Monday, October 31, 2011
सात अरब होने पर मचा हौवा
Monday, October 24, 2011
लीबिया ने तानाशाही से मुक्ति का एलान किया
लीबिया पर 42 वर्ष तक शासन करने वाले मुअम्मर गद्दाफी की मौत के तीन बाद रविवार को विद्रोहियों की राष्ट्रीय आपात परिषद के चेयरमैन मुस्तफा अब्देल जलील ने तानाशाही से आजादी की आधिकारिक घोषणा की। इस समारोह के साथ ही लीबिया में चल रहा खूनी संघर्ष समाप्त हो गया। आठ महीने पहले लीबिया के शहर बेनगाजी और मिस्राता से ही गद्दाफी के विरोध में प्रदर्शन शुरू हुए थे जिन्होंने बाद में सशस्त्र विद्रोह की स्वरूप अख्तियार कर लिया। इस मौके पर आयोजित समारोह के दौरान जलील ने देशवासियों और दुनिया के नाम संदेश देते हुए कहा, तानाशाही के खिलाफ संघर्ष अब समाप्त हुआ। लीबिया की सत्ता सुरक्षित हाथों में है। यह चुनौती भरा समय है और हमें धैर्य, ईमानदारी के साथ एक-दूसरे के प्रति सद्भाव की भावना बनाए रखनी है। लीबिया में चले संघर्ष न केवल गद्दाफी और उनकी क्रूर सेना की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित किया बल्कि विद्रोहियों की क्षमताओं को लेकर भी सवाल हैं। मुअम्मर गद्दाफी को जिस प्रकार से मारा गया उससे भी उन पर सवाल खड़े हैं। कई देशों ने पूर्व तानाशाह की मौत की जांच की मांग की है। सवाल यह भी हैं कि क्या एक कबाइली संस्कृति वाले देश को लोकतांत्रिक तरीके से चलाया जा सकता है। ऐसे में विद्रोहियों की राष्ट्रीय आपात परिषद पर भारी दबाव है। वह आने वाले दिनों में किस प्रकार की अंतरिम सरकार का प्रारूप लेकर आते हैं। इस पर पूरे विश्व की नजरें लगी हैं। यह भी साफ है कि परिषद के सदस्यों में सत्ता संघर्ष जोर पकड़ रहा है। परिषद के चेयरमैन जलील और प्रधानमंत्री महमूद जिब्रिल से देश और दुनिया को बड़ी उम्मीदें हैं। खबर लिखे जाने तक जलील का भाषण जारी था, इसलिए यह बात अभी सामने नहीं आ सकती है कि उनकी भविष्य की योजनाएं क्या हैं। हालांकि एक महीने के भीतर अंतरिम सरकार का गठन और आठ महीने बाद आम चुनावों का वादा परिषद पहले ही कर चुकी है। इसके अलावा 200 सदस्यों की राष्ट्रीय परिषद का गठन भी किया जाना बाकी है। जिन लड़ाकों ने गद्दाफी को सत्ता से बेदखल किया उन्हें हथियार विहीन कर नई सेना और पुलिस के गठन कार्य भी बेहद अहम है। इन दोनों बातों पर ही लीबिया का लोकतांत्रिक भविष्य टिका हुआ है।
अरब जगत ने लोकतंत्र की ओर बढ़ाया पहला कदम
अरब देशों में विद्रोह की शुरुआत करने वाले देश ट्यूनीशिया में जिने अल अबेदीन बेन अली की तानाशाही के अंत के नौ महीने बाद रविवार को मतदान शुरू हो गया। शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दम पर तानाशाह बेन अली के तख्तापलट के बाद यह चुनाव संविधान सभा के गठन के लिए हो रहा है। पूर्व सत्ताधारी पार्टी पर प्रतिबंध संविधान सभा देश के नए संविधान का मसौदा तैयार करेगी। साथ ही अंतरिम राष्ट्रपति और अंतरिम सरकार भी चुनेगी। संविधान सभा को चुनने के लिए देश के 72 लाख वोटर डालेंगे और 217 सदस्यीय संविधान सभा चुनेंगे। देश में मतदान को लेकर गजब का उत्साह देखने को मिल रहा है। पिछले हफ्ते चुनाव प्रचार के दौरान भी लोगों ने पूरे जोश के साथ भाग लिया। चुनाव से पहले के रुझान इस्लामी पार्टी एनाहदा की भारी जीत का इशारा कर रहे हैं। यह पार्टी बेन अली के शासनकाल में प्रतिबंधित थी। दूसरी ओर देश की वाम पार्टियां चुनाव से पहले किसी गठबंधन के नहीं बनने से कमजोर पड़ गई हैं। चुनाव में 80 पार्टियों के करीब 11000 उम्मीदवार मैदान में है, जिसमें आधी महिलाएं हैं। पिछले साल भड़की थी चिंगारी ट्यूनीशिया में एक युवक मोहम्मद बोअजीजी ने अधिकारियों के विरोध में खुद को आग लगाकर जान दे दी थी जिसके बाद वहां विरोध का दौर शुरू हो गया था। बोअजीजी की मां मानोबिया बोअजीजी ने नेताओं से अपील की है कि वे चुने जाने के बाद उनके बेटे की कुबार्नी को जाया न करें और गरीब लोगों की मदद करें। मानोबिया ने कहा, मुझे अपने बेटे पर गर्व है कि उसने न सिर्फ ट्यूनीशिया बल्कि पूरी दुनिया को बदलकर रख दिया। वह पूरी दुनिया का बेटा बन गया है। खुदा का शक्र है कि ट्यूनीशिया की जीत हुई है। बेन अली को हटाए जाने के बाद कई दूसरे अरब देशों में भी बदलाव के लिए लोग सड़कों पर उतर आए