Saturday, June 23, 2012

राजनितिक अनिश्चितता की ओर पाक


पूर्व फौजी शासक जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ लंबे टकराव में जीतकर दिखाने वाले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार हुसैन चौधरी लोकतंत्र के हक में उम्मीद की बड़ी किरण के रूप में देखे जाते रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को पद से हटाने का आदेश देकर उन्होंने अपनी छवि को कितना मजबूत बनाया होगा, कहना मुश्किल है। न्यायालय की अवमानना के आरोप में गिलानी को संसद की सदस्यता और प्रधानमंत्री पद दोनों से बर्खास्त करने के अदालती फैसले से वहां भ्रष्टाचारी नेताओं को कानून के दायरे में लाने का लक्ष्य तो फिलहाल हासिल नहीं हुआ, लेकिन आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संकटों में फंसा रहने वाला यह गरीब देश एक बार फिर राजनीतिक अनिश्चितता के अंधे कुएं में जरूर जा गिरा है। पाकिस्तानी विपक्ष और भ्रष्टाचार विरोधियों ने भले ही इस फैसले को सराहा हो और मौजूदा नाजुक दौर में सत्तारूढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने बुझे मन से इसे स्वीकार कर लिया हो, लेकिन इसमें सवालों, विवादों और आपत्तियों के लिए पर्याप्त गुंजाइश मौजूद है। खास बात यह है कि इस फैसले के खिलाफ अपील करने की भी कोई व्यवस्था नहीं है। इफ्तिखार चौधरी के नेतृत्व में मजबूत हुई पाकिस्तानी न्यायपालिका ज्यूडीशियल एक्टीविज्म की तरफ बढ़ती दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट का मकसद गलत नहीं है। वह पाकिस्तान में शीर्ष पदों पर बैठे नेताओं के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करना चाहता है। उसका पहला निशाना खुद राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी हैं, जिनकी छवि के बारे में किसी को गलतफहमी नहीं है। बेनजीर भुट्टो के प्रधानमंत्रित्व काल में मिस्टर टेन परसेंट के नाम से मशहूर जरदारी पर भ्रष्ट सौदों में अरबों डॉलर की रकम जमा करने का आरोप है। वे कई मामलों में दोषी करार दिए जा चुके हैं और दो बार लंबे समय के लिए जेल भेजे जा चुके हैं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट जिस मामले को लेकर कार्रवाई कर रहा है, वह एक स्विस कोर्ट के वर्ष 2003 के फैसले से संबंधित है, जिसने जरदारी, बेनजीर भुट्टो और नुसरत भुट्टो को भ्रष्टाचार और धनशोधन का दोषी करार दिया था। आरोप था कि दो स्विस कंपनियों ने सीमा-शुल्क से जुड़े एक मामले में जरदारी को 1.2 करोड़ डॉलर की रिश्वत दी थी। इसे काले से सफेद करने के लिए स्विस बैंकों का इस्तेमाल किया गया था। अदालत ने जरदारी व बेनजीर को छह महीने की कैद और पचास हजार डॉलर के जुर्माने की सजा सुनाई थी। वर्ष 2007 में जनरल मुशर्रफ के साथ हुए एक समझौते के तहत भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे सभी नेताओं को आम माफी दे दी गई थी। इसी की बदौलत बेनजीर और जरदारी के स्वदेश लौटकर चुनाव लड़ने का रास्ता खुला, लेकिन नई सरकार बनने के बाद बहाल किए गए न्यायमूर्ति चौधरी ने आम माफी से संबंधित अध्यादेश को गैरकानूनी करार दे दिया और प्रधानमंत्री गिलानी को निर्देश दिया कि जरदारी के खिलाफ बंद पड़े इस मामले में कार्रवाई दोबारा शुरू की जाए। गिलानी की कुर्बानी किसी भी कमजोर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की तरह गिलानी जिनकी नियुक्ति भी जरदारी के ही आशीर्वाद से हुई, उनके विरुद्ध कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट शायद जरदारी को जेल भेजने की ठाने बैठा है। धीरे-धीरे मामला सरकार बनाम सुप्रीम कोर्ट के टकराव में बदल गया। एक ऐसा टकराव, जिसमें दोनों ही पक्ष बहुत संभलकर अपनी-अपनी चाल चल रहे हैं। ताजा चाल इफ्तिखार चौधरी ने कुछ इस तरह चली है कि पीपीपी के सामने गिलानी को कुर्बान करने के सिवा कोई चारा नहीं है। लेकिन गिलानी को सजा सुनाने से न तो भ्रष्टाचार की समस्या हल होती है और न ही असली निशाने तक पहुंचने का अदालती मकसद पूरा होता है। उन्हें पाकिस्तानी संविधान की उस धारा के तहत दोषी ठहराया गया है, जिसमें न्यायपालिका की खिल्ली उड़ाने या उसकी अवज्ञा करने वाले किसी भी जन प्रतिनिधि की सदस्यता खारिज किए जाने का प्रावधान है। सजा तो मिली, लेकिन असली शख्स को नहीं। सजा तो मिली, लेकिन उस आरोप में नहीं, जिस पर सारा मामला आधारित है। तो फिर