Monday, April 30, 2012
स्थिरता के कोई आसार नहीं
अमेरिकी अर्थव्यवस्था धराशायी करना चाहता था ओसामा
| अमेरिकी विमान को उड़ाने की साजिश रचने के लिए जेल में बंद रह चुके ब्रिटेन के साजिद बदात ने न्यूयॉर्क की एक अदालत को बताया है कि ओसामा बिन लादेन ने उससे कहा था कि उड्डयन क्षेत्र में हमले कर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को धराशायी किया जा सकता है। साजिद बदात ने कहा कि उसकी साजिश जूते में छिपे विस्फोटक से सौ यात्रियों को उड़ा देने की थी। लेकिन उसने अंतिम क्षण में अपना इरादा बदल दिया था। साजिद का रिकॉर्डेड बयान न्यूयॉर्क की अदालत में सुनाया जा रहा था। इससे पहले अभियोग पक्ष को सहयोग करने के कारण बदात को मिली 13 साल की सजा पूरी होने से दो साल पहले ही रिहा कर दिया गया था। यह भी जानकारी मिल रही है कि साजिद बदात को कैसे इंग्लैंड के बाबर अहमद ने चरमपंथी हमले के लिए उकसाया। बाबर अहमद चरमपंथी गतिविधियों के आरोप में पिछले सात साल से भी अधिक समय से जेल में बंद है और प्रत्यर्पण का इंतजार कर रहा है। साजिद बदात का एक सप्ताह पहले ब्रिटेन में रिकॉर्ड किया गया यह बयान सोमवार को ब्रुकलिन की अदालत में सुनाया गया। 2010 में जेल से रिहा होने के बाद उसने अमेरिका जाने से मना कर दिया था। बदात को डर था कि अल कायदा के 9/11 के हमले के बाद जूते में रखे बम को बिस्फोट करने के मामले में अमेरिका में उसे गिरफ्तार किया जा सकता है। बदात ने ओसामा बिन लादेन के काम करने के तरीके के बारे में बहुत ही दिलचस्प ब्योरा दिया है। ग्लोसेस्टर के ग्रामर स्कूल के छात्र रहे 33 वर्षीय बदात ने बताया कि उसने अफगानिस्तान के एक समूह से 1990 के दशक के अंतिम सालों में दो साल तक तनख्वाह ली थी। बदात ने विस्तार से बताया कि कैसे उसने लोगों को विस्फोटक पदार्थ का इस्तेमाल करना सिखाया था। हालांकि उसने यह भी कहा कि उसे नहीं लगता है कि उसके किसी छात्र ने बम विस्फोट किया होगा। बदात ने कहा कि 9/11 के बाद अल कायदा के नेताओं ने उसे ‘बुलाकर हवाई जहाज में विस्फोट करने को कहा था।’ बदात के मुताबिक, लादेन के साथ आमने-सामने की मुलाकात में लादेन ने किए जाने वाले हमले को सही ठहराया था। अल-कायदा के नेता ने बदात से कहा, ‘अमेरिकी अर्थव्यवस्था एक जंजीर की तरह है। अगर तुम उस जंजीर का एक लिंक तोड़ देते हो तो पूरी अर्थव्यवस्था धराशायी हो जाएगी।’ अल-कायदा के उस नेता ने कहा, ‘9/11 के हमले के बाद हवाई जहाज पर कोई भी हमला उड्डयन उद्योग को नष्ट कर देगा और अमेरिका की पूरी अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी।’ बदात ने बताया कि उसे अंतिम आदेश खालिद शेख मोहम्मद द्वारा दिया गया। खालिद शेख मोहम्मद वही आदमी है जिसने 9/11 के हमले की जवाबदेही ली थी और जिसके उपर गुआंटानामो में सैन्य ट्रिब्यूनल में मुकदमा चला था। रिकार्डेड बयान में कोर्ट को बताया गया कि बदात ने खुद को बम विस्फोट में मारने के लिए तैयार कर लिया था लेकिन इंग्लैंड वापस लौटने के बाद उसने अपना इरादा बदल दिया |
चीन की बौखलाहट
अग्नि-5 के सफल परीक्षण पर चीन तिलमिला उठा है। चीन के अखबार ग्लोबल टाइम्स ने दावा किया कि चीन की परमाणु ताकत अधिक मजबूत है तथा नई दिल्ली इसका मुकाबला करने में अक्षम है। चीन के अधिकांश हिस्सों तक भारत की मिसाइलें पहुंच सकती हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उसे चीन के साथ विवाद के दौरान अहंकारी होने से लाभ मिलेगा। वहीं चीन सरकार ने सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दोनों देश प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं और उनके बीच बेहतर संबंध हैं। हालांकि इस प्रक्षेपण से क्षेत्र में हथियारों की होड़ का एक और दौर शुरू हो सकता है। सवाल यह है कि चीन स्वयं यह कार्य पहले ही कर चुका है तो फिर वहां का मीडिया ऐसी बातें क्यों कर रहा है। चीन के पास 11500 किलोमीटर की दूरी तक मार करने की क्षमता वाली अंतर महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल डोंग फोंग-31 ए है, जो दक्षिण एशिया में कहीं भी निशाना साध