापना हो सकी। इस विरोध के दौरान जान-माल की भारी क्षति हुई। हिंसक क्षड़पों में 91 लोग मारे गए, जिसमें एक जापानी और एक इतालवी पत्रकार भी शामिल थे। इस दौरान पांच बिलियन डॉलर यानी 150 बिलियन बहत (थाई मुद्रा) बरबाद हो गए। वर्ष 2006 से देश में छाई राजनीतिक अस्थिरता का अंत इस साल तीन जुलाई को समाप्त होता हुआ दिखा, जब देश में आम चुनाव हुए। इंगलक शिनवात्रा इस चुनाव में जीतकर उभरीं। इंगलक अपने बड़े भाई की तरह उद्योग जगत में सफल होने के बाद राजनीति के मैदान में उतरी हैं। फू थाई पार्टी की शीर्ष उम्मीदवार रहीं इंगलक ने प्रधानमंत्री पद से पूर्व और कोई पद नहीं संभाला है। इंगलक के बारे में कहा जाता है कि वह बहुत व्यवहार कुशल हैं ओर लोगों को एक साथ लेकर चलने में विश्वास रखती हैं। जहां तक उनकी शैक्षणिक योग्यता का सवाल है तो उन्होंने अपने परिवार के राजनीतिक गढ़ यानी देश के उत्तरी शहर चियांग माइ से स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद अमेरिका के केंटुकी स्टेट यूनिवर्सिटी से परास्नातक की डिग्री हासिल की। 44 साल की इंगलक अपने परिवार की नौंवी संतान हैं। पढ़ाई के बाद उन्होंने अपने भाई थाकसिन द्वारा स्थापित दूरसंचार कंपनी एआइएस में प्रबंध निदेशक के पद पर कार्य करने के बाद अपने ही परिवार की एक अन्य प्रॉपर्टी से संबंधित कंपनी में भी काम किया। भले ही राजनीति के क्षेत्र में उनका अनुभव शून्य हो, लेकिन पेशेवर जगत में उन्हें खासा अनुभव हासिल है। इस चुनावी जीत को थाकसिन के लिए बड़ी सफलता मानी जा रही है। भ्रष्टाचार के आरोप में खुद ही देश छोड़कर दुबई में रहने वाले थाकसिन के स्वदेश लौटने के कयास लगाए जाने लगे हैं। हालांकि उन्होंने तुरंत स्वदेश लौटने की बात को खारिज कर दिया है। उद्योग में सफलता के झंडे गाड़ने के बाद थाकसिन शिनवात्रा ने 1994 में राजनीति में हाथ आजमाया और 1998 में थाई रक थाई (टीआरटी) पार्टी की स्थापना की। इस पार्टी ने 2001 में जीत हासिल की और थाकसिन ने प्रधानमंत्री का पद ग्रहण किया। वह पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री भी बने। हालांकि बाद में उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे। सुप्रीमकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कोर्ट में उपस्थिति न होने और भ्रष्टाचार के आरोप में थाकसिन को दो साल की कैद की सजा सुना दी साथ ही पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया। बाद में उनके समर्थकों ने फू थाई पार्टी का गठन किया, जिसे थाकसिन का भी समर्थन हासिल है। पिछले कई सालों से राजनीतिक उठापटक देखने के बाद थाईलैंड में शांति के आसार बन रहे हैं। पूर्ण बहुमत पाने के बावजूद इंगलक अपने सहयोगियों के साथ सरकार बनाने का मन बना रही हैं। लगातार विद्रोहों के कारण थाईलैंड की अर्थव्यवस्था को खासा नुकसान उठाना पड़ा है और लोकतंत्र के भविष्य पर भी संकट आ गया था। ऐसे में युवा व महिला प्रधानमंत्री के रूप में इंगलक का पहला लक्ष्य होगा कि देश में राजनीतिक स्थिरता लाई जाए। साथ ही विरोधियों व आलोचकों को फिर से खतरनाक विद्रोह व साजिश रचने का मौका न मिले। पिछले साल बैंकाक ने विरोध-आंदोलन का जो हश्र देखा है उसे थाईवासी अपनी धरती पर दोबारा होते नहीं देखना चाहेंगे|