है। अरब क्रांति की सबसे नई जीत लीबिया में रही जब गुरुवार कर्नल गद्दाफी को जान से हाथ धोना पड़ा। इससे पहले मिस्र में लंबे समय से राष्ट्रपति रहे होस्नी मुबारक को लंबे विरोध प्रदर्शन के बाद अपने पद से हटना पड़ा था। विरोध का दौर सीरिया और यमन में भी देखने को मिला रहा है, लेकिन इन देशों की तुलना में ट्यूनीशिया की क्रांति शांतिपूर्ण रही। मतदान के लिए सुबह छह बजे से लाइन में खड़े 62 वर्षीय मतदाता हुसैन खलीफी ने कहा, ट्यूनीशिया आज दुनिया को स्वतंत्रता और गरिमा के फूलों का गुलदस्ता भेंट कर रहा है। ट्यूनीशिया के नए युग की शुरुआत देखने के लिए खलीफी ने पूरी रात जागकर गुजारी। उन्होंने कहा कि अतीत के अंधेरे से निकलकर हम नई जिंदगी शुरू कर रहे हैं। 23 वर्षीय होटल कर्मचारी मंधेर हमदी ने कहा, आजादी महंगी थी, हमने इसकी कीमत चुकाई है। मतदान से पहले चुनाव प्रभारी कामेल जेनदाउबी ने मतदाताओं से आग्रह किया कि वे अपने घरों से बाहर निकलें और वोट डालकर महान ट्यूनीशिया के भविष्य के निर्माण में सहयोग करें।
Friday, October 21, 2011
भारत के लिए पैदा किया था कूटनीतिक संकट
मुअम्मर गद्दाफी ने कई मौकों पर भारत लिए असहज स्थिति पैदा कर दी थी। संयुक्त राष्ट्र महासभा में वर्ष 2009 में अपना पहला भाषण देते हुए गद्दाफी ने भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को स्वतंत्र देश बनाने का सुझाव दे डाला था। वैसे तो गद्दाफी के साथ भारत के रिश्ते कभी बहुत अच्छे नहीं रहे, लेकिन संयुक्त राष्ट्र महासभा में उनके भाषण ने तो हमारी दुखती रग को छू लिया था। गद्दाफी ने कहा था, कश्मीर एक स्वतंत्र देश होना चाहिए। इसे न तो भारत में रखा जाए और न ही पाकिस्तान में। यह पहली बार था जब भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर किसी मुस्लिम नेता ने कश्मीर की पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत की थी। अपने भाषण में गद्दाफी ने कश्मीर के अलावा अन्य कई मुद्दों पर बेलाग राय रखी थी। ताकतवर देशों को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से बाहर रखने की दलील देते हुए तानाशाह ने कहा था, बड़ी शक्तियों के लिए सुरक्षा परिषद के दरवाजे खोलने से गरीबी बढ़ेगी। दुनिया में अन्याय और तनाव में इजाफा होगा। संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के साथ बराबरी का व्यवहार किए जाने पर जोर देते हुए गद्दाफी ने कहा था कि चूंकि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं, इसलिए अगर भारत को सुरक्षा परिषद में सीट दी गई तो पाकिस्तान भी इसकी मांग करेगा। इस साल फरवरी में भी अरब देश के इस तानाशाह ने कश्मीर का हवाला देकर भारत के लिए अप्रिय स्थिति पैदा कर दी थी। लीबिया के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में मतदान की पूर्व संध्या पर गद्दाफी ने अपने देश में विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई की तुलना कश्मीर में भारत की कार्रवाई से की थी। लीबिया में इस साल गृह युद्ध शुरू होने के बाद इस तानाशाह ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखकर विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई पर भारत का समर्थन मांगा था।
अफ्रीका में पश्चिमी देशों के लिए चुनौती बन गए थे कर्नल गद्दाफी
मुअम्मर अल गद्दाफी ने चार दशक से अधिक समय तक लीबिया की सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाकर रखी। इस दौरान उन्हें पश्चिमी देशों का भरपूर साथ मिला। इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी, फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी और ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर समेत कई देशों के नेताओं का गद्दाफी को भरपूर समर्थन मिला। 1969 में जब गद्दाफी ने सम्राट इदरिश का तख्तापलट कर सत्ता हथियाई तब वह अमेरिका के दुलारे थे। हालांकि बीच-बीच में लॉकरबीकांड और लीबिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर टकराव हुआ, लेकिन कभी ऐसी नौबत नहीं आई कि पश्चिम को गद्दाफी शासन के अंत के बारे में सोचना पड़े। इसके विपरीत 2010 के अंत में जब ट्यूनीशिया और मिस्र से जनांदोलन की लहर उठी तब पश्चिमी देशों ने गद्दाफी शासन के खिलाफ आवाज उठाने वालों को धन और हथियार भी मुहैया कराए। दरअसल, गद्दाफी 2007 के बाद से पश्चिमी हितों के लिए खतरा बने हुए थे। ऑयल एंड गैस जर्नल के मुताबिक 2007 में लीबिया के तेल भंडारों की कीमत 41.5 अरब डॉलर आंकी गई थी। कर्नल गद्दाफी ने लीबिया के सभी तेल कुओं के दोहन का कार्य विदेशी कंपनियों के हाथों में सौंप रखा था। 