ईरान से तेल आयात को लेकर पाकिस्तानी वित्तीय संस्थान अमेरिकी कानून से प्रभावित हो सकते हैं। ईरान को लेकर अमेरिकी प्रतिबंध वाला कानून शुक्रवार से लागू हो गया। पाकिस्तान को अब तक अमेरिकी प्रतिबंधों से छूट नहीं दी गई है, जबकि भारत और 19 अन्य देशों को छूट प्रदान कर दी गई है। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के मुताबिक पाकिस्तान और अफगानिस्तान उन 20 देशों में शामिल नहीं है, जिसने ईरान से तेल आयात में महत्वपूर्ण कमी की है। जिन 20 देशों को प्रतिबंधों से छूट दी गई है उनकी घोषणा तीन चरणों में की गई है। अंतिम चरण में चीन और सिंगापुर को प्रतिबंधों से छूट दी गई है। इनके अलावा बेल्जियम, ब्रिटेन, चेक गणराज्य, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, भारत, मलेशिया, इटली, जापान, नीदरलैंड्स, पोलैंड, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, स्पेन, श्रीलंका, ताइवान और तुर्की को प्रतिबंधों से छूट दी जा चुकी है। अमेरिकी अधिकारियों ने पाकिस्तान को छूट नहीं दिए जाने का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है। छूट नहीं मिलने से पाकिस्तान के वित्तीय संस्थानों पर अमेरिकी प्रतिबंधों का व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। ईरान के विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने के लिए अमेरिका और यूरोपीय संघ ने कड़े कदम उठाए हैं जिसमें ईरान से तेल निर्यात रोकना भी शामिल है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आइईए) के मुताबिक 2011 में ईरान का कच्चे तेल का निर्यात लगभग 25 लाख बैरल प्रतिदिन रहा था। अब यह घटकर 15 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया है। इसका मतलब यह हुआ कि ईरान को प्रत्येक तिमाही में आठ अरब डॉलर (करीब 450 अरब रुपये) के राजस्व का नुकसान हो रहा है। सांसदों ने जताई निराशा अमेरिका द्वारा ईरान से तेल आयात के मुद्दे पर चीन को प्रतिबंधों से छूट दिए जाने पर अमेरिकी सांसदों ने निराशा जताई है। अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के ऊपरी सदन सीनेट के सदस्य जॉय लीबरमैन ने कहा, ओबामा प्रशासन द्वारा ईरान से तेल आयात के मुद्दे पर चीन को प्रतिबंधों से छूट दिए जाने के निर्णय से मैं बहुत निराश हूं।
Saturday, June 30, 2012
पाकिस्तानी भारत को मानते हैं बड़ा खतरा
पाकिस्तानी जनता आतंकी संगठनों के बजाए भारत को अपने लिए बढ़ा खतरा मानती है। पांच में से केवल एक पाकिस्तानी ही भारत के प्रति सकारात्मक नजरिया रखता है, जबकि दस में से छह लोग भारत को तालिबान या अलकायदा से भी बड़ा खतरा मानते हैं। शुक्रवार को जारी किए गए एक सर्वेक्षण में यह बात कही गई है। प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा पाकिस्तान में कराए गए सर्वेक्षण के मुताबिक साल 2009 में जब पहली बार पाकिस्तानियों से उनके सबसे बड़े खतरे के बारे में पूछा गया था, तब से लेकर आज तक वे भारत का नाम ही लेते आए हैं। भारत से डरने वाले लोगों का आंकड़ा बढ़कर 59 प्रतिशत पहुंच गया है। वहीं तालिबान को खतरा मानने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है। इन नकारात्मक भावनाओं के बावजूद 62 प्रतिशत पाकिस्तानी मानते हैं कि भारत के साथ संबंध सुधारना उनके देश के हित में है। वहीं दो तिहाई लोग द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने और दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए वार्ता जारी रखने के पक्षधर हैं। ज्यादातर भारतीय भी पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने, व्यापार बढ़ाने और वार्ता के जरिये समस्याएं सुलझाने के पक्ष में हैं। हालांकि पाकिस्तान को लेकर भारतीयों का नजरिया नकारात्मक ही है। दस में से छह भारतीय पाकिस्तान के प्रति नकारात्मक रुख रखते हैं। वैसे साल 2011 के 65 प्रतिशत की तुलना में इस साल इसमें कुछ कमी आई है। सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत अकेला ऐसा देश नहीं है, जहां पाकिस्तान के प्रति नकारात्मक नजरिया हैं। जिस सात देशों में यह सर्वेक्षण कराया गया है, उनमें से छह देशों के नागरिक पाकिस्तान के प्रति ऐसी ही सोच रखते हैं। यह सर्वेक्षण भारत, पाकिस्तान, चीन, जापान और मुस्लिम बहुल मिस्त्र, जार्डन और ट्यूनीशिया में गत मार्च से अप्रैल के बीच कराया गया।
मुहम्मद मुर्सी बने मिस्र के राष्ट्रपति
मिस्र की सत्ता पर तीन दशक तक काबिज रहे होस्नी मुबारक के अपदस्थ होने के बाद पहली बार हुए राष्ट्रपति चुनाव में मुस्लिम ब्रदरहुड के मुहम्मद मुर्सी को जीत मिली है। उन्हें 51.73 फीसद वोट प्राप्त हुए, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी पूर्व प्रधानमंत्री अहमद शफीक को 48.2 फीसद वोट मिले हैं। शफीक मिस्र की सेना और पूर्व राष्ट्रपति मुबारक के करीबी माने जाते हैं। रविवार को मुर्सी की जीत की घोषणा के साथ ही ऐतिहासिक तहरीर चौक पर लोकतंत्र समर्थकों ने आतिशबाजी की। सैकड़ों लोगों ने हॉर्न बजाकर खुशी का इजहार किया। हालांकि, मुस्लिम ब्रदरहुड की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धताओं के बारे में संदेह रखने वाले इन नतीजों से सहमे हुए हैं। ध्यान रहे कि मुस्लिम ब्रदरहुड की छवि कट्टरपंथी है, लेकिन मिस्र में यह सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। कौन हैं मुर्सी : मुहम्मद मुर्सी 60 वर्षीय इंजीनियर हैं, जिन्होंने अमेरिका में शिक्षा ग्रहण की। वह वर्ष 2001 से 2005 तक निर्दलीय सांसद थे। मुर्सी जनवरी 2011 में मुस्लिम ब्रदरहुड के राजनीतिक दल फ्रीडम एंड जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष बने थे। उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार तब बनाया गया था, जब ब्रदरहुड के प्रभावशाली नेता खैरात अल-शातेर को चुनावी दौड़ से मजबूरी में बाहर होना पड़ा। उन पर होस्नी मुबारक शासनकाल के दौरान आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे। इस वजह से उनकी उम्मीदवारी रद कर दी गई थी। नतीजा आने में हुई देरी : नतीजों के इंतजार में शनिवार देर रात से ही तहरीर चौक पर लाखों लोग जमा हो गए थे। हालांकि, विजेता के नाम की घोषणा गुरुवार को जानी थी, लेकिन अनियमितताओं के आरोपों की वजह घोषणा टाल दी गई। इस बीच देश में खासा तनाव था। मुस्लिम ब्रदरहुड के अधिकतर समर्थक तहरीर चौक पर जमा थे, जबकि शफीक समर्थक काइरो के उत्तरी इलाके में रैली कर रहे थे। चुनाव आयोग ने नतीजे की घोषणा करने से पहले सैकड़ों शिकायतों पर चर्चा की। आयोग ने बताया कि दोनों पक्षों के समर्थकों ने चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बताते हुए संतुष्टि जाहिर की थी। इसके बाद रविवार को चुनाव आयोग के मुख्यालय में सशस्त्र सुरक्षाकर्मियों और टैंकों की मौजूदगी के बीच विजेता की घोषणा की गई। अस्थिरता के बीच हुआ मतदान : राष्ट्रपति चुनाव के लिए 16 और 17 जून को हुए दूसरे दौर के निर्णायक मतदान से एक दिन पहले मिस्र की च्र्वोच्च ने पिछले साल कराए गए संसदीय चुनाव को असंवैधानिक करार दे दिया था। संसदीय चुनाव में मुस्लिम ब्रदरहुड को सबसे ज्यादा सीटें मिली थीं। इस वजह से मिस्र में राजनीतिक संकट गहरा गया था।
राजनितिक अनिश्चितता की ओर पाक