Wednesday, July 6, 2011

भारत के लिए अफगानिस्तान का महत्व

भारत के लिए अफगानिस्तान बड़ा रणनीतिक महत्व रखता है। असल में यह पाकिस्तान से कहीं अधिक महत्व रखता है, जो अफगानी समाज का ताना-बाना तोड़ने में व्यस्त रहा है। वास्तव में भारत का रणनीतिक हित अफगानिस्तान से कहीं आगे है। इसका विस्तार पश्चिम में होर्मुज जलसंधि और फारस की खाड़ी और यहां तक कि इस रणनीतिक क्षेत्र की सबसे पश्चिमी सीमा के रूप में अफ्रीका के पूर्वी तट तक विस्तृत है, जबकि पूर्व की ओर इसमें मलक्का जलसंधि और दक्षिणी चीन सागर शामिल है। इसी तरह उत्तर की ओर इसमें मध्य एशिया है और दक्षिण की ओर यह अंटार्कटिका तक फैला हुआ है। अफ्रीका इन सभी क्षेत्रों का एक महत्वपूर्ण लिंक है। विस्तृत रूप से देखें तो अफगानिस्तान में भारत का हित दक्षिणी एशिया से आगे अपने हितों को सुरक्षित करने की उसकी व्यापक इच्छा का एक छोटा हिस्सा भर है। भारत अपना रणनीतिक हित समझता है और इसीलिए उसे सुरक्षित करने के लिए चुपचाप और दीर्घकालिक कूटनीतिक और व्यवस्थित रूप से काम कर रहा है। अपने राजनीतिक हित को सुरक्षित करने में भारतीय कूटनीति का सबसे महत्वपूर्ण कदम जरंज-डेलारम सड़क का निर्माण और चाबाहर पोर्ट को विकसित करना रहा है। ये दोनों अफगानिस्तान को पाकिस्तान पर अनन्य निर्भरता से आजाद करेंगे और भारत को अफगानिस्तान तथा मध्य एशिया तक सीधा संपर्क प्रदान करेंगे।

आज के भारत ने एशिया में क्षेत्रीय शक्ति का दर्जा हासिल कर लिया है। उसका एकमात्र प्र्रतिस्पर्धी चीन है, यद्यपि पाकिस्तान भी वह दर्जा हासिल करना चाहता है। हो सकता है कि इसी वजह से वह अमेरिका और चीन के साथ रणनीतिक संबंध विकसित कर रहा हो। तालिबान को एक बड़ी ताकत के रूप में उभरने में मदद करने का भी वही कारण हो सकता है, जो पूरी दुनिया में लोकतांत्रिक व्यवस्था को बर्बाद करना चाहता है। पाकिस्तान रणनीतिक रूप से भारत पर निशाना साध रहा है क्योंकि उसका विश्वास है कि अगर भारत विफल होता है तो एशिया उसके रणनीतिक अधिकार में होगा। जहां तक चीन का प्रश्न है, इसलामी आतंकवाद ने वहां भी फन उठा लिया है। पाकिस्तान को यह उम्मीद हो सकती है कि अगर भारत का पतन होता है तो आतंकवाद के हथियार से चीन पर भी काबू पाया जा सकता है।

यह पिछले कुछ सालों का घटनाक्रम नहीं है। अगर पाकिस्तान की विदेश नीति और महाशक्तियों से संबंध स्थापित करने की उसकी कार्यप्रणाली का विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होगा कि वह अपनी स्थापना के बाद से ही चीन की तुष्टि करता रहा है। उसने चीन को कश्मीर के अधिकृत हिस्से पर गैरकानूनी ढंग से नियंत्रण करने दिया। उसके बाद वह राजमार्गों के निर्माण और बंदरगाहों के विकास की अनुमति देते हुए अपने इलाकों पर रणनीतिक नियंत्रण का मौका देता रहा है। पाकिस्तान इस भ्रम में हो सकता है कि वह चीन को अमेरिका से लड़वा सकता है।

भारत यह जानता है क्योंकि यहां एक स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्था और परिपक्व तथा अनुभवी नौकरशाही है। बीच-बीच में लड़खड़ाने के बावजूद एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कुछ देशों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए कुल मिलाकर भारतीय राजनीतिक व्यवस्था संतोषजनक रूप से काम कर रही है। भारत की विदेश नीति और मुख्य क्षेत्रीय शक्तियों के साथ उसके संबंध तथा उसकी सैन्य व आर्थिक क्षमता का सशक्तीकरण इसका एक संकेत है। वह दुनिया की प्रमुख ताकतों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंधों और एक उपयुक्त विदेश नीति की नीति पर चलता है। वह रक्षा, अंतरिक्ष और पर्यावरण सुरक्षा में पारस्परिक सहयोग के लिए एशिया और अफ्रीका के मित्र देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है और साथ ही अपनी सैन्य क्षमता और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर अपनी अंतरराष्ट्रीय पकड़ को भी मजबूत कर रहा है।

भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण से दक्षिणी और पश्चिमी एशिया में अफगानिस्तान सबसे महत्वपूर्ण देश है। इसकी महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक स्थिति मध्य पूर्व को मध्य एशिया और दक्षिणी एशिया के साथ जोड़ती है। अनवरत लड़ाइयों और हिंसा के कारण उसने अपने आधुनिक इतिहास में अत्यंत अस्थिरता और संघर्ष का सामना किया है और उसकी अर्थव्यवस्था तथा बुनियादी ढांचा नष्ट हो चुके हैं। यह एक खनिज संपन्न देश है जो प्राकृतिक गैस को छोड़कर अधिकांशतः अविकसित है।

अफगानिस्तान में भारत की मुख्य दिलचस्पी कई वजहों से है। पहला, १९९० के दशक में अफगानिस्तान पर तालिबानी शासन के बाद से भारत को कई उल्लेखनीय सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। १९७९ में अफगानिस्तान पर रूसी हमले के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को कई उग्रवादी दलों जैसे लश्कर-ए-तैयबा, हरकत-उल-मुजाहिदीन, हरकत-उल-अंसार और हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी आदि को प्रोत्साहित किया और उनका समर्थन किया। इन आतंकी संगठनों ने भारत को भी निशाना बनाया। सोवियत संघ के पतन के बाद भारत पर तालिबान के हमले बढ़े। भारत नहीं चाहता कि अफगानिस्तान फिर से इस्लामी कट्टरपंथियों के हाथों में चला जाए और आतंकवादियों के लिए सुरक्षित शरणगाह बन जाए।

दूसरा, भारत अफगानिस्तान को मित्र देश बनाए रखना चाहता है क्योंकि वहां से पाकिस्तान की गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सकती है। वह पाकिस्तान की इच्छा के विरुद्ध संसाधनों को विकसित करने में भी मदद कर सकता है। अफगानिस्तान से जेहादी तत्वों को साफ करना भारत के हित में होगा।

तीसरा, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के घटनाक्रम न केवल बड़े पैमाने पर भारत की राष्ट्रीय खासकर आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित करते हैं बल्कि उसके सामाजिक ढांचे पर भी असर डालते हैं। पाक प्रायोजित आतंकवाद से भारत में यह धारणा बनी है कि वह भारत को जीतना चाहता है क्योंकि मुगलों के वंशज होने के कारण वह उपमहाद्वीप पर राज करना अपना हक समझता है।

