Saturday, October 13, 2012

भारत पर चीनी हमले को 50 साल पूरे





इस माह भारत पर चीनी हमले को 50 साल पूरे हो जाएंगे। 1950 से अनेक सैन्य टकरावों में उलझने वाला चीन एकमात्र इसी युद्ध को जीत पाया है। हालांकि भारत पर चीन की निर्णायक जीत द्विपक्षीय विवादों का निपटारा करने में विफल रही और युद्ध की विरासत के तौर पर दोनों देशों के संबंध अभी तक खराब चल रहे हैं। वास्तव में, सैन्य तनाव बढ़ने और सीमा उल्लघंन की घटनाओं में वृद्धि के साथ-साथ संबंधों में जोखिम में भी बढ़ोतरी हो गई है। इतिहास के दौरान विशाल तिब्बती पठार ने भारतीय और चीनी सभ्यताओं को अलग किए रखा। दोनों देशों के बीच छिटपुट सांस्कृतिक और धार्मिक संपर्क मात्र कायम रहा। 1950-51 में तिब्बत तक चीनी सैनिकों के विस्तार के बाद ही भारत की हिमालयी सीमा से चीन सैनिक नजर आने शुरू हुए। एक दशक बाद ही 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने भारतीय सीमा पर अचानक कई मोर्चो से हमला बोल दिया। चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन. लाई ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि युद्ध भारत को सबक सिखाने के लिए किया गया। इस हमले ने भारत को इतना मनोवैज्ञानिक-राजनीतिक सदमा पहुंचाया कि हमलावर चीन की शुरुआती बढ़त को ही बहुत बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया। औचक हमले से दुश्मन को हैरान कर देने का युद्ध में बड़ा लाभ मिलता है। चीन के जबरदस्त हमले से लगे झटके से भारत में पराजयबोध पैदा हो गया, जिसके परिणामस्वरूप भारत ने अपनी सेना को रक्षात्मक जगहों पर वापस बुला लिया। कुछ दुष्परिणामों से डरकर भारत ने अपनी वायु सेना का इस्तेमाल करना तक उचित नहीं समझा, यद्यपि उस समय चीन के पास अपनी आगे बढ़ती हुई सेना की सहायता के लिए प्रभावी वायु कवच नहीं था। 32 दिन की लड़ाई के बाद 21 नवंबर को चीन ने विजयी हैसियत से एकतरफा युद्ध विराम लागू कर दिया, जबकि उसकी सेना ने पूर्वी मोर्चे पर छितराई हुई भारतीय सेना पर गोलीबारी करना जारी रखा। साथ ही उसने घोषणा कर दी कि चीनी सेनाएं एक दिसंबर से वापस जानी शुरू हो जाएंगी। इस प्रकार चीन पूर्वी मोर्चे पर जीते गए भूभाग से वापस हट गया, जबकि पश्चिम क्षेत्र में उसने ऐसे क्षेत्र से कब्जा नहीं छोड़ा। वापसी के ये मानदंड चीन के युद्धपूर्व दावों से मेल नहीं खाते। जिस प्रकार जब विश्व का ध्यान कोरियाई युद्ध पर था तब माओ ने तिब्बत को चीन में मिला लिया था उसी प्रकार उन्होंने भारत पर हमले का भी सही समय चुना। यह हमला उस समय के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संकट के समय किया गया। सोवियत संघ द्वारा क्यूबा में मिसाइल लगाने को लेकर अमेरिका व सोवियत संघ में परमाणु युद्ध छिड़ने की नौबत आ गई थी। चीन का एकतरफा युद्धविराम क्यूबा मिसाइल संकट के अंत के समय हुआ। समय के इस चुनाव के कारण भारत-चीन युद्ध अंतरराष्ट्रीय जगत का ध्यान आकर्षित नहीं कर पाया और भारत अंतरराष्ट्रीय मदद से वंचित रह गया। आधी सदी बाद भारत और चीन के बीच फिर से तनाव बढ़ रहा है। 1981 से नियमित तौर पर सीमा वार्ता होने के बावजूद इस सीमा विवाद के हल की दिशा में बहुत कम प्रगति हुई है। ये वार्ताएं आधुनिक विश्व इतिहास में सबसे लंबे समय तक चलने वाली बेनतीजा वार्ता प्रक्रिया है। 