सकती है। इसमें ठोस ईंधन का इस्तेमाल किया गया है। तीन चरणों वाली यह मिसाइल 1800 किलोग्राम वजन के थर्मो न्यूक्लियर वारहेड को ले जा सकती है। डोंग फोंग-31 ठोस ईंधन व तीन चरणों वाली है। यह 1000 किलोग्राम की परमाणु आयुध के साथ 10000 किलोमीटर की दूरी तक की संहारक क्षमता रखती है। चीन ने भारतीय सीमा पर सीएसएस-5 मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात कर रखी हैं। परमाणु क्षमता से लैस इस मिसाइल को डीएफ-21 के नाम से जाना जाता है। यह 1991 से चीन की सैन्य सेवा में है। इसकी लम्बाई 10.7 तथा व्यास 1.4 मीटर है। इसकी मारक क्षमता 1700 से 3000 किलोमीटर है। डीएफ-21 मिसाइल की गति 10 मैक है। इसमें ठोस ईंधन का इस्तेमाल किया गया है। इन मिसाइलों की जद में कोलकाता, डिब्रूगढ़, नई दिल्ली चंडीगढ़ आदि होंगे। यह मिसाइल 600 किलोग्राम वजन का परमाणु विस्फोटक अपने साथ ले जाने में सक्षम है जो किसी शहर के विध्वंस के लिए काफी है। चीन ने इससे पहले भारतीय सीमा पर सीएसएस-2 आइएमबीएम मिसाइलें तैनात कर रखी थीं। चीन की डोंग फोंग-3 ए मिसाइल 2000 किलोग्राम थर्मो न्यूक्लियर आयुध के साथ 2800 किलोमीटर की दूरी तक मार करने में सक्षम है। इसमें तरल ईंधन का प्रयोग किया गया है। यह एक चरण वाली मिसाइल है। दो चरण व तरल ईंधन वाली डोंग फोंग-4 ए मिसाइल 5000 किलोमीटर तक मार कर सकती है। यह मिसाइल भी अपने साथ 2000 किलोग्राम थर्मो न्यूक्लियर वारहेड ले जा सकती है। डोंग फोंग-5 ए में भी तरल ईंधन का प्रयोग किया गया है। यह भी दो चरण वाली मिसाइल है, लेकिन यह 2000 किलोग्राम के थर्मो न्यूक्लियर वारहेड के साथ 10000 किलोमीटर की दूरी तक की संहारक क्षमता रखती है। चीन ने भू-आधारित मध्यम दूरी तक सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल प्रणाली एसएएम की तैनाती कर दी है जो ऊंची और बेहद नीची उड़ान भरने वाले लक्ष्यों को भेदने में सक्षम है। इस प्रणाली को रेड फ्लैग-16 नाम दिया गया है। यह शेनयांग सैन्य क्षेत्र की हवाई रक्षा प्रणाली से जुड़ी होगी। हाल ही में दो एचक्यू-16 मिसाइलें इस यूनिट द्वारा सफलता पूर्वक छोड़ी गई थीं। चीन युद्धपोत रोधी मिसाइलों को प्रशांत महासागर में तैनात कर रहा है। यह एंटी शिप बैलिस्टिक मिसाइल डोंग फोंग-21डी मिसाइल का परिवर्धित रूप है। इसकी मारक क्षमता 20000 किलोमीटर की दूरी तक है। यह तेज गति से चल रहे किसी भी युद्धपोत को ध्वस्त करने की क्षमता रखती है। चीन ने अंतरिक्ष में हमला करने वाली नई मिसाइलें विकसित कर ली हैं। चीन ने 12 जनवरी, 2010 को हवा में ही मिसाइल मार गिराने का सफल परीक्षण किया था। इससे पहले जनवरी 2007 में सैटेलाइट निरोधक प्रणाली का सफल परीक्षण किया था। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) भारत-चीन की मिसाइल क्षमताओं पर डॉ. लक्ष्मी शंकर यादव की टिप्पणी
Monday, April 16, 2012
साझा कारोबारी हित का शुभ मुहूर्त
निश्चित रूप से इन दिनों भारत और पाकिस्तान कारोबारी संबंधों को मजबूत करने के लिए एक के बाद एक सही दिशा में कदम आगे बढ़ा रहे हैं। हाल ही में 13 अप्रैल को भारत-पाक सीमा पर पहले अटारी-वाघा एकीकृत चेकपोस्ट का शुभारंभ करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री पी चिंदबरम और पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शाहबाज शरीफ ने कहा कि भारत और पाकिस्तान व्यापार के जरिए अपने संबंधों को सुधारने के लिए राजी हैं। इसके लिए नई सरल वीजा पण्राली तैयार की जाएगी। दोनों देशों के बीच सड़क मार्ग के जरिए व्यापार में आने वाली बाधाओं को भी दूर किया जाएगा। इसके साथ भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा और पाकिस्तान के वाणिज्य मंत्री फहीम ने कहा कि वे एक-दूसरे देश को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को अनुमति देंगे। साथ ही साझा कारोबारी परिषद का जल्द गठन किया जाएगा। बहुउद्देशीय कारोबार वीजा एक वर्ष के लिए होगा। जल्द ही इस संबंध में समझौते पर हस्ताक्षर हो जाएंगे। भारत और पाक व्यापार के परिप्रेक्ष्य में यह नया परिदृश्य काफी महत्वपूर्ण