स्थिरता के कोई आसार नहीं
नेपाल फिर नई राजनीतिक अस्थिरता और अनिश्चितता के भंवर की ओर लुढ़क गया है। उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुसार 27 मई तक संविधान निर्माण का काम पूरा होना है। न्यायालय का इस आदेश पर अड़ना इसलिए स्वाभाविक है, क्योंकि कायदे से संविधान का निर्माण दो साल पहले यानी मई जून 2009 तक हो जाना चाहिए था। ऐसा होता तो इस समय नए संविधान के तहत निर्वाचित सरकार कार्यरत होती। लेकिन संविधान सभा सह संसद का कार्यकाल लगातार बढ़ता गया और संविधान बनाने का काम नहीं हुआ। स्वभाविक ही समय सीमा के कारण नेपाल की संसद सह संविधान सभा में पार्टियों की हलचल बढ़ गयी है। यह हलचल यदि सर्वसम्मति से संविधान की रचना के लिए होती तो समस्या नहीं थी। संविधान निर्माण के लिए पहल के पीछे का इरादा भी संदेहप्रद है और इसके सामने आने के पूर्व ही संघर्ष के लिए विरोधी मोच्रे खड़े हो गए हैं। इनमें एक सात सदस्यीय मोर्चा जनजातीय पार्टियों एवं मधेसियों का है तो दूसरा 15 दलों के मधेसी सांसदों का मोर्चा है जिसने चेतावनी दी है कि यदि पहचान के आधार पर संघीय भावना के अनुरूप संविधान नहीं बना तो वे इसे स्वीकार नहीं करेंगे। संविधान विरोधी कुछ गतिविधियां पर्दे के पीछे भी चल रही हैं। अब तक संविधान का एक शब्द भी नहीं लिखा गया है। एक-एक पहलू पर इतने गहरे मतभेद हैं कि इसका लिखा जाना मुश्किल ही है। अगर अंतिम कुछ दिनों में दिन रात काम करके संविधान का दस्तावेज तैयार कर भी लिया जाए तो परिस्थितियां बता रहीं हैं कि उसके विरुद्ध छोटे-बड़े आंदोलन हो जाएंगे जिससे उबरना नेपाल के लिए कठिन होगा। इस समय मुख्य प्रश्न यह बनाने की कोशिश हो रही है कि सीधे जनता से निर्वाचित राष्ट्रपति को कार्यकारी प्रधान बनाया जाए या भारत की तरह संसद के बहुमत दल के नता के रूप में प्रधानमंत्री के हाथ में मुख्य शक्तियां रहें। सरकार का नेतृत्व करने वाले माओवादी निर्वाचित राष्ट्रपति के लिए पहल कर रहे हैं। लेकिन नेपाली कांग्रेस, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी एमाले इससे सहमत नहीं हैं। ये संसद के बहुमत से निर्वाचित प्रधानमंत्री के पक्ष में हैं। मधेसी एवं जनजातीय पार्टियों का कहना है उनके लिए यह मुद्दा है ही नहीं। राजनीतिक भौतिक संरचना को लेकर भी मतभेद गहरे हैं। संघीयता यानी संघीय ढांचे पर सहमति नहीं बन पाई है। नेपाली कांग्रेस संघीयता पर पूरी तरह तैयार नहीं है। उसका कहना है कि राज्यों की रचना उत्तर से दक्षिण जाए। इसके विपरीत भूगोल को वह नेपाल तोड़ने की साजिश मान रही है। पहले भी नेपाली कांग्रेस के शासनकाल में इस तरह की अंचल व्यवस्था थी जिसमें हिमाल, पहाड़ और तराई के जिलों को मिलाकर अंचलों का गठन किया गया था। चार मधेसी पार्टियां ऐसी संघीयता चाहती हैं, जिसमें मधेस के ज्यादा टुकड़े न हों। जनजातीय पार्टियां हर हाल में जातीय पहचान के आधार पर संघीयता चाहती हैं। उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि शासन की कार्यकारी शक्तियां जनता द्वारा निर्वाचित राष्ट्रपति के पास हों या संसद में बहुमत द्वारा निर्वाचित प्रधानमंत्री के हाथों। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी एमाले संघीयता के पक्ष में है, पर जनजातीय या किसी जातीय क्षेत्रीय पहचान के आधार पर नहीं। प्रश्न यह भी है कि अगर संघीयता हो तो फिर राज्य कितने हों और उनकी प्रकृति कैसी हो? दस्तावेज समिति को लिंबुआन, किरात, मधेस आदि की मांगों को आधार बनाकर 14 राज्य बनाने का दस्तावेज सौंपा गया था जिसे उसने स्वीकार कर लिया। मधेस राज्य बनाने की घोषणा तो हो गई, पर इसकी संख्या पर सहमति नहीं हुई। समस्या सीमांकन पर भी है। स्वयं मधेसी पार्टियों एवं जनजातीयों के बीच इस पर विवाद है। अब मधेसी पार्टियों को लग रहा है कि एक मधेस एक प्रदेश संभव नहीं है, इसलिए वे दो या तीन राज्यों पर मान सकते हैं। यह केवल संभावना है। जो दो मोच्रे अभी बने हैं, उसका