Wednesday, November 21, 2012

नेहरू के कारण हारे 1962 की लड़ाई



नई दिल्ली, एजेंसी : पूर्व वायुसेना प्रमुख एवाई टिपणीस ने 1962 में चीन के हाथों पराजय के लिए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया है। इस युद्ध में वायुसेना का इस्तेमाल आक्रमण के लिए न होना हमेशा चर्चा का विषय रहा है। हाल में वायुसेना प्रमुख एनएके ब्राउन ने भी कहा था कि चीन के साथ युद्ध में यदि वायुसेना की आक्रामक भूमिका होती तो शायद नतीजा ही कुछ और होता। भारत और चीन : 1962 युद्ध के पांच दशक बाद विषय पर आयोजित एक सम्मेलन में टिपणीस ने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय नेता बनने की अपनी महात्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए नेहरू ने राष्ट्र के सुरक्षा हितों को त्याग दिया। युद्ध में भारत की अपमानजनक पराजय के लिए नेहरू मुख्य रूप से जिम्मेदार थे। उनके समय में सेना प्रमुख स्कूल के बच्चों की तरह फटकार दिए जाते थे। नेहरू उन्हें बुरी तरह से डांट देते थे। 72 वर्षीय टिपणीस 1960 में बतौर फाइटर पायलट नियुक्त हुए थे। 1998 में वह वायुसेना प्रमुख बने। चीन के साथ लड़ाई में वायुसेना की भूमिका सिर्फ सेना की परिवहन सहायता तक सीमित थी। उसकी कोई आक्रामक भूमिका नहीं थी। विशेषज्ञों के बीच भी यह चर्चा का विषय रहा है कि आखिर क्यों वायुसेना की युद्ध में आक्रामक भूमिका नहीं रही। चीन की कार्रवाई से भड़क गए थे लोग मंुबई : 1962 में भारत के खिलाफ चीन की कार्रवाई ने महाराष्ट्र के लोगों खासतौर से मुंबईवासियों का खून खौला दिया था। वे कम्युनिस्ट विरोधी भावनाओं से भर गए थे। मंगलवार को यहां राज भवन से जारी दस्तावेजों से यह जानकारी मिलती है। इस संबंध में राज्य के तत्कालीन कार्यवाहक राज्यपाल चीफ जस्टिस एचके चयनानी ने तब राष्ट्रपति रहे एस राधाकृष्णन को पत्र लिखा था।
Dainik jagran National Edition 21-11-2012 ns’k fons’k) Page -6


