Friday, December 2, 2011

अपनी उलझनें सुलझा रहा मिस्र


इस बार मिस्र के तहरीर चौक पर जो बगावत के दृश्य दुनिया ने दुबारा देखे तो लगने लगा था कि वहां 28 नवम्बर को होनेवाले संसदीय चुनाव स्थगित हो जाएंगे। तहरीक चौक पर इस बार हुए प्रदर्शनों में 42 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। यह खूंरेजी उसी फौज ने की, जिसने जनवरी-फरवरी में मुबारकिवरोधियों पर गोलियां चलाने से मना कर दिया था। आश्चर्य है कि इसी फौज की देखरेख में 28 नव. को मिस्र के ऐतिहासिक चुनाव का पहला दौर सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया। पहले दौर के 17 लाख मतदाताओं में से लगभग 80 प्रतिशत ने मतदान किया। हत्या, मारपीट और धांधली के भी कोई समाचार नहीं आए। 50 पार्टियों के हजारों उम्मीदवारों ने अपनी कि़स्मत आजमाई। चुनाव-प्रचार भी खुलकर हुआ। फौज के खिलाफ भी लोग डटकर बोले। ऐसा लोकतांत्रिक चुनाव मिस्र में हुस्नी मुबारक के तीस सालों के शासन काल में भी नहीं हुआ। चुनाव के दो चरण अभी शेष हैं। 498 सदस्यों वाली इस संसद का चुनाव 13 जनवरी को सम्पन्न होगा। 29 जनवरी को सीनेट का चुनाव है और जुलाई में राष्ट्रपति का चुनाव होना है। इन चुनावों के परिणामों के बारे में यों सभी तरह के पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि इखवानुल-मुसलमीनयानी इस्लामी बंधुत्व पार्टी की विजय होगी। अगर उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो भी वही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। फौज को अपना तम्बू समेटना होगा। परंतु इस्लामी पार्टी समेत अन्य राजनीतिक दल मिस्र में लोकतंत्र कायम कर पाएंगे या नहीं, यह अब भी संदेह का विषय बना हुआ है। फौज आसानी से सिंहासन खाली करनेवाली नहीं है। आज भी मिस्र की सम्पूर्ण सत्ता जनरल तंतावी के हाथों में हैं, जो कभी हुस्नी मुबारक के रक्षा मंत्री रह चुके हैं। हजारों नौजवानों द्वारा तहरीर चौक को फिर से घेरने का कारण यही फौजी शिंकजा रहा है। मिस्र के नागरिकों को शिकायत थी कि मुबारक को गए 10 माह हो गए हैं लेकिन मिस्र में कुछ बदलाव नहीं आया है। महंगाई और बेरोजगारी तो लोगों की कमर तोड़ ही रही है, फौजियों ने नागरिकों को पकड़- पकड़कर अपनी अदालतों में भी खड़ा कर दिया है। वे उन्हें अंधाधुंध सजाएं दे रहे हैं जबकि उनकी अपनी अय्याशी में कोई कमी नहीं आई है। सारी सत्ता का उपभोग अब वे बेखटके कर रहे हैं और निरंकुश हो गए हैं। माना जा सकता है कि वे संसद का चुनाव जरूर करवा रहे हैं लेकिन जब तक फौज सत्ता में है, वह इस संसद को गूंगी-बहरी बनाकर रखेगी। फौज पर संसद की कोई लगाम नहीं होगी। असली सत्ता जुलाई तक राष्ट्राध्यक्ष जनरल तंतावी के पास ही रहेगी। नए राष्ट्रपति के चुनाव के बाद ही पता चलेगा कि कितनी शक्तियां किसके पास रहेंगी और मिस्र में सच्चा लोकतंत्र आएगा भी या नहीं? तहरीर चौक पर दूसरी बगावत का कारण यही था। ट्यूनीशिया और मोरक्को में हुए चुनावों से यह स्पष्ट हो गया कि अरब जगत में अब लोकतंत्र की लहर को कोई रोक नहीं सकता। फौज, तानाशाहों और बादशाहों के दिन अब लदते जा रहे हैं। लीबिया, सीरिया और यमन की घटनाएं इसके प्रमाण हैं। लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी को हटाने के लिए नाटो राष्ट्रों को फौजी कार्रवाई करनी पड़ी लेकिन अन्य राष्ट्रों में वे उलझने से बाज आएंगे। वे राष्ट्र अपने भ्रष्ट तानाशाहों को खुद उखाड़ फेकेंगे। अब सवाल यही है कि उनके हटने