2009 में गद्दाफी ने अमेरिका की जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के छात्रों को संबोधित किया और कहा, तेल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, इसलिए मैं सोच रहा हूं कि लीबिया के तेल कुओं पर हमारे देश की कंपनियों का पूर्ण प्रभुत्व हो। इसके बाद 2009 में लीबिया की राष्ट्रीय तेल कंपनी ने कनाडा की कंपनी को धमकी दी कि अगर उनके विदेश मंत्री ने गद्दाफी के बारे में कहे अपशब्द वापस नहीं लिए तो उसे तेल निकालने का अधिकार खोना पड़ सकता है। इससे पहले 2008 में गद्दाफी ने अमेरिकी सामरिक हितों को सीधी चोट पहुंचाई। उन्होंने यूनाइटेड स्टेट्स अफ्रीकन कमांड (अफ्रीकॉम) के लिए विभिन्न देशों में ठिकाने बनाने की व्हाइट हाउस की कोशिश को नाकाम करने का प्रयास किया। दरअसल, अमेरिका ने ठिकाने बनाने के लिए विभिन्न अफ्रीकी देशों को लाखों डॉलर देने का प्रस्ताव रखा था। दूसरी ओर गद्दाफी ने उन देशों को ठिकाने नहीं बनाने देने पर अमेरिका से दोगुना पैसा देने की बात कही। इसके अलावा लीबिया अफ्रीका के लिए बड़े निवेशक के रूप में भी उभर रहा था। 2007 में लीबिया ने पहला अफ्रीकी सैटेलाइट लांच किया। इससे यूरोपीय कंपनियों को अफ्रीकी देशों से प्राप्त हो रहे 50 करोड़ डॉलर का नुकसान हुआ। लीबिया ने अफ्रीकी यूनियन के पांच प्रोजेक्टों के लिए 30 अरब डॉलर की राशि भी दी। इसका मकसद अफ्रीकी देशों की यूरोप पर वित्तीय निर्भरता को कम करना था। अफ्रीकी इन्वेस्टमेंट बैंक का मुख्यालय भी लीबिया में ही था। इससे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की भूमिका के लिए खतरा पैदा हो रहा था। मुअम्मर गद्दाफी अफ्रीकी यूनियन के साथ मिलकर स्वर्ण आधारित मुद्रा लाने पर भी विचार कर रहे थे। सद्दाम हुसैन भी अमेरिकी हमले से पहले डॉलर को चुनौती दे रहे थे। गद्दाफी अफ्रीका में पश्चिमी हितों के लिए खतरा बन गए थे। इसके अलावा उन्होंने 2010 में संयुक्त राष्ट्र को 50 लाख डॉलर दिए। उन्होंने यह पैसा फलस्तीनियों की मदद के लिए दिया और इजराइल के खिलाफ जेहाद की अपील भी की। गद्दाफी अमेरिका के दुश्मन ईरान के साथ भी खुलकर खड़े थे। वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यगो शावेज के साथ गद्दाफी दोस्ती और चीन तथा रूस के साथ उनके आर्थिक साझेदारी के लगातार हो रहे विस्तार ने भी पश्चिम को गद्दाफी के खिलाफ खड़ा कर दिया।
42 साल तक सत्ता पर काबिज कर्नल गद्दाफी की मौत के साथ ही विद्रोहियों का पूरे लीबिया पर कब्जा
लीबिया के पूर्व तानाशाह कर्नल मुअम्मर गद्दाफी का गुरुवार तड़के अंत हो गया। वह उसी सिर्ते शहर में मारे गए, जहां उनका जन्म हुआ और बचपन बीता था। यही उनकी इच्छा भी थी। लीबिया पर उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के हमलों की शुरुआत से ही गद्दाफी ने मातृभूमि पर ही आखिरी सांस लेने का संकल्प जताया था। गुरुवार को लीबियाई विद्रोहियों की राष्ट्रीय आपात परिषद के लड़ाकों ने भागने की फिराक में एक सुरंग में छिपे बैठे कर्नल को मार गिराया। इसी के साथ विद्रोहियों ने गद्दाफी के आखिरी गढ़ सिर्ते पर कब्जा कर लिया। अब पूरे लीबिया पर विद्रोहियों का शासन कायम हो गया है। ब्रिटिश समाचार पत्र द टेलीग्राफ के अनुसार उन्हें सिर और दोनों पैरों में गोली मारी गई। लीबिया पर 42 वर्षो तक एकछत्र राज करने वाले तानाशाह गद्दाफी मौत को सामने देख गिड़गिड़ाए। उनके आखिरी शब्द थे-मुझे गोली मत मारो। गद्दाफी के मौत की आधिकारिक घोषणा राष्ट्रीय आपात परिषद के सूचना मंत्री महमूद शमाम और प्रवक्ता अब्दुल हफीज घोगा ने की। बकौल घोगा, हम दुनिया को बताना चाहते हैं कि अत्याचारी तानाशाह गद्दाफी का क्रांतिकारियों (अंतरिम सरकार के लड़ाके) ने खात्मा कर दिया है। सूचना मंत्री ने कहा, हमारे लड़ाकों ने कर्नल को मार गिराया है। हमारे पास इसका वीडियो फुटेज है। सिर्ते की लड़ाई