पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रीय खुफिया निदेशक जेम्स आर क्लैपर ने एक चौंकाने वाला बयान दिया जिसमें उन्होंने कहा कि भारत चीन के साथ सीमित संघर्ष की तैयारी कर रहा है। इस बयान में नेविले मैक्सिवेल जैसे लोगों की झलक दिखी जिन्होंने भारत पर किये गये चीनी हमले के बाद अपनी पुस्तक ‘इंडियाज चाइना वार’ में लिखा था कि नेहरू की अग्रगामी नीति उसके लिए जिम्मेदार थी। नेविल मैक्सवेल ने यह भी लिखा था कि नेहरू हठवादी थे, जिन पर अंधराष्ट्रवादियों का दबाव था जिसके कारण उन्होंने चीन के साथ उचित सीमा शतरें पर सीमा-विवाद हल करने की नीति को मानने से इनकार कर दिया। इसके विपरीत उन्होंने 1959 में एक ऐसी अग्रगामी नीति अपनायी जिसने चीनियों को अपनी आत्मरक्षा में आक्रमण करने के लिए विवश कर दिया। सभी जानते हैं कि सच इसके सर्वथा उलट था। आज भी यही स्थिति है। चीन भारत को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है लेकिन अमेरिकी खुफिया प्रमुख भारत को युद्ध की मन:स्थिति में बता रहे हैं। इससे यह नहीं लगता कि अमेरिकी प्रशासन भारत के खिलाफ चीन को उकसाने की रणनीति पर काम कर रहा है? अमेरिका की तरफ से अक्सर ऐसी सूचनाएं या रिपोर्टें आती रहती हैं जिनसे भारत-चीन युद्ध की आशंका बनी रहती है लेकिन इस बार जेम्स आर क्लैपर ने तो मौलिकता के धरातल को ही उलट दिया है। ऐसी आशंका चीन की तरफ से हो सकती है, भारत की तरफ से नहीं। आखिर भारत ऐसा क्यों करना चाहेगा, जबकि भारत यह भली-भांति जानता है कि वह अब तक इस स्थिति में नहीं पहुंचा है कि रक्षा के मामले में चीन को चुनौती दे सके। जिस तरह से चीन-पाकिस्तान गठजोड़ बन रहा है, वह भारत के लिए चिंताजनक है। यही नहीं, चीन भारत के पड़ोसियों के साथ रणनीतिक सम्बंध बनाकर भारत को घेरने की योजना पर भी लगातार कार्य कर रहा है। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद रखे। अब अगर अमेरिका, जिसे वर्तमान नेतृत्व स्वाभाविक मित्र मान रहा है, भारत को उसके चरित्र के विपरीत व्यक्त करता है, तो यह चिंताजनक पक्ष है। क्या यह अमेरिका की खीझ का परिणाम है या फिर उसका मौलिक पक्ष है? इसका आकलन हमारे राजनय को करना होगा। दरअसल भारत करीब 126 आधुनिक जंगी विमान खरीदने की योजना बना रहा था और अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि इस उम्मीद में थे कि वे इस सौदे के जरिए भारत से अरबों डॉलर बटोरने में कामयाब हो जाएंगे। लेकिन भारत के सबसे बड़े रक्षा सौदे का ठेका फ्रांस की कंपनी डेसो रफायल ने हासिल कर लिया। हालांकि अमेरिका इस दौड़ से काफी पहले बाहर हो गया था और डेसो ने तो यह बाजी यूरोपीय कंपनी ईएडीएस को पछाड़ कर मारी है। बहरहाल, सौदा सम्पन्न होते ही अमेरिका खीझ गया और ब्रिटेन की भृकुटी तन गयीं। इसके बाद अमेरिका की तरफ से भारत को यह बताने की ही कोशिश की गयी कि उसने अमेरिका के साथ यह सौदा न करके बड़ी गलती की है क्योंकि अमेरिका के एफ-16, एफ-18 विमानों से भारत को अधिक मजबूती मिलती। लेकिन कुछ ब्रिटिश नेताओं ने प्रधानमंत्री डेविड कैमरून पर भारत को प्रतिवर्ष दी जाने वाली एक अरब पाउंड की आर्थिक सहायता रोकने पर दबाव डालना शुरू कर दिया। इस स्थिति को देखकर भारतीय राजनयिकों और हमारे नेतृत्व को यह बात तो समझ में आ जानी चाहिए कि 2010 समाप्त होते-होते