है। इसके कुछ दिन पहले 8 अप्रैल को पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की एक दिवसीय भारत यात्रा अन्य शिखर बैठकों की तर्ज पर होने वाली कोई ऐसी यात्रा नहीं थी जिसमें दोनों देशों के व्यापार संबंधों पर कोई लंबी-चौड़ी बातचीत होती। लेकिन दोनों देशों के नेता घरेलू राजनीति के मुख्य मुद्दों आतंकवाद और कश्मीर पर अपनी पूर्व स्थिति बरकरार रखते हुए भी कुछ ऐसे मुद्दों पर आगे कदम बढ़ाने के इच्छुक दिखे जिन पर आसानी से उपयोगी समझौते को अंजाम दिया जा सकता है। इनमें सबसे प्रमुख मुद्दा कारोबार का है। मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के उन कदमों को लाभप्रद बताया, जो उसके द्वारा पिछले कुछ महीनों में भारत के साथ आर्थिक रिश्ते सुधारने की दिशा में उठाए हैं। कहा गया है कि दोनों देश शुल्क और अन्य अड़चनों को दूर करने की दिशा में पहले के मुकाबले अधिक तेजी से कार्रवाई करेंगे। सीमा पार करते वक्त महसूस होने वाली बुनियादी ढांचे की कमी और नियमों तथा मानकों को उपयुक्त बनाए जाने की बात कही गई। कठोर वीजा नियमों को उदार बनाने संबंधी मंतव्य भी व्यक्त किया गया। यह तय हुआ है कि दोनों देशों के कारोबारी एक साल के लिए वीजा प्राप्त कर सकेंगे। कोई दो महीने पहले वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा कारोबारियों के बड़े शिष्टमंडल के साथ पाकिस्तान में इंडिया शो आयोजित करवा चुके हैं। अटारी और वाघा सीमा पर एकीकृत जांच चौकी के पूरी तरह खुल जाने से भारत से पाकिस्तान को पशुधन, साब्जियों और अन्य कई वस्तुओं के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। सुविधा पूर्ण यात्रा, कागरे टर्मिनल, उचित सीमा शुल्क और आव्रजन सुविधाओं के मद्देनजर इस आधुनिक चेकपोस्ट के खुलने से दोनों देशों के बीच व्यापार को कई गुना बढ़ाने में मदद मिलेगी। अब ज्यादा से ज्यादा ट्रक सीमा पार कर सकेंगे। यह माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच खासतौर से शक्कर, चाय, गेहूं, कपास, होजियरी, मशीनरी, कृषि उपकरण, रसायन तथा सॉफ्टवेयर का कारोबार छलांगे लगाकर बढ़ता जाएगा। भारत में पाकिस्तान से आ रही शक्कर अन्य देशों की तुलना में सस्ती होगी। भारत से पाक को भेजी जा रही चाय सस्ती पड़ेगी। भारत चाय का सबसे बड़ा उत्पादक है, जबकि पाक चाय का बड़ा आयातक। भारत के गेहूं को पड़ोस में अच्छा बाजार मिलेगा। पाक को दूरस्थ देशों से महंगा गेहूं आयात करना पड़ता है। बेहतर गुणवत्ता और कम कीमत के कारण भारत का कपास पाकिस्तान में स्थान बनाएगा। भारत-पाक के बीच 2.7 अरब डॉलर का जो कारोबार होता है, उसमें दस गुना इजाफे की संभावना है। निश्चित रूप से पाकिस्तान के द्वारा भारत को पसंदीदा देश का दर्जा दिए जाने के बाद भारत और पाक के कारोबारियों की उम्मीदें गाढ़ी होंगी। वैसे दो नवम्बर 2011 को पाकिस्तान ने भारत को व्यापार के लिए सर्वाधिक पसंदीदा देश (एमएफएन) का दर्जा देने का सैद्धांतिक निर्णय लिया था। पर अब भी इस बारे में पाकिस्तान यही कह रहा है कि भारत को एमएफएन के दज्रे संबंधित अंतिम निर्णय कुछ और उच्च विचारिवर्मश के बाद लिया जाएगा। भारत, पाकिस्तान को एमएफएन देश का दर्जा 1996 में ही दे चुका है। भारत को एमएफएन का दर्जा दिए जाने के बाद भारत के कई उद्योगों मसलन पेट्रोलियम उत्पाद, आयरन और स्टील, फार्मा, केमिकल, भारी उद्योग, ऊर्जा और आईटी उद्योग को फायदा होगा। किंतु वास्तविक लाभ आम उपभोक्ता और कारोबारियों को होगा। सामान पाकिस्तान पहुंचने पर लागत में कमी आएगी। अभी दोनों में से कोई भी देश अपने व्यवसायियों के लिए एक-दूसरे के यहां बैंक खोलने की अनुमति नहीं दे पाया है। इस कारण भारत और पाकिस्तान के बीच कारोबारों में क्लीयरिंग तेहरान स्थित एशियन क्लीयरिंग यूनियन से होता है। यह सब कार्य धीमी गति से होता है और इससे कारोबार को नुकसान पहुंचता है। वस्तुत: इस समय भारत-पाक की आर्थिक मित्रता के नए कदमों की दोनों देशों के उद्योग- व्यापार जगत के द्वारा उत्सुकता से प्रतीक्षा की जा रही थी। यदि हम पिछले कुछ वर्षो के आर्थिक एवं कारोबारी संबंधों