पारस्परिक आदान-प्रदान कूटनीति का पहला सिद्धांत है, किंतु भारत के लिए नहीं। पड़ोसियों से दोस्ती की खातिर भारत हदें लांघता रहा है, फिर भी आज वह समस्या खड़ी करने वाले पड़ोसियों से घिरा हुआ है। भूमि के मुद्दे पर भारत की उदारता की काफी चर्चा हुई है। भारत 1954 में तिब्बत पर ब्रिटिश वंशागत अपरदेशीय अधिकार को तिलांजलि दे चुका है, 1965 के युद्ध के बाद पाकिस्तान को सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हाजी पीर वापस कर चुका है और 1971 के युद्ध के बाद भूभाग लाभ तथा 93000 सैनिकों को वापस लौटाने की उदारता दिखा चुका है। ये सब त्याग बिना पारस्परिक आदान-प्रदान के हुए हैं। इस रेकॉर्ड के बावजूद, आज भारत के अंदर से ही सियाचिन ग्लेशियर से नियंत्रण हटाने की मांग की जा रही है। बहुत कम लोगों को यह पता है कि पड़ोसियों के प्रति जल संकट से जूझ रहे भारत की उदारता भूभाग लौटाने तक ही नहीं, बल्कि नदियों का पानी लुटाने तक विस्तारित है। जल बंटावारे के विश्व के सर्वाधिक उदार समझौते का श्रेय भारत को जाता है। 1960 में भारत ने छह नदियों का 80.52 फीसदी पानी पाकिस्तान के लिए छोड़ दिया और खुद अपने लिए महज 19.48 फीसदी पानी ही रखा। पड़ोसी राष्ट्र के लिए छोड़े जाने वाले पानी की कुल मात्रा तथा अनुपात दोनों ही दृष्टि से अब तक कोई भी अंतरराष्ट्रीय जल संधि इस समझौते की बराबरी नहीं कर पाई है। वास्तव में, अमेरिका जितना पानी मेक्सिको के लिए छोड़ता है, भारत उसका 90 गुना पानी पाकिस्तान के लिए छोड़ रहा है। भारत इस संधि से अनिश्चित काल तक के लिए बंधा हुआ है। महत्वपूर्ण यह है कि भारत बांग्लादेश के साथ भी इसी तरह के जाल में न फंस जाए। भारत 1996 में बांग्लादेश के साथ संधि कर चुका है, जिसके तहत फरक्का से लगभग आधा पानी अपने इस पड़ोसी के लिए छोड़ा जा रहा है। अब शेख हसीना के हाथ मजबूत करने के लिए भारत तीस्ता नदी का आधा पानी बांग्लादेश के लिए छोड़ने को तैयार नजर आ रहा है। शेख हसीना भारत की मित्र हो सकती हैं, किंतु वह हमेशा के लिए बांग्लादेश की शासक नहीं रहेंगी और भविष्य में वहां भारत विरोधी शक्तियां सत्ता में आ सकती हैं। जल कूटनीति में भारत की शिकस्त इस बात से सिद्ध हो जाती है कि चीन से बहकर भारत आने वाली नदियों के संबंध में बीजिंग दिल्ली को 80 फीसदी जल देना तो दूर, जल समझौते की अवधारणा तक से इन्कार कर रहा है। विपुल जलधाराओं से लैस चीन एशिया के जल संसाधनों पर पकड़ मजबूत रखने की मंशा से भारतीय हितों को चुनौती दे रहा है। वैसे तो अफगानिस्तान से लेकर वियेतनाम तक अनेक देश तिब्बत से निकलने वाली नदियों का जल प्राप्त करते हैं, किंतु भारत की तिब्बती पानी पर निर्भरता इन सभी देशों से अधिक है। संयुक्त राष्ट्र के हालिया आंकड़ों के अनुसार तिब्बती हिमालयी क्षेत्र से बहने वाली करीब एक दर्जन नदियों से भारत को अपनी आपूर्ति का एक-तिहाई जल मिलता है। यानी साल में करीब 1,911 क्यूबिक किलोमीटर जल भारत को मिलता है। तिब्बत से बहकर भारत आने वाली तमाम नदियों में ब्रह्मपुत्र सबसे बड़ी है। भारत में आने से पहले यह नदी हिमालय के ग्लेशियरों से होती हुई पश्चिम से पूरब की ओर बहती है। बर्फ और पिघले हुए ग्लेशियर का पानी इस नदी को इतना विशाल बनाता है। भारत में प्रवेश के समय ब्रह्मपुत्र का सीमा पार जल प्रवाह एशिया में सबसे अधिक है। ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत की दक्षिण सीमा के करीब से हिमालयी ढलानों पर करीब 2200 किलोमीटर बहते हुए हिमालय की बेहद उर्वर गाद अपने साथ लाती है। ब्रह्मपुत्र के पानी में घुली-मिली इस पोषक गाद के कारण ही असम के मैदानी इलाकों और बांग्लादेश के पूर्वी हिस्से की जमीन फिर से उर्वरा शक्ति से भर जाती है। हर साल ब्रह्मपुत्र में आने वाली बाढ़ से ये पोषक तत्व पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश के मैदानों में दूर-दूर तक समा जाते हैं और इस प्राकृतिक तालाब की अवस्था में किसान धान की भरपूर पैदावार लेते हैं। इसके अलावा वहां मछली पालन भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। ब्रह्मपुत्र की निचली खाड़ी की उर्वर भूमि गाद की इस सालाना भेंट पर निर्भर करती है। यही नहीं बंगाल की खाड़ी में समुद्री जीवन भी ब्रह्मपुत्र और अन्य हिमालयी नदियों से पोषक तत्व हासिल करता है। चीन में ब्रह्मपुत्र पर बांध बनाने के कारण भारत और बांग्लादेश के किसान प्रकृति के इस अनमोल उपहार से वंचित रह जाएंगे। ब्रह्मपुत्र नदी की अधिकांश पोषक गाद प्राकृतिक रूप से बहकर भारत और बांग्लादेश आने के बजाय बांधों में रुक जाएगी। ठीक उसी तरह जैसे थ्री जॉर्जेस बांध यांग्जे नदी की गाद को थाम लेता है और यह जलकुंडों में जमा हो जाती है। चीन में ब्रह्मपुत्र और अन्य नदियों पर जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण से सूखे मौसम में भारत में आने वाले पानी की मात्रा कम हो जाएगी। इसके अलावा चीन को अपनी मर्जी से भारत में पानी छोड़ने या रोकने का औजार भी मिल जाएगा। एक प्रभावशाली चीनी शिक्षाविद ने मुझे बताया था कि तिब्बती नदियों का रुख मोड़ने का फैसला लेते समय चीनी नीतिनिर्माताओं के सामने दो ही विकल्प हैं। एक तो चीन की उत्तरी आबादी की प्यास बुझाना तथा दूसरा भारत तथा अन्य देशों को नाराज न करना। और इन विकल्पों में से चुनाव कोई मुश्किल नहीं है। सीधा-सा तथ्य यह है कि जब राष्ट्रीय हितों का सवाल आता है तो चीन अन्य देशों के असंतोष और नाराजगी की जरा भी परवाह नहीं करता। इसकी नीतियां राष्ट्रीय हित साधने के लिए बनी हैं न कि दूसरे देशों का अनुमोदन हासिल करने या फिर उनकी नाराजगी दूर करने के लिए। भारत को भी अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए। ऐसे में यह पूछना उचित है कि क्या अपने पड़ोसियों के प्रति शाश्वत उदारता के लिए भारत की भर्त्सना की जानी चाहिए? इस सवाल का जवाब जल्द चाहिए क्योंकि भारत ने अपनी नई सहायता नीति पर चलना शुरू कर दिया है-एक अरब डॉलर बांग्लादेश को, पचास करोड़ डॉलर म्यांमार को, 30 करोड़ डॉलर श्रीलंका को, 14 करोड़ डॉलर मालदीव्ज को। इसके अलावा अब अफगानिस्तान और नेपाल को भी उदार सहायता दी जा रही है। इस सहायता उदारता का नतीजा भी जल और भूमि उदारता के समान होगा। कूटनीति में उदारता का लाभांश तभी मिल सकता है, जब इसके माध्यम से क्षेत्रीय सुरक्षा कि स्थिति में सुधार आता हो ताकि भारत व्यापक वैश्विक भूमिका निभा सके। किंतु अगर यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों का मूल तत्व नहीं है, तो भारत अपने भूभाग पर अत्याचार कर रहा है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
Thursday, July 12, 2012
नाजुक डोर से जुड़े रिश्ते