पूर्व फौजी शासक जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ लंबे टकराव में जीतकर दिखाने वाले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार हुसैन चौधरी लोकतंत्र के हक में उम्मीद की बड़ी किरण के रूप में देखे जाते रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को पद से हटाने का आदेश देकर उन्होंने अपनी छवि को कितना मजबूत बनाया होगा, कहना मुश्किल है। न्यायालय की अवमानना के आरोप में गिलानी को संसद की सदस्यता और प्रधानमंत्री पद दोनों से बर्खास्त करने के अदालती फैसले से वहां भ्रष्टाचारी नेताओं को कानून के दायरे में लाने का लक्ष्य तो फिलहाल हासिल नहीं हुआ, लेकिन आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संकटों में फंसा रहने वाला यह गरीब देश एक बार फिर राजनीतिक अनिश्चितता के अंधे कुएं में जरूर जा गिरा है। पाकिस्तानी विपक्ष और भ्रष्टाचार विरोधियों ने भले ही इस फैसले को सराहा हो और मौजूदा नाजुक दौर में सत्तारूढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने बुझे मन से इसे स्वीकार कर लिया हो, लेकिन इसमें सवालों, विवादों और आपत्तियों के लिए पर्याप्त गुंजाइश मौजूद है। खास बात यह है कि इस फैसले के खिलाफ अपील करने की भी कोई व्यवस्था नहीं है। इफ्तिखार चौधरी के नेतृत्व में मजबूत हुई पाकिस्तानी न्यायपालिका ज्यूडीशियल एक्टीविज्म की तरफ बढ़ती दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट का मकसद गलत नहीं है। वह पाकिस्तान में शीर्ष पदों पर बैठे नेताओं के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करना चाहता है। उसका पहला निशाना खुद राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी हैं, जिनकी छवि के बारे में किसी को गलतफहमी नहीं है। बेनजीर भुट्टो के प्रधानमंत्रित्व काल में मिस्टर टेन परसेंट के नाम से मशहूर जरदारी पर भ्रष्ट सौदों में अरबों डॉलर की रकम जमा करने का आरोप है। वे कई मामलों में दोषी करार दिए जा चुके हैं और दो बार लंबे समय के लिए जेल भेजे जा चुके हैं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट जिस मामले को लेकर कार्रवाई कर रहा है, वह एक स्विस कोर्ट के वर्ष 2003 के फैसले से संबंधित है, जिसने जरदारी, बेनजीर भुट्टो और नुसरत भुट्टो को भ्रष्टाचार और धनशोधन का दोषी करार दिया था। आरोप था कि दो स्विस कंपनियों ने सीमा-शुल्क से जुड़े एक मामले में जरदारी को 1.2 करोड़ डॉलर की रिश्वत दी थी। इसे काले से सफेद करने के लिए स्विस बैंकों का इस्तेमाल किया गया था। अदालत ने जरदारी व बेनजीर को छह महीने की कैद और पचास हजार डॉलर के जुर्माने की सजा सुनाई थी। वर्ष 2007 में जनरल मुशर्रफ के साथ हुए एक समझौते के तहत भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे सभी नेताओं को आम माफी दे दी गई थी। इसी की बदौलत बेनजीर और जरदारी के स्वदेश लौटकर चुनाव लड़ने का रास्ता खुला, लेकिन नई सरकार बनने के बाद बहाल किए गए न्यायमूर्ति चौधरी ने आम माफी से संबंधित अध्यादेश को गैरकानूनी करार दे दिया और प्रधानमंत्री गिलानी को निर्देश दिया कि जरदारी के खिलाफ बंद पड़े इस मामले में कार्रवाई दोबारा शुरू की जाए। गिलानी की कुर्बानी किसी भी कमजोर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की तरह गिलानी जिनकी नियुक्ति भी जरदारी के ही आशीर्वाद से हुई, उनके विरुद्ध कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट शायद जरदारी को जेल भेजने की ठाने बैठा है। धीरे-धीरे मामला सरकार बनाम सुप्रीम कोर्ट के टकराव में बदल गया। एक ऐसा टकराव, जिसमें दोनों ही पक्ष बहुत संभलकर अपनी-अपनी चाल चल रहे हैं। ताजा चाल इफ्तिखार चौधरी ने कुछ इस तरह चली है कि पीपीपी के सामने गिलानी को कुर्बान करने के सिवा कोई चारा नहीं है। लेकिन गिलानी को सजा सुनाने से न तो भ्रष्टाचार की समस्या हल होती है और न ही असली निशाने तक पहुंचने का अदालती मकसद पूरा होता है। उन्हें पाकिस्तानी संविधान की उस धारा के तहत दोषी ठहराया गया है, जिसमें न्यायपालिका की खिल्ली उड़ाने या उसकी अवज्ञा करने वाले किसी भी जन प्रतिनिधि की सदस्यता खारिज किए जाने का प्रावधान है। सजा तो मिली, लेकिन असली शख्स को नहीं। सजा तो मिली, लेकिन उस आरोप में नहीं, जिस पर सारा मामला आधारित है। तो फिर ऐसे कठोर और ऐतिहासिक फैसले से हासिल क्या हुआ? गिलानी चले गए हैं और राजा परवेज अशरफ उनकी जगह लेने जा रहे हैं। लेकिन वे भी जरदारी के विश्वस्त ही हैं, जो उस मुकदमे को खोलने वाले नहीं हैं। हो सकता है कि कुछ महीने बाद उन्हें भी अवमानना का दोषी मानकर हटा दिया जाए, मगर तब फिर वैसा ही कोई शख्स आएगा। हां, जरदारी और उनकी पार्टी को जरूर जनता के सामने खुद को अदालती एक्टीविज्म से पीडि़त पक्ष के रूप में पेश करने का मौका मिल जाएगा। यों तो पाकिस्तान में अगले साल चुनाव होने हैं, लेकिन सहानुभूति लहर का फायदा उठाने के लिए पीपीपी इन्हें कुछ महीने पहले ही करवा ले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कठोर फैसला जहां तक गिलानी के विरुद्ध फैसले का सवाल है, यह न सिर्फ बहुत कठोर फैसला है, बल्कि अपने ढंग का अनोखा भी। अगर आप इसे भारतीय संदर्भो में देखेंगे तो अविश्वसनीय भी है। ऊपर से विडंबना यह कि पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने अपने समर्थन में भारतीय सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों का भी हवाला दिया है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश सीधा-सपाट और संक्षिप्त है, लेकिन उसे पढ़कर पाकिस्तान के तथाकथित लोकतंत्र पर दया आती है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने देश की भावी दिशा तय करने का जिम्मा खुद संभाल लिया है, क्योंकि उसने न सिर्फ प्रधानमंत्री को हटाने का फैसला सुनाया, बल्कि इस संबंध में स्पीकर के निर्णय को निरस्त करते हुए चुनाव आयोग और राष्ट्रपति की संस्था को भी बाकायदा आगे कदम उठाने की हिदायत दी है। उसने चुनाव आयोग से कहा है कि वह गिलानी को अयोग्य करार देने की प्रक्रिया पूरी करे और राष्ट्रपति से कहा है कि वे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिहाज से जरूरी कदम उठाएं। भले ही मकसद कितना भी अच्छा क्यों न हो, क्या लोकतंत्र में कोई एक संवैधानिक संस्था इतनी शक्तिशाली हो सकती है कि वह बाकी सबको बाध्यकारी निर्देश दे सके, यहां तक कि राष्ट्रपति और संसद को भी? हालांकि जरदारी कतई दूध के धुले हुए नहीं हैं, लेकिन दूसरे पक्ष की भी अपनी दलीलें हैं। इन्हें सिरे से नकार देना आदर्श न्याय प्रक्रिया के हक में नहीं है। इस तथ्य को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि जरदारी परवेज मुशर्रफ के साथ हुए आम माफी संबंधी करार के बाद ही देश लौटे थे। क्या एक राष्ट्र द्वारा किसी से किए गए वादे का कोई अर्थ नहीं है? यदि यह वादा न होता तो न वे लौटते, न बेनजीर की हत्या होती और न मौजूदा हालात ही बनते। ऐसा लगता है कि ज्यूडीशियल एक्टिवज्म के रास्ते पर बढ़ रहे सुप्रीम कोर्ट ने इन बिंदुओं को अनदेखा कर दिया है। देश को मौजूदा राजनीतिक गतिरोध में धकेलकर उसने लोकतंत्र को मजबूत नहीं बनाया है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं से टकराव का रास्ता खोल दिया है। यह फैसला उसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई के झंडाबरदार के रूप में भी स्थापित नहीं करता, क्योंकि जरदारी को छू पाना आज भी उतना ही मुश्किल है, जितना कि कल था। दूसरे, मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार हुसैन चौधरी का अपना आचरण भी आलोचना के घेरे में आया है, जो अपने पुत्र के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मुकदमे की सुनवाई करने वाली पीठ के प्रमुख थे। वे बढ़ती आपत्तियों और आलोचनाओं के बाद ही इस पीठ से हटे हैं। पाकिस्तान में आगे क्या होगा? अगले चुनाव तक न्यायपालिका और सरकार के बीच टकराव बदस्तूर जारी रहने के आसार हैं। नए प्रधानमंत्री काम संभालने जा रहे हैं, मगर चेहरे भले ही बदलते रहें, मर्म नहीं बदलेगा। पाकिस्तानी राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाली सेना इस मामले में तटस्थ है। इसलिए फिलहाल सरकार पर कोई खतरा दिखाई नहीं देता। सारे प्रकरण में विपक्षी दल जरूर मजबूत हुए हैं, लेकिन पाकिस्तानी राजनीति में भ्रष्टाचारियों की कमी नहीं है और लोगों के बीच यह धारणा फैल रही है कि पीपीपी के मामले में अदालत कुछ ज्यादा ही कठोर हो रही है। ऐसे में आसिफ अली जरदारी समय से पहले चुनाव का मास्टर स्ट्रोक भी खेल सकते हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Saturday, June 23, 2012
