ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने के लिए उस पर ताबड़तोड़ प्रतिबंध लगा रहा अमेरिका अब भारत, तुर्की और चीन पर उससे तेल आयात न करने के लिए दबाव बना रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने यह बात अमेरिकी संसद की समिति के समक्ष मंगलवार को कही। उन्होंने कहा कि अमेरिका इस संबंध में भारत, चीन और तुर्की से सीधी बात कर रहा है। साथ ही इन देशों से विशिष्ट उपाय करने के लिए कह रहा है, जिससे ईरानी तेल पर उनकी निर्भरता कम हो। भारत और चीन, ईरान से उसके कुल तेल निर्यात का क्रमश: 12 व 22 फीसदी भाग खरीदते हैं। यूरोपीय संघ और अमेरिका के प्रतिबंधों के बावजूद ये दोनों देश ईरान से तेल का आयात कर रहे हैं। तुर्की ने भी कहा कि वह ईरान से तेल लेना बंद नहीं करेगा। दूसरी ओर अमेरिकी रक्षा मंत्री लियोन पेनेटा ने कहा है कि ईरान भले ही यूरेनियम संवर्द्धन कर रहा है, लेकिन उसने अभी तक परमाणु बम तैयार करने पर फैसला नहीं किया है। दूसरी ओर सीरिया में जारी विद्रोह के मुद्दे पर हिलेरी ने कहा कि सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद को वहां मारे जा रहे बेकसूर नागरिकों की संख्या को देखते हुए युद्ध अपराधी कहा जा सकता है। सीरियाई राष्ट्रपति को युद्ध अपराधी करार दिया अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने सांसदों से कहा कि सीरियाई नेता बशर अल असद को वहां हर दिन मारे जा रहे बेकसूर नागरिकों की बड़ी संख्या को देखते हुए युद्ध अपराधी कहा जा सकता है। कांग्रेस में एक बहस के दौरान पूछे गए सवाल के जवाब में हिलेरी ने कहा, मुझे लगता है कि युद्ध अपराधी और मानवता के खिलाफ अपराध की परिभाषाओं के आधार पर इस बारे में विचार किया जाना चाहिए कि वह इस श्रेणी में रखे जाने के लायक हैं। सीनेटर लिंड्से ग्राहम ने पूछा था कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चाहिए कि वह असद को युद्ध अपराधी के तौर पर देखे। हिलेरी ने कहा, मेरे विचार से कुछ लोग इस बात को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन लंबे अनुभव के आधार पर मैं यह भी सोचती हूं कि इससे स्थिति और जटिल हो जाएगी क्योंकि यह नेताओं को पद से हटने के लिए समझाने के विकल्प ही सीमित कर देगा। विदेश मंत्री ने कहा कि अमेरिका सीरिया में खूनखराबे के बिना बदलाव लाने की कोशिश में है। पाक में सहायता के गलत इस्तेमाल पर चिंता हिलेरी क्लिंटन और सांसदों ने अमेरिका से मिलने वाली सहायता राशि को पाकिस्तान द्वारा अन्य उद्देश्यों के लिए खर्च किए जाने पर चिंता जाहिर की है। सीनेटर जिम वेब ने हिलेरी से पूछा कि क्या अमेरिका पाकिस्तान को दी जा रही वित्तीय मदद के लिए कोई एहतियाती उपाय कर रहा है ताकि इस राशि का प्रयोग उनके परमाणु उद्देश्यों के लिए न हो सके। इस पर विदेश मंत्री ने कहा, हां, उन्होंने स्वीकार किया कि पाकिस्तान ने अपनी सेना पर बीते कई वर्षो में बड़ी राशि खर्च की है। ओसामा की खबर देने वाले को बचाओ : सांसद अमेरिकी सांसद ने राष्ट्रपति बराक ओबामा से यह सुनिश्चित करने को कहा कि अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन की जानकारी देने वाले पाकिस्तानी डॉक्टर को सजा नहीं हो पाए। सांसद ने इसके लिए ओबामा से निजी तौर पर बीच बचाव करने का अनुरोध किया है। रिपब्लिकन सांसद डाना रोहराबेकर का यह बयान पाकिस्तानी मीडिया की उन रिपोर्टो के परिप्रेक्ष्य में आया है, जिनमें सरकार द्वारा डॉक्टर शकील अफरीदी के बैंक खाते, घर