में शामिल कई सैनिकों ने दावा किया है कि उनकी आंखों के सामने गद्दाफी को गोली मारकर मौत के घाट उतारा गया। परिषद के एक अन्य अधिकारी अब्दुल माजिद मलेग्टा के अनुसार, पकड़े जाने के दौरान अंतरिम सरकार के सैनिकों के साथ संघर्ष में कर्नल की मौत हुई। इससे पूर्व परिषद की ओर से कहा गया था कि पकड़े जाने के दौरान गंभीर रूप से गद्दाफी की मौत एंबुलेंस से अस्पताल ले जाते वक्त हो गई है। वैसे उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के प्रवक्ता कर्नल रोलैंड लावोई के अनुसार, हम पूरे विश्वास के साथ यह नहीं कह सकते कि गद्दाफी की मौत नाटो विमानों के हवाई हमले से हुई है। एक काफिले में हमला जरूर किया गया था, लेकिन उसमे गद्दाफी सवार थे या नहीं, यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है। अल जजीरा और अल अरबिया समेत कई अरबी टेलीविजन चैनलों पर गद्दाफी की खून से सनी लाश की तस्वीर दिखाई जा रही है। परिषद के प्रवक्ता घोगा के अनुसार सिर्ते को कब्जे में लेने के बाद हमारे सैनिक गद्दाफी को पकड़ने के लिए शहर से बाहर निकलने वाले सभी रास्तों की नाकेबंदी किए हुए थे। इसी दौरान सिर्ते के बाहरी इलाके में स्थित एक नहर में कुछ हलचल के बाद सैनिकों ने उस पर धावा बोल दिया। जहां पगड़ी बांधे और सेना की वर्दी में गद्दाफी को अपने चंद समर्थकों के साथ छिपे बैठे पाया गया। पकड़े जाने से पहले दोनों पक्षों की लड़ाई में गद्दाफी के सैन्य प्रमुख अबु बकर यूनुस जब्र की मौत हो गई। सैनिकों की पकड़ में नहीं आ रहे गद्दाफी को पहले दोनों पैरों में गोली मारी गई। घोगा ने कहा कि पैरों में गोली लगते ही जमीन पर गिरे गद्दाफी सरकारी सैनिकों से जीवन की भीख मांगने लगे। वह खूब गिड़गिड़ाए, लेकिन सैनिकों ने उनकी एक नहीं सुनी। प्रवक्ता के अनुसार, गद्दाफी गोली मत मारो.. चिल्लाते रहे, लेकिन उनके सिर पर गोली मार दी गई। अल जजीरा चैनल के मुताबिक, गद्दाफी के शव को मिस्राता शहर की एक मस्जिद में रखा गया है। बेटा मुतस्सिम भी मारा गया सैफ अल इस्लाम भी घिरा सिर्ते की लड़ाई में गद्दाफी के साथ-साथ उनका एक बेटा मुतस्सिम भी मारा गया। परिषद के अधिकारी मलेग्टा के अनुसार, हमारे सैनिकों के साथ संघर्ष में मुतस्सिम मारा गया। वह सिर्ते पर कब्जे के बाद बगावत पर उतारू था। मलेग्टा ने बताया कि गद्दाफी के दूसरे बेटे सैफ अल इस्लाम को भी घेर लिया गया है। वह सिर्ते से भागने की फिराक में है। सैफ कभी पकड़ा जा सकता है। परिषद ने गद्दाफी की मौत को ऐतिहासिक क्षण करार दिया है। कर्नल की मौत की खबर सुनते ही लीबिया के कई शहरों में खुशी का माहौल हो गया। त्रिपोली में लोग सड़क पर उतर कर हवा में फायरिंग करते हुए जश्न मनाने लगे। यही आलम बेनगाजी और मिस्राता समेत दूसरे शहरों का था। सिर्ते में भी सरकारी सैनिकों ने बंदूक से गोली दाग जश्न मनाया। 15 फरवरी को हुई लीबिया में विद्रोह की शुरुआत जाहिर हो कि उत्तर अफ्रीकी देश लीबिया में गद्दाफी के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत इसी साल 15 फरवरी को हुई थी। पहले तो लोगों ने सत्ता परिवर्तन को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से विरोध शुरू किया। मगर विरोध को गद्दाफी ने सैन्य ताकत से कुचलना शुरू किया तो हालात बेकाबू हो गए और गृह युद्ध छिड़ गया। गद्दाफी विरोधी ताकतों ने बेनगाजी में विद्रोहियों की राष्ट्रीय आपात परिषद के नाम से अंतरिम सरकार कायम करने की घोषणा कर दी। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने हस्तक्षेप शुरू किया। गद्दाफी और उनके 10 निकट सहयोगियों की संपत्ति जब्त करने का प्रस्ताव पारित किया। सुरक्षा परिषद ने विरोधियों के खिलाफ सरकार की दमनात्मक कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के लिए संदर्भित कर दिया। 27 जून को गद्दाफी की गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी कर दिया गया। इसके बाद इंटरपोल ने भी 8 सितंबर को एक वारंट जारी किया। 19 जून को अमेरिका ने ओडिशी डान के नाम से लीबिया में कार्रवाई शुरू की और 31 मार्च को नाटो ने कार्रवाई की बागडोर खुद संभाल ली। इसके साथ ही गद्दाफी विरोधियों ने बढ़त लेनी शुरू की और 20 अक्टूबर को अंतत: गद्दाफी का खात्मा कर दिया गया।