राजनितिक अनिश्चितता की ओर पाक
पूर्व फौजी शासक जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ लंबे टकराव में जीतकर दिखाने वाले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार हुसैन चौधरी लोकतंत्र के हक में उम्मीद की बड़ी किरण के रूप में देखे जाते रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को पद से हटाने का आदेश देकर उन्होंने अपनी छवि को कितना मजबूत बनाया होगा, कहना मुश्किल है। न्यायालय की अवमानना के आरोप में गिलानी को संसद की सदस्यता और प्रधानमंत्री पद दोनों से बर्खास्त करने के अदालती फैसले से वहां भ्रष्टाचारी नेताओं को कानून के दायरे में लाने का लक्ष्य तो फिलहाल हासिल नहीं हुआ, लेकिन आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संकटों में फंसा रहने वाला यह गरीब देश एक बार फिर राजनीतिक अनिश्चितता के अंधे कुएं में जरूर जा गिरा है। पाकिस्तानी विपक्ष और भ्रष्टाचार विरोधियों ने भले ही इस फैसले को सराहा हो और मौजूदा नाजुक दौर में सत्तारूढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने बुझे मन से इसे स्वीकार कर लिया हो, लेकिन इसमें सवालों, विवादों और आपत्तियों के लिए पर्याप्त गुंजाइश मौजूद है। खास बात यह है कि इस फैसले के खिलाफ अपील करने की भी कोई व्यवस्था नहीं है। इफ्तिखार चौधरी के नेतृत्व में मजबूत हुई पाकिस्तानी न्यायपालिका ज्यूडीशियल एक्टीविज्म की तरफ बढ़ती दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट का मकसद गलत नहीं है। वह पाकिस्तान में शीर्ष पदों पर बैठे नेताओं के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करना चाहता है। उसका पहला निशाना खुद राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी हैं, जिनकी छवि के बारे में किसी को गलतफहमी नहीं है। बेनजीर भुट्टो के प्रधानमंत्रित्व काल में मिस्टर टेन परसेंट के नाम से मशहूर जरदारी पर भ्रष्ट सौदों में अरबों डॉलर की रकम जमा करने का आरोप है। वे कई मामलों में दोषी करार दिए जा चुके हैं और दो बार लंबे समय के लिए जेल भेजे जा चुके हैं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट जिस मामले को लेकर कार्रवाई कर रहा है, वह एक स्विस कोर्ट के वर्ष 2003 के फैसले से संबंधित है, जिसने जरदारी, बेनजीर भुट्टो और नुसरत भुट्टो को भ्रष्टाचार और धनशोधन का दोषी करार दिया था। आरोप था कि दो स्विस कंपनियों ने सीमा-शुल्क से जुड़े एक मामले में जरदारी को 1.2 करोड़ डॉलर की रिश्वत दी थी। इसे काले से सफेद करने के लिए स्विस बैंकों का इस्तेमाल किया गया था। अदालत ने जरदारी व बेनजीर को छह महीने की कैद और पचास हजार डॉलर के जुर्माने की सजा सुनाई थी। वर्ष 2007 में जनरल मुशर्रफ के साथ हुए एक समझौते के तहत भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे सभी नेताओं को आम माफी दे दी गई थी। इसी की बदौलत बेनजीर और जरदारी के स्वदेश लौटकर चुनाव लड़ने का रास्ता खुला, लेकिन नई सरकार बनने के बाद बहाल किए गए न्यायमूर्ति चौधरी ने आम माफी से संबंधित अध्यादेश को गैरकानूनी करार दे दिया और प्रधानमंत्री गिलानी को निर्देश दिया कि जरदारी के खिलाफ बंद पड़े इस मामले में कार्रवाई दोबारा शुरू की जाए। गिलानी की कुर्बानी किसी भी कमजोर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की तरह गिलानी जिनकी नियुक्ति भी जरदारी के ही आशीर्वाद से हुई, उनके विरुद्ध कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट शायद जरदारी को जेल भेजने की ठाने बैठा है। धीरे-धीरे मामला सरकार बनाम सुप्रीम कोर्ट के टकराव में बदल गया। एक ऐसा टकराव, जिसमें दोनों ही पक्ष बहुत संभलकर अपनी-अपनी चाल चल रहे हैं। ताजा चाल इफ्तिखार चौधरी ने कुछ इस तरह चली है कि पीपीपी के सामने गिलानी को कुर्बान करने के सिवा कोई चारा नहीं है। लेकिन गिलानी को सजा सुनाने से न तो भ्रष्टाचार की समस्या हल होती है और न ही असली निशाने तक पहुंचने का अदालती मकसद पूरा होता है। उन्हें पाकिस्तानी संविधान की उस धारा के तहत दोषी ठहराया गया है, जिसमें न्यायपालिका की खिल्ली उड़ाने या उसकी अवज्ञा करने वाले किसी भी जन प्रतिनिधि की सदस्यता खारिज किए जाने का प्रावधान है। सजा तो मिली, लेकिन असली शख्स को नहीं। सजा तो मिली, लेकिन उस आरोप में नहीं, जिस पर सारा मामला आधारित है। तो फिर ऐसे कठोर और ऐतिहासिक फैसले से हासिल क्या हुआ? गिलानी चले गए हैं और राजा परवेज अशरफ उनकी जगह लेने जा रहे हैं। लेकिन वे भी जरदारी के विश्वस्त ही हैं, जो उस मुकदमे को खोलने वाले नहीं हैं। हो सकता है कि कुछ महीने बाद उन्हें भी अवमानना का दोषी मानकर हटा दिया जाए, मगर तब फिर वैसा ही कोई शख्स आएगा। हां, जरदारी और उनकी पार्टी को जरूर जनता के सामने खुद को अदालती एक्टीविज्म से पीडि़त पक्ष के रूप में पेश करने का मौका मिल जाएगा। यों तो पाकिस्तान में अगले साल चुनाव होने हैं, लेकिन सहानुभूति लहर का फायदा उठाने के लिए पीपीपी इन्हें कुछ महीने पहले ही करवा ले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कठोर फैसला जहां तक गिलानी के विरुद्ध फैसले का सवाल है, यह न सिर्फ बहुत कठोर फैसला है, बल्कि अपने ढंग का अनोखा भी। अगर आप इसे भारतीय संदर्भो में देखेंगे तो अविश्वसनीय भी है। ऊपर से विडंबना यह कि पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने अपने समर्थन में भारतीय सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों का भी हवाला दिया है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश सीधा-सपाट और संक्षिप्त है, लेकिन उसे पढ़कर पाकिस्तान के तथाकथित लोकतंत्र पर दया आती है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने देश की भावी दिशा तय करने का जिम्मा खुद संभाल लिया है, क्योंकि उसने न सिर्फ प्रधानमंत्री को हटाने का फैसला सुनाया, बल्कि इस संबंध में स्पीकर के निर्णय को निरस्त करते हुए चुनाव आयोग और राष्ट्रपति की संस्था को भी बाकायदा आगे कदम उठाने की हिदायत दी है। उसने चुनाव आयोग से कहा है कि वह गिलानी को अयोग्य करार देने की प्रक्रिया पूरी करे और राष्ट्रपति से कहा है कि वे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिहाज से जरूरी कदम उठाएं। भले ही मकसद कितना भी अच्छा क्यों न हो, क्या लोकतंत्र में कोई एक संवैधानिक संस्था इतनी शक्तिशाली हो सकती है कि वह बाकी सबको बाध्यकारी निर्देश दे सके, यहां तक कि राष्ट्रपति और संसद को भी? हालांकि जरदारी कतई दूध