Sunday, November 4, 2012

चीन को बदलने की चुनौती



8 नवंबर को चीन में नेतृत्व परिवर्तन से ठीक एक सप्ताह पहले हू जिंताओ रिवाज के मुताबिक उत्तराधिकारी शी जिनपिंग को कमान सौंप देंगे। यह संयोग ही है कि सुदूर अमेरिका में भी 6 नवंबर को अमेरिकी जनता भी राष्ट्रपति का चुनाव करेगी। चीन की यात्रा के दौरान मेरे सभी स्थानीय सहयोगियों ने हू-शी सत्ता हस्तातंरण के महत्व पर सार्थक चर्चा से इन्कार कर दिया। मेरे बार-बार जोर देने पर भी वे हू जिंताओ-वेन जियाबाओ के दस साल के कार्यकाल के विश्लेषण पर चर्चा के लिए राजी नहीं हुए। पूरा चीनी मीडिया पिछले दिनों अमेरिका के पूर्वी तट पर सैंडी तूफान के कहर और उससे निपटने में अमेरिका की प्रशासनिक विफलता पर केंद्रित रहा। चीन में नेतृत्व परिवर्तन के मुद्दे पर बीजिंग में रहने वाले कुछ विदेशी ही बोलने के इच्छुक नजर आए, इनमें मुख्यत: मीडिया के लोग और कुछ प्रोफेशनल शामिल हैं, जो चीनी राजधानी में कार्यरत हैं। इस नेतृत्व परिवर्तन पर चीनियों की प्रतिक्रिया महज इतनी है कि जब आगामी बृहस्पतिवार को पार्टी कांग्रेस की बैठक होगी तो उसी में औपचारिक रूप से उत्तराधिकारी की घोषणा की जाएगी। चीन के उपराष्ट्रपति शी जिनपिंग कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बनने जा रहे हैं। साथ ही वह अगले साल के शुरू में चीन के राष्ट्रपति का कार्यभार भी संभालेंगे। वर्तमान उपप्रधानमंत्री ली केकियांग वर्तमान प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ का स्थान लेंगे। यह आम धारणा है कि चीन के शक्तिशाली सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (सीएमसी) की कमान भी शी जिनपिंग के हाथों में रहने की संभावना है। यानी अब वह पार्टी और सेना, दोनों का नेतृत्व करेंगे। यह रेखांकित किया जा रहा है कि 2002 में जियांग जेमिन द्वारा हू जिंताओ को नेतृत्व सौंपने से पहले जेमिन दो साल तक सीएमसी के भी अध्यक्ष रहे थे। इसलिए दोनों पद संभालना कोई नई बात नहीं है। ऐसा पहले भी हुआ है, किंतु इन सब अटकलों के बीच चीन में बेचैनी का माहौल है। बीजिंग का मूड यही है कि 8 नवंबर को औपचारिक परिवर्तन होने तक चुप रहना ही ठीक है और उसके बाद ही कुछ कहा जा सकता है। चाहे जो हो, एक बात तो साफ है कि बीजिंग में कुछ दिन रहने मात्र से यह स्पष्ट हो जाता है कि यहां सत्ता का हर तरह की चर्चाओं पर नियंत्रण कायम है, चाहे ये चर्चा सार्वजनिक रूप से हों या फिर निजी। उदाहरण के लिए क्षेत्रीय ¨प्रट मीडिया और टीवी चैनल तो सरकारी इशारे को आसानी से समझ ही लेते हैं, वहां तो नेटीजनों पर भी कड़ी बंदिशें हैं। चीन से बाहर के साइबर संपर्क प्रतिबंधित हैं। इस कारण पार्टी की कांग्रेस और हू जिंताओ युग के बारे में कोई सूचना आसानी से सुलभ नहीं है। 