अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मंदी तथा यूरोपीय कर्ज संकट के कारण लड़खड़ा रही भारतीय मुद्रा रुपए को संभालने के लिए जापान ने भारत को 15 अरब डॉलर देने की पेशकश की है। भारत और जापान ने अपनी मुद्राओं रुपए और येन कीअदला बदली की धनराशि वर्तमान तीन अरब से बढ़ाकर 15 अरब डॉलर करने का फैसला किया है। उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ दिनों से अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं की तुलना में रुपए की कीमत में लगातार गिरावट आ रही है जिसे लेकर भारत में चिंता व्यक्त की जा रही है। जापान के कदम से रुपए में मजबूती आने की संभावना है। भारत यात्रा पर आए जापान के प्रधानमंत्री योशिहिको नोदा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच वाषिर्क शिखर वार्ता में जापान ने दिल्ली मेट्रो के तीसरे चरण और पश्चिम बंगाल की वन और जैविक विविधता संरक्षण के लिए एक अरब 70 करोड़ डॉलर का कर्ज देने की घोषणा की। जापान ने दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे के लिए अगले पांच वर्ष में चार अरब पचार करोड़ डॉलर उपलब्ध कराने का भरोसा दिलाया है। यह धनराशि सरकारी और निजी एजेंसियों की ओर से मुहैया करायी जाएगी। दोनों देशों ने परमाणु ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाने का संकल्प व्यक्त करते हुए इस संबंध में द्विपक्षीय समझौते को अंतिम रू प देने के काम तेज करने का निश्चय किया। पूर्व एशिया के समुद्री जल क्षेत्र में चीन की बढ़ती हुई धौंस के मद्देनजर दोनों देशों ने अबाध नौवहन पर जोर दिया। दोनों देशों की नौसेना अगले वर्ष संयुक्त युद्धाभ्यास करेंगी। दोनों देश समुद्री दस्युओं के संकट का भी मिलकर मुकाबला करने पर सहमत हुए हैं। भारत जापान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार के लिए अपने प्रयास तेज करने का भी निश्चय किया है।
Thursday, December 29, 2011
ईरान की तेल मार्ग बंद करने की धमकी
ईरान ने वि समुदाय को धमकी दी है कि अगर उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर उसके तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो वह होरमुज जलसंधि से होने वाले तेल के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पूरी तरह से रोक लगा देगा। ईरान के पहले उप राष्ट्रपति मोहम्मद रेजा रहीमी ने मंगलवार को कहा, अगर हमारे तेल निर्यात पर रोक लगाई जाती है तो हम होरमुज जलसंधि से एक बूंद तेल का भी व्यापार नहीं होने देंगे। ईरान की आधिकारिक समाचार एजेंसी ने रहीमी के बयान की पुष्टि की है। ईरान की इस धमकी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अमेरिका ने कहा है कि ईरान की ऐसी धमकियों में कोई दम नहीं है। होरमुज से तेल व्यापार रोकने की बात केवल डींग मारने जैसी ही है। साथ ही जोर देकर कहा है कि अमेरिका तेल के अबाध व्यापार का समर्थन करता है। ईरानकी नौसेना द्वारा होरमुज जलसंधि में शनिवार से शुरू हुए और 10 दिनों तक चलने वाले अब तक के सबसे बड़े युद्धाभ्यास के बीच उप राष्ट्रपति की यह धमकी आई है जिसमें उन्होंने कहा, हमारे खिलाफ साजिश करने वालों को जब हम करार जवाब देंगे तभी वह हमारे खिलाफ साजिशों से बाज आएंगे। गौरतलब है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की रिपोर्ट के बाद यूरोपीय संघ के मंत्रियों ने ईरान के खिलाफ प्रतिबंध और कडे किये जाने का फैसला किया था तथा इसी दौरान ईरान के तेल निर्यात पर भी प्रतिबंध लगाये जाने की योजना पर विचार किया गया था। इस निर्णय के मात्र तीन सप्ताह बाद ही ईरान ने वि समुदाय को यह धमकी दी है। परमाणु एजेंसी की रिपोर्ट में कहा गया था कि ईरान परमाणु बम बनाने के काम में लगा है और हो सकता है कि अभी वह इस पर और शोध कर रहा हो। ईरान ने इसका कड़े शब्दों में विरोध किया था और कहा था कि वह देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम पर काम कर रहा है।
