भारत-पाकिस्तान और अमेरिका-पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय संबंधों में कोई सुधार होता नजर नहीं आ रहा है। पांच जुलाई को भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों के बीच हुई बैठक बेनतीजा खत्म हो गई। यह बैठक मुंबई आतंकी हमले के संदर्भ में नए खुलासों की पृष्ठभूमि में नई दिल्ली में हुई थी। सऊदी अरब द्वारा मुंबई हमलों के संदिग्ध अबू जुंदाल को भारत सौंपने के बाद इन हमलों में पाक सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ की संलिप्तता के नए सबूत मिले हैं। अबू जुंदाल को भारत भेजने में भारत, सऊदी अरब और अमेरिका के सहयोग और समन्वय से इस्लामाबाद की चिढ़ और बढ़ गई है, लेकिन विदेश सचिव वार्ता के बाद जारी संयुक्त बयान में इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं की गई। 3 जुलाई को अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन द्वारा नवंबर 2011 में ड्रोन हमले में पाक सैनिकों के मारे जाने पर खेद जताने के बाद अमेरिका और पाकिस्तान के बीच अनेक मुद्दों पर मौजूद गतिरोध टूटता नजर आ रहा है। सैनिकों के मारे जाने के मुद्दे पर पाकिस्तान की सरकार अमेरिका से माफी मांगने को कह रही थी, जबकि अमेरिका इसके लिए राजी नहीं था। इसी कारण पिछले सात महीनों से नाटो फौज के लिए रसद की आपूर्ति के लिए पाकिस्तान ने रास्ते बंद किए हुए थे। पाक-अमेरिका के बीच इस समझौते की उम्मीद की जा रही थी, क्योंकि अफगानिस्तान में सेना को रसद की आपूर्ति के लिए अमेरिका पाकिस्तान के ऊपर निर्भर है। इसके अलावा 2014 में अफगानिस्तान से विदाई के वक्त वहां से भारी उपकरण और सैन्य साजोसामान वापस ले जाने के लिए भी उसे इस रास्ते की सख्त जरूरत है। यह स्पष्ट है कि इस मुद्दे पर दोनों पक्षों की तरफ से भारी मोलभाव किया गया। पाकिस्तान ने प्रति ट्रक भारी रकम की मांग पर जोर नहीं दिया और अमेरिका पाकिस्तान को मिलने वाली मदद से रोक हटाने के लिए राजी हो गया। हालांकि पाकिस्तान में विपक्षी दलों और दक्षिणपंथी पार्टियों ने इस समझौते का पुरजोर विरोध किया है और इसके विरोध में वहां जोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं। हालांकि यह आतंक के मुद्दे पर तनावपूर्ण संधि से अधिक कुछ नहीं है। आतंकियों को मदद पहुंचाने में पाकिस्तान सरकार की भूमिका पर चर्चा नहीं की गई। इसका नई दिल्ली के लिए गंभीर निहितार्थ है। पाक सेना पर अफगानिस्तान में हक्कानी समूह से संबंध तोड़ने का दबाव नहीं डाला गया। माफी के मुद्दे पर अमेरिका को झुकने को मजबूर करने के बाद पाक सत्ता प्रतिष्ठान खुद को विजेता मान रहा है। पाकिस्तान का मानना है कि वह चुनिंदा आतंकी समूहों और उग्रवादी विचारधाराओं को समर्थन जारी रख सकता है। पिछले चार दशकों से भारत-पाक संबंधों पर जुलाई माह की कुछ विशेष तिथियों की अहम भूमिका रही है। 2 जुलाई, 1972 को भारत और पाकिस्तान ने शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसकी प्रस्तावना में उल्लखित है, दोनों देश मतभेदों को शांतिपूर्ण ढंग से द्विपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से निपटाने पर सहमत हो गए हैं। जब तक समस्याओं का पूर्ण समाधान नहीं निकल जाता तब तक कोई भी पक्ष एकतरफा कार्रवाई कर यथास्थिति को बदलने का प्रयास नहीं करेगा और दोनों पक्ष ऐसे संगठनों, सहायता और प्रोत्साहन पर रोक लगाएंगे जो शांतिपूर्ण और सौहार्द्र संबंधों को नुकसान पहुंचाते हों। हालिया इतिहास में शिमला समझौते की गिनती प्रमुख युद्धविराम संधि के रूप में होती है, किंतु अफसोस की बात है कि 40 साल बाद शिमला समझौते का पुनर्मूल्यांकन निराश करने वाला है। जुल्फिकर अली भुट्टो अपने वायदों से मुकर गए और बाद के वर्षों में भारत विरोधी लहर पाकिस्तान की प्रमुख विशेषता बन गई। भारत-पाक के बीच उग्र इतिहास के अनुरूप ही 5 जुलाई, 1977 को जनरल जिया उल हक ने जुल्फिकार अली भुट्टो से सत्ता हथिया ली और 4 जुलाई, 1979 को भुट्टो को फांसी दे दी गई। जनरल जिया उल हक के समय में पाकिस्तान का सतत इस्लामीकरण शुरू हो गया था। 1979 के अंत में सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद यह भाव और गहरा हो गया। अफगानिस्तान में सोवियत संघ के कब्जे के बाद ही अमेरिका-पाक संबंध मजबूत हुए और इसी कारण इस्लामिक, आतंकवाद तथा मुजाहिदीन तत्वों का पोषण शुरू हुआ। अमेरिका ने पाक सेना के साथ कुत्सित मेलजोल किया और ओसामा बिन लादेन प्रकरण के बावजूद (जिससे पाक सेना के आतंक को प्रोत्साहन देने के संबंध में कोई संदेह नहीं रह गया) अमेरिका अंतर्विरोधों को स्वीकार करता चला गया। इसी प्रकार अब्दुल कादिर खान के खुलासे के बाद अमेरिका ने अंतर्विरोधों को स्वीकार किया था। आज भी हालात बदले नहीं हैं। एक बार फिर अफगान कार्ड खेला जा रहा है और इस साल अमेरिका में चुनाव के कारण राष्ट्रपति बराक ओबामा के पास नीति में कोई बड़ा परिवर्तन करने की गुंजाइश नहीं बची है। भारत को पाकिस्तान की आतंकवाद को समर्थन देने की कूटनीति की चुनौती से निपटना होगा। आने वाले वर्षो में भी पाक सेना एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी और पाक सरकार इसी प्रकार असहाय नजर आएगी। भारत को स्वीकार करना होगा कि पाकिस्तान में जनरल जिया ने जिस जिहादी मानसिकता को जन्म दिया था उसने शिमला समझौते की भावना का हरण कर लिया है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
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