वीरता की अप्रतिम गाथाएं

वीरता की अप्रतिम गाथाएं

आज से पचास साल पहले 28 दिनों तक चले भारत-चीन युद्ध में 3824 बहादुर जवानों ने अपनी जान गंवा दी थी। युद्ध की 50वीं वर्षगांठ पर विश्लेषकों ने राजनीतिक और सैन्य गलतियों को रेखांकित किया है, इनमें चीन की राजनीतिक पार्टी पर किया गया गैरजिम्मेदाराना भरोसा, तत्कालीन सरकार तथा सैन्य प्रतिष्ठान की विफलता और रक्षा मंत्री व शीर्ष सैन्य अधिकारियों की अक्षमता पर सवाल उठाए गए थे, किंतु इस युद्ध को भारतीय जवानों के शौर्य के लिए याद किया जाएगा। पुराने, जंग लगे हथियारों और अक्षम राजनेताओं और जनरलों के गलत फैसलों के बावजूद भारतीय सैनिकों ने चीन का जबरदस्त प्रतिरोध किया। भीषण युद्ध में अनेक जगहों पर भारतीय जांबाजों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए चीन को एक-एक इंच जमीन के लिए जबरदस्त टक्कर दी। हममे से बहुत से लोग आज नहीं जानते, किंतु हमारी पीढि़यों को यह जानना ही चाहिए कि भारत को इस युद्ध की क्या कीमत चुकानी पड़ी। युद्ध में भारी खूनखराबा हुआ, अनेक परिवार तबाह हो गए। तमाम लड़ाइयों में भारतीय जांबाजों की शौर्य गाथाएं हैं। भारतीय सैनिकों ने मरते दम तक अपने कर्तव्य का पालन किया, जबकि उनके ऊपर जितने चैनल थे वे सभी अपने कर्तव्य पालन में पूरी तरह विफल रहे। सैनिकों को अनेक शौर्य पुरस्कारों से नवाजा गया। 13 कुमाओनात रेजांग दर्रा (लद्दाख) की सी कंपनी आखिरी सैनिक और आखिरी गोली तक लड़ती रही। 1 सिख प्लाटून अरुणाचल प्रदेश में तोपलेंट दर्रा में एक पहाड़ी की रक्षा के लिए तब तक चीनियों पर गोलियां बरसाती रही जब तक गोलियां खत्म नहीं हो गई। इसके बाद आखिरी आत्मघाती प्रयास में सैनिकों ने बंदूकों के आगे लगी संगीनों से चीनी सैनिकों पर हमला बोल दिया। उनकी इस जांबाजी को कभी भूला नहीं जा सकता। इन टुकडि़यों का नेतृत्व करने वाले मेजर शैतान सिंह और सूबेदार जोगिंदर सिंह को मरणोपरांत परमवीर चक्र सम्मान से नवाजा गया। परमवीर चक्र हासिल करने वाले तीसरे बहादुर थे 8 गोरखा राइफल्स के मेजर धान सिंह थापा। वह लद्दाख में एक शेर की तरह लड़े और हमारा सौभाग्य है कि कहानी बताने के लिए वह जिंदा बच गए। बम दर्रा में एके रॉय के नेतृत्व में 5 असम राइफल्स ने आखिरी दम तक चीन के अनेक हमलों का मुंहतोड़ जवाब दिया। इस प्रकार की अनगिनत कहानियां लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश तक बिखरी पड़ी हैं। चीन ने बड़ी तेजी के साथ हमला बोला और एक समय ऐसा भी आया जब पूरा असम भारत के हाथ से निकलने का खतरा पैदा हो गया था। अगर आप भारत के नक्शे पर नजर डालें तो इस परिदृश्य की परिकल्पना करना भी कठिन है। असम के बिना भारत ऐसा लगता है जैसे इसका बायां हाथ कट गया हो। चीनी हमले का एक लाभ यह जरूर हुआ कि हमने भोलेपन को तिलांजलि दे दी। लगता है कि हम इस युद्ध और इसमें भाग लेने वाले जांबाज जवानों को भूल गए हैं यानी उन लोगों को जिन्होंने हमारे भविष्य के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। हमें हमारी सुरक्षा की केंद्रीय कुंजी जवानों की वीरता और शौर्य को नहीं भूलना चाहिए। चाहे जितने भी कबाड़ हथियारों से ये लैस हों या न हों, सही-गलत कैसे भी आदेश इन्हें मिल रहे हों या न मिल रहे हों, ये वीर जवान ही हमारी पहली, आखिरी और एकमात्र