भारत-पाकिस्तान और अमेरिका-पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय संबंधों में कोई सुधार होता नजर नहीं आ रहा है। पांच जुलाई को भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों के बीच हुई बैठक बेनतीजा खत्म हो गई। यह बैठक मुंबई आतंकी हमले के संदर्भ में नए खुलासों की पृष्ठभूमि में नई दिल्ली में हुई थी। सऊदी अरब द्वारा मुंबई हमलों के संदिग्ध अबू जुंदाल को भारत सौंपने के बाद इन हमलों में पाक सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ की संलिप्तता के नए सबूत मिले हैं। अबू जुंदाल को भारत भेजने में भारत, सऊदी अरब और अमेरिका के सहयोग और समन्वय से इस्लामाबाद की चिढ़ और बढ़ गई है, लेकिन विदेश सचिव वार्ता के बाद जारी संयुक्त बयान में इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं की गई। 3 जुलाई को अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन द्वारा नवंबर 2011 में ड्रोन हमले में पाक सैनिकों के मारे जाने पर खेद जताने के बाद अमेरिका और पाकिस्तान के बीच अनेक मुद्दों पर मौजूद गतिरोध टूटता नजर आ रहा है। सैनिकों के मारे जाने के मुद्दे पर पाकिस्तान की सरकार अमेरिका से माफी मांगने को कह रही थी, जबकि अमेरिका इसके लिए राजी नहीं था। इसी कारण पिछले सात महीनों से नाटो फौज के लिए रसद की आपूर्ति के लिए पाकिस्तान ने रास्ते बंद किए हुए थे। पाक-अमेरिका के बीच इस समझौते की उम्मीद की जा रही थी, क्योंकि अफगानिस्तान में सेना को रसद की आपूर्ति के लिए अमेरिका पाकिस्तान के ऊपर निर्भर है। इसके अलावा 2014 में अफगानिस्तान से विदाई के वक्त वहां से भारी उपकरण और सैन्य साजोसामान वापस ले जाने के लिए भी उसे इस रास्ते की सख्त जरूरत है। यह स्पष्ट है कि इस मुद्दे पर दोनों पक्षों की तरफ से भारी मोलभाव किया गया। पाकिस्तान ने प्रति ट्रक भारी रकम की मांग पर जोर नहीं दिया और अमेरिका पाकिस्तान को मिलने वाली मदद से रोक हटाने के लिए राजी हो गया। हालांकि पाकिस्तान में विपक्षी दलों और दक्षिणपंथी पार्टियों ने इस समझौते का पुरजोर विरोध किया है और इसके विरोध में वहां जोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं। हालांकि यह आतंक के मुद्दे पर तनावपूर्ण संधि से अधिक कुछ नहीं है। आतंकियों को मदद पहुंचाने में पाकिस्तान सरकार की भूमिका पर चर्चा नहीं की गई। इसका नई दिल्ली के लिए गंभीर निहितार्थ है। पाक सेना पर अफगानिस्तान में हक्कानी समूह से संबंध तोड़ने का दबाव नहीं डाला गया। माफी के मुद्दे पर अमेरिका को झुकने को मजबूर करने के बाद पाक सत्ता प्रतिष्ठान खुद को विजेता मान रहा है। पाकिस्तान का मानना है कि वह चुनिंदा आतंकी समूहों और उग्रवादी विचारधाराओं को समर्थन जारी रख सकता है। पिछले चार दशकों से भारत-पाक संबंधों पर जुलाई माह की कुछ विशेष तिथियों की अहम भूमिका रही है। 2 जुलाई, 1972 को भारत और पाकिस्तान ने शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसकी प्रस्तावना में उल्लखित है, दोनों देश मतभेदों को शांतिपूर्ण ढंग से द्विपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से निपटाने पर सहमत हो गए हैं। जब तक समस्याओं का पूर्ण समाधान नहीं निकल जाता तब तक कोई भी पक्ष एकतरफा कार्रवाई कर यथास्थिति को बदलने का प्रयास नहीं करेगा और दोनों पक्ष ऐसे संगठनों, सहायता और प्रोत्साहन पर रोक लगाएंगे जो शांतिपूर्ण और सौहार्द्र संबंधों को नुकसान पहुंचाते हों। हालिया इतिहास में शिमला