हथियार छोड़ राजनीति करें तालिबान लड़ाके

अफगानिस्तान की दो दिवसीय यात्रा पर सोमवार को काबुल पहुंचे ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने तालिबान लड़ाकों से हथियार छोड़कर राजनीति में आने की अपील की है। कैमरन ने अफगान तालिबान के साथ सुलह संबंधी वार्ता के बारे में पूछे गए सवाल का स्पष्ट जवाब देते हुए कहा, यह सच है कि उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के देश तालिबान नेताओं के संपर्क में है। हमारे सैन्य अधिकारियों से भी उनकी बात हो रही है। मुझे लगता है कि पश्चिमी सेना की वापसी और अफगानिस्तान के भविष्य के लिए यह बेहद जरूरी है। अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई से मुलाकात के दौरान कैमरन ने कहा कि आयरिश रिपब्लिकन आर्मी (आइआरए) की तर्ज पर अफगान तालिबान के साथ भी समझौता हो सकता है। आइआरए ने उत्तरी आयरलैंड को अलग राष्ट्र बनाने के लिए सशस्त्र संघर्ष किया था। उन्होंने अपनी जिद के लिए ब्रिटिश सुरक्षाकर्मियों का खून भी बहाया, लेकिन बाद में हमने उन्हें सत्ता में स्थान दिया। इन्हीं प्रयासों के बाद उत्तरी आयरलैंड में शांति स्थापित हो सकी। ध्यान रहे कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अफगान युद्ध से चरणबद्ध सैन्य वापसी की घोषणा कर चुके हैं। उनके साथ ही ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य देशों ने भी सैनिकों की वापसी का कार्यक्रम घोषित कर दिया है। इस प्रकार से 2014 तक अफगानिस्तान से पूर्ण सैन्य वापसी होनी है। ऐसे में अमेरिका, ब्रिटेन और अफगानिस्तान सरकार तालिबान के अलग-अलग धड़ों से सुलह संबंधी वार्ता करने में जुटे हैं। दरअसल, तालिबान के साथ वार्ता को लेकर सभी के अपने-अपने हित हैं। अमेरिका, ब्रिटेन का मकसद अफगानिस्तान से सैन्य वापसी है तो पाकिस्तान काबुल में उस तालिबान धड़े को सत्ता दिलाना चाहता है जिस पर उसका नियंत्रण है। इन गुटों में हक्कानी नेटवर्क उसके सबसे करीब है। दूसरी ओर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई तालिबान की सरकार में भूमिका को लेकर असमंजस की स्थिति में हैं। वह यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर, जलालुद्दीन हक्कानी, सिराजुद्दीन हक्कानी, गुलबुद्दीन हिकमतयार जैसे नेता या फिर उनके द्वारा समर्थित तालिबान लड़ाकों के सरकार में आने के बाद एक लोकतांत्रिक सरकार काबुल में कैसे चल पाएगी। यही कारण है कि तालिबान के साथ सुलह संबंधी वार्ता के मुद्दे पर करजई और पश्चिमी देशों के बीच मतभेद गहरा रहे हैं। बहरहाल, जानकार कैमरन के इस बयान को जल्द से जल्द सैन्य वापसी के एक सूत्रीय एजेंडे का हिस्सा मान रहे हैं। तालिबान को सत्ता में शामिल करना अफगानिस्तान के भविष्य के लिए कितना सही होगा यह देखना रोचक होगा। अफ-पाक के सीमाई क्षेत्रों में होगी निर्णायक जंग अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना और नाटो के कमांडर पद से सेवानिवृत्त होने जा रहे जनरल डेविड पेट्रियास का कहना है कि आने वाले महीनों में तालिबान के खिलाफ लड़ाई अफगानिस्तान के पूर्वी हिस्से में केंद्रित होगी। यह इलाका पाकिस्तान की सीमा से सटा है। तालिबान लड़ाके अफगान सीमा में घुसते हैं और संघर्ष के बाद पाकिस्तान लौट जाते हैं। पेट्रियास सीआइए के नए निदेशक बनने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान के पूर्वी इलाकों में ज्यादा सैनिकों की तैनाती की जाएगी। उन्होंने कहा, सैनिकों को उस ओर भेजा जाएगा। इसके अलावा हेलीकॉप्टरों और अन्य उपकरणों को भी पूर्वी हिस्से की ओर भेजा जाएगा। दूसरी ओर कनाडा ने अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को हटाना शुरू कर दिया है। उसके करीब 3,000 सैनिक यहां तैनात हैं। बीते नौ वर्षो के दौरान 157 कनाडाई सैनिक मारे जा चुके हैं|