और अन्य संपत्तियों को सील किए जाने की बात कही गई है। अफरीदी पिछले वर्ष मई से ही जेल में है और उस पर देशद्रोह का मुकदमा चलाए जाने की आशंका है। रोहराबेकर ने कहा, ओसामा के बारे में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआइए को जानकारी देने वाले अफरीदी को उचित पहचान मिलनी चाहिए। उसके मामले को ओबामा को ऐसे ही नहीं छोड़ देना चाहिए। ओसामा के कारण न्यूयॉर्क में तीन हजार लोग मारे गए थे और उसके बाद पाकिस्तान सरकार ने उसे लंबे समय तक संरक्षण दिया। अब ओसामा के ठिकाने के बारे में जानकारी देने वाले को वह सजा देना चाहती है। हाल ही में रोहराबेकर ने अमेरिकी संसद (कांग्रेस) में अफरीदी को कांग्रेसनल गोल्ड मेडल दिए जाने को लेकर एक प्रस्ताव पेश किया था। 9/11 में मरने वालों के शवों के अवशेष कूड़े में फेंके अमेरिका में 11 सितंबर, 2001 को हुए आतंकी हमले में मारे गए कुछ लोगों के अवशेष कूड़े में फेंक दिए गए थे। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने पहली बार यह रहस्योद्घाटन करते हुए एक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट से अमेरिकी सेना के सबसे महत्वपूर्ण मुर्दाघर में वर्षों से चल रही गड़बड़ी उजागर हुई है। एक स्वतंत्र पैनल द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है,ये अवशेष पेंटागन पर हुए हमले और पेंसिलवेनिया में दुर्घटनाग्रस्त हुए अपहृत विमान की चपेट में आए लोगों के थे। दोवर वायु सैनिक अड्डे स्थित मुर्दाघर की स्थिति की समीक्षा से मंगलवार को ये तथ्य सामने आए। इस मुर्दाघर पर इराक और अफगानिस्तान में मारे गए कुछ सैनिकों के अवशेषों के साथ लापरवाही बरतने के आरोप लगे थे। 9/11 से संबंधित अवशेष अमेरिकियों के लिए विशेष महत्व रखते हैं, इसलिए व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि दोबारा ऐसी गलती न हो इसके लिए पेंटागन कदम उठा रहा है। अधिकारियों ने बताया कि यह पता नहीं चल पाया है कि कितने पीडि़तों या अलकायदा के अपहर्ताओं के अवशेष इनमें थे।
Wednesday, February 29, 2012
Wednesday, February 15, 2012
पाक ने एमएफएन पर टाला फैसला
भारत और पाकिस्तान का आपसी रिश्ता हमेशा कभी नीम-नीम, कभी शहद-शहद जैसा रहा है। द्विपक्षीय रिश्तों को मधुर बनाने के लिए कोशिशें शुरू होती हैं और अचानक इस पर विराम भी लग जाता है। पाकिस्तान सरकार पिछले कुछ हफ्तों से लगातार भारतीय वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा की यात्रा के दौरान भारत को सबसे तरजीही देश (एमएफएन) का दर्जा देने के संकेत दे रही थी। इसके बावजूद प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव को हरी झंडी नहीं दिखाई जा सकी। पाक सरकार का कहना है कि अभी इस मुद्दे पर और गहराई से चर्चा की जाएगी। माना जा रहा है कि पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में प्रधानमंत्री गिलानी के खिलाफ मामला दायर करने के बाद उपजी राजनीतिक स्थिति को देखते हुए इस फैसले को टाला गया है। चूंकि पूरी कैबिनेट ने गिलानी में भरोसा जताया है, लिहाजा वह अभी भारत को फायदा पहुंचाने वाला कोई फैसला लेकर जोखिम नहीं उठाना चाहते। यही वजह है कि पाक सरकार ने भारत को अभी एमएफएन का दर्जा देना मुल्तवी कर दिया है। तीन अहम समझौतों को मंजूरी अलबत्ता पाकिस्तानी सरकार ने भारत के साथ द्विपक्षीय कारोबार बढ़ाने से संबंधित तीन महत्वपूर्ण समझौतों को मंजूरी दे दी है। पाक सरकार का मानना है कि भारत से आयातित उत्पादों