Thursday, October 25, 2012

युद्ध के 50 बरस बाद चीन ने भारत को बताया सहयोगी




बीजिंग, प्रेट्र : युद्ध के 50 साल बाद चीन ने कहा है कि भारत उसका सहयोगी देश है न कि प्रतिस्पर्धी। भारत के प्रति लगातार नरम रुख अपना रहे चीन ने कहा है कि दोनों देशों को आपसी भरोसा बढ़ाते हुए रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर काम करना चाहिए। चीनी विदेश मंत्रालय ने बुधवार को एक बयान में कहा कि 1962 युद्ध के बाद से दुनिया बहुत बदल चुकी है और ऐसे में भारत हमारा सहयोगी है न कि प्रतिद्वंद्वी। चीन ने इससे संकेत दिया है कि वह भारत के साथ एक बार फिर अपनी राजनयिक साझेदारी को परवान चढ़ाने का इच्छुक है। यह इस युद्ध के शहीदों को सम्मानित करने के लिए नई दिल्ली में हुए समारोह के बाद चीनी विदेश मंत्रालय की पहली टिप्पणी है। मंत्रालय के प्रवक्ता होंग लेई ने कहा कि चीन ने इस मौके पर भारतीय मीडिया में आए बयानों पर ध्यान रखा है। प्रवक्ता ने कहा, आज दुनिया बदली हुई है, क्योंकि भारत और चीन, दो सबसे बड़ी आबादी वाले देश और दो सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के सामने विकास के महत्वपूर्ण अवसर हैं। दोनों देशों की साझा जरूरतों ने विवादों और साझा हितों से संघर्षो को दूर कर दिया है। लेई ने अपनी बात के समर्थन में हाल के कुछ वर्षो में दोनों देशों के बीच बढ़े कारोबार को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा, चीन विश्वास बहाली, बातचीत बढ़ाने और साझेदारी को विस्तार देने के लिए भारत के साथ मिलकर काम करने को तैयार है। यह दोनों देशों की जनता के हित में होगा। उधर, ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा है कि दोनों देशों को 1962 युद्ध से हुए नुकसान से उबरते हुए अभिन्न कूटनीतिक साझेदार बन जाना चाहिए। युद्ध की बरसी से पहले भी चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से बयान जारी कर कहा गया था कि चीन अपने सीमा विवाद को सुलझाने के लिए भारत से बात करने का इच्छुक है।
Dainik Jagran National Edition 25-10-2012 ns’k fons’k peJ-7