Monday, December 19, 2011
अरब क्रांति के अगुआ बुअजीजी को श्रद्धांजलि
आज से ठीक एक साल पहले ट्यूनीशिया में ख़ुद को आग लगाने वाले फल विक्रेता मोहम्मद बुअजीजी ने सरकारी तंत्र के खिलाफ आंदोलन को जन्म दिया था। उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए ट्यूनीशिया में एक मूर्ति का अनावरण किया गया है। बुअजीजी की ख़ुदकुशी के बाद 23 साल से सत्ता पर काबिज बेन अली के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू हो गए थे। बुअजीजी के आत्मदाह के बाद सिदी बूजीद में शुरू हुआ विद्रोह धीरे-धीरे संपूर्ण अरब देशों में फैल गया। बुअजीजी को श्रद्धांजलि देने वालों में वर्तमान राष्ट्रपति मोसेफ मरजाउकी भी शामिल हुए, जिन्होंने सिदी बूजीद में मोहम्मद बुअजीजी की याद में आयोजित समारोह में लोगों का अभिवादन किया। बुअजीजी को 90 प्रतिशत तक जली हुई अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां पांच जनवरी 2011 को उनकी मौत हो गई थी। इस साल अक्तूबर महीने में ट्यूनीशिया में पहली बार हुए भ्रष्टाचार मुक्त चुनावों में राष्ट्रपति चुने गए मोसेफ मरजाउकी ने, ट्यूनीशिया के लोगों को उनका सम्मान वापस दिलाने के लिए बुअजीजी का शुक्रिया अदा किया। 26 साल के बुअजीजी अपने मोहल्ले में फलों के ठेले की जगह लॉरी लगाना चाहते थे, लेकिन इसके लिए उन्हें सरकार के अधिकारियों से इजाजत नहीं नहीं मिल रही थी। उनके घरवालों के अनुसार वहां के तीन अधिकारी बुअजीजी से रिश्वत की मांग कर रहे थे। रिश्वत न देने पर उन अधिकारियों ने सामान जब्त कर उनके साथ मारपीट की थी। बुअजीजी इसकी शिकायत गवर्नर से करना चाहते थे, लेकिन जब वह भी उनसे नहीं मिले तब उन्होंने हारकर ख़ुद को आग लगा ली। यहीं से अरब क्रांति की मशाल जली जिससे ट्यूनीशिया के अलावा मिस्त्र, लीबिया और यमन में वषरें से चल रही सरकारों का न सिर्फ अंत हुआ बल्कि लोकतंत्र की नींव भी रखी गई। इन देशों में हुए आंदोलनों का असर सीरिया में भी देखा जा रहा है जहां राष्ट्रपति बशर अल-असद के खिलाफ प्रदर्शन जारी हैं।
निजाम बदला हालात वही
एक ओर जहां अरब जगत में परिवर्तन की लहर को एक साल पूरा होने का जश्न मनाया जा रहा है वहीं मिस्र के तहरीर चौक से आ रही खबरें और तस्वीरें भयावह कहानी बयां कर रही हैं। यहां लोग सत्ता की बागडोर सेना के हाथों से असैन्य नेतृत्व को सौंपे जाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। देश में हाल ही में हुए संसदीय चुनाव के शुरुआती चरणों में कोई हिंसा नहीं हुई थी। लेकिन उसके बाद हजारों प्रदशर्नकारियों ने कड़ाके की सर्दी की परवाह किए बगैर शहर के बीचोंबीच बने ऐतिहासिक तहरीर चौक पर एक दफा फिर अपना डेरा डाल दिया। लेकिन से ना उतनी ही बर्बरता से इन प्रदर्शनों का दमन कर रही है जितना हुस्नी मुबारक के शासन के दौरान किया गया था।