की सकारात्मक सूची के बजाय नकारात्मक सूची होनी चाहिए। इसलिए पाकिस्तान करीब 650 उत्पादों को छोड़कर शेष उत्पादों को भारत से आयात की मंजूरी देने पर राजी हो गया है। अभी पाक भारत से लगभग 1960 उत्पादों का आयात को मंजूरी देता है। इसके अलावा सरकार ने दिसंबर, 2012 तक भारत को एमएफएन का दर्जा देने की बात प्रस्ताव में कही है। संवेदनशील मामला कैबिनेट की बैठक में यह महसूस किया गया कि ये काफी संवेदनशील मुद्दे हैं। यह अलग बात है कि एमएफएन का दर्जा मिलने से ज्यादा फायदा पाक को ही होने वाला है। भारत पाक को एमएफएन का दर्जा काफी पहले दे चुका है। इस दर्जे से दोनों देशों के व्यापार विश्व व्यापार संगठन के नियमों के दायरे में आ जाएंगे। निराश नहीं उद्योग जगत भारत और पाकिस्तान का उद्योग जगत पाक सरकार के फैसले से बहुत ज्यादा निराशा नहीं है। फिक्की अध्यक्ष आरवी कनोरिया ने कहा कि अगर यह मंजूरी मिल जाती तो काफी अच्छा होता। मगर इससे साफ है कि सरकार उद्योग जगत की उम्मीदों के मुताबिक काम नहीं कर रही है। सीआइआइ के अध्यक्ष बी मुत्थुरमन ने कहा कि पाक सरकार ने भले ही इसे फिलहाल टाल दिया हो, लेकिन इसे ज्यादा दिनों तक स्थगित नहीं रखा जा सकता। पाक सरकार ने पिछले वर्ष ही फैसला किया था कि भारत के साथ कारोबार के रास्ते से हर अड़चन हटाई जाएगी। सूत्रों का कहना है कि गिलानी सरकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट विवाद के निपटने के बाद पाक की केंद्र सरकार भारत को एमएफएन का दर्जा देने के प्रस्ताव पर विचार करेगी। पाक के वाणिज्य मंत्रालय की तरफ से तैयार प्रस्ताव के मुताबिक, खाद्य व कृषि उत्पादों, खनिज, रसायन, फार्मा, प्लास्टिक, रबड़, लकड़ी, कागज, कपड़े, स्टील, लोहा, ऑटो क्षेत्र के उत्पादों का आयात भारत से अभी संभव नहीं होगा। इन उत्पादों के अलावा हर उत्पाद के आयात की अनुमति होगी। इस नकारात्मक सूची को भी दिसंबर, 2012 से समाप्त करने का प्रस्ताव किया गया है।
रूसी वैज्ञानिकों का कुडनकुलम छोड़ने का फैसला
पहले से ही संकट में फंसी कुडनकुलम परमाणु बिजली परियोजना को रूस द्वारा अपने वैज्ञानिकों को वापस बुलाने के फैसले से एक और बड़ा झटका लगा है।भारत में रूस के राजदूत अलेक्जेंडर एम कदाकिन ने मंगलवार को इसकी घोषणा की। कदाकिन ने कहा कि जब यहां कोई काम ही नहीं हो रहा तो ऐसे में वहां वैज्ञानिकों को रखने का कोई औचित्य नहीं है। रूस द्वारा यह कदम तब उठाया जा रहा है जब सरकार को उम्मीद है कि इस गतिरोध को अब जल्द ही निपटा लिया जाएगा। पिछले सप्ताह इसके लिए तमिलनाडु सरकार ने एक पैनल का भी गठन कर दिया है जो आंदोलनकारियों की आशंकाओं को दूर करने का काम करेगा। कुडनकुलम परमाणु परियोजना के विरोध में पिछले कुछ महीनों से स्थानीय लोगों द्वारा लगातार प्रदर्शन किए जा रहे हैं। राज्य सरकार ने भी गतिरोध हल होने तक संयंत्र में केवल आपातकालीन कार्य के संचालन की ही अनुमति दी है। कदाकिन ने कहा कि इस संयंत्र में वैज्ञानिक कोई काम नहीं कर पा रहे हैं, जबकि अन्य जगहों पर उनकी आवश्यकता महसूस की जा रही है। राजदूत ने बताया कि भारत-रूस द्वारा बनाया जा रहा कुडनकुलम संयंत्र काफी सुरक्षित है और इसकी पहली दो इकाई पूरी तरह तैयार है। तिरुनेलवेली जिले में रूस के सहयोग से भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम (एनपीसीआइएल) द्वारा बनाए जा रहे इस परमाणु संयंत्र के विरोध में स्थानीय लोग पीएमएएनई के बैनर तले विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। एनपीसीआइएल