पाकिस्तान का स्थापित सत्य





विगत रविवार को गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने पाकिस्तान पर भारत में अशांति पैदा करने का आरोप लगाते हुए कहा कि वह देश में आतंकवादियों की घुसपैठ कराने में मदद कर रहा है। शिंदे का बयान किसी रहस्य का उद्घाटन नहीं करता। यह अब स्थापित सत्य है कि भारत के प्रति वैर और वैमनस्य का भाव पाकिस्तान के डीएनए में ही समाहित है। पाकिस्तान के हुक्मरान बदलते रहे हैं और जब-तब दोनों देशों के बीच मैत्री कायम करने की कवायदें भी हुई हैं, किंतु कटु सत्य तो यह है कि भारत के साथ शत्रुता पाकिस्तान के अपने वजूद के लिए महत्वपूर्ण है। मुहम्मद अली जिन्ना ने 11 अगस्त, 1947 को पाकिस्तानी संसद को संबोधित करते हुए अल्पसंख्यकों व बहुसंख्यकों को बराबरी देने की बात भी की थी, परंतु उनकी यह उद्घोषणा उन सब मान्यताओं और घोषित लक्ष्यों के विपरीत थी जिसे मुस्लिम समाज ने गृहयुद्ध कर भारत के रक्तरंजित विभाजन से पाया था। स्वाभाविक है कि जिन्ना की मृत्यु के बाद पाकिस्तान फिर उसी रास्ते पर चल पड़ा जो उसके जन्म की विचारधारा में निहित था। पाकिस्तान का जन्म अखंड भारत की कोख से हुआ। जिन क्षेत्रों को मिलाकर पाकिस्तान बनाया गया उनमें कभी वेदों की ऋचाएं सृजित हुईं। सनातन संस्कृति की जन्मभूमि होने के कारण उस भूक्षेत्र में हिंदू-सिखों के सैकड़ों मंदिर और गुरुद्वारे थे, जिनमें से कई आध्यात्मिक और एतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थे। आज वहां क्या स्थिति है? विभाजन के दौरान पाकिस्तान की आबादी में हिंदू-सिखों का अनुपात बीस-बाइस प्रतिशत के लगभग था, जो आज घटकर एक प्रतिशत से भी कम रह गया है। उनकी आबादी में कमी का कारण यह नहीं है कि उन्होंने पाकिस्तान से पलायन कर भारत में शरण ले ली। ऐसा होता तो भारत की आबादी में परिवर्तन दर्ज होता। कटु सत्य तो यह है कि उनमें से अधिकांश मजहबी उत्पीड़न से त्रस्त होकर इस्लाम कबूलने को मजबूर हुए। जो हिंदू-सिख वहां बचे रहे उन्हें अपनी जान और अपनी महिलाओं की इज्जत-आबरू की रक्षा के लिए कट्टरपंथियों को जजिया चुकाना पड़ता है। सैकड़ों की संख्या में आज भी हिंदू-सिख पाकिस्तान से पलायन कर शरण की आशा में भारत आ रहे हैं। मंदिरों-गुरुद्वारों की संख्या वहां गौण हो चुकी है। यह स्थिति पाकिस्तान में पल रहे कट्टरवाद के कारण आई है, जो भारत की मूल व सनातन संस्कृति से खुद को अलग करने की प्रेरणा देता है। पाकिस्तान के सृजन के बाद से ही इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान को अरब संस्कृति का भाग बनाने के सतत प्रयास होते रहे हैं। यह संयुक्त भारत की इस्लाम पूर्व की बहुलतावादी सनातनी संस्कृति को नकारने की मानसिकता के कारण हुआ। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जिया उल हक की सैन्य तानाशाही के दौर में शिक्षा और कानून एवं व्यवस्था को सऊदी अरब की तर्ज पर इस्लामी मूल्यों के आधार पर चलाने की नींव पड़ी थी। पाकिस्तान के प्राथमिक विद्यालयों में इतिहास का जो पाठ्यक्रम है उसमें पश्चिम के हाथों कथित इस्लाम की जलालत और हिंदुओं से सांठगांठ कर ब्रितानियों द्वारा भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े भाग को मुस्लिम राज से छीन लेने का उल्लेख है। यह बालपन से प्रतिशोध और घृणा का पाठ पढ़ाने के लिए काफी है। ऐसे माहौल में यदि मुंबई पर हमला करने वाले अजमल कसाब जैसे युवा