समझौते की गिनती प्रमुख युद्धविराम संधि के रूप में होती है, किंतु अफसोस की बात है कि 40 साल बाद शिमला समझौते का पुनर्मूल्यांकन निराश करने वाला है। जुल्फिकर अली भुट्टो अपने वायदों से मुकर गए और बाद के वर्षों में भारत विरोधी लहर पाकिस्तान की प्रमुख विशेषता बन गई। भारत-पाक के बीच उग्र इतिहास के अनुरूप ही 5 जुलाई, 1977 को जनरल जिया उल हक ने जुल्फिकार अली भुट्टो से सत्ता हथिया ली और 4 जुलाई, 1979 को भुट्टो को फांसी दे दी गई। जनरल जिया उल हक के समय में पाकिस्तान का सतत इस्लामीकरण शुरू हो गया था। 1979 के अंत में सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद यह भाव और गहरा हो गया। अफगानिस्तान में सोवियत संघ के कब्जे के बाद ही अमेरिका-पाक संबंध मजबूत हुए और इसी कारण इस्लामिक, आतंकवाद तथा मुजाहिदीन तत्वों का पोषण शुरू हुआ। अमेरिका ने पाक सेना के साथ कुत्सित मेलजोल किया और ओसामा बिन लादेन प्रकरण के बावजूद (जिससे पाक सेना के आतंक को प्रोत्साहन देने के संबंध में कोई संदेह नहीं रह गया) अमेरिका अंतर्विरोधों को स्वीकार करता चला गया। इसी प्रकार अब्दुल कादिर खान के खुलासे के बाद अमेरिका ने अंतर्विरोधों को स्वीकार किया था। आज भी हालात बदले नहीं हैं। एक बार फिर अफगान कार्ड खेला जा रहा है और इस साल अमेरिका में चुनाव के कारण राष्ट्रपति बराक ओबामा के पास नीति में कोई बड़ा परिवर्तन करने की गुंजाइश नहीं बची है। भारत को पाकिस्तान की आतंकवाद को समर्थन देने की कूटनीति की चुनौती से निपटना होगा। आने वाले वर्षो में भी पाक सेना एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी और पाक सरकार इसी प्रकार असहाय नजर आएगी। भारत को स्वीकार करना होगा कि पाकिस्तान में जनरल जिया ने जिस जिहादी मानसिकता को जन्म दिया था उसने शिमला समझौते की भावना का हरण कर लिया है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
मुअम्मर गद्दाफी का महल बनेगा संसद भवन
लीबिया के पूर्व तानाशाह कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के क्षतिग्रस्त महल को संसद भवन बनाने की योजना है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक गद्दाफी का बाब अल-अजीजिया परिसर लीबिया में लोकतंत्र का केंद्र बन सकता है। बाब अल-अजीजिया परिसर किसी समय लीबिया की सबसे डरावनी जगह थी, जिसमें गद्दाफी और उनके शासन के महत्वपूर्ण लोग अभेद्य दीवारों के पीछे रहते थे। यह त्रिपोली के केंद्र में स्थित है। यह किसी समय शहर के अंदर शहर हुआ करता था जहां भूमिगत सुरंग, बैरक और लोगों की नजर से बचे रहने वाले मनोरंजक स्थल हैं। अब लीबिया की नेशनल ट्रांजिशनल काउंसिल (एनटीसी) सरकार ने गद्दाफी के परिसर में संसद भवन बनाने की योजना बनाई है। परिसर में संग्रहालय और पुस्तकालय बनाने की भी योजना है। एनटीसी के महासचिव ओथमैन बेन सासी ने शनिवार को गार्जियन अखबार को बताया, मैं गद्दाफी के परिसर को संसद भवन बनाए जाने का प्रस्ताव करने जा रहा हूं। यह बहुत महत्वपूर्ण है। सासी ने लीबिया में मतदान समाप्त होने से कुछ देर पहले यह बयान दिया। लीबिया में 200 सदस्यीय संसद नेशनल कांग्रेस के लिए अभी कोई इमारत नहीं है। यह अगले महीने एनटीसी का स्थान लेगी। कांग्रेस नया संविधान तैयार करेगी और इस बात पर चर्चा करेगी के लीबिया में संसदीय या अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में से किसे अपनाया जाए। तत्काल तो लीबिया के चुने गए प्रतिनिधि त्रिपोली के रिक्सोस होटल के पास स्थित सम्मेलन केंद्र में बैठक करेंगे। सासी ने कहा कि वह चाहते हैं कि नई संसद की इमारत अगले वर्ष तैयार हो जाए, जब देश में नए चुनाव होने हैं।