की डगर को देखें तो पाते हैं कि पाकिस्तान के लोगों की आशंका रही है कि मुक्त व्यापार का लाभ केवल भारत को मिलेगा। पाकिस्तान द्वारा मुक्त व्यापार से उसके उद्योग चौपट होने और उसके बाजार भारतीय उत्पादों से भर जाने संबंधी आशंका जताई जाती रही है। वहां कई लोगों की मान्यता है कि वे दक्षिण एशिया से खुद को अलग कर अरब और इस्लामिक दुनिया के साथ संबंध जोड़कर व्यापार में अधिक आगे बढ़ सकते हैं। भारत में भी कुछ लोगों की मान्यता रही है कि भारत पड़ोसियों से खुद को अलग कर पूर्व की ओर व्यापार केंद्रित कर अधिक समृद्ध हो सकेगा। इस विषय पर पाकिस्तान में अर्थ विशेषज्ञ जोरदार चर्चाएं करते रहे हैं कि क्या पाक को अमेरिका, यूरोपीय यूनियन जैसे देशों के साथ ही व्यापार का अनुसरण करना चाहिए या व्यापार के लिए सहयोगी चुनते वक्त उन देशों को भी प्राथमिकता देनी चाहिए, जो पड़ोसी हैं। तुलना की जाती रही है कि भारत पाकिस्तान के ठीक दरवाजे के सामने है, जबकि अमेरिका, पाकिस्तान से सात हजार मील दूर है। अंतत: पाकिस्तान का आर्थिक मंच इस बात पर एकमत हुआ है कि भारत से अपने व्यापार संबंध बेहतर बनाने पर पाकिस्तान को अब अधिक जोर देना चाहिए। भारत-पाक व्यापार के नए कदम को सार्क देशों के अर्थ विशेषज्ञों ने भी सराहा है। वे यह कह रहे हैं कि भारत-पाक की आर्थिक मित्रता 21वीं सदी में एशिया का आर्थिक महत्व बढ़ा देगी। क्षेत्र के सबसे बड़े देश होने के कारण भारत और पाकिस्तान पर सार्क को पुनर्जीवित करने की खासतौर से जिम्मेदारी है। 1985 में दक्षिण एशिया में शांति, सहयोग और व्यापार बढ़ाने के लिए दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की स्थापना की गई थी। आठ देश भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका, मालदीव, नेपाल और अफगानिस्तान इसके सदस्य हैं। मुक्त व्यापार के लिए ठोस कदम दिसम्बर 1995 में ‘साफ्टा’ की स्थापना की पहल के साथ आगे बढ़े। साफ्टा की धीमी गति का सबसे प्रमुख कारण भारत और पाकिस्तान के बीच का संघर्ष भी रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच यह ऐतिहासिक समय है और दोनों को आपसी कारोबार को आगे बढ़ाने की नई कोशिश को धीमा नहीं पड़ने देना चाहिए। पाकिस्तानी संसद को अब जल्द से जल्द भारत को एमएफएन की औपचारिक घोषणा कर देनी चाहिए। यह भी ध्यान रखना होगा कि दोनों देशों के बीच कारोबार में मजबूती तभी आएगी, जब एक-दूसरे के यहां निवेश के लिए भी कोशिश तेज की जाएगी। दोनों देशों के रिश्तों को बेहतर करने में कारोबार और निवेश का अहम योगदान होगा। उम्मीद है कि अब भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापारिक मैत्रीपूर्ण संबंधों के नए दौर को दोनों देशों की सरकारें और दोनों देशों के कारोबारी तेजी से आगे बढ़ाएंगे और भारत-पाकिस्तान परस्पर कारोबार से विकास और खुशहाली के नए अध्याय लिखे जाएंगे। भारत-पाक के बीच 2.7 अरब डॉलर का जो कारोबार होता है , उसमें दस गुना इजाफे की संभावना है
Monday, April 9, 2012
आसान नहीं सू की की राह
अभी यह दावा करना कठिन है कि म्यांमार में हुए 45 सीटों के उपचुनाव में जनतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी की भारी विजय से वहां फौजी बूटों की हलचल कम हो जाएगी या लोकतंत्र को पंख फैलाने का मौका मिल जाएगा। वैसे, सैन्य शासकों को सत्ता से उखाड़ फेंकना आसान नहीं होता है। वह भी तब, जब वे पूरी क्रूरता से जनतंत्र का दमन करने पर आमादा हों। म्यांमार में सैन्य शासकों की तानाशाही की जड़ें और भी गहरी हैं। फिर भी यह उपचुनाव म्यांमार और विश्व के स्वतंत्रता प्रेमियों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। साथ ही 2015 में होने वाले आम चुनावों की बेहतरीन खुशबू की आहट भी। उपचुनाव परिणामों से साफ है कि म्यांमार की जनता अब सैन्य वर्दी के खोल से बाहर निकल लोकतांत्रिक परिवेश में सांस लेना चाहती है। एक ऐसे नए म्यांमार को गढ़ना चाहती है, जिसकी संप्रभुता जनता में निहित हो और लोग राज्य प्रदत्त मौलिक अधिकारों से लैस हों। किंतु उनकी इच्छाओं का सम्मान कितना होगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में है। काफी कुछ इस पर निर्भर करेगा कि म्यांमार के वर्तमान सत्ताधारी सैन्य शासकों की मंशा क्या है? क्या वे वाकई में म्यांमार में जनतंत्र को फलते-फूलते देखना चाहते हैं या लोकतंत्र की बहाली के नाम पर जनता की आंख में धूल झोंकना चाहते हैं? कहना मुश्किल है। इसलिए कि इस तरह की चुनावी शोशेबाजी दिखाकर वे पहले भी लोकतंत्र का हरण कर चुके हैं। फिर भी म्यांमार की जनता को धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि वह लोकतंत्र की उम्मीद छोड़ने को तैयार नहीं है। सैन्य शासकों के प्रतिबंध के बाद 22 सालों के दरम्यान यह पहला मौका है, जब आंग सान सू की ने उपचुनाव में हिस्सा लिया है। वह 1990 से अपने घर में नजरबंद थी। नवंबर 2010 में उन्हें नजरबंदी से रिहा किया गया। 27 मई, 1990 को हुए आम चुनाव में उनकी पार्टी ने हिस्सा लिया था और तकरीबन अस्सी फीसदी सीटों पर जीत दर्ज की, किंतु सेना ने जनतंत्र के फैसले का सम्मान नहीं किया। सू की को म्यांमार की सत्ता सौंपने के बजाए उन्हें नजरबंद कर दिया। विश्व हैरान रहा कि जब जनादेश का सम्मान ही नहीं करना था तो फिर चुनाव की क्या जरूरत थी। आज विश्व बिरादरी म्यांमार के सैन्य तंत्र के खिलाफ है। उस पर तमाम आर्थिक प्रतिबंध भी लादा है। आंग सान सू की को लोकतंत्र की प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। विश्व बिरादरी का म्यांमार पर दबाव है कि वह लोकतंत्र की बहाली की दिशा में ठोस कदम उठाए, लेकिन म्यांमार का सैन्य प्रशासन लोकतंत्र के नाम पर छल कर रहा है। विश्व जनमत के दबाव के आगे वह 2010 में लोकतंत्र की बहाली का चुनावी प्रहसन तो खेला, लेकिन उसका सार्थक नतीजा सामने नहीं आया। सूकी ने 2010 के चुनाव का बहिष्कार किया। वजहें साफ थीं। 1990 के चुनावी नतीजे जो उनके पक्ष में आए थे, उसका फौजी वर्दी ने सम्मान नहीं किया था। दूसरे, वह चुनाव में भाग लेती तो निश्चित तौर पर 1990 के जनादेश के सम्मान का उल्लंघन होता। वह पहले ही भांप चुकी थीं कि सैन्य शासन चुनाव में भारी गड़बड़ी कर सकता है। जो अंतत: सच साबित हुआ। चुनाव में उम्मीदवारों को वोटर लिस्ट तक मुहैया नहीं कराई गई। चुनाव प्रचार और सभाओं पर प्रतिबंध लगाया गया। नतीजा जो सामने आया, वह बिल्कुल ही चौंकाने वाला नहीं रहा। अंतर सिर्फ यह देखने को मिला कि सैन्य प्रशासकों के स्थान पर सेना समर्थित थीन सीन की सरकार अस्तित्व में आ गई। कुल मिलाकर फौजी बूटों की धमक कायम रही। अब जब उपचुनाव का परिणाम आ गया है और लोकतंत्र के पक्ष में बयार बहती दिखने लगी है तो निश्चित रूप से म्यांमार की तस्वीर बदलने की उम्मीद की जा सकती है। हालांकि यक्ष प्रश्न अभी भी जस का तस है। वह यह कि क्या फौजी हुकुमत इस जनादेश का सम्मान करेगी? क्या वह नागरिक अधिकारों के प्रति संवेदनशील होगी? सू की ने इस उपचुनाव को निष्पक्ष और स्वतंत्र न मानते हुए भी उसका बहिष्कार करना मुनासिब नहीं समझा। शायद वह समझ चुकी हैं कि लोकतंत्र की स्थापना के लिए चुनाव में हिस्सेदार बनना और जनता के बीच जाना जरूरी है। हालांकि इस उपचुनाव परिणाम से सत्ताधारी दल की सेहत पर विशेष फर्क पड़ने वाला नहीं है। संसद में अब भी सेना का प्रभुत्व बरकरार है, लेकिन संसद में चालीस से अधिक सीटें जीतने वाली विपक्ष की नेता सू की का हौसला बुलंद है। अब उन्हें पहली बार कानून बनाने में योगदान देने का अवसर मिलेगा। शानदार ऐतिहासिक जीत से अभिभूत सूकी ने उम्मीद जताई है कि यह जीत लंबे समय से दमन का शिकार देश में एक नए युग की शुरुआत होगी।
क्या म्यांमार में लौटेगा लोकतंत्र