2010 में नई दिल्ली की यात्रा के दौरान चीनी नेता वेन जियाबाओ ने दोटूक कहा था कि सीमा विवाद का हल निकलने में काफी लंबा समय लगेगा। अगर ऐसा है तो भारत और चीन के इन वार्ताओं को करते रहने का क्या औचित्य है? पुराने घाव अभी भरे नहीं हैं कि नए मुद्दों ने द्विपक्षीय संबंधों में खटास डालनी शुरू कर दी है। उदाहरण के लिए 2006 से चीन ने पूर्वी मोर्चे के उन क्षेत्रों पर अपना दावा जमाना शुरू कर दिया है जहां से 62 के युद्ध में उसकी सेना वापस लौटी थी। चीन ने 2006 से अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत बताना शुरू किया था। तभी से भारत के प्रति चीन के रुख में कठोरता झलकने लगी थी। इसके कारण ही पाक अधिकृत कश्मीर में चीनी सामरिक परियोजनाएं तथा सैन्य उपस्थिति जैसी अन्य घटनाएं घटित हुईं। विश्व की सबसे बड़े एकाधिकारी शासन तथा सबसे बड़े लोकतंत्र में तेजी से बढ़ते व्यापार के बावजूद सामरिक शत्रुता बढ़ी है। 2000 और 2010 के बीच दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार में 20 गुना की वृद्धि हुई है। यही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जिसमें संबंधों में सुधार हुआ है। पुराने विवादों को हल किए बिना यह व्यापार भारत-चीन की भूराजनीतिक शत्रुता तथा सैन्य तनाव बढ़ने के साथ-साथ बढ़ता रहा। इससे पता चलता है कि व्यापार में बढ़ोतरी से देशों में कटुता खत्म नहीं होती। यद्यपि 1962 में चीन ने भारत को सबक सिखाने का यत्न किया था, किंतु इस घटना से आज हम असली सबक यह ले सकते हैं कि युद्ध से चीन किसी भी प्रकार के राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर सका और इससे दोनों देशों के बीच खत्म न होने वाली कटुता की शुरुआत हुई। बीजिंग के लिए ऐसा ही एक सबक था हनोई। 1979 में चीन ने भारत के खिलाफ युद्ध की तर्ज पर ही वियतनाम के खिलाफ औचक हमला बोला। देंग जियापिंग का कहना था कि यह हमला उसे सबक सिखाने के लिए किया गया है। 29 दिनों के बाद चीन ने अपना आक्रमण रोक दिया और सेना को यह कहते हुए वापस बुला लिया कि वियतनाम को उचित दंड दे दिया गया है। हालांकि युद्ध में तपे हुए वियतनामियों ने हमलावरों को मुंहतोड़ जवाब दिया था। भारत के लिए 1962 का सबसे बड़ा सबक यह है कि शांति सुरक्षित करने के लिए हमेशा शांति की रक्षा के लिए तैयार रहना होगा। भारत के प्रति चीन का उग्र रुख वर्तमान द्विपक्षीय तनाव की जड़ है और इसमें यह खतरा निहित है कि चीन भारत को दूसरा सबक न सिखा दे। चीन के सामरिक सिद्धांत में औचक और सही समय पर हमले का बहुत महत्व है। उनकी रणनीति त्वरित परिणाम वाले युद्ध लड़ने की रही है। इसलिए सहसा आक्रमण करके दुश्मन को चकरा देना चीन की सैन्य सोच का हिस्सा है। चीन का सामरिक सिद्धांत इस बात पर भी जोर देता है कि बल प्रयोग बिजली की तेजी से किया जाना चाहिए। एक और मुख्य सिद्धांत है-हमले को सुरक्षा के छलावरण में पेश करना। 1962 और 1979 में चीन ने भारत और वियतनाम पर हमला किया और हर बार इसे रक्षात्मक प्रतिघात बताया। अगर चीन एक और औचक युद्ध करता है तो भारत की हार या जीत इस प्रमुख पहलू पर निर्भर करेगी कि भारत शुरुआती झटके को झेलकर कितनी ताकत से हमले का जवाब देता है। भारत सरकार को उम्मीद है कि चीन के साथ संबंध स्थिर और शांतिपूर्ण रहेंगे, किंतु उम्मीद कोई रणनीति नहीं होती। भारत को अपनी सुरक्षा सामरिक क्षमताओं को इतना पुख्ता करना होगा कि चीन एक और हमले की हिम्मत न कर सके।


Dainik Jagran National Edition 12-10-2012  Pej -8 ns’k fons’k

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