मिस्र में एक महिला की क्रूरता से पिटाई करते हुए 10 सैनिकों की तस्वीरों ने यहां सेना के प्रति लोगों को और नाराज कर दिया है। यहां तक कि इस महिला की कमीज भी फाड़ दी गई और उसकी नग्न छाती पर पैरों से मारा गया। इस अज्ञात महिला के सिर और बदन पर इससे पहले कई बार धातु की छड़ी से मारा गया। कई सैनिक ने उसके सिर पर पैरों से भी मारा। यह अर्धनग्न महिला अपने हाथों की ढाल से सिर को तब तक बचाने की कोशिश करती रही, जब तक कि वह बेहोश नहीं हो गई। काहिरा के तहरीर चौक में देखे गए शर्मनाक सैकड़ों गतिविधियों में यह एक है जहां मिस्र की सेना ने प्रदर्शनों को दबाने के लिए क्र ूरता का परिचय दिया। तीसरे दिन भी हिंसा जारी : मिस्र की राजधानी काहिरा के ऐतिहासिक तहरीर चौक पर मिस्र के सैनिकों और प्रदर्शनकारियों के बीच रविवार को लगातार तीसरे दिन झड़प हुई। इन झड़पों में अब तक 10 लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं।Friday, December 16, 2011
चीन से सावधान
पूर्व रक्षामंत्री और वरिष्ठ नेता मुलायम सिंह यदि संसद में सीधी चेतावनी दे रहे हों कि चीन वर्ष 1962 का इतिहास दोहराने की तैयारी में है और किसी भी वक्त हम पर हमला कर सकता है तो जाहिर है देश इसे अति गंभीरता से लेगा। लेकिन, इसके जवाब में प्रधानमंत्री का सपाट बयान आ जाए कि ऐसे किसी हमले की आशंका सरकार को नहीं है तो इस बात को कितनी गंभीरता से लेने की जरूरत है! वह भी तब जब उसी दिन रक्षामंत्री दूसरे सदन को यह बता रहे हों कि चीन कितनी तेजी से हमारी सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर का जाल बिछा रहा है! हैरत की बात है कि चीन का नाम आते ही सवा अरब की आबादी वाले हमारे मुल्क में राजनेताओं के घुटने कांपने क्यों लगते हैं और क्यों हमें चीन के नाराज होने की चिंता सताने लगती है। हम आधी सदी पहले चीन की पिलाई उस कड़वी खुराक का सबक क्यों भूल जाते हैं जब दोस्ती की तमाम कसमों के बीच उसने अचानक हम पर हमला कर दिया था और हमारी धरती का विशाल क्षेत्र अपने कब्जे में कर लिया था। आज तक हमारी जबरन कब्जाई जमीन पर न केवल उसका कब्जा बना हुआ है बल्कि अपरोक्ष रूप से अब वह कश्मीर की सीमा तक भी घुस आया है। आधी सदी पहले जिन कारणों से चीन ने भारत का मान रौंदना चाहा था, आज उससे भी बड़े कारण ऐसे हैं जो उसे फिर से हमलावर बनने को उकसा सकते हैं। दलाई लामा का भारत की शरण में होना अगर उसके पहले हमले के पीछे का एक बड़ा कारण था तब आज हालात उससे भी गंभीर हो गए हैं जब दुनियाभर के बौद्ध देश दलाई लामा के नेतृत्व में भारत में ही बौद्ध धर्म का प्रकाश स्तंभ खड़ा कर रहे हैं। पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित ऐसे ही एक अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन पर चीन का आंखें तरेरना सभी को याद होगा। दुनिया मान रही है कि यह सदी एशिया की है लेकिन चीन की दिक्कत यह है कि उसे इस महाद्वीप का चौधरी बनने में भारत से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। भारत को असंतुलित बनाए रखने के लिए उसने पाकिस्तान का खुलकर इस्तेमाल किया लेकिन आज पाकिस्तान के खुद असंतुलित होने से चीन का यह मोर्चा उतना असरदार नहीं रह गया है। चीन ने भारत के पड़ोसी देशों को अपने जाल में फंसा कर हमें घेरने की योजना बनायी थी लेकिन बदलते हालात इसमें भी अड़चने पैदा कर रहे हैं। वियतनाम, जापान जैसे एशियाई देश चीन के खिलाफ संतुलन बनाने के लिए भारत का मुंह ताक रहे हैं। दक्षिण चीन सागर में वियतनाम के साथ समुद्र में तेल की खोज में भारत की सहभागिता के खिलाफ चीन ने हमें कैसे धमकाया था यह भी सबको याद होगा। चीन के लिए सबसे गंभीर बात यह हो गई है कि अमेरिका ने