पले-बढ़े हों तो उसमें आश्चर्य कैसा? पाकिस्तान सहित कई अन्य मुस्लिम बहुल देशों के संविधान में गैर मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है। नागरिक और सैन्य स्तर के शीर्ष पद बहुसंख्यकों के लिए आरक्षित हैं। पाकिस्तान के सैन्य तानाशाहों ने राज्य की नीतियों के साथ मजहब का बहुत गहरा संबंध विकसित किया है। युवाओं की एक बड़ी फौज ऐसी शिक्षण व्यवस्था में पल-बढ़कर बड़ी होती है, जिसमें उनके मजहब को ही एकमात्र सच्चा पंथ बताया जाता है। जिया उल हक के कार्यकाल में कानून-ए-इहानते-रसूल बना, ताकि इस्लाम पर प्रश्न खड़ा करने का कोई अवसर ही न हो और मुल्क में उदारवाद व आधुनिक सोच के लिए कोई जगह नहीं हो। उसके बाद शासक तो बदलते रहे, किंतु पाकिस्तान की यात्रा कट्टरवाद के एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक अनिरुद्ध चलती रही। हाल की दो घटनाएं पाकिस्तान में पोषित किए जा रहे कट्टरवाद को नंगा करने के लिए काफी हैं। हाल में एक ईसाई नाबालिग को वहां के एक इमाम ने ईशनिंदा के मामले में केवल इसलिए फंसा दिया, ताकि आसपास के ईसाइयों को वहां से भगाया जा सके। मानवाधिकारियों के दबाव में जब जांच हुई तो इमाम को कसूरवार पाया गया। ऐसा नहीं है कि कट्टरपंथियों का शिकार केवल गैर मुस्लिम ही बन रहे हैं। जो भी इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाता है उसे खामोश करने की कोशिश होती है। कुछ समय पूर्व पंजाब सूबे के गवर्नर सलमान तसीर की हत्या इसलिए कर दी गई थी, क्योंकि उन्होंने ईशनिंदा कानून में बंद ईसाई औरत आसिया बीबी को राहत देने की वकालत की थी। अभी मानवाधिकार कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई जिंदगी और मौत से जूझ रही है। उसे पाकिस्तान में पल रही तालिबानी संस्कृति का विरोध करने पर जिहादियों ने सिर में गोली मार दी थी। पाकिस्तान स्थित तालिबान जैसे आतंकी संगठनों और पाकिस्तान सत्तातंत्र को अलग-अलग नजरिए से देखना आत्मघाती साबित होगा। एक ओर पाकिस्तानी हुक्मरान आतंकवाद से स्वयं त्रस्त होने का दावा करते हैं और दूसरी ओर उनकी छत्रछाया में जमात उद दावा, लश्कर, हूजी जैसे संगठन भारत को क्षतविक्षत कर देने की धमकी देते हैं। आतंकवाद के खात्मे के लिए यदि पाकिस्तान इतना संजीदा है तो वह अपनी सरजमीं पर आतंकी शिविरों को पनाह ही नहीं देता। सीआइए के पास पाकिस्तानी सैन्य कमांडर जनरल कियानी द्वारा की गई एक वार्ता का ब्यौरा है, जिसमें कियानी ने तालिबान को पाक सेना की पूंजी बताया है। कियानी ने कहा है कि पाकिस्तान का ध्यान भारतीय सुरक्षा बलों पर केंद्रित है और तालिबान को खत्म करने के नाम पर मिल रही अमेरिकी सहायता से वह खुद को सशक्त करना चाहता है ताकि भारत को पराजित किया जा सके। तालिबान, लश्करे-तैयबा और अन्य जिहादी संगठनों का एकसूत्री एजेंडा इस उपमहाद्वीप पर इस्लामी वर्चस्व कायम करना है, जिसे पाकिस्तान का पूर्ण समर्थन प्राप्त है। इस दृष्टि से गृहमंत्री शिंदे ने कोई नया खुलासा नहीं किया है। पाकिस्तान दुनिया के सामने नंगा हो चुका है। चुनौती तो भारत में मौजूद उस ढांचे को खत्म करने की है जिसके कारण पाकिस्तान को भारत में अशांति और अस्थिरता पैदा करने में सफलता मिल रही है। चुनौती उस मानसिकता को ध्वस्त करने की है जो वोट बैंक की खातिर कट्टरवादी इस्लामी ढांचे को पुष्ट कर रही है। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)