Monday, October 17, 2011
चीन का बढ़ता दखल
पाक अधिकृत कश्मीर में चीनी सैनिकों की मौजूदगी भारत के लिए गंभीर चिंता का सबब है। सेना प्रमुख वीके सिंह ने पीओके में चार हजार चीनी सैनिकों की उपस्थिति बताई है। इसके पहले भी जम्मू-कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान में ग्यारह हजार से अधिक चीनी सैनिकों की हलचल जारी थी, जिसे चीन ने यह कहकर नकारने की कोशिश की थी कि यह अमला किसी गलत काम में संलग्न नहीं है। किंतु चीन ने यह साफ नहीं किया कि आखिर इतनी बड़ी सशस्त्र फौज की पहलकदमी किस लिए है? भारतीय सीमा पर चीन और पाकिस्तानी सेना का संयुक्त युद्धाभ्यास इस बात का प्रतीक है कि चीन भारत को घेरने के लिए लगातार कदम बढ़ा रहा है। चीन जल्दी ही पाकिस्तान के पहले संचार उपग्रह का प्रक्षेपण भी करने जा रहा है जिससे दोनों के द्विपक्षीय संबंध और प्रगाढ़ होगें। इस उपग्रह के प्रक्षेपण का उद्देश्य तो यह बताया गया है कि यह मौसम पर निगरानी और उच्च क्षमता वाली संचार सुविधा पाकिस्तान को मुहैया कराएगा, लेकिन असल मकसद इसके जरिये भारत की सामरिक और रक्षा गतिविधियों पर निगाह रखने की है। कुछ समय पहले चीनी सैनिकों ने वास्तविक नियंतण्ररेखा को लांघ कर भारत की परिधि में न केवल घुसने का दुस्साहस दिखाया बल्कि लद्दाख क्षेत्र में ठेकेदार को डराकर निर्माणाधीन यात्री प्रतीक्षालय का काम भी रूकवा दिया था। इसका शर्मनाक नतीजा यह रहा कि गृह मंत्रालय के निर्देश पर भारतीय सेना ने दखल देकर राज्य सरकार को यथास्थिति बनाए रखने के लिए मजबूर कर दिया। कोई जवाबी कार्रवाई करने की बजाय लाचारी दिखाने से चीनी सैनिकों की हौसला अफजाई ही हुई। चीन की इस तरह की हरकतें नई नहीं हैं। 2009 में चीनी सेना ने लेह लद्दाख के शिखरों पर चिन्हित अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन कर पत्थरों और चट्टानों पर लाल रंग पोत दिया था। 31 जुलाई 2009 को तो चीनी सैनिक मर्यादा की सभी हदें पार कर भारत के गया शिखर क्षेत्र में डेढ़ किलोमीटर भीतर घुसकर कई चट्टानों पर लाल रंग से ‘चाइना’ और ‘चीन-9’ लिख देने की हिमाकत दिखा चुके हैं। जबकि एक समझौते के तहत शिखर गया को दोनों देश अंतरराष्ट्रीय सीमा की मान्यता देते हैं। यह जम्मू-कश्मीर के लद्दाख, हिमाचल प्रदेश के स्पीति और तिब्बत के केंद्र में स्थित है। इससे पहले चीनी सेना के हेलिकॉप्टरों ने जून 2009 में चूमार क्षेत्र में वास्तविक नियंतण्ररेखा को लांघ कर दूषित खाद्य सामग्री भारतीय सीमा में गिरा कर भारत को मुंह चिढ़ाया था। अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकट स्थित काराकोरम क्षेत्र में भी चीनी हलचलें बढ़ती जा रही हैं। चीन ने सीधे इस्लामाबाद पहुंचने के लिए काराकोरम होकर सड़क मार्ग भी तैयार कर लिया है। इस निर्माण के बाद चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा मानने के बयान भी देने शुरू कर दिए हैं। चीनी दस्तावेजों में अब इस विवादित क्षेत्र को उत्तरी पाकिस्तान दर्शाया जाने लगा है। भारत विरोधी मंशा के चलते ही चीन ने पीओके क्षेत्र में 80 अरब डॉलर का निवेश किया है। यहां से वह अरब सागर पहुंचने की तजवीज जुटाने में लगा है। चीन की पीओके में ये गतिविधियां सामरिक दृष्टि से बेहद चिंतनीय हैं। अरुणाचल प्रदेश में भी चीनी हस्तक्षेप लगातार मुखर हो रहा है। हाल ही में गूगल अर्थ से होड़ बरतते हुए चीन ने एक ‘ऑन लाइन मानचित्र सेवा’ शुरू की है जिसमें उसने भारतीय भू-भाग अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चीन को अपने देश का हिस्सा बताया है। मानचित्र खंड में इसे चीनी भाषा में प्रदर्शित करते हुए अरुणाचल को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताया गया है जिस पर चीन का दावा पहले से ही बना हुआ है। इस सिलसिले में भारतीय अधिकारियों ने सफाई देते हुए स्पष्ट किया है कि दक्षिणी तिब्बत का तो इसमें विशेष उल्लेख नहीं है, लेकिन इसकी सीमाओं का विस्तार अरुणाचल तक दर्शाया गया है। इसके अलावा अक्साई चीन को जरूर शिनजियांग प्रांत का अंग बताया गया है। जबकि हकीकत में यह जम्मू- कश्मीर में लद्दाख का हिस्सा है। इसमें दो राय नहीं कि आजाद भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने कभी भी चीन की छिपी साम्राज्यवादी मंशा को वास्तविक तौर पर नहीं समझा। हालांकि प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक महाषर्ि अरबिंद ने परतंत्र भारत में ही चीन के मंसूबों को भांपते हुए कहा था, ‘चीन दक्षिण-पश्चिम एशिया और तिब्बत पर पूरी तरह छाकर उसे निगलने का संकट उत्पन्न कर सकता है। साथ ही भारतीय सीमाओं तक के सारे क्षेत्र पर कब्जा जमा लेने की सीमा पार कर सकता है।’ महषर्ि का यह पूर्वाभास चीनी मंसूबों के बारे आज खरा साबित हो रहा है। चीन ने ताइवान में पहले तो आर्थिक मदद और विकास के बहाने घुसपैठ की और फिर ताइवान का अधिपति बनने का प्रयास करने लगा। तिब्बत पर तो चीन के अनाधिकृत कब्जे से दुनिया वाकिफ है। साम्यवादी देशों की हड़प नीतियों के चलते ही चेकोस्लोवाकिया बरबादी के चरम पर पहुंचा। पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के बंदरगाहों पर चीनी युद्धपोत लहरा रहे हैं। वि मंचों से चीन दुनिया के देशों को संदेश भी देने में लगा है कि भारत के पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यांमार समेत किसी भी सीमांत देश से मधुर संबंध नहीं हैं। यही नहीं चीन नकली भारतीय मुद्रा छापकर लगातार पाकिस्तान व बांग्लादेश के जरिये भारत पहुंचा कर भारतीय अर्थव्यवस्था को बिगाड़ रहा है। चीन द्वारा नकली दवाएं बनाकर उन पर ‘मेड इन इंडिया’ लिखकर तीसरी दुनिया के देशों में खपाने का सिलसिला सार्वजनिक होने के बावजूद जारी है। इन अप्रत्यक्ष व अदृश्य चीनी सामरिक रणनीतियों से आंख मूंदकर भारत अब तक सचाई से मुंह चुराता रहा है। अब भारत द्वारा चीन को जैसे को तैसा के अंदाज में जवाब देने के कुछ प्रयास होते जरूर दिख रहे हैं लेकिन चीनी कुटिलता के समक्ष इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता।
चीन ने फिर दिखाई आंख
दक्षिण चीन सागर में भारत और वियतनाम द्वारा तेल एवं गैस उत्खनन से चीन काफी परेशान दिख रहा है क्योंकि एक प्रमुख सरकारी दैनिक ने चेतावनी दी है कि यह ‘टकराव का गफलत भरा प्रयास’ है। ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने अपने कड़े शब्दों में लिखे संपादकीय में कहा है, जहाजरानी विवादों को सुलझाने के लिए नियम तय करने संबंधी समझौते पर एक दिन पहले ही पेइचिंग में हस्ताक्षर किए गए और उसके तुरंत बाद अगले ही दिन हनोई ने भारत के साथ संयुक्त उत्खनन संबंधी एक समझौता किया। यह बताना मुश्किल है कि क्या यह वियतनाम की दोहरे लेनदेन की मानसिकता का परिचायक है। वियतनामी राष्ट्रपति त्रुओंग तान सेंग की नई दिल्ली यात्रा के दौरान किए गए समझौते पर टिप्पणी करते हुए दैनिक ने लिखा है, दोनों देशों को यह साफ पता है कि इसका चीन के लिए क्या मतलब है। भारत और वियतनाम की सरकारी तेल कंपनियों के बीच हुआ समझौता नए निवेश तथा दोनों देशों को तेल एवं गैस के उत्खनन तथा आपूर्ति से संबंधित है। दक्षिण चीन सागर में वियतनामी ब्लाक में भारत की उत्खनन परियोजनाओं से परेशान चीनी प्रशासन ने आपत्ति उठाते हुए दावा किया था कि यह उनके समुद्र क्षेत्र में है। दैनिक ने लिखा है, वियतनाम के साथ समझौता करने के पीछे भारत के संभवत: क्षेत्रीय रणनीति में बहुत गहरे मायने हैं क्योंकि यह केवल गैस और तेल हासिल करने की बात नहीं है, जैसा कि दिखता है। उत्खनन परियोजनाओं के पीछे मजबूत राजनीतिक प्रेरणा है। अखबार ने कहा, वियतनाम के साथ समझौता करके भारत ने शायद अपनी रणनीति को प्रगाढ़ बनाया है। दक्षिणी चीन सागर में तेल की खोज के पीछे एक मजबूत राजनीतिक मकसद है।
| इसमें कहा गया है, भारत दक्षिणी चीन सागर में पहुंच बनाने का इच्छुक है ताकि वह चीन के साथ अन्य मुद्दों पर मोल-तोल कर सके। सरकारी अखबार ने कहा, चीन को भारत और वियतनाम के बीच समझौते को नकारते हुए उसे अवैध करार देना चाहिए। पिछले दिनों वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख नगुयेन फू ट्रोंग के पेइचिंग दौरे के समय दोनों देशों के बीच समुद्री विवाद को लेकर भी एक समझौता हुआ था। इसमें कहा गया है, दक्षिणी चीन सागर में भारत की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। यद्यपि उसकी राष्ट्रीय शक्ति इतना मजबूत आधार नहीं प्रदान करती कि वह इस तरह की महत्वाकांक्षाएं रखे। |
ये जो अमेरिका है!