प्रशांत और हिंद महासागर में अपनी पैठ बढ़ाने का और भारत, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया से मिल कर संयुक्त निगरानी का फैसला लिया है। चीन तेजी से अपनी नौसेना की ताकत बढ़ाने में लगा है ताकि इन महासागरों पर प्रभुत्व जमा सके। इन महासागरों से दुनिया के अधिकतम व्यापारिक जहाज गुजरते हैं जो सीधे चीन के रहमोकरम पर रहने को मजबूर हो जाएंगे। इसके अलावा इन महासागरों तटों पर बसे देशों के सामने सुरक्षा का सवाल भी पैदा हो जाएगा। इन हालात से निपटने की दिशा में भारत की भूमिका स्वाभाविक रूप से बढ़ गई है और यही कारण है कि हम आज चीन के सीधे निशाने पर आ गए हैं। इसीलिए चीन की मंशा भांपने में ऊर्जा बरबाद करने की जगह हम सजग रहें और मुंह तोड़ जवाब देने की ताकत रखें तो बेहतर होगा।
Wednesday, December 14, 2011
रुक सकती है पाक को अमेरिकी मदद
वाशिंगटन और इस्लामाबाद के तल्ख रिश्तों के बीच पाकिस्तान को मिलने वाली 70 करोड़ डॉलर की मदद पर अमेरिकी कांग्रेस की ओर से रोक लगाने का प्रस्ताव दिया गया है। पाक सरकार जब तक अफगानिस्तान में विनाशकारी आईईडी विस्फोटकों के प्रसार से लड़ने की एक कारगर रणनीति नहीं बनाती यह रोक जारी रखने को कहा गया है। पहले से तनावपूर्ण चल रहे अमेरिका-पाक रिश्तों में कांग्रेस के इस कदम से और तल्खी आ सकती है। इस मामले पर रुख कड़ा करते हुए सीनेट और प्रतिनिधि सभा की एक समिति ने सोमवार को पाकिस्तान को दी जाने वाली 70 करोड़ डॉलर की मदद रोकने पर सहमति जताई। यह सहमति रक्षा अनुज्ञा विधेयक (डिफेंस ऑथराइजेशन बिल) 2012 के संदर्भ में बनी है। पाकिस्तान पर यह सख्ती करने के साथ ही इस विधेयक का लक्ष्य ईरान के सेंट्रल बैंक को निशाना बनाना और गुआंतानामो खाड़ी की जेल को बंद करने की योजना के संदर्भ में नई बंदिशें लगाना है। इस विधेयक पर दोनों सदनों में इसी सप्ताह मतदान होगा। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पहले ही आगाह कर दिया है कि वह ऐसे किसी भी विधेयक पर वीटो करेंगे जिसमें अमेरिका को निशाना बनाने वाले संदिग्ध आतंकवादियों को सैन्य हिरासत में भेजे जाने की बात होगी। आम्र्ड सर्विसेज कमिटी ने एक बयान जारी कर कहा, ‘रोकी जाने वाली राशि में ज्यादातर हिस्सा पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ने के लिए दी जाने वाली 1.1 अरब डॉलर की मदद का है।’ पाकिस्तान दुनिया के उन देशों में शामिल है जिन्हें अमेरिका से बहुत ज्यादा मदद मिलती है। कांग्रेस की समिति के इस प्रस्तावित कदम की पृष्ठभूमि आईईडी विस्फोटकों का प्रसार है। इसका इस्तेमाल आतंकवादी अफगानस्तिान में अमेरिकी और नाटो सैनिकों के खिलाफ करते हैं।
कहीं कंधार न बन जाए काहिरा
अरब देशों में शुरू हुई जास्मिन क्रांति के एक वर्ष के अंदर ही ट्यूनीशिया, मिस्र और लीबिया के तानाशाहों का अंत हो गया और सीरिया तथा यमन भी उसी रास्ते चलते दिख रहे हैं जिस पर मिस्र व लीबिया चले थे। इन परिवर्तनों के मद्देनजर सवाल है कि तानाशाहों के अंत के लिए जो जनक्रांति सम्पन्न हुई थी, आखिर उसका उद्देश्य क्या था? क्रांतिकारी इन देशों में लोकतंत्र की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध थे या फिर इस्लामी कट्रपंथ की प्रतिष्ठा के लिए अथवा निरुद्देश्य? लीबया में मुअम्मर कर्नल गद्दाफी का शासन उखाड़ने वाली नेशनल ट्रांजिशनल काउंसिल की अंतरिम सरकार की घोषणा कि देश के पुनर्गठन में शरई कानून का पालन होगा, ट्यूनीशिया में ‘इस्लामी एन्नहदा पार्टी’ द्वारा सबसे अधिक सीटें प्राप्त कर सरकार को नेतृत्व देने की हैसियत में पहुंचना और मिस्र में संसदीय चुनावों के शुरुआती परिणामों में इस्लामी कट्टरपंथी दलों का दबदबा यही संकेत देता है कि अरब देशों में भड़की क्रांति की मूल प्रेरणा लोकतंत्र नहीं, बल्कि इस्लामी शासन की स्थापना थी। तहरीर चौक पर दूसरी क्रांति के लिए बजे बिगुल के बीच 28 नवम्बर को 508 सदस्यों वाली संसद के निचले सदन पीपुल्स एसेम्बली के लिए मिस्र में मतदान हुआ जिसमें करीब 62 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया। आंदोलनकारी सेना का रवैया देखकर चुनाव का विरोध कर रहे थे, जो अब भी जारी है। क्रांतिकारियों को नहीं लगता कि सेना मिस्र में लोकतंत्र की स्थापना को लेकर गंभीर है। सेना कॉप्टिक ईसाइयों को भी अलग करने का कुचक्र रच चुकी है ताकि उदारवादी शक्तियां कमजोर पड़ जाएं और कट्टरपंथ तंत्र की मूल व्यवस्था का हिस्सा बन जाए। सेना अपने उद्देश्यों में बहुत हद तक सफल होती दिख भी रही है। मिस्र में पहले चरण के चुनाव में इस्लामी पार्टियां सबसे आगे निकल गयीं और धर्मनिरपेक्ष दल चारों खाने चित हो गये। 28-29 नवम्बर को हुए मतदान में इस्लामी पार्टी कुल मतों का कम से कम दो तिहाई हिस्सा हासिल करने में सफल रही। मुस्लिम ब्रदरहुड ने 32.5 प्रतिशत मत पाये और कट्टरपंथी अल नूर पार्टी को 20.7 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। उदारवादी वफ्द पार्टी को 14 प्रतिशत मत मिले जबकि एक अन्य इस्लामी पार्टी अल वसात, जो इस्लामी काूननों की समर्थक है, को 12.9 प्रतिशत। मिस्र के चुनावों के आरंभिक परिणामों में मुस्लिम ब्रदरहुड की राजनीतिक अंग, फ्रीडम ऐंड जस्टिस पार्टी सबसे आगे निकल गयी। मुस्लिम ब्रदरहुड वही संस्था है जिसने तीस साल तक हुस्नी मुबारक के राज का विरोध किया और पिछले वर्ष तक मिस्र में प्रतिबंधित रही। उसके बाद सलाफ अल-नूर पार्टी दूसरे स्थान पर रही। यह पार्टी हजरत मोहम्मद और उनके सहयोगियों के समय में प्रचलित इस्लाम की तर्ज पर मिस्र को चलाना चाहती है। बहरहाल, धर्मनिरपेक्ष गठबंधन के हाशिए पर जाने और कट्टरपंथियों के दबदबे के कारण उदारवादियों को चिंता सताने लगी है। कट्टरपंथियों के विचारों से लगता है कि वे काहिरा को कंधार बनाने की इच्छा से प्रेरित हैं। उदारवादियों की सबसे बड़ी चिंता राष्ट्रपति पद का निर्दलीय उम्मीदवार अति कट्टरपंथी हजेम अबू इस्माइल है जो सऊदी अरब के सलाफी इस्लाम का अनुयायी है। सलाफी उम्मीदवार मिस्र की मुख्य राजनीतिक पार्टी अल-नूर के झंडे के नीचे जमा हो रहे हैं। अबू इस्माइल ने हाल में एक टीवी साक्षात्कार में घोषणा की कि सभी मुस्लिम महिलाओं को परदे में रहना होगा। अविवाहित युवक-युवतियां एक साथ नजर नहीं आने चाहिए। ऐसे कार्यस्थल स्वीकार्य नहीं होंगे जहां लड़के-लड़कियां एक साथ काम करते हों आदि। हालांकि अबू इस्माइल राष्ट्रपति पद का कमजोर उम्मीदवार है लेकिन उसके विचार उन उदारवादियों के की चिंता बढ़ाते हैं जिन्होंने फरवरी में हुस्नी मुबारक की 30 साल की तानाशाही खत्म करने के बाद आजादी का सपना देखा है। जिस तरह चुनाव के जरिए इस्लामवादी दल मिस्र की राजनीतिक में प्रकट हो रहे हैं, उससे सवाल उठता है कि अरब देशों में सत्ता परिवर्तन के पीछे कोई और मकसद तो काम नहीं कर रहा था? गरीब और क्रांति समर्थकों को सपना दिखाया गया कि सत्ताधारी दल पूरी तरह बाहर रखा जाएगा लेकिन इसका यह मतलब नहीं था कि ऐसे दलों के लिए सत्ता तक पहुंचने का रास्ता तैयार किया