2008 में ओलंपिक खेलों के बाद फेसबुक और इससे मिलती-जुलती चीनी साइटों पर रोक लगा दी गई थी। कम्युनिस्ट पार्टी और सेना (पीएलए) में शीर्ष पदों के लिए अंदरखाने भीषण संघर्ष चल रहा है। माओ से लेकर वर्तमान के सत्ता संघर्ष तक यह चीन में नेतृत्व परिवर्तन का स्थायी भाव बना हुआ है। उदाहरण के लिए वर्तमान में बो शिलाई कांड को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि वर्तमान संक्रमण में हू जिंताओ व्यक्तिगत तौर पर सत्ता की कमान प्रिय पात्र ली केक्यांग को सौंपना चाहते थे, किंतु वह ऐसा नहीं कर पाए और उन्हें सर्वसम्मत पसंद शी जिनपिंग के नाम पर सहमत होना पड़ा। पूर्व में चीनी सम्राटों से लेकर 1949 के बाद चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिवों तक लगभग हमेशा शीर्ष पद पर पहुंचने के लिए ताकत या फिर सत्तारूढ़ पिरामिड के प्रतिनिधियों में अपने वफादारों के समर्थन का सहारा लिया गया है। प्राचीन काल में झाऊ वंश (ईसा पूर्व 1050) से लेकर माओ तक जनसाधारण को यही संदेश प्रचारित जाता रहा कि शासक के पास दैवीय आदेश या स्वर्गिक शक्तियां होती हैं। शी एक ऐसे समय में चीन का नेतृत्व संभालेंगे जब वह घरेलू और बाहरी, दोनों ही मोर्चो पर एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि हू जिंताओ के दशक में संपन्नता और शक्ति के सूचकांक में प्रभावी बढ़त देखने को मिली है। इस दौरान जीडीपी, प्रति व्यक्ति आय और सैन्य क्षमता में उल्लेखनीय सुधार हुआ मिला। 2008 ओलंपिक ने तो उनकी शान में चार चांद लगा दिए, लेकिन चिंता की बात यह है कि इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद इस दौरान विशाल चीनी किले में कुछ दरारें भी देखी गईं। बढ़ती सामाजिक-आर्थिक असमानता के कारण चीन में घरेलू असंतोष में उछाल आया है। वहां एक तरफ पूंजीपतियों के छोटे से वर्ग के पास अकूत संपत्ति जमा हो गई है और दूसरी तरफ दूरदराज के कम विकसित क्षेत्रों में बहुसंख्यक आबादी गरीबी की मार झेल रही है। देश की आम जनता इस बदहाली के लिए नेताओं-उद्योगपतिके इस गठजोड़ को जिम्मेदार मानती है। वैश्विक मंदी के कारण चीन में विनिर्माण और निर्यात उद्योग में गिरावट आ रही है और इसके चलते चीनी कामगारों के वेतन में या तो कटौती हो रही है या फिर वे बेरोजगार हो रहे हैं। इसके अलावा तिब्बत और शिनजियांग प्रांत अलगाववादी और सांप्रदायिक हिंसा से कांप रहे हैं। हू के कार्यकाल के आखिरी चरण में बीजिंग ने क्षेत्र में अपनी सैन्य दबंगई दिखाकर नासमझी का परिचय दिया है। उसने खासतौर पर जापान और दक्षिण कोरिया को अपनी आंखें दिखाई हैं। इस प्रकार चीन के उदय को लेकर विश्व सशंकित हो गया है। चीन के अमेरिका के साथ भी संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी के चीन को धोखेबाज कहने पर वहां के लोगों में भारी गुस्सा और असंतोष है। शी जिनपिंग के सामने चीन की छवि बदलने की बड़ी चुनौती है और यह कतई आसान कार्य नहीं है। नए राष्ट्रपति को टकराव के स्थान पर सौहार्द का रास्ता अपनाना होगा। इसके लिए उन्हें पोलिट ब्यूरो के मठाधीशों को साधने के साथ-साथ एक अरब से अधिक आबादी को भी साथ लेकर चलना होगा। अमेरिका, जापान और भारत समेत पूरा विश्व भी बीजिंग में शी-ली टीम के साथ गर्मजोशी से दोस्ती का हाथ मिलाने को तैयार है। (लेखक सामरिक मामले के विशेषज्ञ हैं) 

Dainik Jagran National Edition 5-11-2012 ns’k fons’k) Page -10

No comments:

Post a Comment