के धुले हुए नहीं हैं, लेकिन दूसरे पक्ष की भी अपनी दलीलें हैं। इन्हें सिरे से नकार देना आदर्श न्याय प्रक्रिया के हक में नहीं है। इस तथ्य को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि जरदारी परवेज मुशर्रफ के साथ हुए आम माफी संबंधी करार के बाद ही देश लौटे थे। क्या एक राष्ट्र द्वारा किसी से किए गए वादे का कोई अर्थ नहीं है? यदि यह वादा न होता तो न वे लौटते, न बेनजीर की हत्या होती और न मौजूदा हालात ही बनते। ऐसा लगता है कि ज्यूडीशियल एक्टिवज्म के रास्ते पर बढ़ रहे सुप्रीम कोर्ट ने इन बिंदुओं को अनदेखा कर दिया है। देश को मौजूदा राजनीतिक गतिरोध में धकेलकर उसने लोकतंत्र को मजबूत नहीं बनाया है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं से टकराव का रास्ता खोल दिया है। यह फैसला उसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई के झंडाबरदार के रूप में भी स्थापित नहीं करता, क्योंकि जरदारी को छू पाना आज भी उतना ही मुश्किल है, जितना कि कल था। दूसरे, मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार हुसैन चौधरी का अपना आचरण भी आलोचना के घेरे में आया है, जो अपने पुत्र के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मुकदमे की सुनवाई करने वाली पीठ के प्रमुख थे। वे बढ़ती आपत्तियों और आलोचनाओं के बाद ही इस पीठ से हटे हैं। पाकिस्तान में आगे क्या होगा? अगले चुनाव तक न्यायपालिका और सरकार के बीच टकराव बदस्तूर जारी रहने के आसार हैं। नए प्रधानमंत्री काम संभालने जा रहे हैं, मगर चेहरे भले ही बदलते रहें, मर्म नहीं बदलेगा। पाकिस्तानी राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाली सेना इस मामले में तटस्थ है। इसलिए फिलहाल सरकार पर कोई खतरा दिखाई नहीं देता। सारे प्रकरण में विपक्षी दल जरूर मजबूत हुए हैं, लेकिन पाकिस्तानी राजनीति में भ्रष्टाचारियों की कमी नहीं है और लोगों के बीच यह धारणा फैल रही है कि पीपीपी के मामले में अदालत कुछ ज्यादा ही कठोर हो रही है। ऐसे में आसिफ अली जरदारी समय से पहले चुनाव का मास्टर स्ट्रोक भी खेल सकते हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Friday, June 22, 2012
विकसित देशो के रवैये से भारत हताश
ब्राजील में चल रहे रियो+20 शिखर सम्मेलन के घोषणा पत्र के मसौद में भारत की ओर से उठाए गए दो प्रमुख मुद्दों को शामिल कर लिया गया है। पर्यावरण को बचाने के लिए हो रहे इस तीन दिवसीय सम्मेलन में 130 से अधिक देशों के शासनाध्यक्ष और प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ गई केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने बताया कि भारत के जोर देने पर मसौदे में साझा, लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारी के सिद्धांत को फिर से शामिल कर लिया गया है। इस सिद्धांत का मतलब यह है कि पर्यावरण प्रदूषण के लिए मुख्यत: जिम्मेदार होने के कारण विकसित देशों को पर्यावरण बेहतर बनाने की अधिक जिम्मेदारी उठानी चाहिए। उन्होंने कहा कि विकसित राष्ट्र पर्यावरण अनुकूल कार्यक्रमों के वित्त पोषण में वचनबद्धता से भाग रहे हैं। जयंती ने कहा, हमें खेद है कि विकसित देशों में विकासशील देशों को बेहतर साधन उपलब्ध कराने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है, लेकिन हमें खुशी है कि हम दो महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं पर सहमत हो चुके हैं-एक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और दूसरा वित्त। ये दोनों प्रस्ताव भारत ने दिए थे, जिसका जी-77 समूह के देशों ने प्रबल समर्थन किया। रियो+20 सम्मेलन से दक्षिण एशिया की उम्मीदें ब्राजील में चल रहा तीन दिवसीय रियो+20 सम्मेलन दक्षिण एशियाई देशों के लिए ऊर्जा हासिल करने के लिहाज से फायदेमंद हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, सम्मेलन में अगर स्वच्छ ऊर्जा पर सहमति बनी तो क्षेत्र में वैश्विक निवेश को बढ़ावा मिल सकता है। ध्यान रहे कि सम्मेलन के एजेंडे में ग्रीन इकोनॉमी सबसे ऊपर है। इसी वजह से दक्षिण एशिया में ऊर्जा के विकास को लेकर आशा बंधती है। नेपाल, भूटान जैसे देश और भारत के कुछ हिस्सों में हाइड्रो पावर या जलशक्ति के विकास की प्रचुर संभावनाएं हैं। क्षेत्र के दूसरे देशों में सौर ऊर्जा का अच्छा उत्पादन हो सकता है। ऊर्जा के इन सभी स्रोतों को स्वच्छ ऊर्जा के नाम से पुकारा जाता है, क्योंकि ये पर्यावरण को प्रदूषित किए बिना विकास को संभव बनात हैं। भारत की बात करें तो कोयले और तेल जैसे बुरे ईंधनों पर उसकी निर्भरता बहुत ज्यादा है। ऐसे में कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए विकसित देश उस पर भारी दबाव बना रहे हैं। चीन की भी स्थिति ऐसी ही है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारत ने सालाना ऊर्जा उत्पादन की दक्षता को बेहतर नहीं किया तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में उसकी भागीदारी बढ़ती जाएगी। देखना रोचक होगा कि रियो+20 से दक्षिण एशियाई नेता क्या लेकर लौटते हैं? पर्यावरण अनुकूल परिवहन के लिए 175 अरब डॉलर निवेश रियो डि जेनेरियो, आइएएनएस : आठ बहुपक्षीय विकास बैंकों ने बुधवार को घोषणा की है कि आने वाले दशक में वे पर्यावरण अनुकूल परिवहन प्रणाली के लिए 175 अरब डॉलर का निवेश करेंगे। एशियाई विकास बैंक के अध्यक्ष हारूहिको कुरोडा ने बहुपक्षीय विकास बैंकों की ओर से रियो डी जेनेरियो में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि तेजी से हो रहे मशीनीकरण से भीड़-भाड़, वायु प्रदूषण, दुर्घटना और ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन बढ़ रहा है-खासकर विकासशील देशों में। विकासशील देशों को सीधे कम मशीनीकरण और अधिक ऊर्जा सक्षम परिवहन प्रणाली वाले पर्यावरण अनुकूल भविष्य में पहुंचने का अवसर मिला है। यह घोषणा एडीबी, विश्व बैंक और छह अन्य बहुपक्षीय विकास बैंकों ने पर्यावरण अनुकूल विकास (रियो+ 20) पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन की शुरुआत में की। यूएन-हेबिटेट के कार्यकारी निदेशक जॉन क्लोज ने कहा कि इससे हजारों जीवनों की रक्षा होगी क्योंकि इससे वायु स्वच्छ होगी, सड़क सुरक्षित होगी, सैकड़ों शहरों में भीड़ भाड़ घटेगी और नुकसानदेह जलवायु प्रदूषण में परिवहन का योगदान घटेगा। उन्होंने कहा, इससे अधिक सक्षम यात्री और ढुलाई परिवहन का विकास होगा और पर्यावरण अनुकूल शहरी आर्थिक विकास होगा।
रियो+20 के लिए ब्राजील पहुंचे मनमोहन
