Tuesday, July 10, 2012

नेपाल में राजशाही की दस्तक


कोई चार साल पहले राजगद्दी त्यागने वाले नेपाल के नरेश राजा ज्ञानेंद्र वीर विक्रम शाह ने एक बार फिर राजा बनने की इच्छा जाहिर की है। ज्ञानेंद्र के मुताबिक चार साल पहले हुए लोकतांत्रिक जन आंदोलन के ज्वारभाटा को शांत करने के लिए आंदोलनरत दलों के बीच जो समझौता हुआ था, उसमें राजतंत्र को रखने पर सहमति हुई थी। समझौते के तहत भंग हुई संसद की बहाली, राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधि प्रधानमंत्री की नियुक्ति, संवैधानिक राजतंत्र के साथ बहुदलीय प्रजातंत्र का उल्लेख था। नेपाल के पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र की रुचि सक्रिय राजनीति में नहीं है, लेकिन वे चाहते हैं कि नेपाल में सांकेतिक राजशाही पुन: स्थापित हो। फिलहाल नेपाल को संघीय गणतंत्र घोषित करने के लिए निर्वाचित संविधान सभा नतीजे तक पहुंचे बिना भंग हो गई है। अंधकार की ओर जाते नेपाल के हालात को देखकर लोग राजशाही को पुन: स्थापित करने की मांग करने लगे हैं। पहले से ही राजशाही के पक्षधर नेता कमल थापा के नेतृत्व में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी सहित कई अन्य दल राजशाही को पुन: स्थापित करने के लिए मुहिम चलाए हुए हैं। इस मुहिम को नेपाल की अस्थिर राजनीति और सत्ता के भूखे राजनेताओं के कारण अधिक बल मिल रहा है। इसी का नतीजा है कि भारत के पड़ोसी देश नेपाल में अब एक बार फिर राजशाही दस्तक देने लगी है। लोगों का भरोसा बहुदलीय व्यवस्था से उठता जा रहा है। 1990 के बाद नेपाली जनता में पहली बार राजा के प्रति इतनी श्रद्धा देखी जा रही है। नेपाल के अधिकांश लोग चाहते हैं कि राजतंत्र की बहाली हो, जिससे देश जाति, धर्म और गरीबी के दंश से बाहर निकल सके। अराजकता का दौर यह जानना बहुत जरूरी है कि वर्ष 2008 में हुए ऐतिहासिक आंदोलन के बाद नेपाल को संघीय ढांचे में ढालने पर सभी दलों के बीच आम सहमति बनी थी। इसके बाद संविधान सभा की पहली बैठक में नेपाल को गणतंत्र घोषित करने के साथ ही प्रतिनिधि सभा ने राजशाही काल से हिंदू राष्ट्र कहे जा रहे नेपाल को धर्म निरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया। नेपाल में संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र आए चार वर्ष बीच चुके हैं, लेकिन अभी तक वहां संविधान का निर्माण नहीं हो सका है। परिणाम स्वरूप मौजूदा समय में नेपाल में अराजकता का माहौल बना हुआ है। लोग कानून व्यवस्था की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं। छोटी-छोटी बातों पर चक्काजाम करने के साथ ही गोलियां चल रही हैं। खुलेआम नेताओं तथा न्यायाधीशों की हत्या हो रही है। सर्वसाधारण जनता दहशत में है। देश का विकास रसातल की ओर जा रहा है। देश में नौकरियां नहीं हैं। व्यवसायी अस्थिर राजनीतिक माहौल के कारण नेपाल में उद्योग लगाना नहीं चाहते। सीमाओं का हाल तो इससे भी बुरा है। दस-दस रुपये की रिश्वत लेकर नेपाल-भारत सीमा पर आपत्तिजनक सामग्रियां ले जाने-ले आने की अनुमति दी जा रही है। इसी तरह की अव्यवस्था और तंत्र का नतीजा है कि मुंबई हमले का आरोपी अबू जंुदाल नेपाल में प्रशिक्षण पाता रहा और किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई। ऐसे तमाम अबू जुंदाल नेपाल में मिल जाएंगे, जो भारत या अन्य देशों के खिलाफ साजिश रच रहे हैं। यही वजह है कि चार साल तक देश की दुर्गति देखने के बाद जब पूर्व नरेश ने मुंह खोला तो नेपाल में हड़कंप मच गया है। पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र की अभिव्यक्ति में वजन भी नजर आता है। वास्तव में चार साल पहले जिस दिन राजा ने नारायणहिती राजदरबार छोड़कर राजपाट जनता को सौंपा था, उससे बेहतर स्थिति में नेपाल नहीं पहुंचा है। बल्कि नेपाल के विकास में निरंतर स्खलन ही हो रहा है। 