लगभग दो दशक तक नजरबंद रहने के बाद 66 वर्षीय नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सांग सू की म्यांमार की संसद में प्रवेश करेंगी। गौरतलब है कि पिछले पांच दशक से म्यांमार में सेना ही शासक बनी हुई है। इसलिए यह प्रश्न प्रासंगिक है कि क्या आंग सांग सू की की जीत से इस देश में लोकतंत्र की बहाली का मार्ग प्रशस्त होगा? बीते 1 अपै्रल को म्यांमार में 664 सीटों वाली संसद की खाली पड़ी 45 सीटों के लिए उपचुनाव हुआ। हालांकि इन सभी सीटों पर सू की के समर्थक जीत भी हासिल कर लेते तो भी नई सरकार में सत्ता संतुलन में कोई परिवर्तन नहीं आता। वैसे म्यांमार की सरकार सिविलियन है, लेकिन यह स्थिति केवल नाम के लिए है, क्योंकि सरकार का नियंत्रण रिटायर्ड जनरलों के हाथ में है। सू की और अन्य विपक्षी उम्मीदवारों का सरकार में कोई दखल या असर नहीं होगा, लेकिन सू की के सांसद बनने से जनता में उम्मीद की एक नई किरण दौड़ी है। आवाम को लगता है कि सू की के सांसद बनने से राष्ट्रीय आम सहमति की प्रक्रिया आरंभ हो जाएगी और जनता को कठोर सैन्य शासन से कुछ राहत अवश्य मिलेगी। यही कारण है कि सू की जीत पर जनता में जबरदस्त जोश और उत्साह दिखाई दे रहा है। इसमें शक नहीं है कि नजरबंद रहने पर भी सू की म्यांमार में सैन्य दमन के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रेरणा का स्त्रोत रहीं। अब वह अपने देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की कगार पर हैं, लेकिन उन्हें अपने इस प्रयास में अनेक अपरिचित चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। सू की को न केवल निचले सदन में ऐसे लोगों से घिरा रहना पड़ेगा, जिनमें से अधिकतर उनके विरोधी हैं, बल्कि सुधारवादी राष्ट्रपति थीन सीन से भी अपने संबंधों को विकसित करना होगा। साथ ही उन्हें उस आवाम की उम्मीदों पर भी खरा उतरना होगा, जो परिवर्तन के लिए बेचैन है और दशकों से अकेलेपन, गरीबी और खराब सैन्य शासन को बर्दाश्त कर रहा है। इस बात का अनुमान लगाया जा रहा है कि सू की को सेना समर्थित सरकार में कोई भूमिका दी जाएगी। हालांकि उन्होंने मंत्री पद लेने से इनकार कर दिया है, क्योंकि ऐसा करने पर उन्हें संसद में अपनी सीट छोड़नी पड़ेगी। पत्रकारों से बात करते हुए सू की ने कहा था, संसद छोड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं है, क्योंकि इसमें प्रवेश करने के लिए मैंने बहुत कठिन मेहनत की है। लेकिन इसी के साथ उन्होंने ऐसे संकेत भी दिए हैं कि वह म्यांमार के देसज टकराव को सुलझाने के लिए अपनी सेवाएं प्रदान कर सकती हैं। उनके अनुसार, मैं उनमें से एक होना चाहती हूं, जो इस देश को एक करने का प्रयास कर रहे हैं..। इस तरह से कि सभी देसज समुदाय आपस में शांति और खुशी के साथ मिलकर रहें। दरअसल, आवाम की उम्मीदों को राजनीतिक हकीकत में बदलना एक बड़ी चुनौती है। म्यांमार जैसे गरीब देश में ऐसा करने का अर्थ है लोगों को इतना सक्षम बनाना कि उन्हें रोटी मिलने लगे। वे अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने लगें और अपने स्वास्थ की देखभाल कर सकें। जाहिर है, यह असंभव नहीं तो कठिन काम अवश्य है। मात्र 17 माह पहले तक सू की नजरबंद थीं और उनकी पार्टी पर प्रतिबंध था। उन्होंने जो तेजी से बंदी से सांसद होने तक का सफर तय किया है, वह राष्ट्रपति थीन सीन की सुधार प्रक्रिया पर साहसिक सहमति का नतीजा है। हालांकि वह इस प्रक्रिया की आलोचक भी हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह काम सू की ने उस नैतिक अधिकार से समझौता किए बगैर किया है, जो संपूर्ण म्यांमार में उन्हें प्राप्त है। सू की का जन्म 19 जून 1945 को रंगून (अब यौंग) में जनरल आंग सांग के घर में हुआ था, जो म्यांमार की आजादी के निर्विवाद हीरो थे। लेकिन म्यांमार (तब बर्मा) की आजादी से मात्र छह माह पहले जुलाई 1947 में जनरल सांग की हत्या कर दी गई। बहरहाल, 1960 में सू की नई दिल्ली में राजनीति शास्त्र का अध्ययन करने के लिए आ गई, क्योंकि उनकी मां को भारत में म्यांमार का राजदूत नियुक्त कर दिया गया था। सू की ने 1972 में ब्रिटेन के प्रोफेसर माइकल ऐरिस से विवाह किया और उनके दो पुत्र एलेक्जेंडर और किम पैदा हुए। अपै्रल 1988 में वह वापस यौंग आ गई ताकि अपनी बीमार मां की देखभाल कर सकें। अगस्त 1988 में हुआ यह कि लोकतंत्र के लिए प्रदर्शन करने वालों पर सुरक्षाबलों ने गोलियां चलाई, जिसमें सैंकड़ों लोग मारे गए। अपने देशवासियों को इंसाफ दिलाने के लिए सू की ने सितंबर 1988 में राजनीतिक पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोके्रसी