हमारा पड़ोसी और आम भारतीयों की नजर में सर्वाधिक अपनत्व का बोध कराने वाला नेपाल फिर राजनीतिक संकट के दौर में प्रवेश कर गया है। करीब छह सालों में माओवादियों के साथ शांति समझौते से लेकर, मधेश का जन विद्रोह, जनजातियों का विद्रोह, आम चुनाव, संविधान सभा सह संसद का गठन, राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के चुनाव से लेकर संविधान निर्माण और मिलीजुली सरकार चलाने की कोशिशों का कोई एक नतीजा इस समय सामने है तो बिना संविधान एवं मान्य सरकार के नेपाल। इसका यदि यह निष्कर्ष निकलता है कि इन सालों में नेपाल को लोकतंत्र की पटरी पर लाने की तमाम कोशिशें विफल हो गईं तो उसे गलत नहीं कह सकते हैं। माओवादी बाबूराम भट्टाराई प्रधानमंत्री के पद पर विराजमान हैं और कल तक उनकी सरकार की साथी पार्टियां व नेता उन्हें हटाने के लिए राष्ट्रपति से गुहार लगाते हुए सड़कों पर उतर रहे हैं। भट्टाराई ने मंत्रिमंडल की बैठक के बाद चुनाव की तिथि घोषित की, जबकि इनका तर्क है कि समर्थन देने वाली पार्टियों के मंत्रियों के बैठक से हटने के बाद उनका बहुमत नहीं रहा, इसलिए उनकी घोषणा असंवैधानिक है। ऐसे राजनीतिक माहौल में कल्पना की जा सकती है कि ये भविष्य में नेपाल को कोई सर्वसम्मत संविधान दे सकेंगे ताकि देश लोकतंत्र की राह पर अग्रसर हो सके? हम हमेशा ध्यान रखें कि नेपाल का संकट उसका अपना ही नहीं बल्कि भारत का भी संकट है। उसके साथ हमारी ऐसी सुरक्षा और परागमन संधि है जो दुनिया के लिए अनूठी है। वहां नेताओं और सक्रिय नागरिकों के एक वर्ग द्वारा भारत के खिलाफ सार्वजनिक विष वमन के बावजूद वे ऐसे समय सीधे भारत की ओर देखते हैं क्योंकि नेपाल की राजनीति को दिशा देने की
क्षमता भारत में हमेशा रही है और सम्पूर्ण परिस्थितियों के मद्देनजर यह भारत का दायित्त्व भी है। इसलिए आज यदि नेपाल फिर गंभीर संकट में है तो भारत इसकी जिम्मेवारी से बच नहीं सकता। पिछले कम से कम चार सालों से जिस तरह चीन वहां अति सक्रिय हुआ है उसके बाद तो भारत की कूटनीति ज्यादा तीव्र और सघन होनी चाहिए थी। जाहिर है, ऐसा नहीं हुआ है। स्थिति काफी विकट है। नेपाल के अंतरिम संविधान में संविधान सभा के लिए नए चुनाव का कोई प्रावधान ही नहीं है। दूसरे, कोई निर्वाचित इकाई न होने के कारण निर्वाचन के नियम और कानून का निर्माण कैसे होगा, यह भी स्पष्ट नहीं है। ऐसे में इस देश को अगर किसी एक बात की सबसे ज्यादा जरूरत है तो वह है, राजनीतिक दलों के बीच आपसी सहमति। लेकिन इनके बीच किसी एक बात पर सहमति है तो वह है सतत असहमत रहना। गैर माओवादी पार्टियों का भट्टाराई पर आरोप है कि उन्होंने संविधान सभा
को अंतरिम संसद के रूप में बनाए रखने यानी उसकी अवधि विस्तार की मांग अनसुनी कर दी, जिससे यह संकट पैदा हुआ है। इनके अनुसार एक सामान्य संशोधन द्वारा ऐसा किया जा सकता था और फिर चुनाव के लिए कानूनी और संवैधानिक आधार तैयार कर लिया जाता। वस्तुत: उच्चतम न्यायालय ने 27 मई के बाद संविधान सभा की अवधि विस्तार की अपील ठुकरा दी थी। जाहिर है, 27 मई की 12
बजे रात्रि तक संविधान निर्माण न होने के बाद इसका भंग होना निश्चित था, पर न्यायालय ने संसद के बारे में कुछ नहीं कहा था। भट्टाराई ने ऐसा क्यों नहीं किया, यह स्पष्ट नहीं है, पर विपक्ष का आरोप है कि उन्होंने अपने हाथ में सत्ता बनाए रखने के लिए ऐसा किया। बहरहाल, क्योंकि पांच प्रमुख पार्टियां राष्ट्रपति रामवरण यादव से प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने की लिखित मांग कर चुकी हैं इसलिए उनके द्वारा कार्रवाई अपरिहार्य लगती