सुरक्षा पंक्ति हैं। क्या हम इनके लिए वह सब करते हैं जिसके ये हकदार हैं? क्या हम उन्हें सही ढंग से याद भी करते हैं? कुछ साल पहले एक रिपोर्ट छपी थी कि रेजांग दर्रे की बर्फीली पहाडि़यों पर अपनी जान गंवाने वाले मेजर शैतान सिंह की विधवा को उनकी पात्रता से कहीं कम पेंशन दी जा रही है। इसका जिम्मेदार कौन है? रक्षा लेखा नियंत्रक और बैंक एक दूसरे के सिर ठीकरा फोड़ रहे हैं। बाकी हम लोग हताशा में अपने कंधे झटका देते हैं। मैं अकसर राजनेताओं और नौकरशाहों को कौटिल्य की प्रसिद्ध उक्ति सुनाता हूं-जिस दिन एक सैनिक अपने बकाया की मांग करने लगे वह दिन मगध के लिए बहुत दुखद होगा। उस दिन से आप एक राजा होने का नैतिक अधिकार गंवा देंगे। राष्ट्र को हमेशा अपने सैनिकों पर गर्व करने के साथ-साथ उनकी परवाह भी करनी चाहिए। 1962 की गलतियों को कभी दोहराया नहीं जाना चाहिए। यह स्पष्ट है कि हमारा वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व हमारे पूर्व सैनिकों की दशा के प्रति बेपरवाह है। पूर्व सैनिकों द्वारा अपने मेडल लौटाने की घटनाओं पर अधिकांश लोगों को शर्म से अपना सिर झुका लेना चाहिए। 3800 बहादुर सिपाहियों की स्मृति और देश के प्रति उनकी अंतिम सेवा की कहानियां हमारी सामूहिक अंतश्चेतना में अंकित हो जानी चाहिए। इंग्लैंड की संसद ने आ‌र्म्ड फोर्सेज कोवेनेंट पारित किया है। इसमें यूनाइटेड किंगडम के लोगों और देश के लिए लड़ने वाले सैनिकों के बीच एक समझौता किया गया है कि सैनिकों के मरने के बाद उनके परिवारों की जिम्मेदारी सरकार उठाएगी। इसी प्रकार का एक बिल मैंने भी संसद में पेश किया है। अभी इस पर चर्चा होनी बाकी है। मैं आशा करता हूं कि इस पर चर्चा होगी और सरकार अगर मेरा नहीं तो इस प्रकार का कोई अन्य प्रस्ताव पारित करेगी। यही 1962 के शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। साथ ही इससे भारत की जनता और सशस्त्र बलों के बीच एक नए रिश्ते की शुरुआत भी होगी। रक्षा मंत्री और उनके साथ तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने जिस प्रकार 62 के युद्ध की 50वीं वर्षगांठ पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने की शुरुआत की है वह एक सराहनीय कदम है। इससे संकेत मिलता है कि राष्ट्र अपने सपूतों के बलिदानों को भूला नहीं है। आजकल हमारे नायक क्रिकेटर, फिल्म स्टार और राजनेता बन गए हैं। यह जैसा है वैसा ही रहेगा, लेकिन भारत-चीन युद्ध की 50वीं सालगिरह ने हमें सुअवसर प्रदान किया है कि हम अपने बच्चों को भारत के जांबाजों के किस्से सुनाएं। आज के बच्चों को मेजर धान सिंह थापा, मेजर शैतान सिंह, सुबेदार जोगिंदर सिंह, मेजर पद्मपाणि आचार्य, राइफलमैन सतबीर सिंह, हवलदार अब्दुल हमीद, कैप्टन विक्रम बत्रा, राइफलमैन योगेंद्र यादव और इस प्रकार के अनेक वीरों के बारे में यह जानना ही चाहिए कि किस प्रकार छोटे से गांव या कस्बे से आकर उन्होंने देश की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान की और अपने पीछे बिलखते परिजनों को छोड़ गए। इन कहानियों को हमारी नई पीढ़ी को प्रेरणाFोत बनने देना चाहिए और अपने वीर सपूतों और उनके परिवार को याद करते हुए हमें अपना सिर झुकाकर उन्हें सलाम करना चाहिए। (लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं)