का गठन किया, लेकिन 1989 में जुंटा ने मार्शल लॉ की घोषणा कर दी और सू की को नजरबंद कर दिया। हालांकि 1990 में उनकी पार्टी ने आम चुनावों में जीत दर्ज की, लेकिन सेना ने नतीजों को मानने से इनकार कर दिया। अपने संघर्ष के लिए सू की को 1991 में शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया। सू की की गतिविधियों पर पाबंदी लगाते हुए सेना ने 1995 में उन्हें नजरबंदी से मुक्त कर दिया। सेना का खौफ इतना ज्यादा था कि 1999 में जब सू की के पति का निधन हुआ तो उन्होंने अंतिम संस्कार के लिए इंग्लैंड जाने से इनकार कर दिया, क्योंकि उन्हें शक था कि सेना उन्हें वापस म्यांमार में घुसने नहीं देगी। जनता के लिए उनके समर्पण का नतीजा यह निकला कि 2000-02 में उन्हें फिर नजरबंद कर दिया गया। जब मई 2003 में उनकी पार्टी और सेना के बीच संघर्ष हुआ तो उन्हें फिर जेल में डाल दिया गया। हालांकि सितंबर 2003 में इलाज के लिए सू की को घर लौटने दिया गया, लेकिन प्रभावी नजरबंदी के साथ। मई 2007 में उनकी नजरबंदी एक वर्ष के लिए और बढ़ा दी गई। सितंबर 2007 में सू की को 2003 के बाद पहली बार जनता के सामने आने दिया गया और वह प्रदर्शनकारी बौद्ध भिक्षुओं से मिलीं, लेकिन मई 2008 में उनकी नजरबंदी एक वर्ष के लिए और बढ़ा दी गई। मई 2009 में जब एक अमेरिकी झील पार कर उनके कंपाउंड तक पहंुच गया तो सू की पर नजरबंदी नियमों को तोड़ने की धाराएं लगाई गई। नतीजतन अगस्त 2009 में सू की को 18 माह की नजरबंदी की सजा सुनाई गई। नवंबर 2010 में सू की को नजरबंदी से मुक्त किया गया, लेकिन उस साल गड़बड़ी के आरोपों के तहत जुंटा समर्थक पार्टी ने चुनावों में जबरदस्त विजय हासिल की। यह चुनाव 20 वर्ष में पहली बार हुए थे। बावजूद इसके सू की की ख्याति बढ़ती गई और 2011 में उन पर बनी हॉलीवुड फिल्म द लेडी रिलीज हुई। इस फिल्म में सू की की भूमिका मलेशिया की अभिनेत्री मिशेल यीह ने निभाई है। अपै्रल 2012 में सू की ने पहली बार संसद के लिए चुनाव लड़ा। इस संघर्ष गाथा से स्पष्ट है कि अपने देश को सैनिक शासन से मुक्त कराने और लोकतंत्रा बहाल करने के लिए सू की ने अपना सब कुछ समर्पित कर दिया है। अब वह ऐसे मुकाम पर ,हैं जहां उन्हें बहुत सोच-समझकर कदम रखना है ताकि दशकों का संघर्ष बेकार न चला जाए। हालांकि अमेरिका म्यांमार में सुधार प्रयासों का समर्थन कर रहा है, लेकिन जंुटा पर पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय दबाव डालने की आवश्यकता है ताकि म्यांमार की जनता लोकतंत्र में सांस लेते हुए आर्थिक प्रगति के पथ पर आ जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Tuesday, April 3, 2012
म्यांमार उपचुनाव में आंग सान सू को मिली ऐतिहासिक जीत
लोकतंत्र के लिए संघर्ष कर रहे म्यांमार में रविवार का दिन ऐतिहासिक रहा। उपचुनाव में प्रजातंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ने संसद के निचले सदन की एक सीट जीत ली। सू की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) के कार्यकर्ता जीत का दावा करते हुए जश्न मना रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग ने 45 सीटों के लिए हुए उपचुनाव का अभी कोई परिणाम घोषित नहीं किया है। म्यांमार का यह ऐतिहासिक उपचुनाव वहां सुधार की कोशिशों के लिए एक परीक्षा है। यदि पश्चिमी देश इससे संतुष्ट हुए तो मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर म्यांमार पर लगी पाबंदियां समाप्त की जा सकती हैं। एनएलडी मुख्यालय पर इसे लेकर जश्न मनाया जा रहा है कि नोबेल पुरस्कार विजेता सू ने काहमू की सीट जीत ली है। इस जीत से देश में तानाशाही के खिलाफ जारी दो दशक के संघर्ष के बाद सरकार में उनकी पहली भूमिका निभाने का रास्ता साफ हो गया है। संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने संकेत दिए हैं कि यदि चुनाव निष्पक्ष हुए तो पिछले दो दशकों से मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर म्यांमार पर लगाई गई कुछ पाबंदियां हटाई जा सकती हैं। भारत और चीन जैसी उभरती वैश्विक शक्तियों