अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच पर भारत भले ही ईरान को लेकर अमेरिका को आंखें दिखा रहा हो, लेकिन असलियत यह है कि नई दिल्ली ने तेहरान के साथ अपने रिश्तों की चादर समेटनी शुरू कर दी है। नए वित्त वर्ष के दौरान भारत न सिर्फ ईरान से तेल आयात में भारी कमी करने जा रहा है, बल्कि ईरान को होने वाले निर्यात को भी हतोत्साहित किया जा रहा है। भारत का यह कदम अमेरिका की ओर से तेल खरीदारों को मिल रही चेतावनी का नतीजा माना जा रहा है। एक दिन पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के तेल खरीदार देशों पर नए प्रतिबंधों को मंजूरी दे दी है। इससे पहले अमेरिका द्वारा बनाई गई ऐसे देशों की नकारात्मक सूची में भारत का नाम शामिल नहीं था। ईरान को लेकर वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितता की वजह से ही सरकार ने वहां 4,000 मेगावाट क्षमता का गैस आधारित बिजली प्लांट लगाने की परियोजना की रफ्तार भी धीमी कर दी गई है। इस परियोजना के लिए दोनों देशों के बीच वर्ष 2010 में समझौता हुआ था। ईरान सरकार ने परियोजना को बेहद सस्ती दर पर गैस देने की हामी भरी थी, जबकि इसे स्थापित करने की जिम्मेदारी भारत की थी। पिछले वर्ष ईरान पर परमाणु मसले को लेकर तारी पाबंदी के बाद भारत ने इस परियोजना में रुचि लेनी ही बंद कर दी है। सूत्र बताते हैं कि जब तक ईरान पर पाबंदी को लेकर हालात साफ नहीं होते, इस समझौते के आगे बढ़ने के आसार नहीं हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, ईरान से तेल खरीदना वैसे ही काफी कठिन हो गया है। यही वजह है कि सरकार ने चालू वित्त वर्ष के दौरान ईरान से आयातित तेल में लगभग 26 प्रतिशत की कमी करने का फैसला किया है। वैसे पिछले दो वित्त वर्षो के दौरान ईरान से आयातित तेल में लगातार कमी की गई है। वर्ष 2011-12 में भारत ने ईरान से 1.70 करोड़ टन क्रूड (कच्चा तेल) आयात किया है। यह वर्ष 2010-11 के मुकाबले 8 फीसदी कम है। वर्ष 2012-13 में भारतीय तेल कंपनियां बमुश्किल 1.25 करोड़ टन क्रूड आयात करेंगी। सरकारी तेल कंपनियां ही नहीं, बल्कि एस्सार ऑयल जैसी निजी कंपनी भी ईरान से तेल आयात में भारी कटौती करने जा रही है। भारत वैश्विक स्थिति की वास्तविकता को नजरअंदाज नहीं कर सकता। चीन और रूस भी बाहरी तौर पर ईरान के साथ रिश्ते को अहमियत देने की बात करते हैं, लेकिन इन दोनों देशों ने भी धीरे-धीरे द्विपक्षीय कारोबार को कम करना शुरू कर दिया है। अभी तक निष्पक्ष रहने की बात कर रहे जापान ने भी ईरान से तेल खरीदने में काफी कटौती कर दी है। पाक व ईरान सरकार की तरफ से गारंटी मिलने के बावजूद कोई भी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसी ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन के लिए वित्तीय मदद देने को तैयार नहीं है। चीन की एक कंपनी तैयार हुई थी, लेकिन अंतिम समय में उसने भी हाथ खींच लिया है। यही वजह है कि भारत सरकार ईरान से संबंधित निर्यात ऑर्डर को लेकर भी काफी सावधानी बरत रही है।
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