याद कीजिए इस अमेरिका को आपने पहले कब देखा था। दुनिया को पूंजी, तकनीक, निवेश, सलाहें, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और सपने बांटने वाला अमेरिका नहीं, बल्कि बेरोजगार, गरीब, मंदी पीडि़त, सब्सिडीखोर, कर्ज में डूबा, बुढ़ाता और हांफता हुआ अमेरिका। न्यूयॉर्क, सिएटल, लॉस एंजिलिस सहित 70 शहरों की सड़कों पर फैले आंदोलन में एक दूसरा ही अमेरिका उभर रहा है। चीखते, कोसते और गुस्साते अमेरिकी लोग (ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट आंदोलन) अमेरिकी बाजारवाद और पूंजीवाद पर हमलावर हैं। राष्ट्रपति ओबामा डरे हुए हैं। उनकी निगाह में शेयर बाजार व बैंक गुनहगार हैं। न्यूयॉर्क के मेयर माइकल ब्लूमबर्ग को अमेरिका की सड़कों पर काइरो व लंदन जैसे आंदोलन उभरते दिख रहे हैं। इन आशंकाओं में दम है। अमेरिका से लेकर कनाडा व यूरोप तक 140 शहरों में जनता सड़क पर आने की तैयारी में है। आर्थिक आंकड़ों से लेकर सामाजिक बदलावों तक और संसद से लेकर वित्तीय बाजार तक अमेरिका में उम्मीद की रोशनियां अचानक बुझने लगी हैं। लगता है मानो दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क में कोई तिलिस्म टूट गया है या किसी ने पर्दा खींचकर सब कुछ उघाड़ दिया है। महाशक्ति की यह तस्वीर महादयनीय है। बेरोजगार अमेरिका अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां करीब दो ट्रिलियन डॉलर (2,00,000 करोड़ डॉलर) की नकदी पर बैठी हैं!! लेकिन रोजगार नहीं हैं। सस्ते बाजारों में उत्पादन से मुनाफा कमाने के मॉडल ने अमेरिका को तोड़ दिया है। अमेरिका के पास शानदार कंपनियां तो हैं, मगर रोजगार चीन, भारत थाइलैंड को मिल रहे हैं। देश में बेकारी की बढ़ोतरी दर पिछले दो साल से 9 फीसदी पर बनी हुई है। इस समय अमेरिका में करीब एक करोड़ 40 लाख लोग बेकार हैं। अगर आंशिक बेकारी को शामिल कर लिया जाए तो इस अमीर मुल्क में बेकारी की दर 16.5 फीसदी हो जाती है। लोगों को औसतन 41 हफ्तों तक कोई काम नहीं मिल रहा है। 1948 के बाद बेकारी का यह सबसे भयानक चेहरा है। बेरोजगारी भत्ते के लिए सरकार के पास आवेदनों की तादाद कम नहीं हो रही है। बैंक ऑफ अमेरिका ने 30,000 नौकरियां घटाई हैं, जबकि अमेरिकी सेना ने पांच वर्षीय भर्ती कटौती अभियान शुरू कर दिया है। आलम यह है कि कर्मचरियों को बाहर का रास्ता दिखाने की रफ्तार 212 फीसदी पर है। पिछले माह अमेरिका में करीब सवा लाख लोगों की नौकिरयां गई हैं। इस बीच नौकरियां बढ़ाने के लिए ओबामा का 447 अरब डॉलर का प्रस्ताव प्रतिस्पर्धी राजनीति में फंसकर संसद में (इसी शुक्रवार को) गिर गया है। इसके बाद बची-खुची उम्मीदें भी टूट गई हैं। अमेरिका अब गरीब (अमेरिकी पैमानों पर) मुल्क में तब्दील होने लगा है। गरीब अमेरिका अमेरिकी यूं ही नहीं गुस्साए हैं। दुनिया के सबसे अमीर मुल्क में 4.6 करोड़ लोग बाकायदा गरीब (अमेरिकी पैमाने पर) हैं। अमेरिका में गरीबी के हिसाब किताब की 52 साल पुरानी व्यवस्था में निर्धनों की इतनी बड़ी तादाद पहली बार दिखी है। अमेरिकी सेंसस ब्यूरो व श्रम आंकड़े बताते हैं कि देश में गरीबी बढ़ने की दर 2007 में 2.1 फीसदी थी, जो अब 15 फीसदी पर पहुंच गई है। मध्यम वर्गीय परिवारों की औसत आय 6.4 फीसदी घटी है। 