Monday, July 4, 2011

प्रधानमंत्री की पाकिस्तानी जमींदारी सोच

प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे ने भी इस बात की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का यह बयान अनौपचारिक था और गलती से प्रकाशित हो गया था, जिसमें अब सुधार कर लिया गया है। सवाल तो यह है कि आखिर प्रधानमंत्री इस तरह की बचकाना बातें संपादकों से कर ही क्यों रहे थे..से एक गलती कहेंगे, या पाकिस्तानी पंजाब की सुपीरियरिटी कि हमारे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का जन्म आज के जिस पाकिस्तानी पंजाब में हुआ था, उनपर वहां वाली सोच हावी है। मनमोहन सिंह के अनुसार 25 प्रतिशत बांग्लादेशी कट्टर हैं और जमात-उल-इस्लामी के प्रभाव में हैं। यह सोच पाकिस्तानी पंजाबियों की सोच से मेल खाती है, जो पृथक पाकिस्तान बनने के बाद पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लाभाषी मुसलमानों को हिंदू समर्थक, हिंदू रीति रिवाज मानने वाले बताते थे। इसी सोच का परिणाम था पृथक बांग्लादेश का उदय। जी हां, भारतीय प्रधानमंत्री के एक ऑफ द रिकार्ड बयान ने भारत-बांग्लादेश संबंधों को नुकसान पहुंचाया है। यही नहीं, बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष परंपरा को और मजबूत करने की कोशिश कर रही शेख हसीना के प्रयासों को भी इससे नुकसान पहुंचा है। दरअसल, पिछले दिनों पांच संपादकों के साथ मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा था कि कम से कम 25 फीसदी बांग्लादेशी जमात-उल-इस्लामी के प्रभाव में हैं और वे भारत के खिलाफ हैं। आईएसआई जैसी संस्थाओं ने इन लोगों पर पकड़ बना ली है। उन्होंने कहा था कि ये लोग पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के असर में हैं। आगे उन्होंने कहा कि ऐसे में बांग्लादेश में राजनीतिक परिदृश्य कभी भी बदल सकता है। यों तो प्रधानमंत्री का यह बयान ऑफ द रिकॉर्ड था, लेकिन यह प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ की वेबसाइट पर जारी हो गया। पीएमओ ने हालांकि करीब 30 घंटे बाद अनौपचारिक तौर पर दिए गए डॉ. मनमोहन सिंह के इस बयान को वेबसाइट से हटा लिया। मगर यह बयान ऐसे समय सार्वजनिक हुआ, जब विदेश मंत्री एसएम कृष्णा को एक हफ्ते बाद बांग्लादेश जाना है।

पीएम के बयान को बुधवार की रात पीएमओ की वेबसाइट पर जारी किया गया था। शुक्रवार की सुबह संपादकों से बातचीत का यह लिखित ब्यौरा यानी ट्रांसस्क्रिप्ट सुधार कर फिर से जारी किया गया। इसमें बांग्लादेश को लेकर पीएम के बयान को पूरी तरह से हटा दिया गया। प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे ने भी इस बात की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का यह बयान अनौपचारिक था और गलती से प्रकाशित हो गया था, जिसमें अब सुधार कर लिया गया है। सवाल तो यह है कि आखिर प्रधानमंत्री इस तरह की बचकाना बातें संपादकों से कर ही क्यों रहे थे। अभी भी इस देश के लोग जानते हैं कि बांग्लादेश ही एक मुल्क है, जहां पर हिंदुओं की आबादी बाकी इस्लामी देशों से ज्यादा है। यही नहीं, अगर कुछ पीरियड को छोड़ दिया जाए तो वहां हिंदू पूरी तरह से अपने अधिकारों के साथ जीता है। वहां न तो जबरदस्ती धर्म परिवर्तन की शिकायत अभी तक आई, न ही हिंदुओं के अधिकारों में कटौती की गई। बीच में खालिदा जिया के शासन में जरूर कुछ कट्टरपंथी आंख उठा रहे थे, लेकिन अब शेख हसीना के शासन में हालात वैसे नहीं हैं। आज बांग्लादेश एक धर्मनिरपेक्ष देश के हर नियम का पालन कर रहा है।

