Tuesday, January 24, 2012

चीन की नई चाल

हिंद महासागर में भारत के पीछे चीन की ताजा घुसपैठ सेशेल्स द्वीपसमूह की सरकार के साथ एक समझौते के रूप में सामने आई है। इससे चीनी नौसेना की मौजूदगी और इस क्षेत्र की भू-राजनीति पर असर के खतरे बढ़ गए हैं। जिस प्रकार बीजिंग ने सैन्य नीति के साधन के रूप में जिहादी इस्लामी आतंकवादियों के इस्तेमाल में पारंगत पाक सेना प्रमुख जनरल अशफाक कियानी की मिजाजपुर्सी की है, उससे इन संगठनों को उसके पूर्ण समर्थन का अंदाजा लगाया जा सकता है। पाकिस्तान सैन्य प्रतिष्ठान की व्यूह-रचना के प्रमुख अंग ऐसे ही आतंकवादी संगठन, अफ्रीकी महाद्वीप के पश्चिमी और पूर्वी दोनों ही तटों पर चीन की दिलचस्पी के क्षेत्र समझे जाने वाले क्षेत्रों में गहरी पैठ बना चुके हैं। इसलिए, अगर चीन अफ्रीका के पूर्वी तट के पास समुद्री मार्गों पर गश्त लगाने का एकाधिकार चाहता था, तो उसमें हैरानी की कौन सी बात थी, क्योंकि उसका प्रकट इरादा भले ही समुद्री डाकुओं से निपटने का हो, लेकिन उसका असली इरादा उत्तरी अरब सागर, हिंद महासागर तथा प्रशांत महासागर के द्वीपीय क्षेत्रों में अपना प्रभाव-क्षेत्र बढ़ाना ही था। चीन द्वारा हिंद महासागर के तट के साथ-साथ समुद्री सुविधाओं के दोहरे इस्तेमाल की योजना बनाने से भारत को चारो ओर से घेरने तथा अपनी सैन्य ताकत से उसे दबाने का उसका असल उद्देश्य स्पष्ट होता है। भारत के लिए यह गंभीर मामला लग रहा है, क्योंकि इससे भारत के उन पड़ोसी देशों के रुख में बदलाव लाया जा सकता है जिनके साथ भारत के सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंध हैं। इस क्षेत्र में भारत के पुराने मित्र देशों को अपनी फलती-फूलती अर्थव्यवस्था के बूते पर उनकी खुशामद के जरिए चीन उन्हें भारत से दूर कर सकता है। नेपाल में ऐसा ही हो रहा है। कई अफ्रीकी देशों के साथ भी भारत के पुराने नजदीकी संबंध हैं, जिन्हें अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई या श्वेतों के नस्लवादी शासन से छुटकारा पाने की प्रेरणा भारत से मिली थी। दक्षिण अफ्रीका और जिम्बाब्वे ऐसे ही प्रमुख देश हैं। भारत ने सेशेल्स के साथ सुरक्षा संबंधी, खास तौर से समुद्री डाकुओं के बढ़ते खतरे को देखते हुए अच्छे संबंध बनाए हैं। हॉर्न ऑफ अफ्रीका में और उसके आस-पास विदेशी सेनाओं की बढ़ती मौजूदगी को देखते हुए समुद्री डाकुओं की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के बाद से ये गतिविधियां सोमालिया से हटकर दक्षिण की ओर केंद्रित हो गई हैं। इसलिए सेशेल्स सरकार के साथ चीन की सैन्य व्यवस्था एक गहरी चाल है। ऐसा मालदीव में भी हो सकता है, जहां मुस्लिम समुदाय को पाकिस्तान के प्रभाव के अंतर्गत लगातार कट्टरपंथ की ओर प्रेरित किया जा रहा है या यूं कहें कि परोक्ष रूप से चीन का प्रभाव फैल रहा है। सेशेल्स की तुलना में मालदीव भारतीय प्रायद्वीप के अधिक निकट है। अरब सागर के दूसरी तरफ स्थित सेशल्स अफ्रीकी महाद्वीप के अधिक निकट है। फिर भी, हिंद महासागर में चीन की मौजूदगी को एक बहुत ही बड़े संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसमें भी भलाई छुपी है। हिंद महासागर में चीन की सैन्य मौजूदगी को भारत के फायदे में बदला जा सकता है। भारत की प्रायद्वीपीय भूमि और समुद्र में बिखरे इसके द्वीप, उसे हिंद महासागर के तटीय इलाकों मे निगरानी रखने का जितना फायदा देते हैं, उतना फायदा तो दुनिया का कोई भी दूसरा देश नहीं उठा सकता। मलक्का की खाड़ी, पूर्व में इंडोनेशिया के दक्षिण के महासागर और दक्षिण अफ्रीका में केप ऑफ गुड होप तथा पश्चिम में लाल सागर में चैक-प्वाइंट्स पर सतर्कतापूर्वक निगरानी से भारत किसी भी शत्रु देश द्वारा तैनात नौसेना के खिलाफ मुकाबले की कार्रवाई कर सकता है। भारत अंडमान द्वीप समूह में एक पूर्ण नौसैनिक अड्डा बनाने की तैयारी कर रहा है, जिससे उसे मलक्का खाड़ी और इंडोनेशिया के दक्षिण में सागर, दोनों ही में पहंुच मिल जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) 

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