Saturday, January 7, 2012

प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा का सवाल


चीन की एक अदालत के बाहर भारतीय राजनयिक बालाचंद्रन को पीटकर अधमरा कर दिया जाता है और उन्हें उपलब्ध कराई गई चीनी सुरक्षा बल तमाशा देखते हैं। इंग्लैंड में एक भारतीय छात्र अनुज बिदवे से एक अंग्रेज युवक समय पूछता है। भारतीय युवक विनम्रता से उसे समय बताता है, लेकिन इस बीच कुछ कहासुनी होती है और अंग्रेज युवक ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर उसे ढेर करता है और आराम से भाग जाता है। दुनियाभर में अपनी चुस्ती-फुर्ती के लिए मशहूर मैनचेस्टर पुलिस कुछ नहीं करती। ऑस्ट्रेलिया में एक भारतीय छात्र को सिर्फ इसलिए चाकुओं से गोद दिया जाता है, क्योंकि उसके पास एप्पल का ई-फोन था और वह अच्छे कपड़े पहने था। कनाडा, मलेशिया, इंडोनेशिया, श्रीलंका, सूडान यहां तक कि नेपाल में भी भारतीयों के साथ दु‌र्व्यवहार किया जाता है। स्थानीय लोग उन्हें गाली देते हैं, बेइज्जत करते हंै, उनसे घृणा करते हैं और हमारे लोग यह सब चुपचाप सहते हैं। जो सह पाते हैं सहते हैं नहीं तो बोरिया-बिस्तर बांधकर भारत की राह पकड़ लेते हैं। पिछले एक दशक में 500 से ज्यादा भारतीयों को किसी न किसी तरह से परेशन करके वापस भारत भेजा जा चुका है और भारत इन देशों की सरकारों से अपने नागरिकों की सुरक्षा, सम्मान के संबंध में आज तक कोई आश्वासन नहीं ले पाई है। ऑस्ट्रेलिया में 4000 से ज्यादा भारतीय छात्रों को पिछले कुछ सालों में किसी न किसी रूप में सताया गया है, लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय इस संबंध में कुछ खास नहीं कर सका है। ऐसी घटनाओं पर बातें खूब होती हैं ओर यह राजनीतिक सुर्खियां भी बनती हैं, लेकिन विदेशों में रह रहे भारतीयों की न तो सुरक्षा बेहतर हुई है और न ही उनके अपमान की घटनाएं कम हुई हैं। एक तरफ भारत सुपर पावर बनने की ओर अग्रसर है और पूरी दुनिया में हमारी धाक जम रही है तो दूसरी ओर दुनिया में भारतीयों की जानमाल व इज्जत ही सुरक्षित नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह हमारा खुद का अपने नागरिकों की परवाह नहीं करना है। खाड़ी में अमेरिका का एक सैनिक मारा गया तो बदले में अमेरिकी सैनिकों ने 200 से ज्यादा दुश्मनों को मार गिराया 1987 में श्रीलंका को स्थानीय विद्रोहियों से राहत दिलाने के लिए जब भारतीय शांति सेना जाफना, बट्टिकलोवा में लिट्टे से चारों तरफ घिर गई तो श्रीलंका की फौज व सरकार हमारी बेवकूफी और दूरंदेशी पर हंस रही थी। हमने श्रीलंका में 1100 से ज्यादा अपने सैनिक गवाएं और 2500 से ज्यादा सैनिकों को हमेशा के लिए अपंग होने दिया, लेकिन इससे हासिल क्या हुआ? आज पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा अमेरिकी नागरिकों की परवाह की जाती है। अमेरिका का एक राजनयिक खुलेआम पाकिस्तान में दो लोगों की हत्या कर देता है और पाकिस्तान की पुलिस प्रशासन को तो छोडि़ए वहां की सरकार को भी इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह उस राजनयिक को जेल में बंद करे या उस पर मुकदमा चला सके। कुछ दिनों की तू-तू मैं-मैं के बाद आखिरकार पाकिस्तान सरकार को उस अमेरिकी राजनयिक को छोड़ना पड़ा। इन दिनों वह ठाठ से पेंटागन में एक ऊंचे पद पर कार्यरत है। दरअसल किसी देश के नागरिकों की हैसियत इस बात से बनती है कि वह देश अपने नागरिकों की कितनी परवाह करता है। आज दुनिया के किसी भी देश में अमेरिकी नागरिक मौजूद हों और किसी तरह का संकट वहां दिख रहा हो तो अमेरिका उस देश की सरकार को आदेश जारी कर देता है कि उसके नागरिकों की सुरक्षा की जाए। इतना ही नहीं अमेरिका का सारा सुरक्षातंत्र अपने नागरिकों की रक्षा के लिए जागरूक हो जाता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकिा अमेरिका को अपने नागरिकों की चिंता होती है। कहा भी जाता है कि अगर बाजार भाव के हिसाब से नागरिकों की कीमत लगाई जाए तो एक अमेरिकी नागरिक की हैसियत दुनिया के बाजार में 1 अरब डॉलर होती है जबकि भारतीयों की कीमत 1 डॉलर भी नहीं होती। हाल के दशकों में भारतीयों के प्रति एक खास किस्म का विरोध देखने को मिल रहा है, क्योंकि