और 2011 की शुरुआत में दुनिया भर की शक्तिशाली देशों के शीर्ष नेतृत्व ने जब भारत की ओर रुख किया था, तो उसके पीछे उनका मकसद क्या था ? वे भारत की सराहना क्यों कर रहे थे और भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट का सबसे योग्य दावेदार क्यों बता रहे थे? दुनिया के ये देश अच्छी तरह से जानते हैं कि भारत के समक्ष किस तरह की सामरिक चुनौतियां हैं। वे यह भी जानते हैं कि यदि भारत इन चुनौतियों को देखते हुए स्वयं को मजबूत नहीं करता है तो उसकी सीमाएं संकट में पड़ सकती हैं, इसलिए भारत अपनी सेना को आधुनिक और सक्षम बनाने की हर संभव कोशिश करेगा। भारत इस रणनीति पर गम्भीरता से कार्य कर भी रहा है। इस तैयारी के मद्देनजर ही भारत इस दशक में बड़े पैमाने पर हथियार और उनसे संबंधित टेक्नोलॉजी की खरीद- फरोख्त करेगा। वैसे भी भारत इस समय हथियार खरीदने के मामले में दुनिया का अग्रणी देश बन गया है। हथियारों की खरीद फरोख्त पर नजर रखने वाली संस्था स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की वर्ष 2011 की रिपोर्ट के अनुसार 2006 और 2010 के बीच दुनिया में हुई हथियारों की खरीद का 9 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत के खाते में जाता है। वाशिंगटन स्थित सेंटर फर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज का आकलन स्वीकार करें तो भारत ने अपनी सेनाओं के आधुनिकीकरण पर 2015 तक 80 अरब डॉलर (करीब 40 खरब रुपये) खर्च करने की योजना बनाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपनी समुद्री ताकत बढ़ाने पर भी खासा जोर दे रहा है क्योंकि उसकी आर्मी की अपेक्षा नेवी काफी कमजोर है। मैरीटाइम एनालिसिस फर्म एएमआई इंटरनेशनल का कहना है कि अगले 20 वर्षों में भारत 103 नए जंगी जहाजों, जिसमें परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बियां भी शामिल हैं, पर 45 अरब डॉलर का खर्च करेगा जबकि इस दौरान चीन 135 जंगी जहाजों पर केवल 25 अरब डॉलर (करीब 12 खरब रुपये) ही खर्च करेगा। लेकिन हथियारों की खरीद फरोख्त के पीछे भारत का मकसद हथियारों की होड़ शुरू करना नहीं है बल्कि वह अपनी रक्षा पंक्ति मजबूत करना चाहता है। यह कार्य भारत के दो पड़ोसी चीन और पाकिस्तान तो पिछले ही दशक में कर चुके हैं। फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट की ही रिपोर्ट बताती है कि चीन जमीन से छोड़ी जाने वाली 140 बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात कर चुका है जिनमें से नयी किस्म की चार मिसाइलें वह तुंगफंग-31, तुंगफंग -21, तुंगफंग -31 ए और चूलांग-2 को तिब्बत के छिंगह्वा इलाके में तलिंगहा सैनिक अड्डे पर तैनात कर चुका है। इस स्थिति में यदि भारत अपनी रक्षा रणनीति पर सक्रिय होता है तो यह पड़ोसियों की तरफ से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों को काउंटर करने की रणनीति का हिस्सा है न कि सीमित पैमाने पर युद्ध जैसा। इसके बावजूद यदि अमेरिकी प्रशासन या उसकी किसी एजेंसी की तरफ से भारत को युद्ध जैसी मन:स्थिति में दिखाया जाता है तो यह अमेरिका की भड़काऊ वृत्ति है। वह चीन को सिर्फ उकसाने का कार्य कर रहा है। भारतीय राजनय को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
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