भारतीय प्रधानमंत्री का जन्म आज के पाकिस्तानी पंजाब के चकवाल में हुआ था। तो क्या यह माना जाए कि उनकी सोच उसी पंजाबी मानसिकता का परिचायक है, जो बांग्लादेश की उत्पत्ति के लिए जिम्मेवार बना। अगर पंजाबियों ने बंगालियों पर जुल्म नहीं किया होता तो पाकिस्तान से अलग बांग्लादेश का वजूद नहीं होता। वास्तव में बंगालियों का धर्मनिरपेक्ष चरित्र ही पाकिस्तानी पंजाबियों को पसंद नहीं आया था और वे पाकिस्तानी स्टैबलिशमेंट पर कब्जा कर चुके थे। वे उन बंगालियों को हिंदुओं का एजेंट बताने लगे थे, जो बांग्लादेश की मांग करने लगे थे, क्योंकि पाकिस्तान के अंदर उन्हें वे अधिकार नहीं मिल रहे थे, जो मिलने चाहिए थे। बंगाली भाषा का दमन किया गया था और सत्ता में अच्छी संख्या होने के बावजूद सरकार बनाने की इजाजत मुजीब को नहीं दी गई थी। आज भी 1971 की बुरी हार के बाद पाकिस्तानी पंजाब की मानसिकता यही कहती है कि जो बंगाली पाकिस्तान से विद्रोह करके बांग्लादेश बनाने में कामयाब हुए, वे वास्तव में हिंदू टीचरों के स्टूडेंट थे। जिन्हें उनके टीचर स्कूलों में लगातार पाकिस्तान के खिलाफ भड़काते रहे। हमारे प्रधानमंत्री को वास्तव में कई आंकड़े नहीं पता हैं। आज का बांग्लादेश आर्थिक फ्रंट पर काफी तेजी से विकास कर रहा है। व्यापार के क्षेत्र में वह आगे निकल रहा है और पश्चिमी देशों से भी उसके संबंध इसलिए अच्छे हैं कि धर्मनिरपेक्ष चरित्र लेकर यह मुल्क आगे बढ़ रहा है। हालत यह है कि बांग्लादेश का सालाना कपड़ा निर्यात का कारोबार ही आज 12 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। अगर वहां पर इस्लामी कट्टरपंथियों का इतना प्रभाव होता तो निश्चित तौर पर व्यापार और उोग का विकास नहीं होता। ढाका में जन्माष्टमी पर जुलूस निकालने की पाबंदी लग जाती। जबकि दिलचस्प बात है कि हमारे प्रधानमंत्री उस पाकिस्तान से बातचीत के लगातार हिमायती हैं, जहां पर साक्षात रूप से सरकार, सेना और हर स्टैबलिशमेंट में अलकायदा और तालिबान की घुसपैठ हो चुकी है। जहां पर आजादी के 60 साल बाद भी भूमिसुधार नहीं हो पाया और आजादी के बाद भी कठमुल्लापन की आड़ में जमींदारी बची रही। आज भी लाहौर शहर के बाहर निकलें तो 20 किलोमीटर के अंदर ही आपको जमींदारों की अपनी जेलें नजर आएंगी। जो जमींदारों की बात नहीं मानते, उन्हें कुत्तों से नुचवाया जाता है। इसी मुल्क में ब्लासफेमी लॉ की आड़ में सलमान तासिर और शहबाज भट्टी जैसे हाई प्रोफाइल लोगों की हत्या हो जाती है।