Dainik jagran National Edition 21-11-2012 ns’k fons’k)  Page -8

इजरायल की मनमानी



इजरायल की मनमानी अंग्रेज जब दक्षिण एशिया छोड़कर गए तो भारत और पाकिस्तान को विभाजित कर ऐसा नासूर छोड़ गए जो आज तक हमारे लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। उसके अगले साल उन्होंने पश्चिम एशिया में अकारण यहूदियों के रहने के लिए जहां फलस्तीन बसा हुआ था वहां इजरायल नामक एक नया देश पैदा कर दिया। यहूदियों ने अरबों को वहां से खदेड़ कर उनकी संख्या 1948 की लगभग आधी कर दी है और दुनिया के अन्य हिस्सों से यहूदियों को वहां आने का आ ान कर अपनी संख्या उनके बराबर कर ली है। अंग्रेजों ने विवाद का ऐसा बीज बोया है जो आने वाले कई सालों और पीढि़यों तक अरबों और यहूदियों, दोनों के लिए परेशानी का कारण बना रहेगा। इजरायल ने फलस्तीन को दो इलाकों- गाजा और वेस्ट बैंक में सीमित कर दिया है। अपने ही घर में फलस्तीनी बंधकों की तरह रहने को मजबूर हैं। फलस्तीनियों ने इजरायल का कभी कम कभी ज्यादा, लगातार 64 सालों से हमला झेला है। एक पूरी पीढ़ी को मालूम ही नहीं कि सामान्य जिंदगी क्या होती है। प्रत्येक फलस्तीनी घर में, यहां तक कि उनके शीर्ष नेताओं के घरों में भी, दीवारों पर शहीदों की तस्वीरें लगी दिखाई पड़ेंगी। हजारों फलस्तीनी इजरायल की जेलों में बंद हैं। फलस्तीन ने इजरायल के खिलाफ पहले शांतिपूर्ण संघर्ष किया। यासर अराफात के नेतृत्व में चले आंदोलन को पूरी दुनिया के अमन और न्यायपसंद लोगों का समर्थन प्राप्त था। वह भारत में भी उतने ही लोकप्रिय थे जितने कि शायद अपने लोगों के बीच में। अमेरिकियों ने उनके और इजरायली नेतृत्व के बीच शांति वार्ता में मध्यस्थता की। कई बार समझौते भी हुए, लेकिन इजरायल ने किसी भी समझौते का सम्मान नहीं किया, बल्कि इस वजह से यासर अराफात की अपने लोगों में विश्वसनीयता घटी। यासर अराफात के बाद जो फलस्तीनी नेतृत्व उभरा वह कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा से प्रेरित था। दुनिया को यासर अराफात के जाने के बाद उनके जैसे एक नेता की काफी कमी महसूस हुई। वर्तमान में हमास और अल-फतह दो फलस्तीन संगठनों को अधिकांश जनता का समर्थन प्राप्त है। पिछले चुनाव में हमास की जीत होने के बावजूद उसे पूरे फलस्तीन में सरकार नहीं बनाने दी गई। हमास का नियंत्रण गाजा पर है तो उसके पूर्व सरकार चला चुके फतह का नियंत्रण वेस्ट बैंक पर। इन दोनों गुटों में खूनी प्रतिस्पर्धा के दौर भी रहे हैं, लेकिन पिछले वर्ष दोनों में एकता की बात ने जोर पकड़ा। गाजा पर गत 14 नवंबर को इजरायल ने बिना किसी चेतावनी के हमला कर हमास के सेनापति अहमद जबारी की हत्या कर दी। विडंबना यह है कि अहमद जबारी को कुछ घंटों पहले ही इजरायल के साथ स्थायी शांति हेतु एक दस्तावेज प्राप्त हुआ था, जिसमें हमले तेज हो जाने की स्थिति में शांति कैसे बहाल करें, इसके सुझाव दिए गए थे। जवाब में जब हमास ने भी कुछ प्रक्षेपास्त्र छोड़े जिसमें तीन इजरायली नागरिकों की जानें गई तो इजरायल को हमले अचानक तेज करने का बहाना मिल गया। इस ताजा दौर में, जैसा कि हमेशा होता आया है, अब तक यहूदियों से कई गुना ज्यादा फिलीस्तीनी नागरिक मारे जा चुके हैं और उससे भी कई गुना ज्यादा अस्पताल पहुंच चुके हैं। दोनों तरफ मारे जाने वालों में महिलाएं व बच्चे शामिल हैं, जो इस त्रासदी का सबसे दुखद पहलू है। इजरायल में जनवरी में चुनाव हैं। इजरायली प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दक्षिणपंथी वोटों के ध्रुवीकरण की दृष्टि से यह हमला किया है। पूरी दुनिया को यह बताया जा रहा है कि इजरायल अपनी सुरक्षा के लिए ऐसा कर रहा है, जबकि हकीकत कुछ और ही है। इजरायल की समस्या का स्थायी हल निकालने में रुचि नहीं है। यह दुनिया का अकेला मुल्क है, जिसने अपनी सीमाओं की घोषणा नहीं की है। इतिहास में देखा जाए तो फलस्तीन पर कब्जा करने के साथ-साथ उसे जब मौका मिला उसने कभी मिF तो कभी सीरिया, कभी लेबनान तो कभी जॉर्डन के इलाकों पर अवैध कब्जा करने की कोशिश की है। यदि इजरायल वास्तव में हल चाहता तो अभी तक क्षेत्र का स्पष्ट रूप से बंटवारा कर दो अलग मुल्क बनाकर फलस्तीन के साथ सह-अस्तित्व की भावना से रह सकता था। एक ही मुल्क में बराबर की नागरिकता प्रदान कर यहूदी, मुसलमानों और ईसाइयों, के साथ भी रह सकते थे, किंतु वे मुस्लिम व ईसाइयों को बिल्कुल भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। यहूदियों के साथ हिटलर ने जो किया वह निश्चित रूप से अमानवीय था, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं हो सकता कि यहूदियों द्वारा किसी और पर किए जा रहे अत्याचार को जायज ठहराया जाए। अमेरिका हमेशा इजरायल के पक्ष में खड़ा दिखाई पड़ता है, क्योंकि अमेरिका में यहूदियों का सरकार पर काफी दबाव रहता है। इसलिए अमेरिका, जिसने दुनिया में घूम-घूम कर लोकतंत्र कायम करने का ठेका ले रखा है, इजरायल द्वारा फलस्तीनियों के उत्पीड़न पर कोई सवाल नहीं खड़ा करता। संयुक्त राष्ट्र में फलस्तीन के पक्ष में कई प्रस्ताव पारित हो चुके हैं, लेकिन अमेरिका फलस्तीन को संयुक्त राष्ट्र का सदस्य ही नहीं बनने दे रहा। गनीमत है कि भारत ने अमेरिकी दबाव को नजरअंदाज करते हुए फलस्तीन के पक्ष में मत दिया। भारत ने हमेशा से फलस्तीन का समर्थन किया है, लेकिन जब से देश ने उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण वाली आर्थिक नीतियां अपनाईं हैं, हम इजरायल के भी अच्छे दोस्त बन गए हैं। इतने अच्छे कि इजरायल के आधे हथियार अब हम ही खरीदते हैं और हमारा 30 प्रतिशत हथियारों का आयात इजरायल से होता है। इजरायल के सैनिक हमारी सेना को प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। भारत ने अभी तक इजरायल द्वारा फलस्तीन पर ताजा हमले की कोई निंदा भी नहीं की है। (लेखक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