की सीमा से लगे इस बदहाल देश में निवेश की संभावना बढ़ जाएगी। जनता में अत्यंत लोकप्रिय व करिश्माई नेता सू ने पिछले हफ्ते अनियमितताओं की शिकायत की थी लेकिन इसके बावजूद उनकी पार्टी 44 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इस उपचुनाव को वर्ष 2015 में देश में होने वाले आम चुनाव के लिए मंच के तैयार करने के रूप में देखा जा रहा है। जीत पर सू ने तत्काल कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है। सुबह से ही मतदाता स्कूलों, धार्मिक केंद्रों और सामुदायिक भवनों में बने मतदान केंद्रों में चुपचाप मतदान करने जमा हो गए थे। सू के पक्ष में मतदान करने के बाद कुछ बहुत भावुक नजर आ रहे थे। म्यांमार में हुए वर्ष 2010 में हुए आम चुनाव की दुनिया भर में हुई आलोचना के छह दिन बाद आंग सान सू को नजरबंदी से रिहा किया गया था। उसी चुनाव से 49 वर्षो से जारी सैन्य शासन की समाप्ति का रास्ता भी निकला।
ईरान से दूरी बनाने लगा भारत
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच पर भारत भले ही ईरान को लेकर अमेरिका को आंखें दिखा रहा हो, लेकिन असलियत यह है कि नई दिल्ली ने तेहरान के साथ अपने रिश्तों की चादर समेटनी शुरू कर दी है। नए वित्त वर्ष के दौरान भारत न सिर्फ ईरान से तेल आयात में भारी कमी करने जा रहा है, बल्कि ईरान को होने वाले निर्यात को भी हतोत्साहित किया जा रहा है। भारत का यह कदम अमेरिका की ओर से तेल खरीदारों को मिल रही चेतावनी का नतीजा माना जा रहा है। एक दिन पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के तेल खरीदार देशों पर नए प्रतिबंधों को मंजूरी दे दी है। इससे पहले अमेरिका द्वारा बनाई गई ऐसे देशों की नकारात्मक सूची में भारत का नाम शामिल नहीं था। ईरान को लेकर वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितता की वजह से ही सरकार ने वहां 4,000 मेगावाट क्षमता का गैस आधारित बिजली प्लांट लगाने की परियोजना की रफ्तार भी धीमी कर दी गई है। इस परियोजना के लिए दोनों देशों के बीच वर्ष 2010 में समझौता हुआ था। ईरान सरकार ने परियोजना को बेहद सस्ती दर पर गैस देने की हामी भरी थी, जबकि इसे स्थापित करने की जिम्मेदारी भारत की थी। पिछले वर्ष ईरान पर परमाणु मसले को लेकर तारी पाबंदी के बाद भारत ने इस परियोजना में रुचि लेनी ही बंद कर दी है। सूत्र बताते हैं कि जब तक ईरान पर पाबंदी को लेकर हालात साफ नहीं होते, इस समझौते के आगे बढ़ने के आसार नहीं हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, ईरान से तेल खरीदना वैसे ही काफी कठिन हो गया है। यही वजह है कि सरकार ने चालू वित्त वर्ष के दौरान ईरान से आयातित तेल में लगभग 26 प्रतिशत की कमी करने का फैसला किया है। वैसे पिछले दो वित्त वर्षो के दौरान ईरान से आयातित तेल में लगातार कमी की गई है। वर्ष 2011-12 में भारत ने ईरान से 1.70 करोड़ टन क्रूड (कच्चा तेल) आयात किया है। यह वर्ष 2010-11 के मुकाबले 8 फीसदी कम है। वर्ष 2012-13 में भारतीय तेल कंपनियां बमुश्किल 1.25 करोड़ टन क्रूड आयात करेंगी। सरकारी तेल कंपनियां ही नहीं, बल्कि एस्सार ऑयल जैसी निजी कंपनी भी ईरान से तेल आयात में भारी कटौती करने जा रही है। भारत वैश्विक स्थिति की वास्तविकता को नजरअंदाज नहीं कर सकता। चीन और रूस भी बाहरी तौर पर ईरान के साथ रिश्ते को अहमियत देने की बात करते हैं, लेकिन इन दोनों देशों ने भी धीरे-धीरे द्विपक्षीय कारोबार को कम करना शुरू कर दिया है। अभी तक निष्पक्ष रहने की बात कर रहे जापान ने भी ईरान से तेल खरीदने में काफी कटौती कर दी है। पाक व ईरान सरकार की तरफ से गारंटी मिलने के बावजूद कोई भी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसी ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन के लिए वित्तीय मदद देने को तैयार नहीं है। चीन की एक कंपनी तैयार हुई थी, लेकिन अंतिम समय में उसने भी हाथ खींच लिया है। यही वजह है कि भारत सरकार ईरान से संबंधित निर्यात ऑर्डर को लेकर भी काफी सावधानी बरत रही है।
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