रियो डी जेनेरियो, आइएएनएस : प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी-20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के बाद रियो+20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए बुधवार को मेक्सिको से यहां पहुंचे। प्रधानमंत्री विश्व के शीर्ष नेताओं के साथ गरीबी घटाने, सामाजिक न्याय बढ़ाने एवं सतत तरीके से पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर रास्ते तलाशेंगे। आर्थिक विकास एवं पर्यावरण संकट की विरोधाभासी चुनौतियों के बीच तीन दिवसीय रियो+20 सम्मेलन बुधवार से ब्राजील के रियो डि जेनेरियो शहर में शुरू हो गया। गरीबी उन्मूलन के लक्ष्य को हासिल करने की जिद्दोजहद के बीच 193 देशों के प्रतिनिधि हरी-भरी धरती का रास्ता तलाशने की कोशिश करेंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुआई में भारतीय प्रतिनिधिमंडल सम्मेलन में हिस्सा ले रहा है। इस सम्मेलन में 100 से ज्यादा देशों के राष्ट्राध्यक्ष और 50,000 से अधिक सामाजिक कार्यकर्ता हिस्सा ले रहे हैं। सम्मेलन में ग्लोबल वार्मिग के खतरे से निपटने के लिए कार्बन उत्सर्जन में बाध्यकारी कटौती पर जोर दे रहे विकसित देशों के दबाव से विकासशील देश कैसे निपटेंगे, यह देखने वाली बात होगी। मेजबान देश होने के नाते ब्राजील का झुकाव भी इस बार विकसित देशों की ओर दिखाई दे रहा है। चर्चा के लिए तैयार 50 पेज के मसौदे द फ्यूचर वी वांट में पर्यावरण संकट, जैव विविधता पर छाया संकट, प्राकृतिक आपदाओं जैसी तमाम समस्याओं का जिक्र होगा। मनमोहन-ओलेंड मुलाकात में रफाल पर हुई बात लॉस कैबोस : जी-20 शिखर सम्मेलन में फ्रांस के नए राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलेंड एवं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 20 अरब डॉलर के रफाल लड़ाकू विमान सौदे पर बात की। लॉस कैबोस में प्रधानमंत्री के साथ मौजूद शीर्ष भारतीय अधिकारियों ने कहा कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने रफाल को चुनने पर प्रसन्नता जाहिर की। 20 अरब डॉलर के इस रक्षा सौदे को अब तक का सबसे बड़ा सौदा कहा जा रहा है। भारत ने फरवरी में रफाल को चुना था। ओलेंड ने प्रधानमंत्री से कहा कि उन्हें उम्मीद है कि रफाल की लागत के विषय में नई दिल्ली में जारी वार्ता जल्द ही पूरी हो जाएगी। रफाल फ्रांसीसी वायुसेना का प्रमुख लड़ाकू विमान है। निविदाओं में हारने के बाद भी अन्य कंपनियां सौदे को हासिल करने के लिए कई प्रकार के प्रस्ताव भारतीय रक्षा मंत्रालय को दे रही हैं। यह पूछने पर कि क्या फ्रांस के राष्ट्रपति ने इस विषय पर कोई चर्चा की तो अधिकारियों ने कुछ भी कहने से इन्कार कर दिया।
Wednesday, June 20, 2012
तालिबान की धमकी बच्चों को बना रही अपाहिज
पाकिस्तान के कबायली इलाके उत्तरी वजीरिस्तान में तालिबान केएक शक्तिशाली कमांडर द्वारा बच्चों को टीके लगाने पर लगाई गई पाबंदी के चलते पांच साल से कम उम्र के 16 हजार से अधिक बच्चों को पोलियो का टीका नहीं लगाया जा सकेगा। पाकिस्तानी मीडिया ने इस पर चिंता जाहिर की है। अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून के मुताबिक, उत्तरी वजीरिस्तान में हक्कानी नेटवर्क के कर्ताधर्ता हाफिज गुल बहादुर ने पिछले हफ्ते कहा था कि शूरा ने तब तक टीकाकरण अभियान पर पाबंदी का फैसला किया है जब तक क्षेत्र में अमेरिकी ड्रोन हमले जारी रहते हैं। आतंकियों ने दावा किया कि ये टीकाकरण अमेरिकी जासूसों के लिए ढाल का काम करते हैं। इस पाबंदी से पाकिस्तान में पोलियो उन्मूलन के प्रयासों पर गंभीर असर पड़ेगा। पाकिस्तान दुनिया के उन तीन देशों में शुमार है जहां अब भी पोलियो का प्रकोप व्याप्त है। पाकिस्तान में इस साल पोलियो के 22 नए मामले सामने आए हैं। मार्च में विश्र्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी थी कि अगर पाकिस्तान ने पोलियो के खिलाफ सख्त मुहिम नहीं चलाई गए तो उसके खिलाफ वीजा और यात्रा संबंधी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना है कि संघीय प्रशासित कबायली इलाके (एफएटीए) में पोलियो के अधिक मामले हैं क्योंकि यहां रास्ते दुर्गम हैं और कबायली जनता में टीकाकरण को लेकर भ्रम है। कबायली पट्टी में खैबर, बजौर, मोहमंद और कुर्रम एजेंसियों समेत अधिक जोखिम वाले इलाकों में सोमवार को तीन दिनी टीकाकरण अभियान शुरू हुआ। इसका लक्ष्य करीब आठ लाख बच्चों को पोलियो की खुराक देना है। एक स्वास्थ्य अधिकारी ने कहा कि अभियान के दौरान उत्तरी वजीरिस्तान को छोड़ दिया जाएगा। कबायली इलाकों के लिए टीकाकरण पर विस्तारित कार्यक्रम के उपनिदेशक शाहिबजादा खालिद ने कहा,हमने हाफिज गुल बहादुर की धमकी के चलते इसे हटा दिया है।
Tuesday, June 19, 2012
ग्रीस में न्यू डेमोक्रेसी पार्टी की जीत से दुनिया को राहत
ग्रीस में हुए संसदीय चुनाव में बेलआउट पैकेज समर्थक दक्षिणपंथी न्यू डेमोक्रेसी पार्टी की जीत से वैश्विक आर्थिक संकट के और गहराने का खतरा फिलहाल टलता दिखाई दे रहा है। ग्रीस चुनाव पर दुनियाभर की नजरें गढ़ी थीं, क्योंकि अगर यहां वामपंथी सत्ता में आ जाते तो इस देश का यूरोजोन से बाहर जाना तय था। यदि ऐसा होता तो यूरोजोन में आर्थिक संकट और गहरा जाता, जिसका बुरा प्रभाव भारत समेत दुनिया भर के देशों पर पड़ता। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ग्रीस चुनाव से पहले ही चेता दिया था कि अगर ग्रीस में बेल आउट समर्थक पार्टी नहीं जीती तो इसका असर भारत पर भी पड़ेगा। पिछले कुछ महीनों से चल रहे ग्रीस संकट की वजह से डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत घटी है। इससे भारतीय कारोबारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसी प्रकार से जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल और फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलेंड ने भी चिंता जाहिर की थी। बहरहाल, ताजा परिणामों से फौरी राहत मिल गई है और अब सभी को ग्रीस में नई सरकार गठित होने का इंतजार है। ग्रीस में रविवार को हुए संसदीय चुनाव में 129 सीटें जीतकर न्यू डेमोक्रेसी सबसे बड़े दल के रूप में उभरा है। हालांकि, आशंका के मुताबिक ग्रीसवासियों ने खंडित जनादेश ही दिया है, लेकिन न्यू डेमोक्रेसी पार्टी का दावा है कि इस बार वह सरकार गठित कर लेगी। ग्रीस में सरकार बनाने के लिए 151 सीटों की जरूरत है। ध्यान रहे कि ग्रीस में छह सप्ताह के भीतर दूसरी बार आम चुनाव हुए हैं। इससे पहले छह मई को आम चुनाव हुए थे, जिसमें न्यू डेमोक्रेसी सबसे बड़ा दल तो था, लेकिन उसे केवल 108 सीटें मिल सकी थीं। इस बार उसे 21 सीटें ज्यादा मिली हैं, ऐसे में पूरी उम्मीद है कि न्यू डेमोक्रेसी पार्टी सरकार बनाने में सफल रहेगी। पार्टी के नेता एंडोनिस समारास ने सोमवार को दूसरे नंबर पर रहे वामपंथी दल सिरीजा के प्रमुख एलेक्सिस सिप्रास से वार्ता शुरू कर दी है। वह अन्य छोटे दलों से भी बात कर रहे हैं, क्योंकि सिप्रास ने कह दिया है कि वह गठबंधन सरकार का हिस्सा नहीं बनेंगे। सिरीजा पार्टी बेलआउट पैकेज के लिए रखी गई शर्तो के खिलाफ है। मई में दोनों प्रमुख दलों के बीच इसी बात को लेकर विवाद था, जिसकी वजह से गठबंधन सरकार नहीं बन पाई थी। यूरोजोन समूह के वित्त मंत्रियों के प्रमुख ज्यां क्लॉड ने कहा कि आर्थिक सुधार ही ग्रीस की मुश्किलों का हल है। यूरोपीय संघ ने ग्रीस के वोटरों की हिम्मत की दाद दी है। ध्यान रहे कि ग्रीस को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और यूरोपीय संघ से 138 अरब डॉलर (75.9 खरब रुपये) और 130 अरब यूरो (91 खरब रुपये) के दो बेलआउट पैकेज मिल चुके हैं। कर्ज में डूबे ग्रीस की अर्थव्यवस्था इसी पर निर्भर है, लेकिन राजनीतिक सहमति नहीं बन पाने के कारण ग्रीस ने अभी तक बेलआउट पैकेज की शर्ते स्वीकार नहीं की हैं। ग्रीस अगर ऐसा नहीं करता तो उसे यूरोजोन से जाना होगा। हालांकि, अब इसकी संभावना कम है, क्योंकि हाल में जीतने वाली न्यू डेमोक्रेसी पार्टी बेलआउट पैकेज की शर्ते लागू करने और यूरोजोन में बने रहने का समर्थन करती है। फ्रांस के संसदीय चुनावों में सोशलिस्ट पार्टी की जीत पेरिस : फ्रांस के संसदीय चुनावों में सोशलिस्ट पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज की है। पार्टी ने 577 सीटों वाली नेशनल असेंबली में 300 से ज्यादा सीटें जीत ली हैं। हालांकि, अभी तक परिणामों की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन सोशलिस्ट पार्टी को 312 से 326 सीटें मिलना लगभग तय है। फ्रांस में रविवार को संसदीय चुनाव के लिए दूसरे दौर का मतदान हुआ था। राजनीतिक विश्लेषकों की राय में यह चुनाव परिणाम फ्रांस की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को संवारने में सहायक साबित होंगे। संसद में बहुमत मिलने से देश के नए राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलेंड के हाथ मजबूत हुए हैं। अब उन्हें आर्थिक सुधारों के लिए विपक्ष का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा। संसदीय चुनाव में पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी की पार्टी यूएमपी को 212 से 234 सीटें मिलने का अनुमान है। फ्रांस में 17 साल बाद सोशलिस्ट पार्टी की लहर दिख रही है। ध्यान रहे कि फ्रांसुआ ओलेंड की पार्टी की संसदीय चुनाव में जीत से यूरोजोन के उस आर्थिक समझौते पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जिसे पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी और जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने तैयार किया था। ओलेंड इस समझौते धुर विरोधी हैं। हाल ही में उन्होंने यूरोजोन के देशों को एक नया आर्थिक प्रस्ताव भी भेजा है। देखना यह होगा कि ओलेंड के प्रस्ताव पर यूरोजोन के बाकी देश कैसी प्रतिक्रिया देंगे।
परमाणु करार के क्रियान्वयन पर आगे बढ़े भारत-अमेरिका
अमेरिका और भारत ने असैन्य परमाणु करार के क्रियान्वयन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ा दिया है। वेस्टिंगहाउस इलेक्टि्रक कार्पोरेशन व न्यूक्लियर पावर कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआइएल) ने सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत गुजरत में परमाणु संयंत्र निर्माण के लिए प्रारंभिक स्तर पर कार्य किया जाएगा। अमेरिका-भारत रणनीतिक वार्ता की शुरुआत के मौके पर विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने कहा कि इस समझौते से 2008 में हुए अमेरिका-भारत परमाणु करार के क्रियान्वयन को लेकर लगाई जा रही अटकलों पर विराम लग गया है। कृष्णा ने कहा, मुझे खुशी है कि दोनों देशों के बीच परमाणु व्यापार की शुरुआत हो रही है। हमें उम्मीद है कि अमेरिका और भारत की कंपनियां मिलकर जल्द ही परमाणु संयंत्र का निर्माण कार्य शुरू कर देंगी। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के साथ संयुक्त वार्ता में कृष्णा ने बताया कि रणनीतिक वार्ता से पहले दोनों देशों की कंपनियों ने सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए। इस प्रारंभिक समझौते के तहत गुजरात के भावनगर जिले में मिथिविर्दी में परमाणु संयंत्र के लिए प्रारंभिक स्तर पर लाइसेंस देने और साइट के निर्माण का कार्य किया जाना है। इसकी क्षमता एक हजार मेगावाट होगी। दूसरी ओर हिलेरी क्लिंटन ने कहा, हमें पूरी उम्मीद है कि गुजरात में बनने वाला यह संयंत्र भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मददगार साबित होगा। मुझे आशा है कि भविष्य में और समझौते होंगे, जिनके जरिए अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्टि्रक भी कार्य शुरू कर सकेगी। हिलेरी ने कहा कि दोनों देशों को परमाणु करार के पूर्ण क्रियान्वयन के लिए अब भी बहुत कार्य करना है। ध्यान रहे कि भारत में प्रस्तावित क्षतिपूर्ति विधेयक पर अमेरिकी कंपनियों को सख्त ऐतराज है। यह विधेयक परमाणु दुर्घटना की स्थिति में कंपनियों की जिम्मेदारी तय करता है। इस विधेयक की वजह से न केवल अमेरिकी बल्कि रूस और फ्रांस समेत कई देशों की कंपनियां भारत से कतरा रही हैं। अमेरिका समझता है भारत की ऊर्जा जरूरतें : विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने कहा भारत की तेल जरूरतों के लिए ईरान पर निर्भर है। अमेरिका इस बात को अच्छी तरह जानता है और वह इसे समझता भी है। कृष्णा का यह बयान अमेरिका की ओर से भारत को ईरान के साथ तेल व्यापार की छूट के बाद आया है। उन्होंने कहा कि ईरान से तेल आयात में कुछ कमी आई है, इसकी पूर्ति के लिए हम सऊदी अरब व अन्य देशों से बात कर रहे हैं। इस पर हिलेरी ने कहा कि हम भारत की जरूरतों को समझते हैं। भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अन्य अमेरिका अन्य स्रोतों पर भी काम कर रहा है। हाफिज सईद को आजाद नहीं देख सकता भारत : अमेरिका के साथ रणनीतिक वार्ता में विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद का मामला भी जोरदार ढंग से उठाया। उन्होंने हिलेरी से कहा, दोनों देशों के बीच शांति प्रयास जारी हैं, लेकिन पाकिस्तान को आतंकियों पर नकेल कसनी होगी। कृष्णा ने कहा कि सईद अब भी पाकिस्तान में आजाद घूम रहा है और खुलकर भारत विरोधी गतिविधियां चला रहा है। कृष्णा अगले महीने पाकिस्तान की यात्रा पर जाने वाले हैं। बैठक के दौरान हिलेरी क्लिंटन ने शांति प्रयासों के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और युसूफ रजा गिलानी की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि अमेरिका इस बात से खुश है कि भारत-पाक निवेश और व्यापार बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। हिलेरी के लिए भारत संग रिश्ता दिल का मामला : विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के लिए भारत-अमेरिका संबंध दिल का मामला है। उन्होंने रणनीतिक वार्ता के तीसरे दौर की समाप्ति पर विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा, दिल के मामलों में एक-दूसरे के प्रति सम्मान के साथ आमतौर पर उतार-चढ़ाव होते रहते हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या इन उतार-चढ़ावों से दोनों देशों के संबंध प्रभावित होंगे तो क्लिंटन ने कहा, इससे दोनों के संबंध कम हार्दिक नहीं हो जाते और न ही उनकी प्रतिबद्धता कम होती है। उन्होंने कहा, मैं आज भी दोनों देशों के संबंधों में उतनी ही मजबूती महसूस करती हूं, जितनी दो साल पहले करती थी। क्लिंटन ने कहा, मैं हमारे रिश्ते के प्रति बहुत सकारात्मक हूं और हम मतभेदों के बावजूद साथ काम करना जारी रखेंगे। अमेरिका के साथ रक्षा तकनीक सहयोग बढ़ाएगा भारत : भारत-अमेरिका के बीच रणनीतिक वार्ता में रक्षा क्षेत्र संबंधी कई अहम मसलों पर दोनों देशों के बीच सहमति बनी है। विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने कहा कि रक्षा तकनीक के हस्तांतरण, विकास और उत्पादन में भारत-अमेरिका साथ मिलकर काम करेंगे। अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, दोनों देश रक्षा उत्पाद सौदों, बिक्री, रिसर्च, उत्पादन और विकास को बढ़ाएंगे। पिछले एक दशक में भारत ने अमेरिका से नौ अरब डॉलर के रक्षा सौदे किए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अनुसार फिलहाल 10 अरब डॉलर के सौदों पर विचार चल रहा है। अगर ये सौदे होते हैं तो अमेरिका में कई नौकरियों का सृजन होगा। गुरुवार को वार्ता से पहले हिलेरी ने कहा था कि दोनों देशों की सेनाएं नियमित रूप से मिलकर अभ्यास कर रही हैं। समुद्री डाकुओं और समुद्र में शांति बनाए रखने के लिए भी साथ मिलकर काम किए जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि रक्षा सौदों को और बढ़ाया जाए। उन्होंने कहा कि हम साइबर सिक्योरिटी जैसे मसलों पर सहयोग बढ़ाने पर भी विचार विमर्श कर रहे हैं। कृष्णा ने बताया कि द्वितीय विश्व के दौरान भारत के पूर्वोत्तर इलाकों में मारे गए अमेरिकी सैनिकों के शव खोजने में भी मदद करने पर सहमति बनी है। हेडली और राणा से दोबारा पूछताछ करना चाहता है भारत : भारत ने लश्कर आतंकी डेविड कोलमैन हेडली उर्फ दाऊद गिलानी और उसके सहयोगी तहव्वुर हुसैन राणा से दोबारा पूछताछ करने के लिए पहुंच मुहैया कराने का आग्रह किया है। पाक मूल के दोनों आतंकी फिलहाल अमेरिका की जेल में बंद हैं। भारत के विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने वाशिंगटन से 26 नवंबर, 2008 को हुए मुंबई हमलों के षडयंत्रकारियों को न्याय के दायरे में लाने में मदद करने को कहा है। कृष्णा ने अपनी अमेरिकी समकक्ष हिलेरी क्लिंटन के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा,मुंबई हमलों की जांच के लिए हमारी कानूनी प्रक्रिया के मुताबिक भारत हेडली और राणा से दोबारा पूछताछ करना चाहता है। जून, 2010 में चार सदस्यीय भारतीय अधिकारियों ने इन दोनों आतंकियों से पूछताछ की थी। पाकिस्तानी मूल का अमेरिकी आतंकी हेडली मुंबई हमलों में अपनी भूमिका स्वीकार चुका है।