Dainik jagran National Edition 21-11-2012 ns’k fons’k)  Page -8

Sunday, November 18, 2012

कारगिल पर मुशर्रफ को कोई अफसोस नहीं



ठ्ठ जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और सैन्य शासक जनरल परवेज मुशर्रफ को आज तक कारगिल युद्ध के लिए कोई अफसोस नहीं है। भारतीय जमीन पर मुशर्रफ ने कारगिल युद्ध को सही साबित करने की कोशिश भी की। पाकिस्तान से निर्वासित मुशर्रफ ने नई दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि रिश्तों को सुधारने के लिए सही नीयत की जरूरत है। उन्होंने दोनों मुल्कों के बीच सैन्य टकराव घटाने की पैरवी की। जब उनसे कारगिल के पीछे उनकी नीयत के बारे में पूछा गया तो उन्होंने सीनाजोरी के अंदाज में कहा, पाकिस्तान की नीयत वही थी, जो 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के विभाजन के पीछे भारत की थी। वर्ष 1999 में पाकिस्तानी सेना ने भारत में घुसपैठ की थी। करीब दो महीने तक चली लड़ाई के बाद पाक को अपनी फौजें वापस लौटानी पड़ीं। हालांकि, पाकिस्तान इस बात से इन्कार करता रहा कि कारगिल में घुसपैठ करने वाले उसके सैनिक थे। मुशर्रफ की दलीलों पर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पूछा कि क्या पाक सेना की कश्मीर मामले को सुलझाने की नीयत है। जवाब में मुशर्रफ ने कहा, यह सोचना गलत है कि पाक सेना कश्मीर समस्या को सुलझाना नहीं चाहती। पाकिस्तान में 1999 से 2008 तक सत्ता के शीर्ष पर रहे मुशर्रफ ने आइएसआइ द्वारा आतंकियों को शह देने पर भी कोई जानकारी होने से इन्कार किया। उन्होंने इतना जरूर कहा कि पाकिस्तान में चरमपंथ और आतंकवाद सरकार के नियंत्रण से बाहर है। भारत-पाक के बीच लंबित मुद्दों के समाधान की कोशिशों पर पाक के पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, 2007 में मैंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आने का न्योता दिया था। साथ ही सियाचिन व सरक्रीक को सुलझाने का आग्रह भी किया था। मैं नहीं जानता कि सिंह क्यों नहीं आए। शायद इसलिए कि मेरे खिलाफ पाकिस्तान में प्रदर्शन हो रहे थे। 2008 में हुए चुनावों और पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद मुशर्रफ को पाकिस्तान छोड़ना पड़ा था। लंदन में राजनीतिक निर्वासन बिता रहे मुशर्रफ अब पाकिस्तान लौटने की तैयारी कर रहे हैं। (पेज-5 भी देखें)
Dainik jagran National Edition 18-11-2012 Page -1 (ns’k fons’k)