के एक अधिकारी ने उम्मीद जताई है कि राज्य सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम से कुडनकुलम संयंत्र पर जारी गतिरोध को तोड़ने में मदद मिलेगी। दूसरी तरफ एनपीसीआइएल ने तमिलनाडु सरकार के अधिकारियों के साथ बैठक कर संयंत्र के आसपास के इलाकों में किए जा रहे विकास कार्यो की भी समीक्षा की। मालूम हो कि पिछले सप्ताह तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने चार सदस्यों का एक पैनल गठित किया जो स्थानीय लोगों की चिंताओं पर गौर करेगा। इस पैनल में परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष एमआर श्रीनिवासन, अन्ना विश्वविद्यालय के दो प्रोफेसर (डी अरिवू और एस इनीयान) तथा एक सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारी एलएन विजयराघवन शामिल हैं। इससे पहले प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह, देश के प्रख्यात वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम और अन्य विशेषज्ञ कुडनकुलम परमाणु परियोजना को सुरक्षित बता चुके हैं। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने इस बाबत कुडनकुलम संयंत्र का दौरा कर इसे सुरक्षित करार दिया था। साथ ही उन्होंने परमाणु ऊर्जा को देश के लिए आवश्यक बताया था। जापान में फुकुशिमा परमाणु दुर्घटना के बाद से कुडनकुलम संयंत्र का विरोध और तेज हो गया। विरोध प्रदर्शनों का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि संयंत्र में सिर्फ आपातकालीन कार्य ही हो पा रहा है।
Tuesday, February 14, 2012
अमेरिका की भड़काऊ नीति
पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रीय खुफिया निदेशक जेम्स आर क्लैपर ने एक चौंकाने वाला बयान दिया जिसमें उन्होंने कहा कि भारत चीन के साथ सीमित संघर्ष की तैयारी कर रहा है। इस बयान में नेविले मैक्सिवेल जैसे लोगों की झलक दिखी जिन्होंने भारत पर किये गये चीनी हमले के बाद अपनी पुस्तक ‘इंडियाज चाइना वार’ में लिखा था कि नेहरू की अग्रगामी नीति उसके लिए जिम्मेदार थी। नेविल मैक्सवेल ने यह भी लिखा था कि नेहरू हठवादी थे, जिन पर अंधराष्ट्रवादियों का दबाव था जिसके कारण उन्होंने चीन के साथ उचित सीमा शतरें पर सीमा-विवाद हल करने की नीति को मानने से इनकार कर दिया। इसके विपरीत उन्होंने 1959 में एक ऐसी अग्रगामी नीति अपनायी जिसने चीनियों को अपनी आत्मरक्षा में आक्रमण करने के लिए विवश कर दिया। सभी जानते हैं कि सच इसके सर्वथा उलट था। आज भी यही स्थिति है। चीन भारत को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है लेकिन अमेरिकी खुफिया प्रमुख भारत को युद्ध की मन:स्थिति में बता रहे हैं। इससे यह नहीं लगता कि अमेरिकी प्रशासन भारत के खिलाफ चीन को उकसाने की रणनीति पर काम कर रहा है? अमेरिका की तरफ से अक्सर ऐसी सूचनाएं या रिपोर्टें आती रहती हैं जिनसे भारत-चीन युद्ध की आशंका बनी रहती है लेकिन इस बार जेम्स आर क्लैपर ने तो मौलिकता के धरातल को ही उलट दिया है। ऐसी आशंका चीन की तरफ से हो सकती है, भारत की तरफ से नहीं। आखिर भारत ऐसा क्यों करना चाहेगा, जबकि भारत यह भली-भांति जानता है कि वह अब तक इस स्थिति में नहीं पहुंचा है कि रक्षा के मामले में चीन को चुनौती दे सके। जिस तरह से चीन-पाकिस्तान गठजोड़ बन रहा है, वह भारत के लिए चिंताजनक है। यही नहीं, चीन भारत के पड़ोसियों के साथ रणनीतिक सम्बंध बनाकर भारत को घेरने की योजना पर भी लगातार कार्य कर रहा है। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद रखे। अब अगर अमेरिका, जिसे वर्तमान नेतृत्व स्वाभाविक मित्र मान रहा है, भारत को उसके चरित्र के विपरीत व्यक्त करता है, तो यह चिंताजनक पक्ष है। क्या यह अमेरिका की खीझ का परिणाम है या फिर उसका मौलिक पक्ष है? इसका आकलन हमारे राजनय को करना होगा। दरअसल भारत करीब 126 आधुनिक जंगी विमान खरीदने की योजना बना रहा था और अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि इस उम्मीद में थे कि वे इस सौदे के जरिए भारत से अरबों डॉलर बटोरने में कामयाब हो जाएंगे। लेकिन भारत के सबसे बड़े रक्षा सौदे का ठेका फ्रांस की कंपनी डेसो रफायल ने हासिल कर लिया। हालांकि अमेरिका इस दौड़ से काफी पहले बाहर हो गया था और डेसो ने तो यह बाजी यूरोपीय कंपनी ईएडीएस को पछाड़ कर मारी है। बहरहाल, सौदा सम्पन्न होते ही अमेरिका खीझ गया और ब्रिटेन की भृकुटी तन गयीं। इसके बाद अमेरिका की तरफ से भारत को यह बताने की ही कोशिश की गयी कि उसने अमेरिका के साथ यह सौदा न करके बड़ी गलती की है क्योंकि अमेरिका के एफ-16, एफ-18 विमानों से भारत को अधिक मजबूती मिलती। लेकिन कुछ ब्रिटिश नेताओं ने प्रधानमंत्री डेविड कैमरून पर भारत को प्रतिवर्ष दी जाने वाली एक अरब पाउंड की आर्थिक सहायता रोकने पर दबाव डालना शुरू कर दिया। इस स्थिति को देखकर भारतीय राजनयिकों और हमारे नेतृत्व को यह बात तो समझ में आ जानी चाहिए कि 2010 समाप्त होते-होते और 2011 की शुरुआत में दुनिया भर की शक्तिशाली देशों के शीर्ष नेतृत्व ने जब भारत की ओर रुख किया था, तो उसके पीछे उनका मकसद क्या था ? वे भारत की सराहना क्यों कर रहे थे और भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट का सबसे योग्य दावेदार क्यों बता रहे थे? दुनिया के ये देश अच्छी तरह से जानते हैं कि भारत के समक्ष किस तरह की सामरिक चुनौतियां हैं। वे यह भी जानते हैं कि यदि भारत इन चुनौतियों को देखते हुए स्वयं को मजबूत नहीं करता है तो उसकी सीमाएं संकट में पड़ सकती हैं, इसलिए भारत अपनी सेना को आधुनिक और सक्षम बनाने की हर संभव कोशिश करेगा। भारत इस रणनीति पर गम्भीरता से कार्य कर भी रहा है। इस तैयारी के मद्देनजर ही भारत इस दशक में बड़े पैमाने पर हथियार और उनसे संबंधित टेक्नोलॉजी की खरीद- फरोख्त करेगा। वैसे भी भारत इस समय हथियार खरीदने के मामले में दुनिया का अग्रणी देश बन गया है। हथियारों की खरीद फरोख्त पर नजर रखने वाली संस्था स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की वर्ष 2011 की रिपोर्ट के अनुसार 2006 और 2010 के बीच दुनिया में हुई हथियारों की खरीद का 9 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत के खाते में जाता है। वाशिंगटन स्थित सेंटर फर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज का आकलन स्वीकार करें तो भारत ने अपनी सेनाओं के आधुनिकीकरण पर 2015 तक 80 अरब डॉलर (करीब 40 खरब रुपये) खर्च करने की योजना बनाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपनी समुद्री ताकत बढ़ाने पर भी खासा जोर दे रहा है क्योंकि उसकी आर्मी की अपेक्षा नेवी काफी कमजोर है। मैरीटाइम एनालिसिस फर्म एएमआई इंटरनेशनल का कहना है कि अगले 20 वर्षों में भारत 103 नए जंगी जहाजों, जिसमें परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बियां भी शामिल हैं, पर 45 अरब डॉलर का खर्च करेगा जबकि इस दौरान चीन 135 जंगी जहाजों पर केवल 25 अरब डॉलर (करीब 12 खरब रुपये) ही