ऐसे कठोर और ऐतिहासिक फैसले से हासिल क्या हुआ? गिलानी चले गए हैं और राजा परवेज अशरफ उनकी जगह लेने जा रहे हैं। लेकिन वे भी जरदारी के विश्वस्त ही हैं, जो उस मुकदमे को खोलने वाले नहीं हैं। हो सकता है कि कुछ महीने बाद उन्हें भी अवमानना का दोषी मानकर हटा दिया जाए, मगर तब फिर वैसा ही कोई शख्स आएगा। हां, जरदारी और उनकी पार्टी को जरूर जनता के सामने खुद को अदालती एक्टीविज्म से पीडि़त पक्ष के रूप में पेश करने का मौका मिल जाएगा। यों तो पाकिस्तान में अगले साल चुनाव होने हैं, लेकिन सहानुभूति लहर का फायदा उठाने के लिए पीपीपी इन्हें कुछ महीने पहले ही करवा ले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कठोर फैसला जहां तक गिलानी के विरुद्ध फैसले का सवाल है, यह न सिर्फ बहुत कठोर फैसला है, बल्कि अपने ढंग का अनोखा भी। अगर आप इसे भारतीय संदर्भो में देखेंगे तो अविश्वसनीय भी है। ऊपर से विडंबना यह कि पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने अपने समर्थन में भारतीय सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों का भी हवाला दिया है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश सीधा-सपाट और संक्षिप्त है, लेकिन उसे पढ़कर पाकिस्तान के तथाकथित लोकतंत्र पर दया आती है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने देश की भावी दिशा तय करने का जिम्मा खुद संभाल लिया है, क्योंकि उसने न सिर्फ प्रधानमंत्री को हटाने का फैसला सुनाया, बल्कि इस संबंध में स्पीकर के निर्णय को निरस्त करते हुए चुनाव आयोग और राष्ट्रपति की संस्था को भी बाकायदा आगे कदम उठाने की हिदायत दी है। उसने चुनाव आयोग से कहा है कि वह गिलानी को अयोग्य करार देने की प्रक्रिया पूरी करे और राष्ट्रपति से कहा है कि वे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिहाज से जरूरी कदम उठाएं। भले ही मकसद कितना भी अच्छा क्यों न हो, क्या लोकतंत्र में कोई एक संवैधानिक संस्था इतनी शक्तिशाली हो सकती है कि वह बाकी सबको बाध्यकारी निर्देश दे सके, यहां तक कि राष्ट्रपति और संसद को भी? हालांकि जरदारी कतई दूध के धुले हुए नहीं हैं, लेकिन दूसरे पक्ष की भी अपनी दलीलें हैं। इन्हें सिरे से नकार देना आदर्श न्याय प्रक्रिया के हक में नहीं है। इस तथ्य को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि जरदारी परवेज मुशर्रफ के साथ हुए आम माफी संबंधी करार के बाद ही देश लौटे थे। क्या एक राष्ट्र द्वारा किसी से किए गए वादे का कोई अर्थ नहीं है? यदि यह वादा न होता तो न वे लौटते, न बेनजीर की हत्या होती और न मौजूदा हालात ही बनते। ऐसा लगता है कि ज्यूडीशियल एक्टिवज्म के रास्ते पर बढ़ रहे सुप्रीम कोर्ट ने इन बिंदुओं को अनदेखा कर दिया है। देश को मौजूदा राजनीतिक गतिरोध में धकेलकर उसने लोकतंत्र को मजबूत नहीं बनाया है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं से टकराव का रास्ता खोल दिया है। यह फैसला उसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई के झंडाबरदार के रूप में भी स्थापित नहीं करता, क्योंकि जरदारी को छू पाना आज भी उतना ही मुश्किल है, जितना कि कल था। दूसरे, मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार हुसैन चौधरी का अपना आचरण भी आलोचना के घेरे में आया है, जो अपने पुत्र के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मुकदमे की सुनवाई करने वाली पीठ के प्रमुख थे। वे बढ़ती आपत्तियों और आलोचनाओं के बाद ही इस पीठ से हटे हैं। पाकिस्तान में आगे क्या होगा? अगले चुनाव तक न्यायपालिका और सरकार के बीच टकराव बदस्तूर जारी रहने के आसार हैं। नए प्रधानमंत्री काम संभालने जा रहे हैं, मगर चेहरे भले ही बदलते रहें, मर्म नहीं बदलेगा। पाकिस्तानी राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाली सेना इस मामले में तटस्थ है। इसलिए फिलहाल सरकार पर कोई खतरा दिखाई नहीं देता। सारे प्रकरण में विपक्षी दल जरूर मजबूत हुए हैं, लेकिन पाकिस्तानी राजनीति में भ्रष्टाचारियों की कमी नहीं है और लोगों के बीच यह धारणा फैल रही है कि पीपीपी के मामले में अदालत कुछ ज्यादा ही कठोर हो रही है। ऐसे में आसिफ अली जरदारी समय से पहले चुनाव का मास्टर स्ट्रोक भी खेल सकते हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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