पिछले कुछ समय में विदेशों में बसे भारतीयों ने काफी तरक्की की है। वहां के स्थानीय लोगों के मुकाबले उनके रहन-सहन का स्तर अधिक बेहतर हुआ है। दिमाग से भारतीय तेज तो होते ही हैं और कारोबार उनके खून में होता है। इसलिए विदेशी उनकी इस मेधा के सामने टिक नहीं पाते। बौद्धिक मामले में भारतीय काफी आगे हैं। इस सबके चलते विदेशियों में भारतीयों के प्रति एक खास तरह की ईष्र्या पैदा हुई है। कुछ सालों पहले जब सब कुछ ठीक-ठाक था। पूंजीवाद फल फूल रहा था तो विदेशी अपनी ईष्र्या छिपाए हुए थे, क्योंकि उनकी जिंदगी इतनी कष्टकारी नहीं थी। मगर हाल के कुछ सालों में जब मंदी बढ़ती गई और गरीबी, बेरोजगारी का का विस्तार हुआ तो विदेशियों ने इसके लिए बड़ी सहजता से भारतीयों को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। अब समय का तकाजा है कि भारत सरकार आगे आए और अपने नागरिकों की चिंता करे। पूरी दुनिया में हमारी चाहे जितनी वाहवाही हो, लेकिन यदि भारतीयों की इज्जत नहीं होगी, उनकी सुरक्षा नहीं होगी तो ऐसी ताकत किस काम की। वर्तमान में दुनिया के 73 से भी ज्यादा देशों में भारतीयों की मौजूदगी है। ये अलग-अलग भाषाओं और धर्मो से जुड़े हुए हैं। अगर संख्या के लिहाज से देखा जाए तो दुनिया में सबसे ज्यादा 40 लाख से ज्यादा भारतीय नेपाल में रहते हैं। इसके बाद 27 लाख 65 हजार 815 भारतीय अमेरिका में, 24 लाख मलेशिया में, 20 लाख म्यांमार में, 15 लाख सऊदी अरब में, 14 लाख संयुक्त अरब अमीरात में, 13 लाख 16 हजार इंग्लैंड में रहते हैं। तकरीबन 10 लाख भारतीय कनाडा में, 4 लाख आस्ट्रेलिया में, 71 हजार इटली में हैं। आजादी के पहले से ही भारतीयों ने पूरी दुनिया में खूब नाम और दौलत कमाई है। यही कारण है कि आज उनकी एक अलग हैसियत है। कहने की जरूरत नहीं है कि भारतीयों की दुनिया के तमाम देशों में उपस्थिति का सर्वाधिक लाभ भारत को हुआ है। जो विदेशी पहले भारत को साधुओं, सपेरों और गरीबों का देश मानते थे वह अब भारत को तेजी से उभरती हुई महाशक्ति के रूप में देखने लगे हैं। विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय इस छवि के सबसे बड़े सूत्रधार हैं। यही वजह है कि जब पूरी दुनिया मंदी के आतंक से ग्रस्त है तब भारत की तरफ सिर्फ विदेशी उद्योग ही नहीं, बल्कि सरकारें भी उम्मीद भरी निगाहों से देख रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा भारत के लिए व्यक्त किए गए बयान पूरी दुनिया में मशहूर हो चुके हैं। राष्ट्रपति बनने के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा था-अगर अमेरिका को अपनी हैसियत बरकरार रखनी है तो अमेरिकियों को भारतीयों की तरह पढ़ने-लिखने में आगे आना होगा और मेहनत ेनए मानक गढ़ने होंगे। ओबामा ने यह बात अमेरिका में बसे प्रवासी भारतीयों के संदर्भ में ही कही थी। अमेरिका में जो भारतीय प्रवासी रह रहे हैं वह दूसरे अमेरिकियों के मुकाबले न सिर्फ ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, बल्कि उनके मुकाबले आर्थिक रूप से भी ज्यादा संपन्न हैं। इसलिए अगर कहा जाए कि नए भारत के सबसे चमकते मजबूत ब्रांड प्रवासी भारतीय हैं तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। प्रवासी भारतीयों ने न सिर्फ हाल के सालों में भारत के बारे में दुनिया को राय बदलने के लिए मजबूर किया है, बल्कि उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था और भारत की आर्थिक कामयाबी में भी खूब बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया है। प्रवासी भारतीयों द्वारा बड़े पैमाने पर भेजा जा रहा धन भारत की अर्थव्यस्था के लिए बहुत बड़ी टॉनिक के माफिक है। वर्ष 2009 में दुनिया के अलग-अलग कोनों में बसे भारतीयों ने जो पैसा भारत भेजा वह 50 अरब डॉलर था। हालंाकि इसके बाद ही दुनिया मंदी की गिरफ्त में आ गई और बड़े पैमाने पर भारत में आने वाला प्रवासियों के धन का आगमन कम हुआ है। 2009 में भारतीयों ने जो धन भारत भेजा वह इसी दौरान चीन के नागरिकों द्वारा अपने देश भेजे गए पैसे से 3 अरब डॉलर ज्यादा था। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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