खर्च करेगा। लेकिन हथियारों की खरीद फरोख्त के पीछे भारत का मकसद हथियारों की होड़ शुरू करना नहीं है बल्कि वह अपनी रक्षा पंक्ति मजबूत करना चाहता है। यह कार्य भारत के दो पड़ोसी चीन और पाकिस्तान तो पिछले ही दशक में कर चुके हैं। फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट की ही रिपोर्ट बताती है कि चीन जमीन से छोड़ी जाने वाली 140 बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात कर चुका है जिनमें से नयी किस्म की चार मिसाइलें वह तुंगफंग-31, तुंगफंग -21, तुंगफंग -31 ए और चूलांग-2 को तिब्बत के छिंगह्वा इलाके में तलिंगहा सैनिक अड्डे पर तैनात कर चुका है। इस स्थिति में यदि भारत अपनी रक्षा रणनीति पर सक्रिय होता है तो यह पड़ोसियों की तरफ से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों को काउंटर करने की रणनीति का हिस्सा है न कि सीमित पैमाने पर युद्ध जैसा। इसके बावजूद यदि अमेरिकी प्रशासन या उसकी किसी एजेंसी की तरफ से भारत को युद्ध जैसी मन:स्थिति में दिखाया जाता है तो यह अमेरिका की भड़काऊ वृत्ति है। वह चीन को सिर्फ उकसाने का कार्य कर रहा है। भारतीय राजनय को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
पाकिस्तान को रोशन करेगा भारत
कुछ वर्ष पहले तक ऊर्जा मामले में पूरी तरह से संपन्न पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान अब अपनी जरूरतों के लिए भारत का मुंह ताक रहा है। इधर, पेट्रोलियम उत्पादों के प्रमुख निर्यातक के तौर पर उभर चुका भारत जितना चाहे उतना पेट्रोल और डीजल पाकिस्तान को देने को तैयार है। भारत ने पाकिस्तान को बिजली देने की भी इच्छा जताई है। इन मुद्दों पर अगले हफ्ते पाकिस्तान में दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय वार्ता होगी। वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा सोमवार 13 फरवरी से पाकिस्तान की यात्रा शुरू करेंगे। चार दिन की यात्रा के दौरान वह पाकिस्तान के वाणिज्य मंत्री मखदूम एम. अमीन फहीम से दो बार बातचीत करेंगे। सूत्रों के मुताबिक, अपने घर में बिजली की किल्लत होने के बावजूद भारत पाकिस्तान को 500 मेगावाट बिजली की आपूर्ति करने का प्रस्ताव कर सकता है। इसके लिए अमृतसर में एक स्पेशल ग्रिड स्थापित करने को लेकर भी दोनों देशों के बीच बातचीत होगी। सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान के साथ रिश्ते को दूसरे आयाम से देखना चाहिए। अपने देश में भले ही बिजली उत्पादन में हम पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं हों, लेकिन हम पाकिस्तान के लिए थोड़ी बिजली की व्यवस्था कर ही सकते हैं। दरअसल, पाकिस्तान में अधिकांश बिजली संयंत्र गैस आधारित हैं और हाल ही में वहां गैस की ्रकिल्लत हो गई है। इस वजह से लाहौर और कराची में भी घंटों बिजली गुल रहने लगी है। वाणिज्य मंत्रियों की बैठक में भारत से आयात होने वाले पेट्रोलियम उत्पादों को लेकर भी तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाएगी। भारत पहले ही कह चुका है कि पाकिस्तान जितना चाहे पेट्रोल, डीजल व अन्य पेट्रोलियम उत्पाद आयात कर सकता है। उम्मीद है कि इस हफ्ते पाकिस्तान सरकार आयातित सूची के मौजूदा तरीके में बदलाव करेगी। अब वह सिर्फ आयात नहीं होने वाले उत्पादों की सूची जारी करेगी। इससे पेट्रोलियम उत्पादों का आयात संभव हो सकेगा। भारत पंजाब में स्थापना के अंतिम चरण में पहुंच चुकी एचपीसीएल-मित्तल रिफाइनरी से पाकिस्तान को पेट्रो