जाएगा जो देश में आधुनिक और मानवीय मूल्यों के स्थान पर इस्लामी कानूनों या रूढ़िवादी धार्मिक मूल्यों को थोप देंगे। अरब जगत की तानाशाही सत्ताओं की अन्य जो खामियां रही हों लेकिन इस्लामी कट्टटरपंथ को सिर उठाने का अवसर उन्होंने कभी नहीं दिया। सत्ता बचाए रखने के लिए इन्होंने पश्चिमी जगत, खासकर अमेरिका से समर्थन हासिल किया और इसी कारण अपनी सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था में मजहबी कट्टटरपन को प्रश्रय नहीं दिया। बहरहाल मिस्र में हुए चुनाव मिस्र के निर्वाचन उच्च आयोग के लिए बड़ी उपलब्धि हो सकते हैं क्योंकि उसकी नजर में यह फराओ काल के बाद सबसे बड़ा मतदान है, लेकिन उन क्रांतिकारियों के लिए नहीं, जिन्होंने तानाशाह के चंगुल से मुक्ति के बाद वास्तविक स्वतंत्रता का सपना देखा है।
Saturday, December 10, 2011
चीन की नई चाल
हाल ही में चीन के साथ कूटनीतिक तकरार बीजिंग की बड़ी चाल का नतीजा है, जिसे भारत को समझकर उससे निपटना होगा। भारत-चीन सीमा बेहद विवादित क्षेत्र है। 4057 किलोमीटर लंबी यह सीमा विश्व की सबसे लंबी सीमाओं में से एक है। चीन द्वारा बार-बार भारत की सीमा में घुसपैठ के कारण यह अकसर चर्चा में रहती है। चीन सोचसमझ कर दोनों देशों के बीच पूर्णत: सहमति के आधार पर सीमा रेखा का निर्धारण नहीं करना चाहता। भारत का करीब 1,35,000 वर्ग किलोमीटर भूभाग चीन के कब्जे में है। यह करीब-करीब कोस्टारिका देश के आकार के बराबर है। फिलहाल चीन अपने 11 पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद में उलझा हुआ है। किंतु अगर तुलना करें तो भारत के साथ चीन का सीमा विवाद शेष अन्य सभी देशों के साथ सीमा विवाद से कहीं अधिक महत्वपूर्ण और बड़ा है। इसी सप्ताह भारत के साथ होने वाली सीमा वार्ता को चीन द्वारा स्थगित किए जाने से भारत को कोई वास्तविक नुकसान नहीं होगा, क्योंकि गत तीस वर्षो से इस प्रकार की वार्ताओं में भारत को उलझाने के अलावा कोई वास्तविक प्रगति नहीं कर रहा है। 2006 से बीजिंग अरुणाचल प्रदेश के तिब्बत से संबंधों के आधार पर इस पर दावा जता रहा है। वह तमाम सेक्टरों में सैन्य भिडंत के लिए तत्पर दिखता है, जबकि नई दिल्ली सीमा वार्ताओं में उलझी रहती है। भारत-चीन के बीच सीमा वार्ता द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किन्हीं दो देशों के बीच चलने वाली सबसे लंबी वार्ता है। इन वार्ताओं के माध्यम से चीन बराबर भारत पर दबाव बढ़ाता जा रहा है। उदाहरण के लिए, पाक अधिकृत कश्मीर में हजारों सैनिकों को तैनात कर और भारत के खिलाफ कई तरह से कश्मीर कार्ड खेलकर चीन साफ संकेत दे रहा है कि चीन-पाक गठजोड़ जम्मू-कश्मीर पर भारत को मजबूर कर सकता है। अरुणालच को लेकर चीन ने जो सैन्य दबाव बनाया है, वह महज कूटनीतिक है। सच्चाई यह है कि जम्मू-कश्मीर पर भारत की कमजोरी चीनी सैन्य घेराबंदी से और बढ़ गई है। चीन को भारत के खिलाफ पहले अरुणाचल कार्ड और फिर कश्मीर कार्ड खेलने में महज चाल साल लगे हैं। पाक अधिकृत कश्मीर में चीन के बढ़ते कूटनीतिक दखल के कारण भारत को अब जम्मू-कश्मीर के दोनों छोरों पर पर चीनी सेना का सामना करना पड़ेगा। चीन-पाक के मजबूत होते गठजोड़ के कारण इनमें से किसी भी देश के साथ युद्ध की स्थिति में भारत के खिलाफ दो मोर्चे खुल जाएंगे। हालिया कूटनीतिक तकरार किसी अनिष्ट से कम नहीं है। दलाई लामा की भूमिका को सीमित करने के लिए बीजिंग भारत पर दबाव डाल रहा है कि वह तिब्बती नेता को कोई सार्वजनिक मंच उपलब्ध न कराए। चीन के साथ नया विवाद दलाई लामा द्वारा धार्मिक सम्मेलन को संबोधित करने मात्र को लेकर नहीं था। चीन का विदेश मंत्रालय बराबर दबाव डाल रहा है कि दलाई लामा को किसी भी प्रकार का सार्वजनिक मंच मुहैया नहीं कराया जाए। भारत की तिब्बत नीति को अपनी मंशा के अनुरूप ढालने में कामयाब होने के बाद बीजिंग के हौसले बुलंद हैं। 