Tuesday, July 10, 2012
नेपाल में राजशाही की दस्तक
कोई चार साल पहले राजगद्दी त्यागने वाले नेपाल के नरेश राजा ज्ञानेंद्र वीर विक्रम शाह ने एक बार फिर राजा बनने की इच्छा जाहिर की है। ज्ञानेंद्र के मुताबिक चार साल पहले हुए लोकतांत्रिक जन आंदोलन के ज्वारभाटा को शांत करने के लिए आंदोलनरत दलों के बीच जो समझौता हुआ था, उसमें राजतंत्र को रखने पर सहमति हुई थी। समझौते के तहत भंग हुई संसद की बहाली, राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधि प्रधानमंत्री की नियुक्ति, संवैधानिक राजतंत्र के साथ बहुदलीय प्रजातंत्र का उल्लेख था। नेपाल के पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र की रुचि सक्रिय राजनीति में नहीं है, लेकिन वे चाहते हैं कि नेपाल में सांकेतिक राजशाही पुन: स्थापित हो। फिलहाल नेपाल को संघीय गणतंत्र घोषित करने के लिए निर्वाचित संविधान सभा नतीजे तक पहुंचे बिना भंग हो गई है। अंधकार की ओर जाते नेपाल के हालात को देखकर लोग राजशाही को पुन: स्थापित करने की मांग करने लगे हैं। पहले से ही राजशाही के पक्षधर नेता कमल थापा के नेतृत्व में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी सहित कई अन्य दल राजशाही को पुन: स्थापित करने के लिए मुहिम चलाए हुए हैं। इस मुहिम को नेपाल की अस्थिर राजनीति और सत्ता के भूखे राजनेताओं के कारण अधिक बल मिल रहा है। इसी का नतीजा है कि भारत के पड़ोसी देश नेपाल में अब एक बार फिर राजशाही दस्तक देने लगी है। लोगों का भरोसा बहुदलीय व्यवस्था से उठता जा रहा है। 1990 के बाद नेपाली जनता में पहली बार राजा के प्रति इतनी श्रद्धा देखी जा रही है। नेपाल के अधिकांश लोग चाहते हैं कि राजतंत्र की बहाली हो, जिससे देश जाति, धर्म और गरीबी के दंश से बाहर निकल सके। अराजकता का दौर यह जानना बहुत जरूरी है कि वर्ष 2008 में हुए ऐतिहासिक आंदोलन के बाद नेपाल को संघीय ढांचे में ढालने पर सभी दलों के बीच आम सहमति बनी थी। इसके बाद संविधान सभा की पहली बैठक में नेपाल को गणतंत्र घोषित करने के साथ ही प्रतिनिधि सभा ने राजशाही काल से हिंदू राष्ट्र कहे जा रहे नेपाल को धर्म निरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया। नेपाल में संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र आए चार वर्ष बीच चुके हैं, लेकिन अभी तक वहां संविधान का निर्माण नहीं हो सका है। परिणाम स्वरूप मौजूदा समय में नेपाल में अराजकता का माहौल बना हुआ है। लोग कानून व्यवस्था की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं। छोटी-छोटी बातों पर चक्काजाम करने के साथ ही गोलियां चल रही हैं। खुलेआम नेताओं तथा न्यायाधीशों की हत्या हो रही है। सर्वसाधारण जनता दहशत में है। देश का विकास रसातल की ओर जा रहा है। देश में नौकरियां नहीं हैं। व्यवसायी अस्थिर राजनीतिक माहौल के कारण नेपाल में उद्योग लगाना नहीं चाहते। सीमाओं का हाल तो इससे भी बुरा है। दस-दस रुपये की रिश्वत लेकर नेपाल-भारत सीमा पर आपत्तिजनक सामग्रियां ले जाने-ले आने की अनुमति दी जा रही है। इसी तरह की अव्यवस्था और तंत्र का