नापाक चेहरे की झलक

पाकिस्तानी हुकूमत की शह पर एक और मानवाधिकार कार्यकर्ता को मौत के घाट उतार दिया है। बलूचिस्तान के जाफराबाद जिले में मीर रुस्तम बारी को डेरा अल्लाहयार इलाके में उनके घर के सामने ही मोटरसाइकिल सवाल बंदूकधारियों ने मार डाला। यह पाकिस्तान की तथाकथित सिविलियन हुकूमत के उस अभियान की एक कड़ी मात्र है जिसमें फौज के इशारे पर उन लोगों को मार दिया जाता है जो सरकार और फौज के लिए मुश्किल पैदा करने की कोशिश कर रहे होते हैं। पिछले हफ्ते पाकिस्तानी रेंजर्स ने कराची शहर के बीचोबीच उन्नीस साल के एक लड़के सरफराज शाह को राह चलते मार डाला था। सरफराज शाह की हत्या को सबने देखा, क्योंकि किसी वीडियो कैमरामैन ने उसकी फिल्म उतार ली थी और न्यूज चैनलों ने उसे सार्वजनिक कर दिया था। सरफराज शाह की हत्या मीर रुस्तम बारी से अलग तरह की हत्या है। इस नौजवान को तो रेंजर्स के सिपाहियों ने मजा लेने के लिए मार डाला था। इसके पीछे कहीं कोई राजनीतिक मंशा नहीं थी। इसीलिये यह हत्या ज्यादा खतरनाक मानी जा रही है, क्योंकि जिस समाज में तफरीह के लिए किसी राह चलते इंसान को मार डाला जाए उसका अधोपतन लगभग पूरी तरह से मुकम्मल माना जाता है। पूरे पाकिस्तान ने टीवी चैनलों पर देखा कि किस तरह रेंजर्स की गोली का शिकार होकर वह नौजवान चिल्लाता रहा कि उसे अस्पताल पहुंचा दिया जाए, लेकिन कोई नहीं आया। सरफराज शाह की हत्या पाकिस्तानी राष्ट्र और समाज के लिए एक खतरे की घंटी है, क्योंकि जो पाकिस्तानी फौज और आईएसआई अब तक उन लोगों को मार रही थी जो हुकूमत के लिए मुश्किलें पैदा कर रहे थे उसने राह चलते लोगों को अपना शिकार बनाना शुरू कर दिया है। पाकिस्तानी बुद्धिजीवियों का कहना है कि देश बहुत ही बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है। यह संकट 1971 के उस संकट से भी बड़ा है जब मुल्क का एक बड़ा हिस्सा अलग होकर स्वतंत्र बांग्लादेश बन गया था। पाकिस्तान के ताजा हालत के बारे में जो बात हैरानी की है वह यह कि लोकतांत्रिक अधिकारों की बात करने वालों की लगभग रोज ही हो रही हत्याओं के बावजूद बाकी दुनिया में कहीं भी उसके विरोध में आवाज नहीं उठ रही है। जहां तक सभ्य समाज के लोगों की हत्या का सवाल है तो ऐसी हत्याएं वहां रोज ही हो रही है। मीर रुस्तम बारी की हत्या के एकाध दिन पहले ही क्वेटा में प्रोफेसर सबा दश्तियारी को मार डाला गया था। उसके कुछ दिन पहले खोजी पत्रकार सलीम शहजाद को मौत के घाट उतार दिया गया था। इन हत्याओं में जो बात उभर कर सामने आती है वह यह कि मारे गए सभी लोग उस बिरादरी से संबंधित हैं, जो फौज के इशारे पर काम करने वाली अमेरिका परस्त सिविलियन हुकूमत की गैर-जिम्मेदार नीतियों से लोगों को आगाह कर रहे थे। इस बिरादरी के लोगों को खत्म कर देने का सिलसिला पिछले कुछ वर्षो से चल रहा है। हालांकि इस तरह से मारे गए लोगों की पूरी सूची तो नहीं बनाई जा सकती, लेकिन कुछ ऐसे नाम जो मीडिया की नजर में आए हैं वे किस्से की कई परतों को बयान कर देते हैं। पाकिस्तानी पंजाब के गवर्नर सलमान तसीर की उनके ही सुरक्षा गार्ड के हाथों हुई हत्या को इस डिजाइन की एक अहम कड़ी के रूप में देखा जाता है। सलमान तसीर के बाद अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री शाहबाज भट्टी और पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के संयोजक नईम साबिर को मारा गया था। पाकिस्तान के मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि जो लोग भी मारे जा रहे हैं लगभग सभी लोग अल कायदा के प्रभाव वाले सैनिक और आतंकवादी संगठनों के शिकार हो रहे हैं। प्रोफेसर सबा दश्तियारी से जिहादी संगठन खास तौर से नाराज थे, क्योंकि उनके काम से नौजवानों में लोकतांत्रिक चेतना आती। वे छात्रों को लोकतंत्र के बारे में जागरूकता का संदेश दे रहे थे। बलूचिस्तान में पाकिस्तानी फौज का डंडा बहुत ही जबर्दस्त तरीके से चल रहा है। ऐसा शायद इसलिए हो रहा है कि उस इलाके में जमीन के नीचे कच्चे तेल के बड़े जखीरों का पता चला है और सरकार उसे पूरी तरह से अपने कब्जे में रखना चाह रही है। वहां अक्सर निर्दोष बलोच युवकों को पकड़ कर उनको सेना के कब्जे में रखा जाता है और उन्हें हर किस्म की यातनाएं दी जाती हैं। आतंक फैलाने के उद्देश्य से ऐसे लोगों को मार दिया जाता है जो बिल्कुल सीधे सादे होते हैं। अभी पिछले दिनों बलूचिस्तान विश्वविद्यालय की एक महिला प्रोफेसर नाजिमा तालिब को भी गोली मार दी गई थी। एकाध को छोड़कर मारे गए ज्यादातर लोग पाकिस्तानी समाज में चेतना फैलाने का काम कर रहे थे। कुछ को पाकिस्तानी सेना के लोगों ने सीधे तौर पर मार डाला था, लेकिन कुछ को किसी आतंकवादी संगठन के लोगों ने मारा और जिम्मेदारी ली। जानकार बताते हैं कि पाकिस्तान में आतंकवादी संगठन लगभग पूरी तरह से आइएसआइ और फौज की कृपा से चलते हैं इसलिए वहां पर लोकतंत्र और मानवाधिकारों का जो भी खात्मा हो रहा है उसके लिए आइएसआइ और फौज ही पूरी तरह से जिम्मेदार है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).