Friday, December 16, 2011

चीन से सावधान

पूर्व रक्षामंत्री और वरिष्ठ नेता मुलायम सिंह यदि संसद में सीधी चेतावनी दे रहे हों कि चीन वर्ष 1962 का इतिहास दोहराने की तैयारी में है और किसी भी वक्त हम पर हमला कर सकता है तो जाहिर है देश इसे अति गंभीरता से लेगा। लेकिन, इसके जवाब में प्रधानमंत्री का सपाट बयान आ जाए कि ऐसे किसी हमले की आशंका सरकार को नहीं है तो इस बात को कितनी गंभीरता से लेने की जरूरत है! वह भी तब जब उसी दिन रक्षामंत्री दूसरे सदन को यह बता रहे हों कि चीन कितनी तेजी से हमारी सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर का जाल बिछा रहा है! हैरत की बात है कि चीन का नाम आते ही सवा अरब की आबादी वाले हमारे मुल्क में राजनेताओं के घुटने कांपने क्यों लगते हैं और क्यों हमें चीन के नाराज होने की चिंता सताने लगती है। हम आधी सदी पहले चीन की पिलाई उस कड़वी खुराक का सबक क्यों भूल जाते हैं जब दोस्ती की तमाम कसमों के बीच उसने अचानक हम पर हमला कर दिया था और हमारी धरती का विशाल क्षेत्र अपने कब्जे में कर लिया था। आज तक हमारी जबरन कब्जाई जमीन पर न केवल उसका कब्जा बना हुआ है बल्कि अपरोक्ष रूप से अब वह कश्मीर की सीमा तक भी घुस आया है। आधी सदी पहले जिन कारणों से चीन ने भारत का मान रौंदना चाहा था, आज उससे भी बड़े कारण ऐसे हैं जो उसे फिर से हमलावर बनने को उकसा सकते हैं। दलाई लामा का भारत की शरण में होना अगर उसके पहले हमले के पीछे का एक बड़ा कारण था तब आज हालात उससे भी गंभीर हो गए हैं जब दुनियाभर के बौद्ध देश दलाई लामा के नेतृत्व में भारत में ही बौद्ध धर्म का प्रकाश स्तंभ खड़ा कर रहे हैं। पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित ऐसे ही एक अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन पर चीन का आंखें तरेरना सभी को याद होगा। दुनिया मान रही है कि यह सदी एशिया की है लेकिन चीन की दिक्कत यह है कि उसे इस महाद्वीप का चौधरी बनने में भारत से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। भारत को असंतुलित बनाए रखने के लिए उसने पाकिस्तान का खुलकर इस्तेमाल किया लेकिन आज पाकिस्तान के खुद असंतुलित होने से चीन का यह मोर्चा उतना असरदार नहीं रह गया है। चीन ने भारत के पड़ोसी देशों को अपने जाल में फंसा कर हमें घेरने की योजना बनायी थी लेकिन बदलते हालात इसमें भी अड़चने पैदा कर रहे हैं। वियतनाम, जापान जैसे एशियाई देश चीन के खिलाफ संतुलन बनाने के लिए भारत का मुंह ताक रहे हैं। दक्षिण चीन सागर में वियतनाम के साथ समुद्र में तेल की खोज में भारत की सहभागिता के खिलाफ चीन ने हमें कैसे धमकाया था यह भी सबको याद होगा। चीन के लिए सबसे गंभीर बात यह हो गई है कि अमेरिका ने प्रशांत और हिंद महासागर में अपनी पैठ बढ़ाने का और भारत, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया से मिल कर संयुक्त निगरानी का फैसला लिया है। चीन तेजी से अपनी नौसेना की ताकत बढ़ाने में लगा है ताकि इन महासागरों पर प्रभुत्व जमा सके। इन महासागरों से दुनिया के अधिकतम व्यापारिक जहाज गुजरते हैं जो सीधे चीन के रहमोकरम पर रहने को मजबूर हो जाएंगे। इसके अलावा इन महासागरों तटों पर बसे देशों के सामने सुरक्षा का सवाल भी पैदा हो जाएगा। इन हालात से निपटने की दिशा में भारत की भूमिका स्वाभाविक रूप से बढ़ गई है और यही कारण है कि हम आज चीन के सीधे निशाने पर आ गए हैं। इसीलिए चीन की मंशा भांपने में ऊर्जा बरबाद करने की जगह हम सजग रहें और मुंह तोड़ जवाब देने की ताकत रखें तो बेहतर होगा।

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