है। हालांकि राष्ट्रपति अंतरिम संविधान के अनुसार नाममात्र के प्रधान हैं, पर उन्हें कुछ आपातकालीन अधिकार हैं। अगर वे विपक्षी दलों की मांग के अनुरूप कदम उठाते हैं तो भट्टाराई के लिए मुश्किल होगी। भय है कि कहीं नया सत्ता संघर्ष न आरंभ हो जाए। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-एमाले, नेपाली कांग्रेस, चारों प्रमुख मधेशी पार्टियों व अन्य छोटी पार्टियों को इस समय भट्टाराई के विरुद्ध एकजुट देखकर गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि ये आगे भी एक रहेंगी। यह केवल प्रधानमंत्री को हटाने के लिए विरोधियों की तात्कालिक एकजुटता है। अगर इनके बीच एकता होती तो नेपाल को न केवल लिखित संविधान मिल चुका होता बल्कि देश का राजनीतिक ढांचा खड़ा हो गया होता, राज्यों का गठन हो चुका होता तथा नए संविधान के तहत निर्वाचित सरकार केन्द्र व राज्यों में कार्य कर रही होती। तो नेताओं की अनेकता नेपाल के इस संकट की मुख्य बाधा है। 10 अप्रैल 2008 को निर्वाचन के बाद अस्तित्व में आई संविधान सभा ने 28 अगस्त से काम आरंभ किया और पहले ही दिन देश से राजशाही के अंत का प्रस्ताव पारित कर नेपाल को लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया। उस दिन संविधान सभा में दिखी एकता कभी दोबारा परिलक्षित नहीं हुई। हालांकि निर्वाचन के बावजूद 601 सदस्यीय संविधान सभा सह संसद में 24 दलों के प्रतिनिधित्व ने सरकार गठन में बाधाएं पैदा कीं एवं चार महीने बाद 15 अगस्त 2008 को माओवादी प्रमुख पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड के नेतृत्व में मिलीजुली सरकार गठित हुई। ऐसे ऐतिहासिक अवसर पर इतनी अनेकता से संकेत मिल गया था कि आगे की डगर कठिन है और सबने देखा है कि किस तरह वहां शीर्ष राजनीति में सरकार गिराने, बनाने, सरकार को काम न करने देने का खेल चलता रहा है। चार वर्ष से कम समय में चार सरकारें गिरीं और चार प्रधानमंत्री बने। एमाले के माधव कुमार नेपाल तो बहुमत खोने के बाद कई महीनों तक इसलिए प्रधानमंत्री बने रहे, क्योंकि किसी नई सरकार का गठन ही संभव नहीं हो रहा था। हालांकि कुछ तो परिस्थितियां बाधा बनतीं रहीं जिनसे निपटने का अनुभव नेताओं को नहीं था, लोकतांत्रिक आचरण के अनुभव का भी अभाव था, लेकिन अगर नेताओं का इरादा नेक और ईमानदार होता तो परिस्थितियां और अनुभवहीनता कमजोर पड़ जाती। यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि उम्मीद के साथ अस्तित्व में आई संविधान सभा की अविध केवल दो साल की थी और उसे 28 अगस्त 2010 तक संविधान निर्माण का कार्य पूरा करके स्वयं को विघटित कर देना था, किंतु उच्चतम न्यायालय द्वारा बार- बार अवधि बढ़ाए जाने के बावजूद नेतागण सत्ता के राजनीतिक घात-प्रतिघात में तो लगे रहे, लेकिन ऐसे संविधान निर्माण के लिए मेहनत नहीं की गई जिसमें सभी क्षेत्र व जातीय समूहों की भावनाओं की अभिव्यक्ति हो। आज चारों ओर केवल नाउम्मीदी है। नेपाल का बहुमत मानने लगा है कि नेताओं का संविधान निर्माण से लेनादेना है ही नहीं, उन्हें केवल सत्ता चाहिए। संसदीय लोकतंत्र की ओर उम्मीद के साथ कदम बढ़ाने को आतुर देश के लिए यह सामान्य धक्का नहीं है। लेकिन केवल परिस्थितियों और नेपाली नेताओं को खलनायक साबित करने से पूरा सच सामने नहीं आएगा। प्रश्न है कि ऐसे में भारत कहां था? चीन की गतिविधियां वहां तीव्र थीं और उसकी अभिरुचि संविधान बनने देने में नहीं थी। इसके समानांतर भारत के प्रतिनिधि नेताओं से तो मिलते थे, पर चार वर्षों में संविधान के विवादास्पद मुद्दों पर मधेशियों, जनजातीय समूहों के नेताओं के साथ तीनों मुख्य दलों के नेताओं के बीच सहमति कराने की पुरजोर पहल नजर नहीं आई। जनता द्वारा निर्वाचित राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री के हाथोें में कार्यकारी शक्तियां रहें, इसके उत्तर में भारत का सहयोग निर्णायक होता और मधेशियों व जनजातीय समूहों द्वारा संघीय ढांचा तथा पहचान पर आधारित राज्यों के निर्माण के सबसे जटिल और झगड़ालू प्रश्न पर भी। परंतु संविधान सभा इन्हीं दो प्रश्नों में उलझ कर रह गई। ऐसी स्थिति में तीनों राजनीतिक दलों में तालमेल बिठाने की भूमिका भारत शालीन तरीके से निभा सकता था। नेपाल के गंभीर संकट में फंसने के बावजूद लगता है जैसे भारत केवल आगे की घटनाओं की प्रतीक्षा कर रहा है। यह आत्मघाती नीति है।
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