विश्व के बहुत कम हिस्सों में इतनी आर्थिक विविधता है जितनी दक्षिण एशिया में। मानव और प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद यह क्षेत्र संपर्क, शासन और सकारात्मक राजनीतिक नेतृत्व की भारी कमी से जूझ रहा है। यह क्षेत्र आर्थिक वैश्वीकरण का लाभ उठाने में भी पिछड़ गया है। दक्षिण एशियाई देशों का आपस में व्यापार उस रफ्तार से नहीं बढ़ रहा है, जिस गति से शेष विश्व के साथ व्यापार बढ़ा है। इस क्षेत्र के सभी देशों के कुल व्यापार के अनुपात में अंतर-क्षेत्रीय व्यापार की दर कम है। इससे पता चलता है कि दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा) जैसे क्षेत्रीय व्यापार संगठन अंतर क्षेत्रीय व्यापार बढ़ाने में विफल रहे हैं। साफ्टा क्षेत्र में जारी व्यापार दरों को नीचे लाने में उतना प्रभावी सिद्ध नहीं हुआ जितनी उससे आशा की जा रही थी। अपनी जीडीपी की तुलना में क्षेत्र का विदेश व्यापार विश्व के अन्य क्षेत्रों की तुलना में काफी कम है। यद्यपि यह अनुपात पिछले दो दशकों में कुछ सुधरा है। इस सुधार के पीछे एक प्रमुख कारण है गैर-क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार में बढ़ोतरी। खासतौर पर दक्षिण एशिया का चीन के साथ व्यापार तेजी से बढ़ा है। पिछले दशक में चीन के साथ क्षेत्र का व्यापार 5.7 अरब डॉलर से बढ़कर 80.5 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। इस वृद्धि के बावजूद दक्षिण एशिया अब भी चीन के लिए छोटा व्यापार साझेदार है। दक्षिण एशिया के लिए चीन एक प्रमुख व्यापार इकाई के रूप में उभरा है, किंतु चीन के लिए यह क्षेत्र प्रमुख बाजार नहीं बन पाया है। दक्षिण एशिया में चीन का व्यापार एशिया-प्रशांत क्षेत्र में इसके व्यापार का महज पांच फीसदी ही है। वास्तव में, चीन के लिए दक्षिण एशिया से बड़े व्यापारिक साझेदार तो पश्चिम एशिया और अफ्रीका हैं। फिर भी जिस तेजी के साथ दक्षिण एशिया में चीन का व्यापार बढ़ रहा है उससे यह संभावना बलवती हो रही है कि यह इस क्षेत्र के व्यापार ढांचे में अपनी औपचारिक उपस्थिति को संस्थागत रूप देना चाहेगा। खासतौर पर यह विचार इस संभावना से पैदा हुआ है कि निकट भविष्य में चीन साफ्टा का सदस्य बनने जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चीन के सार्क आर्थिक संरचना में औपचारिक प्रवेश से दक्षिण एशिया में विकास की गति जोर पकड़ेगी। दक्षिण एशिया के व्यापार और आर्थिक ढांचे में चीन के औपचारिक प्रवेश पर किसी भी चर्चा में हमें इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि चीन पहले ही एक ऐसे बहुपक्षीय व्यापार ढांचे का सदस्य है जिसमें दक्षिण एशियाई क्षेत्र से बहुत कम देश शामिल हैं। यह संगठन है एशिया-प्रशांत व्यापार समझौता (आप्टा)। इसे पहले बैंकाक समझौते के नाम से जाना जाता था। इसमें भारत, बांग्लादेश, लाओस, कोरिया गणतंत्र और श्रीलंका ने 1975 में प्रवेश किया था। चीन ने इस संगठन में 2001 में कदम रखा था। आप्टा अपने सभी सदस्यों को सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र का दर्जा देता है। इस प्रकार चीन पहले ही दक्षिण एशिया में औपचारिक स्थान हासिल किए हुए है। चीन पहले ही पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता कर चुका है। मालदीव के साथ इसकी शून्य शुल्क संधि है। दक्षिण एशियाई व्यापार में चीन की औपचारिक उपस्थिति को देखते हुए सवाल उठता है कि साफ्टा जैसे संगठन में चीन के प्रवेश के बाद क्या दोनों पक्षों में से किसी की व्यापार संभावनाएं बढ़ने की संभावना है? यह ठीक है कि पिछले दशक में दक्षिण एशियाई देशों के साथ चीन के व्यापार में तीव्र वृद्धि हुई है, लेकिन इसका मुख्य कारण भारत के साथ चीन के व्यापार में बढ़ोतरी है। 2000 में भारत के साथ चीन का व्यापार महज 2.9 अरब डॉलर था, जो दक्षिण एशियाई देशों के साथ उसके कुल व्यापार का 51 फीसदी था। 2010 में चीन का भारत के साथ व्यापार 61.7 अरब डॉलर हो गया है, जो दक्षिण एशिया के साथ उसके कुल व्यापार का 78 फीसदी है। इस बीच पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका के साथ चीन के व्यापार में तो उलटे गिरावट देखने को मिली। इससे स्पष्ट है कि दक्षिण एशिया की चीन के साथ व्यापक व्यापार भागीदारी में क्षेत्र के सभी देशों की समान भागीदारी नहीं रही है। दक्षिण एशिया के साथ चीन के व्यापार में भारत-चीन व्यापार की प्रमुख भूमिका को देखते हुए इस बिंदु पर विचार करना उचित है कि क्या दक्षिण एशियाई व्यापार ढांचे में चीन का औपचारिक प्रवेश क्षेत्र की आर्थिक संभावनाओं में बड़े मतभेदों का कारण बनेगा? चीन के साफ्टा में शामिल होने से भारत के साथ इसका व्यापार बढ़ने की अधिक संभावनाएं नहीं हैं। इस क्षेत्र की अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर भी इस कदम का मामूली असर ही पड़ेगा, क्योंकि बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान के पहले ही चीन के साथ व्यापारिक रिश्ते मजबूत हैं। इसके विपरीत साफ्टा में चीन के प्रवेश से आप्टा और एफटीए के तहत पाकिस्तान तथा कुछ अन्य देशों को मिल रही सुविधाओं में विरोधाभास और भ्रम की स्थिति खड़ी हो सकती है। यह ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि साफ्टा में शामिल होने से दक्षिण एशिया की कीमत पर चीन को लाभ हो सकता है। दक्षिण एशियाई देशों के साथ चीन का पहले ही निर्यात असंतुलित है। चीन के साफ्टा में शामिल होने से व्यापार असंतुलन और बढ़ सकता है। इसके अलावा साफ्टा में शामिल होने से चीन दक्षिण एशियाई देशों से सस्ते आयात का लाभ उठा सकेगा। चीन के साफ्टा में प्रवेश के पक्ष में यही सबसे मजबूत दलील है। (लेखक नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में सीनियर रिसर्च फेलो हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
No comments:
Post a Comment