2003 में अटलबिहारी वाजपेयी ने तिब्बत को चीनी के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (टीएआर) के रूप में दर्शाने वाले नक्शों को स्वीकार कर भारत का महत्वपूर्ण कार्ड गंवा दिया। कुछ वर्षो से चीन भारत की क्षेत्रीय अखंडता की खिल्ली उड़ा रहा है, जबकि भारत अपने तिब्बत रुख में कोई बदलाव करने का इच्छुक दिखाई नहीं दे रहा। वास्तव में, मनमोहन सिंह द्वारा पहले तो द्विपक्षीय रक्षा विनिमय को स्थगित करने की घोषणा करना और फिर दब्बूपने के साथ इन्हें फिर से चालू करने से बीजिंग की दबंगई बढ़ गई है। भारत ने रक्षा विनिमय इसलिए स्थगित किया था क्योंकि चीन जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए अलग से वीजा जारी कर रहा था। साथ ही चीन ने भारतीय सेना की टीम के प्रमुख के रूप में उत्तरी कमांड प्रमुख को वीजा देने से इनकार कर दिया था। किंतु इस साल के आरंभ में मनमोहन सिंह ने चीन यात्रा में एक ही बार में दो रियायतें दे डालीं। एक तो उन्होंने रक्षा वार्ता और स्टैपल्ड वीजा मामले को अलग-अलग मुद्दा मानते हुए वार्ता फिर से शुरू करने पर सहमति जता दी और दूसरे, भारतीय सैन्य प्रतिनिधिमंडल में से इसके टीम लीडर उत्तरी कमांड प्रमुख का नाम हटाकर चीन की संवेदनाओं का सम्मान किया। हाल ही में, भारतीय राष्ट्रपति द्वारा नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन का उद्घाटन करने के लिए पहले तैयार होना और बाद में चीन द्वारा तयशुदा सीमा वार्ता स्थगित किए जाने के बाद फैसला पलट देने की आखिर क्या आवश्यकता थी। जिस प्रकार बीजिंग ने रक्षा वार्ता को स्थगित कर भारत को झुकने को मजबूर कर दिया, इससे लगता है कि इस हथकंडे से आगे भी लाभ उठाने का प्रयास करता रहेगा। चीन ने दलाई लामा पर भारत की फजीहत इसलिए की क्योंकि वह जानता है कि वह भारत के पास बड़ी कूटनीतिक संपदा हैं। अब वह चाहता है कि भारत दलाई लामा को न केवल राजनीतिक मंच बल्कि धार्मिक मंच भी उपलब्ध न कराए। दरअसल, बीजिंग का दावा है कि वह विशुद्ध रूप से धार्मिक व्यक्तित्व नहीं हैं, बल्कि लंबे समय से अलगाववादी गतिविधियों में लिप्त हैं। वास्तव में चीन यह याद रखना नहीं चाहता कि उसने 1951 में स्वतंत्र तिब्बत को सेना के बल पर अपने देश में मिला लिया था और अब वह इस कब्जे का विस्तार अरुणाचल को दक्षिण तिब्बत बताकर वहां तक करना चाहता है। बीजिंग दलाई लामा के लिए धार्मिक मंच भी उपलब्ध न कराने की नई दिल्ली से मांग इसलिए कर रहा है क्योंकि वह दलाई लामा के बहाने भारत पर नियंत्रण करना चाहता है। और हैरत की बात यह है कि इस काम में वह भारत की सहायता चाहता है। वास्तव में, चीन के कदम से संकेत मिलता है कि वह तिब्बत में बढ़ते असंतोष को दबाने और वहां अपना शासन और पक्का करने के लिए वृहद कूटनीति पर चल रहा है। वह तिब्बती बौद्धों को अपने सख्त नास्तिक शासन के अधीन करना चाहता है। पंचेल लामा संस्थान पर कब्जा जमाने से लेकर किसी वरिष्ठ लामा के दिवंगत हो जाने के बाद उसका अवतार खोजने की परंपरागत प्रक्रिया पर नियंत्रण से बीजिंग को दीर्घकालीन लाभ होगा। वर्तमान दलाई लामा की मृत्यु के बाद चीन किसी कठपुतली को अगले दलाई लामा के रूप में पेश करने का इंतजार कर रहा है। केवल भारत के पास चीन की इस कूटनीतिक चाल की काट है, और इसे अपने खुद के हितों के लिए यह करना होगा। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