नेतृत्व मधेस के प्रमुख नेता उपेन्द्र यादव कर रहे हैं। वे बातचीत में शामिल नहीं हैं। केवल समावेशी चुनाव पण्राली पर सबकी सहमति है। इसके अनुसार उम्मीदवारों की जीत-हार तो प्राप्त मतों से होगी, पार्टी को प्राप्त मतों के आधार पर कुछ सीटें निर्धारित होंगी। इसके पीछे सोच यह है कि सभी तरह के सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व हो जाएगा। साफ है कि संविधान के किसी प्रारूप पर सर्वसम्मति संभव नहीं। इसमें राष्ट्रपति राम वरण यादव हस्ताक्षर करेंगे या नहीं यह भी प्रश्न खड़ा है। उनका खुद का बयान अनिश्चितता में वृद्धि करने वाला है। मुख्य पार्टियों के बीच अविास की खाई कायम है। जनजातीय समूहों की क्षेत्रीय व सांस्कृतिक अस्मिता की भावना जिस तरह परवान चढ़ गई है, उसे न तत्काल कम किया जा सकता है न उसकी पूर्ति हो सकती है। उनके बीच भी मतभेद हैं। मधेसियों के बीच एकता नहीं है तो संविधान का विरोध निश्चित है। राजनीतिक दलों की विफलता ने पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र को भी परोक्ष रूप से राजनीति का अवसर दे दिया। उनके समर्थक संविधान निर्माण में बाधा डलवाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी मुख्य सक्रियता जनजाति मुक्ति पार्टी के माध्यम से है। ज्ञानेन्द्र ने बयान नहीं दिया, पर वे संघीयता नहीं चाहते। सुदूर पश्चिम के इलाकों की जनजातियों को मिलाकर यह संगठन खड़ा हुआ। यह पिछले दो साल से आंदोलन कर रहा है। इसमें पूर्व माओवादी भी हैं। यह जातीय संरचना के आधार पर अलग राज्य मांगते हैं। सरकार ने उससे बातचीत की एवं उसकी मांगों को यथासंभव स्वीकारने का आासन दिया है। इस आंदोलन के कारण 15-16 जिले दो वर्ष तक अशांत रहे। नेपाल आर्मी, तराई आर्मी आदि के गठन के पीछे ज्ञानेन्द्र का ही हाथ माना जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल ने यूं ही बयान नहीं दिया कि राजा ने लोकतंत्र के रास्ते बाधा डाली तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। नेपाल की मुश्किलें यहीं तक सीमित नहीं हैं। माओवादियों को अपना घर एक रखना मुश्किल हो रहा है। पीएलए को सेना में समायोजित करने की स्वीकृति तो मिल गई, पर काफी कम संख्या में इनका समायोजन हो पाया है। सेना ने नियम बना दिया कि पीएलए के सदस्यों को छह महीने का प्रशिक्षण लेना होगा और उसमें सफल होने पर ही समायोजन हो पाएगा। दूसरे, पीएलए में जो कमांडर थे, उन्हें ज्यादा से ज्यादा हवलदार स्तर पर लिया जा रहा है। इससे इसके ज्यादातर सदस्य सेना में जाने की बजाय निर्धारित छह लाख की अनुकंपा व पुनर्वास राशि लेना चाहते हैं। लेकिन यहां भी समस्या है। पूरी राशि एकमुश्त नहीं, तीन किश्तों में दिए जाने की बात है। कहा जा रहा है कि आप घर जाइए, हम वहीं आकर किश्त प्रदान करेंगे। इससे पीएलए अपने को ठगा हुआ महसूस कर रही है। पीएलए माओवादी संघर्ष की रीढ़ रहे हैं पर सबसे ज्यादा दुर्दशा इन्हीं की हो रही है। इन्हें समर्पण के साथ प्रति महीने तीन हजार रुपया दिए जाने का प्रावधान पार्टी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। कहा जाता है कि पीएलए के सदस्यों को पूरा तीन हजार रुपया नहीं मिलता। इसके खिलाफ कई बार हंगामा हुआ और उन्होंने अपने कई कमांडरों को ही बंधक बना लिया। इस प्रकार पूरा परिदृश्य अनिश्चय की ओर जाता दिख रहा है। अगर शासकीय पण्राली, आंतरिक राजनीतिक ढांचा, उनका भौगोलिक सीमांकन, जनांकीकीय समीकरण, संघीय संरचना, राज्यों के अधिकार आदि बिन्दुओं पर ही सहमति नहीं तो फिर उस संविधान का अर्थ क्या होगा और उसे कौन मानेगा जिसके निर्माण के लिए कोर्ट ने 27 मई तक अंतिम समय सीमा निर्धारित कर दी है। इस बीच अगर माओवादियों के बीच ही संघर्ष आरंभ हो गया तो क्या होगा! इसलिए मानकर चलना होगा कि नेपाल कम से कम कुछ सालों तक अस्थिरता, अशांति एवं अनिश्चय की अवस्था में फंसा रहेगा।
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