Friday, June 1, 2012
चीन से व्यापार का नया मंच
विश्व के बहुत कम हिस्सों में इतनी आर्थिक विविधता है जितनी दक्षिण एशिया में। मानव और प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद यह क्षेत्र संपर्क, शासन और सकारात्मक राजनीतिक नेतृत्व की भारी कमी से जूझ रहा है। यह क्षेत्र आर्थिक वैश्वीकरण का लाभ उठाने में भी पिछड़ गया है। दक्षिण एशियाई देशों का आपस में व्यापार उस रफ्तार से नहीं बढ़ रहा है, जिस गति से शेष विश्व के साथ व्यापार बढ़ा है। इस क्षेत्र के सभी देशों के कुल व्यापार के अनुपात में अंतर-क्षेत्रीय व्यापार की दर कम है। इससे पता चलता है कि दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा) जैसे क्षेत्रीय व्यापार संगठन अंतर क्षेत्रीय व्यापार बढ़ाने में विफल रहे हैं। साफ्टा क्षेत्र में जारी व्यापार दरों को नीचे लाने में उतना प्रभावी सिद्ध नहीं हुआ जितनी उससे आशा की जा रही थी। अपनी जीडीपी की तुलना में क्षेत्र का विदेश व्यापार विश्व के अन्य क्षेत्रों की तुलना में काफी कम है। यद्यपि यह अनुपात पिछले दो दशकों में कुछ सुधरा है। इस सुधार के पीछे एक प्रमुख कारण है गैर-क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार में बढ़ोतरी। खासतौर पर दक्षिण एशिया का चीन के साथ व्यापार तेजी से बढ़ा है। पिछले दशक में चीन के साथ क्षेत्र का व्यापार 5.7 अरब डॉलर से बढ़कर 80.5 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। इस वृद्धि के बावजूद दक्षिण एशिया अब भी चीन के लिए छोटा व्यापार साझेदार है। दक्षिण एशिया के लिए चीन एक प्रमुख व्यापार इकाई के रूप में उभरा है, किंतु चीन के लिए यह क्षेत्र प्रमुख बाजार नहीं बन पाया है। दक्षिण एशिया में चीन का व्यापार एशिया-प्रशांत क्षेत्र में इसके व्यापार का महज पांच फीसदी ही है। वास्तव में, चीन के लिए दक्षिण एशिया से बड़े व्यापारिक साझेदार तो पश्चिम एशिया और अफ्रीका हैं। फिर भी जिस तेजी के साथ दक्षिण एशिया में चीन का व्यापार बढ़ रहा है उससे यह संभावना बलवती हो रही है कि यह इस क्षेत्र के व्यापार ढांचे में अपनी औपचारिक उपस्थिति को संस्थागत रूप देना चाहेगा। खासतौर पर यह विचार इस संभावना से पैदा हुआ है कि निकट भविष्य में चीन साफ्टा का सदस्य बनने जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चीन के सार्क आर्थिक संरचना में औपचारिक प्रवेश से दक्षिण एशिया में विकास की गति जोर पकड़ेगी। दक्षिण एशिया के व्यापार और आर्थिक ढांचे में चीन के औपचारिक प्रवेश पर किसी भी चर्चा में हमें इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि चीन पहले ही एक ऐसे बहुपक्षीय व्यापार ढांचे का सदस्य है जिसमें दक्षिण एशियाई क्षेत्र से बहुत कम देश शामिल हैं। यह संगठन है एशिया-प्रशांत व्यापार समझौता (आप्टा)। इसे पहले बैंकाक समझौते के नाम से जाना जाता था। इसमें भारत, बांग्लादेश, लाओस, कोरिया गणतंत्र और श्रीलंका ने 1975 में प्रवेश किया था। चीन ने इस संगठन में 2001 में कदम रखा था। आप्टा अपने सभी सदस्यों को सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र का दर्जा देता है। इस प्रकार चीन पहले ही दक्षिण एशिया में औपचारिक स्थान हासिल किए हुए है। चीन पहले ही पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता कर चुका है। मालदीव के साथ इसकी शून्य शुल्क संधि है। दक्षिण एशियाई व्यापार में चीन की औपचारिक उपस्थिति को देखते हुए सवाल उठता है कि साफ्टा जैसे संगठन में चीन के प्रवेश के बाद क्या दोनों पक्षों में से किसी की व्यापार संभावनाएं बढ़ने की संभावना है? यह ठीक है कि पिछले दशक में दक्षिण एशियाई देशों के साथ चीन के व्यापार में तीव्र वृद्धि हुई है, लेकिन इसका मुख्य कारण भारत के साथ चीन के व्यापार में बढ़ोतरी है। 2000 में भारत के साथ चीन का व्यापार महज 2.9 अरब डॉलर था, जो दक्षिण एशियाई देशों के साथ उसके कुल व्यापार का 51 फीसदी था। 2010 में चीन का भारत के साथ व्यापार 61.7 अरब डॉलर हो गया है, जो दक्षिण एशिया के साथ उसके कुल व्यापार का 78 फीसदी है। इस बीच पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका के साथ चीन के व्यापार में तो उलटे गिरावट देखने को मिली। इससे स्पष्ट है कि दक्षिण एशिया की चीन के साथ व्यापक व्यापार भागीदारी में क्षेत्र के सभी देशों की समान भागीदारी नहीं रही है। दक्षिण एशिया के साथ चीन के व्यापार में भारत-चीन व्यापार की प्रमुख भूमिका को देखते हुए इस बिंदु पर विचार करना उचित है कि क्या दक्षिण एशियाई व्यापार ढांचे में चीन का औपचारिक प्रवेश क्षेत्र की आर्थिक संभावनाओं में बड़े मतभेदों का कारण बनेगा? चीन के साफ्टा में शामिल होने से भारत के साथ इसका व्यापार बढ़ने की अधिक संभावनाएं नहीं हैं। इस क्षेत्र की अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर भी इस कदम का मामूली असर ही पड़ेगा, क्योंकि बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान के पहले ही चीन के साथ व्यापारिक रिश्ते मजबूत हैं। इसके विपरीत साफ्टा में चीन के प्रवेश से आप्टा और एफटीए के तहत पाकिस्तान तथा कुछ अन्य देशों को मिल रही सुविधाओं में विरोधाभास और भ्रम की स्थिति खड़ी हो सकती है। यह ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि साफ्टा में शामिल होने से दक्षिण एशिया की कीमत पर चीन को लाभ हो सकता है। दक्षिण एशियाई देशों के साथ चीन का पहले ही निर्यात असंतुलित है। चीन के साफ्टा में शामिल होने से व्यापार असंतुलन और बढ़ सकता है। इसके अलावा साफ्टा में शामिल होने से चीन दक्षिण एशियाई देशों से सस्ते आयात का लाभ उठा सकेगा। चीन के साफ्टा में प्रवेश के पक्ष में यही सबसे मजबूत दलील है। (लेखक नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में सीनियर रिसर्च फेलो हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
नेपाल का संकट हमारा भी संकट