25 से 34 साल के करीब 9 फीसदी लोग (पूरे परिवार की आय के आधार पर) गरीबी की रेखा से नीचे हैं। यदि व्यक्तिगत आय को आधार बनाया जाए तो आंकड़ा बहुत बड़ा होगा। लोगों की गरीबी कर्ज में डूबी सरकार को और गरीब कर रही है। अमेरिका के करीब 48.5 फीसदी लोग किसी न किसी तरह सरकारी सहायता पर निर्भर हैं। अमेरिका का टैक्स पॉलिसी सेंटर कहता है कि देश के 46.5 फीसदी परिवार केंद्र सरकार को कोई कर नहीं देते यानी कि देश की आधी उत्पादक व कार्यशील आबादी शेष आधी जनसंख्या से मिलने वाले टैक्स पर निर्भर है। यह एक खतरनाक स्थिति है। अमेरिका को इस समय उत्पादन, रोजगार और ज्यादा राजस्व चाहिए, जबकि सरकार उलटे टैक्स बढ़ाने व खर्च घटाने जा रही है। बेबस अमेरिका इस मुल्क की कंपनियां व शेयर बाजार देश में उपभोक्ता खर्च का आंकड़ा देखकर नाच उठते थे। अमेरिका के जीडीपी में उपभोक्ता खर्च 60 फीसदी का हिस्सेदार है। बेकारी बढ़ने व आय घटने से यह खर्च कम हुआ है और अमेरिका मंदी की तरफ खिसक गया। अमेरिकी बचत के मुरीद कभी नहीं रहे, इसलिए उपभोक्ता खर्च ही ग्रोथ का इंजन था। अब मंदी व वित्तीय संकटों से डरे लोग बचत करने लगे हैं। अमेरिका में बंद होते रेस्टोरेंट और खाली पड़े शॉपिंग मॉल बता रहे हैं कि लोगों ने हाथ सिकोड़ लिए हैं। किसी भी देश के लिए बचत बढ़ना अच्छी बात है, मगर अमेरिका के लिए बचत दोहरी आफत है। कंपनियां इस बात से डर रही हैं कि अगर अमेरिकी सादा जीवन जीने लगे और बचत दर 5 से 7 फीसदी हो गई तो मंदी बहुत टिकाऊ हो जाएगी। दिक्कत इसलिए पेचीदा है, क्योंकि अमेरिका में 1946 से 1964 के बीच पैदा हुए लोग (बेबी बूम पीढ़ी) अब बुढ़ा रहे हैं। इनकी कमाई व खर्च ने ही अमेरिका को उपभोक्ता संस्कृति का स्वर्ग बनाया था। यह पीढ़ी अब रिटायरमेंट की तरफ है यानी कमाई व खर्च सीमित और चिकित्सा पेंशन आदि के लिए सरकार पर निर्भरता। टैक्स देकर अमेरिकी सरकार को चलाने वाली यह पीढ़ी अब सरकार की देखरेख में अपना बुढ़ापा काटेगी। मगर इसी मौके पर सरकार कर्ज में डूबकर दोहरी हो गई है। अमेरिका आंदोलनबाज देश नहीं है। 1992 में लॉस एंजिलिस में दंगों (अश्वेत रोडनी किंग की पुलिस पिटाई में मौत) के बाद पहली बार देश इस तरह आंदोलित दिख रहा है। अमेरिकी शहरों को मथ रहे आंदोलनों का मकसद और नेतृत्व भले ही अस्पष्ट हो, मगर पृष्ठभूमि पूरी दुनिया को दिख रही है। मशहूर अमेरिकन ड्रीम मुश्किल में है। बेहतर, समृद्ध और संपूर्ण जिंदगी व बराबरी के अवसरों (एपिक ऑप अमेरिका- जेम्स ट्रुसलो एडम्स) का बुनियादी अमेरिकी सपना टूट रहा है। इस भयानक संकट के बाद दुनिया को जो अमेरिका मिलेगा, वह पहले जैसा बिल्कुल नहीं होगा। अपनी जनता की आंखों में अमेरिकन ड्रीम को दोबारा बसाने के लिए अमेरिका को बहुत कुछ बदलना पड़ेगा। चर्चिल ने ठीक ही कहा था कि अमेरिका पर इस बात के लिए भरोसा किया जा सकता है कि वह सही काम करेगा, लेकिन कई गलतियों के बाद। ..अमेरिका का प्रायश्चित शरू हो गया है।
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