उत्पाद देने को तैयार है। अगर पाकिस्तान से मांग ज्यादा होती है, तो भारत भटिंडा रिफाइनरी से पाकिस्तान बॉर्डर तक पाइपलाइन भी बिछाने को तैयार है। भारत को तरजीही राष्ट्र कादर्जा खतरनाक : सईद इस्लामाबाद, एजेंसी : वाणिज्य व उद्योग मंत्री आनंद शर्मा की पाकिस्तान यात्रा से पहले जमात-उद-दावा (जेयूडी) के प्रमुख हाफिज सईद ने भारत को तरजीही राष्ट्र (एमएफएन) का दर्जा देने का विरोध किया है। सईद का कहना है कि पाकिस्तान को एक बाजार में तब्दील करने की कोशिश की जा रही है। आखिर में पाकिस्तान का इस्तेमाल अफगानिस्तान को सामान भेजने के लिए किया जाएगा। वर्ष 2008 के मुंबई हमले के मास्टरमाइंड सईद ने कहा कि यह केवल व्यापार का मामला नही है, बल्कि अफगानिस्तान तक भारतीय माल पहुंचाने के लिए पाकिस्तान को एक रास्ते के तौर पर इस्तेमाल करने का मामला है। यह पाकिस्तान के लिए बड़ा खतरा होगा।
Tuesday, February 7, 2012
हथियार मेले में चीन को अनुमति नहीं
भारत और चीन के बीच रक्षा संबंध सुधारने की कोशिशों के बीच नई दिल्ली ने अपने सबसे बड़े हथियार मेले से चीनी कंपनियों को दूर रखने का फैसला लिया है। विदेश मंत्रालय ने अगले माह राजधानी में होने वाले द्विवार्षिक डिफेंस एक्सपो-2012 में चीनी कंपनियों की शिरकत का प्रस्ताव नामंजूर कर दिया है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक चीन के साथ ताइवान की हथियार कंपनियों के लिए भी इस शस्त्र प्रदर्शनी में नुमाइश की इजाजत नहीं होगी। सूत्र बताते हैं कि विदेश मंत्रालय ने करीब दो हफ्ते के मंथन के बाद मेजबान रक्षा मंत्रालय को अपने इस फैसले की जानकारी दे दी। हालांकि विदेश मंत्रालय का यह फैसला विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के बीजिंग दौरे पर रवानगी से ठीक पहले आया। महत्वपूर्ण है कि विदेश मंत्री एसएम कृष्णा बुधवार से तीन दिनी चीन दौरे पर हैं। कृष्णा के एजेंडे में दोनों देशों की संवाद प्रक्रिया सुधारने के अलावा अगले महीने प्रस्तावित चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ के भारत दौरे की भूमिका तैयार करना भी शामिल है। हालांकि चीनी कंपनियों को बाहर रखने का भारतीय फैसला चीन के साथ बीते दिनों सीमा विवाद पर हुई विशेष प्रतिनिधि स्तर वार्ता, सैन्य प्रतिनिधि मंडलों की आवाजाही और रक्षा संवाद सुधारने की कोशिशों के बीच आया है। वैसे यह पहला मौका नहीं है जब भारत ने चीन को अपनी रक्षा प्रदर्शनी से बाहर रखने का फैसला किया है। इससे पहले रक्षा संबंधों की तल्खी के चलते 2011 के एयरो इंडिया शो में भारत ने चीनी कंपनियों को इस मेले से बाहर रखा था। वहीं फरवरी 2010 में हुए डिफेंस एक्सपो में भी चीन और पाकिस्तान को न्यौता नहीं दिया गया था। 2009 के एयरो इंडिया शो में भारत ने चीन को शिरकत का न्यौता दिया था लेकिन बीजिंग ने उसमें भाग नहीं लिया था। रक्षा मंत्रालय एक साल डिफेंस एक्सपो और एक साल एयरो इंडिया शो का आयोजन करता है। मार्च 29 से अप्रैल 1, 2012 के बीच नई दिल्ली के प्रगति मैदान में होने वाले डिफेंस एक्सपो में इटली, कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, रूस, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, पोलैंड, तुर्की, इजराइल और ब्रिटेन समेत कई देश अपने पैवेलियन स्थापित कर रहे हैं। गौरतलब है कि इससे पहले फरवरी 2010 में हुए डिफेंस एक्सपो में 31 देशों ने अपने उत्पादों की नुमाइश की थी।
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