Dainik Jagran National Edition 23-10-2012 ns’k fons’k ist 8

जांच से बचने के जतन





जांच से बचने के जतन कांग्रेस और केजरीवाल के बीच छिड़ी जंग को लेकर ताजा सूचना यह है कि दिग्विजय सिंह ने सोनिया गांधी और उनके दामाद रॉबर्ट वाड्रा का बचाव करते हुए कहा है कि वह अपने दामाद की चार्टर्ड एकाउंटेंट नहीं हैं। नि:संदेह यह सही है। वाड्रा की चार्टर्ड एकाउंटेट तो एसआरसी भट्ट एंड एसोसिएट्स नाम की कंपनी है, लेकिन मुश्किल यह है कि वह मौन धारण किए हुए है। केजरीवाल के बारे में कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा है कि अरविंद केजरीवाल से निपटने में तो उनके ब्लाक स्तर के नेता भी सक्षम हैं। यदि वास्तव में ऐसा है तो फिर तमाम केंद्रीय मंत्री अपनी महत्ता भूल कर ब्लाक स्तर के नेता क्यों बने हुए हैं? क्या कारण है कि वे वाड्रा का बचाव कर रहे हैं? शीला दीक्षित ने केजरीवाल को बरसाती मेढक बताया है और सलमान खुर्शीद उन्हें सड़क छाप बता चुके हैं। इस सबके बीच कोई भी यह बताने वाला नहीं कि रॉबर्ट वाड्रा ने तीन साल में तीन सौ करोड़ कैसे बना लिए? वाड्रा की कंपनियों के चार्टर्ड एकाउंट, कारपोरेट मंत्रालय और वह खुद मौन साधे हुए हैं। वाड्रा ने आखिरी बार बनाना रिपब्लिक और मैंगो मैन वाली बेढब टिप्पणी की थी। उनकी कंपनी स्काईलाइट हास्पिटैलिटी ने जिस कारपोरेशन बैंक से 7.94 करोड़ का ओवरड्राफ्ट लेने का उल्लेख अपने दस्तावेजों में किया है उसके प्रबंध निदेशक दो बार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि हमने कोई लोन या ओवरड्राफ्ट नहीं दिया। वह इस ओर भी संकेत कर चुके हैं कि वाड्रा की कंपनी ने अपनी बैलेंस सीट मनमाने तरीके से तैयार की है, लेकिन किसी की जबान नहीं खुल रही है और इस गंभीर सवाल का जवाब अभी भी नदारद है कि वाड्रा के पास यह रकम कहां से आई? यह वही रकम है जिससे उन्होंने वह जमीन खरीदी जिसे बाद में 58 करोड़ रुपये में डीएलएफ को बेचा गया। यदि रॉबर्ट वाड्रा आम आदमी अथवा कोई आम दामाद होते तो और कुछ न सही, उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज हो गया होता, आयकर वाले उनके पीछे पड़ गए होते और हो सकता है कि प्रवर्तन निदेशालय या फिर सीबीआइ भी उनकी छानबीन में जुट जाती। अभी न तो ऐसा कुछ हो रहा है और न होने के दूर-दूर तक कोई आसार हैं। जाहिर है कि आम आदमी इस नतीजे पर पहुंचने के लिए विवश है कि वाड्रा के खिलाफ कोई कार्रवाई सिर्फ इसलिए नहीं हो रही है, क्योंकि वह सोनिया गांधी के दामाद हैं। कांग्रेसी यह भी नहीं कह पा रहे हैं कि वाड्रा की संपत्ति दहेज में मिली संपदा है। वाड्रा-डीएलएफ जमीन सौदे को रद किए जाने के बाद हरियाणा सरकार जांच अवश्य करा रही है, लेकिन कोई भी समझ सकता है कि उसकी दिलचस्पी वाड्रा और उनकी कंपनियों को क्लीनचिट देने में है। यही कारण रहा कि हरियाणा सरकार के आइएएस अधिकारी अशोक खेमका ने जैसे ही वाड्रा की ओर से खरीदी गई जमीनों की छानबीन शुरू की, उनका तबादला कर दिया गया। हरियाणा सरकार ऐसे व्यवहार कर रही है जैसे वाड्रा हरियाणा नामक कांग्रेस की जागीर के शासक हों। जिस तरह पुराने जमाने में राजा-महाराजा अपनी पुत्रियों-दामादों को दहेज में कुछ इलाकों का स्वामित्व सौंप देते थे कुछ वैसा ही मामला रॉबर्ट वाड्रा का नजर आता है। वाड्रा देश के नियम-कानून और संविधान से इतर नजर आ रहे हैं। हरियाणा सरकार के साथ-साथ केंद्रीय सत्ता उनके बचाव में खड़ी है। केंद्र सरकार के करीब आधे मंत्री उनका बचाव कर रहे हैं। बाकी आधे मौन हैं और उनके मौन का वही मतलब है जो मुखर मंत्रियों का है। इस पर भी गौर करें कि देश में हर किसी की आय से अधिक संपत्ति की जांच हो सकती है-यहां तक कि मायावती की, मुलायम सिंह की भी और जगनमोहन रेड्डी की भी, लेकिन रॉबर्ट वाड्रा की नहीं हो सकती। यदि यह जांच हो जाए और उसमें वाड्रा पाक-साफ पाए जाएं तो इससे उनका और कांग्रेस का ही हित होगा, लेकिन हर कांग्रेसी इस जुगत में लगा है कि कैसे दामाद जी की जांच का सवाल न उठने पाए। इसी जुगत के तहत तरह-तरह के जतन किए जा रहे हैं। पिछले दिनों दिग्विजय सिंह ने केजरीवाल से जो 27 सवाल पूछे उसके पीछे भी यही उद्देश्य था। केजरीवाल से 27 सवाल तब पूछे गए जब उन्होंने वाड्रा को घेरा। उनसे जो सवाल पूछे गए हैं उनमें से ज्यादातर तो कोई सवाल ही नहीं हैं और यदि हैं भी तो उनका जवाब केंद्र सरकार को देना चाहिए, जैसे कि यह कि भारतीय राजस्व सेवा के तहत काम करने के दौरान केजरीवाल और उनकी पत्नी दिल्ली से बाहर क्यों नहीं तैनात हुए? दिग्विजय सिंह और अन्य कांग्रेसी चाहें तो केजरीवाल से 270 सवाल पूछें और यदि इससे भी काम न चले तो बाबा रामदेव की तरह उनके खिलाफ जांच बैठा दें, लेकिन उन्हें यह तो बताना ही होगा कि वाड्रा तीन साल में तीन सौ करोड़ के स्वामी कैसे बन गए? यदि कांग्रेस के नेतृत्व वाली हरियाणा और साथ ही केंद्र सरकार इस सवाल का जवाब नहीं देती तो फिर देश में किसी के भी खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले की जांच होने का कोई औचित्य नहीं? किसी भी लोकतांत्रिक देश में दो तरह के कानून नहीं हो सकते। अभी यह साफ नजर आ रहा है कि सोनिया गांधी के दामाद वाड्रा के लिए अलग कानून है और शेष देशवासियों के लिए अलग। कांग्रेस वाड्रा के मामले को मामूली बताने की कोशिश कर रही है। उसकी यह कोशिश उसे बहुत भारी पड़ सकती है। बोफोर्स तोप सौदे में सिर्फ 67 करोड़ की दलाली का मामला उछला था, लेकिन इस संदेह मात्र ने कांग्रेस की लुटिया डुबो दी थी कि दलाली के इस लेन-देन में राजीव गांधी की भी भूमिका थी। यदि कांग्रेस को लोक लाज की तनिक भी परवाह है तो उसे दामाद प्रेम से मुक्त होना होगा। (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)

Dainik Jagran National Edition 23-10-2012 ns’k fons’k ist 8