के बाद सत्ता किनके हाथों में आएगी? जरूरी नहीं कि जो बगावत का नेतृत्व करेंगे, वही सत्तारूढ़ होंगे। यह भी हो सकता है कि आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष, पश्चिमाभिमुख भ्रदलोक के बजाय सत्ता उन लोगों के हाथ में आ जाए जो धर्मप्रेमी हैं, इस्लाम समर्थक हैं, पारम्पारिक हैं, दबे-पिसे लोगों के साथ जुड़े हुए हैं। इससे चिंतित होने की बात ही क्या है? यदि आप सचमुच में लोकतंत्र में विास करते हैं तो सत्ता उन्हीं के हाथों में जाने दीजिए, जिन पर जनता का विास है। हमारे सामने तीन स्पष्ट उदाहरण हैं। पहला ईरान का, दूसरा तुर्की का और तीसरा अफगानिस्तान का! 1978 में जब ईरान के शाहंशाह का पतन हुआ तो वहां सत्ता में कौन आया? इमाम रूहेल्ला खुमैनी के लोग! और वे आज तक सत्तारूढ़ हैं। वे पक्के इस्लामवादी हैं लेकिन लोकतांत्रिक भी हैं। ईरान में बराबर चुनाव होते हैं और लोगों को स्वतंत्रता का अधिकार भी काफी हद तक मिला है। इसी प्रकार तुर्की में लगभग एक दशक से रिसेप इरदोगन की न्याय और विकास पार्टीने उस ढांचे को काफी हद तक बदल दिया है, जो कमाल पाशा के जमाने से चला आ रहा था। अब तुर्की में न फौज का वर्चस्व है और न धर्म-निरपेक्ष तत्वों का! वहां इस्लामी तत्वों का ही वर्चस्व है। इरदोगन की पार्टी अपने को इस्लाम का उद्घोषक नहीं कहती है लेकिन मानती है कि राजकाज में इस्लाम की उपेक्षा नहीं की जा सकती। वह बहुदलीय लोकतंत्र और आर्थिक प्रगति पर भी पूरा जोर देती है। उसने अमेरिका और यूरोप के ईसाई राष्ट्रों से भी मधुर संबंध बना रखे हैं। अफगानिस्तान में भी आजकल जिनका राज है, वे कौन लोग हैं? इनका मूल नाम मुजाहिदीनथा यानी जेहाद करनेवाले। क्या अफगानिस्तान में लोकतंत्र नहीं है? स्वातंत्रता नहीं है? आधुनिकता नहीं है? वहां आज सब कुछ है। यदि मिस्र में भी जनवरी और जुलाई के बाद फौज को हटाकर इस्लामी तत्वों की प्रधानता हो जाती है तो उसका असर सारे अरब जगत पर पड़ेगा। ईरान और तुर्की अपनी जगह हैं लेकिन अरब जगत में मिस्र की जगह कौन ले सकता है? मिस्र ही तय करेगा कि इस्रइल-अरब संबंध कैसे होंगे? आठ करोड़ लोगों का यह प्राचीन राष्ट्र अरब देशों के लिए भी स्वस्थ उदाहरण उपस्थित करेगा। यह ठीक है कि अब से 50-60 साल पहले इखवानके लोग हिंसा और सशस्त्र संघर्ष में विास करते थे लेकिन अब उनकी भूमिका भी बदल रही है। अल्जीरिया में इस्लामी उद्धार मोच्रेऔर फिलिस्तीन में हमासके आ जाने पर पश्चिमी महाशक्तियां व्यर्थ ही प्रकंपित हुईं। बातचीत और समझौता जब इनके साथ भी हो सकते हैं तो मिस्र के इस्लामी तत्वों के साथ क्यों नहीं? ओबामा प्रशासन इस व्यावहारिक यथार्थ को समझने की कोशिश कर रहा है, यह संतोष का विषय है। जुलाई में होनेवाले राष्ट्रपति चुनाव तक मिस्र अपनी उलझनें खुद सुलझा लेगा, ऐसी आशा है। यदि मिस्र में भी फौज को हटाकर इस्लामी तत्वों की प्रधानता हो जाती है तो उसका असर सारे अरब जगत पर पड़ेगा। ईरान और तुर्की अपनी जगह हैं लेकिन अरब जगत में मिस्र की जगह कौन ले सकता है? मिस्र तय करेगा कि इस्रइल-अरब संबंध कैसे होंगे? आठ करोड़ लोगों का यह प्राचीन राष्ट्र अरब देशों के लिए भी स्वस्थ उदाहरण उपस्थित करेगा। ओबामा प्रशासन इस व्यावहारिक यथार्थ को समझने की कोशिश कर रहा है, यह संतोष का विषय है। जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव तक मिस्र अपनी उलझनें खुद सुलझा लेगा, ऐसी आशा है

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