चीन के साथ बर्फ पिघली पर जकड़न बरकरार
भारत और चीन के बीच नई दिल्ली में हुई चौथे दौर की सालाना रक्षा वार्ता ने सैन्य संबंधों पर जमी बर्फ को कुछ कम किया लेकिन संबंधों में जकड़न बरकरार है। करीब दो साल बाद नई दिल्ली में हुई इस बातचीत में दोनों खेमों की राय यही थी कि फिलहाल किसी बड़े कदम की बजाए छोटे डग भरना ही बेहतर है। सीमा पर सैन्य अधिकारियों की मुलाकात को लिपुलेख दर्रे से बदलकर माना दर्रे पर किए जाने के भारतीय प्रस्ताव पर चीन ने केवल गौर करने का भरोसा ही दिया। रक्षा मंत्रालय में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जनरल मा श्याओ थेन और रक्षा सचिव शशिकांत शर्मा की अगुवाई में हुई बातचीत के दौरान बीते तीन सालों से टल रही सैन्य अभ्यास की तारीखों को लेकर भी कोई सहमति नहीं बन सकी। महत्वपूर्ण है कि दोनों देशों के बीच 2008 में भारत के बेलगाम और 2009 में चीन के कुनमिंग में साझा सैन्य अभ्यास हुआ था। रक्षा मंत्रालय सूत्रों के मुताबिक साझा अभ्यास का फैसला निचले स्तर पर वार्ता स्तर बातचीत के जरिए होगा। रक्षा मंत्रालय प्रवक्ता सितांशु कार के अनुसार काफी अच्छे माहौल में हुए बातचीत के दौरान रक्षा संबंधों और सैन्य संवाद बढ़ाने पर भी सहमति बनी। साथ ही दोनों खेमों ने स्वीकार किया की बेहतर सैन्य संवाद आपसी समझ और विश्वास बढ़ाने में कारगर होगा। दोनों पक्षों का मानना था कि विभिन्न स्तर पर सैन्य आदान-प्रदान का दायरा धीरे-धीरे आगे बढ़ाया जाएगा। हालांकि चीन के साथ विश्वास बहाली के नए प्रस्तावों के बारे में पूछे जाने पर मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना था कि बातचीत हुई यही अपने आप में विश्वास बढ़ोतरी का कदम है। सूत्रों के मुताबिक करीब तीन घंटे चली बातचीत में इस बात पर रजामंदी जरूर बनी की इस महीने चीनी सैन्य प्रतिनिमंडल भारत दौरे पर आएगा। साथ ही जनवरी 2012 में भारतीय सेना का एक प्रतिनिधिमंडल चीन जाएगा। भारत की ओर मध्य स्तर के सैन्य अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल भेजा जाएगा। करीब 21 महीने बाद हुए रक्षा संवाद के दौरान दोनों पक्षों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बनाए रखने के लिए 2005 के प्रोटोकॉल के कड़ाई से अनुपालन की जरूरत पर भी जोर दिया। नियंत्रण रेखा पर विश्वास बहाली के लिए भारत ने सीमा पर सैन्य अधिकारियों की बातचीत का स्थान दोनों देशों के बीच खुले व्यापारिक गलियारे लिपुलेख दर्रे की बजाए माना दर्रे तक ले जाने का भी प्रस्ताव दिया। चीन ने इस पर विचार करने का भरोसा दिया है। कुमाऊं क्षेत्र स्थित लिपुलेख दर्रा तिब्बत के पुरंग को जोड़ता है। 1992 में यह दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार के लिए खोली गई पहली पोस्ट है। वहीं माना दर्रा या डुंगरी-ला भारत और चीन के तिब्बत क्षेत्र को जोड़ता है। जनरल थेन की अगुवाई में आए छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने वार्ता के बाद रक्षा मंत्री एके एंटनी और तीनों सेना प्रमुखों की समिति के मुखिया एडमिरल निर्मल वर्मा से भी मुलाकात की।
Friday, December 2, 2011
अपनी उलझनें सुलझा रहा मिस्र
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