1,47,181 किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस छोटे से देश में राजनीति जिस दिशा की ओर जा रही है, उससे तो यही लगता है कि बहुत जल्द ही पड़ोसी देश नेपाल में जातीय हिंसा फैलने वाली है। महज 2.9 करोड़ आबादी वाले इस देश में राई, नेवारी, लिंबु, थारू, तामांग सहित लगभग सभी जातियां गणतंत्र के नाम पर अपने लिए एक अलग प्रदेश की मांग कर रही हैं। समस्या तो यह है कि अगर अलग राज्य नहीं दिया गया तो देश को क्षति पहुंचाने से लेकर आत्मदाह तक करने की धमकी दी जा रही है। ऐसे में राजनेताओं के पास भी कोई चारा नहीं है। माओवादी सहित कई राजनीतिक पार्टियां सभी को अलग-अलग राज्य देने का प्रलोभन देकर ही संसद तक पहुंची हैं, लेकिन ऐसे नाजुक मोड़ पर ये प्रलोभन इनके लिए गले की फांस बन गया है। समस्या यह है कि सत्ता पर काबिज नेपाल की सबसे बड़ी पार्टी एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी यह जानती है कि गणतंत्र से नेपाल विखंडित हो जाएगा, लेकिन वह भी मजबूर है। सभी जातियों को रेवड़ी की तरह प्रदेश न बांटे जाएं तो सत्ता तक पहुंचने की उनकी सीढ़ी टूट जाएगी। आगामी चुनावों में उनकी पार्टी के लिए अपना अस्तित्व बचाना भी मुश्किल हो जाएगा। अत: वह चाहते हैं कि भले ही देश टूट जाए, लेकिन किसी तरह जातियों को प्रसाद के रूप में प्रदेश का वितरण कर दिया जाए। वहीं दूसरी पार्टियां नेपाली कांग्रेस, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी एकीकृत मा‌र्क्सवाद-लेनिनवाद (नेकपा एमाले) और मधेश की सभी प्रमुख पार्टियां भी अपना-अपना उल्लू सीधा करने में लगी हुई हैं। ये पार्टियां अपने मतदाताओं के मुताबिक नेपाल का विभाजन चाहती हैं, न कि नेपाल की एकता। ज्ञानेंद्र की मंशा ऐसे में यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर नेपाल को बचाएगा कौन? किसी न किसी को तो आगे आना ही था। राष्ट्रीय अखंडता के लिए पूर्व राजा ज्ञानेंद्र आगे आने की सोचते हैं तो यह स्वागत योग्य कदम कह सकते हैं। वैसे भी जितनी शांति राजशाही में थी, बहुदलीय व्यवस्था आने के बाद कभी नहीं रही। प्रजातंत्र आने के साथ ही नेपाल तो राजनीतिक दलदल में फंस गया। इसका असर भारत पर देखने को मिल रहा है। धर्म निरपेक्ष देश कहकर सभी समुदाय को आदर-सम्मान देने के नाम पर भारत-नेपाल के बॉर्डर पर बांग्लादेशियों ने अपना डेरा जमाना शुरू कर दिया है। वर्तमान में नेपाल को पूर्व राजा त्रिभुवन वीर विक्रम शाह, महेंद्र वीर विक्रम शाह और वीरेंद्र वीर विक्रम शाह के समय नेपाल के प्रति भारत का जो सहयोगात्मक रवैया रहता था, वही सहयोगात्मक भावना भारत को पुन: जगाने की आवश्यकता है। पड़ोसी देश नेपाल में राजनीतिक उथल-पुथल की स्थिति हो तो इसका सीधा असर भारत के आर्थिक हालात तथा सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ेगा। ऐसे में आप पड़ोसी राष्ट्र में मचे घमासान को यों ही मूक दर्शक बनकर नहीं देख सकते। जब अमेरिका सात समंदर पार से आकर नेपाल के हालता को टटोल सकता है तो आप उस देश के सबसे नजदीकी मित्र होते हुए भी चुप क्यों हैं? क्या चीन उत्तर कोरिया के हालात पर पैनी नजर नहीं रखता? क्या अमेरिका दक्षिण कोरिया के हालात से वाकिफ नहीं है? क्या वह सामने आकर उसकी परिस्थिति की समीक्षा नहीं करता? ऐसे ही जितने भी बड़े देश हैं, वे अपने मित्र धर्म को निभाते हैं। लेकिन भारत पड़ोसी देश को उसके हाल पर क्यों छोड़ रहा है? लोकतांत्रिक या गणतांत्रिक नेपाल से न ही नेपाल का भला होगा और न ही भारत का। लिहाजा, भारत को खुले तौर पर नेपाल में पुन: राजतंत्र की बहाली का प्रयास करना चाहिए। पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र कतिपय विवादों से घिरे हुए जरूर हैं, लेकिन उनमें नेपाल को विकास की ओर अग्रसर करने के अदम्य साहस के साथ पड़ोसी धर्म निभाने की भी भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। खासकर वह भारत के साथ बेहतर संबंध चाहते हैं। ऐसे में पूर्व राजा की वापसी को भारत के संदर्भ में देखा जाए तो बेहतर कहा जा सकता है। (लेखक नेपाल मसलों के जानकार हैं)

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