नतीजा है कि मुंबई हमले का आरोपी अबू जंुदाल नेपाल में प्रशिक्षण पाता रहा और किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई। ऐसे तमाम अबू जुंदाल नेपाल में मिल जाएंगे, जो भारत या अन्य देशों के खिलाफ साजिश रच रहे हैं। यही वजह है कि चार साल तक देश की दुर्गति देखने के बाद जब पूर्व नरेश ने मुंह खोला तो नेपाल में हड़कंप मच गया है। पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र की अभिव्यक्ति में वजन भी नजर आता है। वास्तव में चार साल पहले जिस दिन राजा ने नारायणहिती राजदरबार छोड़कर राजपाट जनता को सौंपा था, उससे बेहतर स्थिति में नेपाल नहीं पहुंचा है। बल्कि नेपाल के विकास में निरंतर स्खलन ही हो रहा है। 1,47,181 किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस छोटे से देश में राजनीति जिस दिशा की ओर जा रही है, उससे तो यही लगता है कि बहुत जल्द ही पड़ोसी देश नेपाल में जातीय हिंसा फैलने वाली है। महज 2.9 करोड़ आबादी वाले इस देश में राई, नेवारी, लिंबु, थारू, तामांग सहित लगभग सभी जातियां गणतंत्र के नाम पर अपने लिए एक अलग प्रदेश की मांग कर रही हैं। समस्या तो यह है कि अगर अलग राज्य नहीं दिया गया तो देश को क्षति पहुंचाने से लेकर आत्मदाह तक करने की धमकी दी जा रही है। ऐसे में राजनेताओं के पास भी कोई चारा नहीं है। माओवादी सहित कई राजनीतिक पार्टियां सभी को अलग-अलग राज्य देने का प्रलोभन देकर ही संसद तक पहुंची हैं, लेकिन ऐसे नाजुक मोड़ पर ये प्रलोभन इनके लिए गले की फांस बन गया है। समस्या यह है कि सत्ता पर काबिज नेपाल की सबसे बड़ी पार्टी एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी यह जानती है कि गणतंत्र से नेपाल विखंडित हो जाएगा, लेकिन वह भी मजबूर है। सभी जातियों को रेवड़ी की तरह प्रदेश न बांटे जाएं तो सत्ता तक पहुंचने की उनकी सीढ़ी टूट जाएगी। आगामी चुनावों में उनकी पार्टी के लिए अपना अस्तित्व बचाना भी मुश्किल हो जाएगा। अत: वह चाहते हैं कि भले ही देश टूट जाए, लेकिन किसी तरह जातियों को प्रसाद के रूप में प्रदेश का वितरण कर दिया जाए। वहीं दूसरी पार्टियां नेपाली कांग्रेस, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी एकीकृत मार्क्सवाद-लेनिनवाद (नेकपा एमाले) और मधेश की सभी प्रमुख पार्टियां भी अपना-अपना उल्लू सीधा करने में लगी हुई हैं। ये पार्टियां अपने मतदाताओं के मुताबिक नेपाल का विभाजन चाहती हैं, न कि नेपाल की एकता। ज्ञानेंद्र की मंशा ऐसे में यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर नेपाल को बचाएगा कौन? किसी न किसी को तो आगे आना ही था। राष्ट्रीय अखंडता के लिए पूर्व राजा ज्ञानेंद्र आगे आने की सोचते हैं तो यह स्वागत योग्य कदम कह सकते हैं। वैसे भी जितनी शांति राजशाही में थी, बहुदलीय व्यवस्था आने के बाद कभी नहीं रही। प्रजातंत्र आने के साथ ही नेपाल तो राजनीतिक दलदल में फंस गया। इसका असर भारत पर देखने को मिल रहा है। धर्म निरपेक्ष देश कहकर सभी समुदाय को आदर-सम्मान देने के नाम पर भारत-नेपाल के बॉर्डर पर बांग्लादेशियों ने अपना डेरा जमाना शुरू कर दिया है। वर्तमान में नेपाल को पूर्व राजा त्रिभुवन वीर विक्रम शाह, महेंद्र वीर विक्रम शाह और वीरेंद्र वीर विक्रम शाह के समय नेपाल के प्रति भारत का जो सहयोगात्मक रवैया रहता था, वही सहयोगात्मक भावना भारत को पुन: जगाने की आवश्यकता