अरब देशों में शुरू हुई जास्मिन क्रांति के एक वर्ष के अंदर ही ट्यूनीशिया, मिस्र और लीबिया के तानाशाहों का अंत हो गया और सीरिया तथा यमन भी उसी रास्ते चलते दिख रहे हैं जिस पर मिस्र व लीबिया चले थे। इन परिवर्तनों के मद्देनजर सवाल है कि तानाशाहों के अंत के लिए जो जनक्रांति सम्पन्न हुई थी, आखिर उसका उद्देश्य क्या था? क्रांतिकारी इन देशों में लोकतंत्र की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध थे या फिर इस्लामी कट्रपंथ की प्रतिष्ठा के लिए अथवा निरुद्देश्य? लीबया में मुअम्मर कर्नल गद्दाफी का शासन उखाड़ने वाली नेशनल ट्रांजिशनल काउंसिल की अंतरिम सरकार की घोषणा कि देश के पुनर्गठन में शरई कानून का पालन होगा, ट्यूनीशिया में ‘इस्लामी एन्नहदा पार्टी’ द्वारा सबसे अधिक सीटें प्राप्त कर सरकार को नेतृत्व देने की हैसियत में पहुंचना और मिस्र में संसदीय चुनावों के शुरुआती परिणामों में इस्लामी कट्टरपंथी दलों का दबदबा यही संकेत देता है कि अरब देशों में भड़की क्रांति की मूल प्रेरणा लोकतंत्र नहीं, बल्कि इस्लामी शासन की स्थापना थी। तहरीर चौक पर दूसरी क्रांति के लिए बजे बिगुल के बीच 28 नवम्बर को 508 सदस्यों वाली संसद के निचले सदन पीपुल्स एसेम्बली के लिए मिस्र में मतदान हुआ जिसमें करीब 62 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया। आंदोलनकारी सेना का रवैया देखकर चुनाव का विरोध कर रहे थे, जो अब भी जारी है। क्रांतिकारियों को नहीं लगता कि सेना मिस्र में लोकतंत्र की स्थापना को लेकर गंभीर है। सेना कॉप्टिक ईसाइयों को भी अलग करने का कुचक्र रच चुकी है ताकि उदारवादी शक्तियां कमजोर पड़ जाएं और कट्टरपंथ तंत्र की मूल व्यवस्था का हिस्सा बन जाए। सेना अपने उद्देश्यों में बहुत हद तक सफल होती दिख भी रही है। मिस्र में पहले चरण के चुनाव में इस्लामी पार्टियां सबसे आगे निकल गयीं और धर्मनिरपेक्ष दल चारों खाने चित हो गये। 28-29 नवम्बर को हुए मतदान में इस्लामी पार्टी कुल मतों का कम से कम दो तिहाई हिस्सा हासिल करने में सफल रही। मुस्लिम ब्रदरहुड ने 32.5 प्रतिशत मत पाये और कट्टरपंथी अल नूर पार्टी को 20.7 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। उदारवादी वफ्द पार्टी को 14 प्रतिशत मत मिले जबकि एक अन्य इस्लामी पार्टी अल वसात, जो इस्लामी काूननों की समर्थक है, को 12.9 प्रतिशत। मिस्र के चुनावों के आरंभिक परिणामों में मुस्लिम ब्रदरहुड की राजनीतिक अंग, फ्रीडम ऐंड जस्टिस पार्टी सबसे आगे निकल गयी। मुस्लिम ब्रदरहुड वही संस्था है जिसने तीस साल तक हुस्नी मुबारक के राज का विरोध किया और पिछले वर्ष तक मिस्र में प्रतिबंधित रही। उसके बाद सलाफ अल-नूर पार्टी दूसरे स्थान पर रही। यह पार्टी हजरत मोहम्मद और उनके सहयोगियों के समय में प्रचलित इस्लाम की तर्ज पर मिस्र को चलाना चाहती है। बहरहाल, धर्मनिरपेक्ष गठबंधन के हाशिए पर जाने और कट्टरपंथियों के दबदबे के कारण उदारवादियों को चिंता सताने लगी है। कट्टरपंथियों के विचारों से लगता है कि वे काहिरा को कंधार बनाने की इच्छा से प्रेरित हैं। उदारवादियों की सबसे बड़ी चिंता राष्ट्रपति पद का निर्दलीय उम्मीदवार अति कट्टरपंथी हजेम अबू इस्माइल है जो सऊदी अरब के सलाफी इस्लाम का अनुयायी है। सलाफी उम्मीदवार मिस्र की मुख्य राजनीतिक पार्टी अल-नूर के झंडे के नीचे जमा हो रहे हैं। अबू इस्माइल ने हाल में एक टीवी साक्षात्कार में घोषणा की कि सभी मुस्लिम महिलाओं को परदे में रहना होगा। अविवाहित युवक-युवतियां एक साथ नजर नहीं आने चाहिए। ऐसे कार्यस्थल स्वीकार्य नहीं होंगे जहां लड़के-लड़कियां एक साथ काम करते हों आदि। हालांकि अबू इस्माइल राष्ट्रपति पद का कमजोर उम्मीदवार है लेकिन उसके विचार उन उदारवादियों के की चिंता बढ़ाते हैं जिन्होंने फरवरी में हुस्नी मुबारक की 30 साल की तानाशाही खत्म करने के बाद आजादी का सपना देखा है। जिस तरह चुनाव के जरिए इस्लामवादी दल मिस्र की राजनीतिक में प्रकट हो रहे हैं, उससे सवाल उठता है कि अरब देशों में सत्ता परिवर्तन के पीछे कोई और मकसद तो काम नहीं कर रहा था? गरीब और क्रांति समर्थकों को सपना दिखाया गया कि सत्ताधारी दल पूरी तरह बाहर रखा जाएगा लेकिन इसका यह मतलब नहीं था कि ऐसे दलों के लिए सत्ता तक पहुंचने का रास्ता तैयार किया जाएगा जो देश में आधुनिक और मानवीय मूल्यों के स्थान पर इस्लामी कानूनों या रूढ़िवादी धार्मिक मूल्यों को थोप देंगे। अरब जगत की तानाशाही सत्ताओं की अन्य जो खामियां रही हों लेकिन इस्लामी कट्टटरपंथ को सिर उठाने का अवसर उन्होंने कभी नहीं दिया। सत्ता बचाए रखने के लिए इन्होंने पश्चिमी जगत, खासकर अमेरिका से समर्थन हासिल किया और इसी कारण अपनी सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था में मजहबी कट्टटरपन को प्रश्रय नहीं दिया। बहरहाल मिस्र में हुए चुनाव मिस्र के निर्वाचन उच्च आयोग के लिए बड़ी उपलब्धि हो सकते हैं क्योंकि उसकी नजर में यह फराओ काल के बाद सबसे बड़ा मतदान है, लेकिन उन क्रांतिकारियों के लिए नहीं, जिन्होंने तानाशाह के चंगुल से मुक्ति के बाद वास्तविक स्वतंत्रता का सपना देखा है।
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