हमारा पड़ोसी और आम भारतीयों की नजर में सर्वाधिक अपनत्व का बोध कराने वाला नेपाल फिर राजनीतिक संकट के दौर में प्रवेश कर गया है। करीब छह सालों में माओवादियों के साथ शांति समझौते से लेकर, मधेश का जन विद्रोह, जनजातियों का विद्रोह, आम चुनाव, संविधान सभा सह संसद का गठन, राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के चुनाव से लेकर संविधान निर्माण और मिलीजुली सरकार चलाने की कोशिशों का कोई एक नतीजा इस समय सामने है तो बिना संविधान एवं मान्य सरकार के नेपाल। इसका यदि यह निष्कर्ष निकलता है कि इन सालों में नेपाल को लोकतंत्र की पटरी पर लाने की तमाम कोशिशें विफल हो गईं तो उसे गलत नहीं कह सकते हैं। माओवादी बाबूराम भट्टाराई प्रधानमंत्री के पद पर विराजमान हैं और कल तक उनकी सरकार की साथी पार्टियां व नेता उन्हें हटाने के लिए राष्ट्रपति से गुहार लगाते हुए सड़कों पर उतर रहे हैं। भट्टाराई ने मंत्रिमंडल की बैठक के बाद चुनाव की तिथि घोषित की, जबकि इनका तर्क है कि समर्थन देने वाली पार्टियों के मंत्रियों के बैठक से हटने के बाद उनका बहुमत नहीं रहा, इसलिए उनकी घोषणा असंवैधानिक है। ऐसे राजनीतिक माहौल में कल्पना की जा सकती है कि ये भविष्य में नेपाल को कोई सर्वसम्मत संविधान दे सकेंगे ताकि देश लोकतंत्र की राह पर अग्रसर हो सके? हम हमेशा ध्यान रखें कि नेपाल का संकट उसका अपना ही नहीं बल्कि भारत का भी संकट है। उसके साथ हमारी ऐसी सुरक्षा और परागमन संधि है जो दुनिया के लिए अनूठी है। वहां नेताओं और सक्रिय नागरिकों के एक वर्ग द्वारा भारत के खिलाफ सार्वजनिक विष वमन के बावजूद वे ऐसे समय सीधे भारत की ओर देखते हैं क्योंकि नेपाल की राजनीति को दिशा देने की
क्षमता भारत में हमेशा रही है और सम्पूर्ण परिस्थितियों के मद्देनजर यह भारत का दायित्त्व भी है। इसलिए आज यदि नेपाल फिर गंभीर संकट में है तो भारत इसकी जिम्मेवारी से बच नहीं सकता। पिछले कम से कम चार सालों से जिस तरह चीन वहां अति सक्रिय हुआ है उसके बाद तो भारत की कूटनीति ज्यादा तीव्र और सघन होनी चाहिए थी। जाहिर है, ऐसा नहीं हुआ है। स्थिति काफी विकट है। नेपाल के अंतरिम संविधान में संविधान सभा के लिए नए चुनाव का कोई प्रावधान ही नहीं है। दूसरे, कोई निर्वाचित इकाई न होने के कारण निर्वाचन के नियम और कानून का निर्माण कैसे होगा, यह भी स्पष्ट नहीं है। ऐसे में इस देश को अगर किसी एक बात की सबसे ज्यादा जरूरत है तो वह है, राजनीतिक दलों के बीच आपसी सहमति। लेकिन इनके बीच किसी एक बात पर सहमति है तो वह है सतत असहमत रहना। गैर माओवादी पार्टियों का भट्टाराई पर आरोप है कि उन्होंने संविधान सभा
को अंतरिम संसद के रूप में बनाए रखने यानी उसकी अवधि विस्तार की मांग अनसुनी कर दी, जिससे यह संकट पैदा हुआ है। इनके अनुसार एक सामान्य संशोधन द्वारा ऐसा किया जा सकता था और फिर चुनाव के लिए कानूनी और संवैधानिक आधार तैयार कर लिया जाता। वस्तुत: उच्चतम न्यायालय ने 27 मई के बाद संविधान सभा की अवधि विस्तार की अपील ठुकरा दी थी। जाहिर है, 27 मई की 12
बजे रात्रि तक संविधान निर्माण न होने के बाद इसका भंग होना निश्चित था, पर न्यायालय ने संसद के बारे में कुछ नहीं कहा था। भट्टाराई ने ऐसा क्यों नहीं किया, यह स्पष्ट नहीं है, पर विपक्ष का आरोप है कि उन्होंने अपने हाथ में सत्ता बनाए रखने के लिए ऐसा किया। बहरहाल, क्योंकि पांच प्रमुख पार्टियां राष्ट्रपति रामवरण यादव से प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने की लिखित मांग कर चुकी हैं इसलिए उनके द्वारा कार्रवाई अपरिहार्य लगती
है। हालांकि राष्ट्रपति अंतरिम संविधान के अनुसार नाममात्र के प्रधान हैं, पर उन्हें कुछ आपातकालीन अधिकार हैं। अगर वे विपक्षी दलों की मांग के अनुरूप कदम उठाते हैं तो भट्टाराई के लिए मुश्किल होगी। भय है कि कहीं नया सत्ता संघर्ष न आरंभ हो जाए। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-एमाले, नेपाली कांग्रेस, चारों प्रमुख मधेशी पार्टियों व अन्य छोटी पार्टियों को इस समय भट्टाराई के विरुद्ध एकजुट देखकर गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि ये आगे भी एक रहेंगी। यह केवल प्रधानमंत्री को हटाने के लिए विरोधियों की तात्कालिक एकजुटता है। अगर इनके बीच एकता होती तो नेपाल को न केवल लिखित संविधान मिल चुका होता बल्कि देश का राजनीतिक ढांचा खड़ा हो गया होता, राज्यों का गठन हो चुका होता तथा नए संविधान के तहत निर्वाचित सरकार केन्द्र व राज्यों में कार्य कर रही होती। तो नेताओं की अनेकता नेपाल के इस संकट की मुख्य बाधा है। 10 अप्रैल 2008 को निर्वाचन के बाद अस्तित्व में आई संविधान सभा ने 28 अगस्त से काम आरंभ किया और पहले ही दिन देश से राजशाही के अंत का प्रस्ताव पारित कर नेपाल को लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया। उस दिन संविधान सभा में दिखी एकता कभी दोबारा परिलक्षित नहीं हुई। हालांकि निर्वाचन के बावजूद 601 सदस्यीय संविधान सभा सह संसद में 24 दलों के प्रतिनिधित्व ने सरकार गठन में बाधाएं पैदा कीं एवं चार महीने बाद 15 अगस्त 2008 को माओवादी प्रमुख पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड के नेतृत्व में मिलीजुली सरकार गठित हुई। ऐसे ऐतिहासिक अवसर पर इतनी अनेकता से संकेत मिल गया था कि आगे की डगर कठिन है और सबने देखा है कि किस तरह वहां शीर्ष राजनीति में सरकार गिराने, बनाने, सरकार को काम न करने देने का खेल चलता रहा है। चार वर्ष से कम समय में चार सरकारें गिरीं और चार प्रधानमंत्री बने। एमाले के माधव कुमार नेपाल तो बहुमत खोने के बाद कई महीनों तक इसलिए प्रधानमंत्री बने रहे, क्योंकि किसी नई सरकार का गठन ही संभव नहीं हो रहा था। हालांकि कुछ तो परिस्थितियां बाधा बनतीं रहीं जिनसे निपटने का अनुभव नेताओं को नहीं था, लोकतांत्रिक आचरण के अनुभव का भी अभाव था, लेकिन अगर नेताओं का इरादा नेक और ईमानदार होता तो परिस्थितियां और अनुभवहीनता कमजोर पड़ जाती। यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि उम्मीद के साथ अस्तित्व में आई संविधान सभा की अविध केवल दो साल की थी और उसे 28 अगस्त 2010 तक संविधान निर्माण का कार्य पूरा करके स्वयं को विघटित कर देना था, किंतु उच्चतम न्यायालय द्वारा बार- बार अवधि बढ़ाए जाने के बावजूद नेतागण सत्ता के राजनीतिक घात-प्रतिघात में तो लगे रहे, लेकिन ऐसे संविधान निर्माण के लिए मेहनत नहीं की गई जिसमें सभी क्षेत्र व जातीय समूहों की भावनाओं की अभिव्यक्ति हो। आज चारों ओर केवल नाउम्मीदी है। नेपाल का बहुमत मानने लगा है कि नेताओं का संविधान निर्माण से लेनादेना है ही नहीं, उन्हें केवल सत्ता चाहिए। संसदीय लोकतंत्र की ओर उम्मीद के साथ कदम बढ़ाने को आतुर देश के लिए यह सामान्य धक्का नहीं है। लेकिन केवल परिस्थितियों और नेपाली नेताओं को खलनायक साबित करने से पूरा सच सामने नहीं आएगा। प्रश्न है कि ऐसे में भारत कहां था? चीन की गतिविधियां वहां तीव्र थीं और उसकी अभिरुचि संविधान बनने देने में नहीं थी। इसके समानांतर भारत के प्रतिनिधि नेताओं से तो मिलते थे, पर चार वर्षों में संविधान के विवादास्पद मुद्दों पर मधेशियों, जनजातीय समूहों के नेताओं के साथ तीनों मुख्य दलों के नेताओं के बीच सहमति कराने की पुरजोर पहल नजर नहीं आई। जनता द्वारा निर्वाचित राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री के हाथोें में कार्यकारी शक्तियां रहें, इसके उत्तर में भारत का सहयोग निर्णायक होता और मधेशियों व जनजातीय समूहों द्वारा संघीय ढांचा तथा पहचान पर आधारित राज्यों के निर्माण के सबसे जटिल और झगड़ालू प्रश्न पर भी। परंतु संविधान सभा इन्हीं दो प्रश्नों में उलझ कर रह गई। ऐसी स्थिति में तीनों राजनीतिक दलों में तालमेल बिठाने की भूमिका भारत शालीन तरीके से निभा सकता था। नेपाल के गंभीर संकट में फंसने के बावजूद लगता है जैसे भारत केवल आगे की घटनाओं की प्रतीक्षा कर रहा है। यह आत्मघाती नीति है।
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