है। पड़ोसी देश नेपाल में राजनीतिक उथल-पुथल की स्थिति हो तो इसका सीधा असर भारत के आर्थिक हालात तथा सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ेगा। ऐसे में आप पड़ोसी राष्ट्र में मचे घमासान को यों ही मूक दर्शक बनकर नहीं देख सकते। जब अमेरिका सात समंदर पार से आकर नेपाल के हालता को टटोल सकता है तो आप उस देश के सबसे नजदीकी मित्र होते हुए भी चुप क्यों हैं? क्या चीन उत्तर कोरिया के हालात पर पैनी नजर नहीं रखता? क्या अमेरिका दक्षिण कोरिया के हालात से वाकिफ नहीं है? क्या वह सामने आकर उसकी परिस्थिति की समीक्षा नहीं करता? ऐसे ही जितने भी बड़े देश हैं, वे अपने मित्र धर्म को निभाते हैं। लेकिन भारत पड़ोसी देश को उसके हाल पर क्यों छोड़ रहा है? लोकतांत्रिक या गणतांत्रिक नेपाल से न ही नेपाल का भला होगा और न ही भारत का। लिहाजा, भारत को खुले तौर पर नेपाल में पुन: राजतंत्र की बहाली का प्रयास करना चाहिए। पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र कतिपय विवादों से घिरे हुए जरूर हैं, लेकिन उनमें नेपाल को विकास की ओर अग्रसर करने के अदम्य साहस के साथ पड़ोसी धर्म निभाने की भी भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। खासकर वह भारत के साथ बेहतर संबंध चाहते हैं। ऐसे में पूर्व राजा की वापसी को भारत के संदर्भ में देखा जाए तो बेहतर कहा जा सकता है। (लेखक नेपाल मसलों के जानकार हैं)
लीबिया में 60 वर्षो में पहली बार हुआ मतदान
लीबिया में 60 वर्षो में पहली बार जनरल नेशनल कांफ्रेंस के लिए शनिवार को हुए चुनाव में लोगों ने उत्साहपूर्वक वोट डाले। मतदान सुबह आठ से शाम आठ बजे तक चला। पूर्व तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी के शासन का अंत होने के बाद यहां मतदान हुआ है। हालांकि देश के सबसे बड़े शहर बेनगाजी के लिए, अंतरिम सरकार से और अधिक स्वायत्तता की मांग करने वाले प्रदर्शनकारियों ने मतदान केंद्रों पर हंगामा किया और सैकड़ों मतपत्रों को जला दिया। संघवादी प्रदर्शनकारियों ने पहले ही मतदान के बहिष्कार की धमकी दी थी। शुक्रवार को अज्ञात आतंकवादियों ने बेनगाजी में चुनाव सामग्री लेकर जा रहे पुलिस के एक हेलीकॉप्टर को मार गिराया, जिसमें एक चुनावी कर्मी की मौत हो गई थी। सूत्रों ने बताया कि इस हेलीकॉप्टर को पूर्वी शहर में कथित रूप से स्वायत्तता समर्थक आतंकवादियों ने मार गिराया है। लीबियाई 200 सदस्यीय असेंबली का चुनाव कर रहे हैं। बाद में इसी के द्वारा प्रधानमंत्री और कैबिनेट का चयन किया जाएगा। चुनाव मैदान में 3700 उम्मीदवार हैं। इनमें इस्लामी एजेंडे वाले उम्मीदवार प्रमुख हैं। इससे इस बात की संभावना बढ़ गई है कि ट्यूनीशिया और मिस्र के बाद लीबिया, अरब में ऐसा देश होगा जहां धार्मिक पार्टी सत्ता पर पकड़ बनाएगी। राजधानी त्रिपोली में मतदान शांतिपूर्ण रहा। एक मतदान केंद्र पर जब पहली महिला ने वोट डाला तो वहां नारों की गूंज सुनाई देने लगी। पहली बार वोट डालने वाली 50 वर्षीय शिक्षिका जैनाब मासरी ने कहा, मैं अपने अनुभव को बयां नहीं कर सकती हूं। मुझे विश्वास है कि भविष्य अच्छा होगा और लीबिया सफल होगा। जनरल नेशनल कांफ्रेंस मौजूदा गैर निर्वाचित अंतरिम सरकार का स्थान लेगी। गद्दाफी के पतन के बाद देश की बागडोर संभालने के लिए अंतरिम सरकार का गठन किया गया था।
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