| बच्चों के साथ यौन बर्ताव, पोर्न फिल्मों में उनके इस्तेमाल और लैंगिक अपराध से उनके संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण विधेयक को मंगलवार को संसद ने पारित कर दिया। लैंगिक अपराध से बच्चों का संरक्षण विधेयक 2012 को लोकसभा ने आज मंजूरी दी। राज्यसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है। विधेयक पर हुई चर्चा के जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ ने कहा कि विधेयक के दायरे में 18 साल से कम उम्र के सभी बच्चे-बच्चियों को शामिल किया गया है। इसमें छह तरह के यौन बर्ताव के लिए कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। पोर्न फिल्मों में बच्चों के इस्तेमाल को भी इस विधेयक के तहत लाया गया है। कृष्णा तीरथ ने बताया कि विधेयक में प्रावधान किया गया है कि पुलिस को 30 दिन में बच्चे का बयान दर्ज करना होगा और एक साल में मामले को हल करना होगा। इसके अलावा बच्चे की मर्जी से मुकदमा चलेगा। वह चाहे तो अपने घर या किसी अन्य जगह के चयन के लिए स्वतंत्र होगा। उन्होंने कहा कि यदि कोई पुलिस अधिकारी लैंगिक अपराध के मामले को दर्ज नहीं करता है तो उसके लिए भी कार्रवाई का प्रावधान विधेयक में किया गया है। विधेयक में भारतीय दंड संहिता से कहीं ज्यादा कड़े प्रावधान किए गए हैं। कृष्णा ने कहा, ‘ बुरी नीयत से यदि कोई बच्चों का पीछा भी करेगा तो विधेयक में इतने कड़े दंडात्मक प्रावधान किए गए हैं कि पीछा करने वाले या ऐसा इरादा करने वाले की रूह कांपेगी।’ विधेयक के दुरूपयोग के बारे में कुछ सदस्यों की चिंताओं पर मंत्री ने कहा कि विधेयक में झूठी शिकायत पर भी सजा का प्रावधान किया गया है। स्कूल जाने वाले बच्चों के साथ कोई शिक्षक या स्कूल का कोई अधिकारी यदि लैंगिक अपराध करता है तो ऐसे मामलों में अव्वल दज्रे के दंड का प्रावधान किया गया है। उन्होंने बताया कि कम से कम दस साल की सजा और जुर्माने के अलावा अधिक से अधिक आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान विधेयक में किया गया है। जहां तक संभव होगा, ऐसे मामलों की जांच का काम महिला पुलिस अधिकारी ही करेगी और वह इंस्पेक्टर की रैंक से नीचे की अधिकारी नहीं होगी। बच्चों के साथ अप्राकृतिक यौनाचार को भी विधेयक के दायरे में लाया गया है। कुछ सदस्यों द्वारा निठारी कांड की चर्चा किए जाने पर कृष्णा ने कहा कि पहले इस तरह का कानून नहीं था और जो भी कार्रवाई होती थी भारतीय दंड संहिता के तहत होती थी। लेकिन अब कड़ा कानून बनने से चाहे गली में, सड़क पर, घर के भीतर या बाहर या होटल में कहीं भी कोई घटना होती है तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। 23 मई 2012 , राष्ट्रीय सहारा, पेज न. 1 d`f"k
जयंतीलाल भंडारी , 23 मई 2012 , राष्ट्रीय सहारा, पेज न. 10 ns'k fons’k
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Wednesday, May 23, 2012
अमेरिका ही नहीं, दुनिया का सच
ब्रिटेन जाने वाले भारतीयों को कराना होगा टीबी टेस्ट
कैमरन सरकार ने एक नया फरमान जारी कर कहा है कि ब्रिटेन आने के ख्वाहिशमंद भारत समेत 67 देशों के नागरिकों को अब वीजा आवेदन के साथ टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) का परीक्षण कराना होगा। परीक्षण और इसके इलाज पर आने वाला खर्च भी उन्हें खुद ही वहन करना होगा। ब्रिटेन के आव्रजन मंत्री डेमियन ग्रीन ने टीबी की प्री इंट्री स्क्रीनिंग का दायरा 15 देशों के अलावा 67 अन्य देशों में लागू करने का फैसला सोमवार को सार्वजनिक किया। इससे भारत, चीन, अफगानिस्तान और नेपाल भी इसकी जद में आ गए हैं। बांग्लादेश और पाकिस्तान पहले ही इस सूची में थे। ब्रिटेन में बसने के ख्वाहिशमंद गैर यूरोपीय देशों के नागरिकों पर पहले ही तमाम बंदिशें लागू करने को लेकर कैमरन सरकार पर नस्लीय भावना से काम करने का आरोप लग चुका है। ग्रीन ने सफाई दी है कि इससे ब्रिटिश एयरपोर्टो पर ऐसे स्वास्थ्य परीक्षण से बचा जा सकेगा और करीब चार करोड़ पौंड की बचत हो सकेगी। हालांकि टीबी परीक्षण उन्हीं वीजा आवेदकों को कराना होगा जो छह माह से ज्यादा समय के लिए ब्रिटेन आना चाहते हैं। कम अवधि की व्यापारिक यात्रा, पर्यटन या रिश्तेदारों से मिलने के लिए वीजा चाहने वालों को ऐसे परीक्षण से नहीं गुजरना होगा। ब्रिटिश सरकार ने सफाई दी है कि यह नियम उन्हीं देशों पर लागू किया गया है जो टीबी के मामलों में विश्व स्वास्थ्य संगठन की संवेदनशील देशों की सूची में शामिल हैं। ग्रीन का कहना है कि 2011 में उनके देश में टीबी के 9,000 मामले सामने आए हैं जो 30 साल में सर्वाधिक है। खास बात है कि यूरोपीय देशों को ऐसे परीक्षण के दायरे से बाहर रखा गया है। देश से बाहर रहे ब्रिटिश नागरिकों पर भी यह परीक्षण अनिवार्य नहीं किया गया है। इंपीरियल कालेज लंदन ने हालिया शोध में कहा था कि ब्रिटिश एयरपोर्ट पर टीबी परीक्षण की मौजूदा प्रक्रिया भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के निवासियों में क्षय रोग के गुप्त मामलों को नहीं खोज पाती। अगर टीबी के सर्वाधिक मामलों वाले भारतीय उपमहाद्वीप के नागरिकों का गहन परीक्षण किया जाए तो क्षय रोग के 92 फीसदी गुप्त मामलों को रोका जा सकता है।
अंगोला में जिंदगी और मौत से जूझ रहे भारतीय श्रमिक
अंगोला के सीमेंट फैक्ट्री में काम कर रहे भारतीय श्रमिकों की स्थिति दयनीय है। ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले से काम की तलाश में अंगोला गए श्रमिक ने भारत लौटने के बाद जो आपबीती सुनाई है, उससे उनकी दर्दनाक स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। वेतन को लेकर उठे विवाद को लेकर अंगोला पुलिस की बर्बर कार्रवाई के बाद कई भारतीय श्रमिकों को जंगल में जाकर अपनी जान बचानी पड़ी थी। भारतीय श्रमिकों में से कई अभी भी सीमेंट संयंत्र में फंसे हुए हैं। अंगोला में भारतीय श्रमिकों के त्रासदी की कहानी की शुरुआत मई के पहले सप्ताह से हुई। इस अफ्रीकी देश का सीमेंट कारखाना भारतीय मजदूरों के बल पर चलता है। वहां कार्यरत 1800 मजदूरों में से एक हजार भारतीय मूल के हैं। भारतीय मजदूरों के साथ खराब व्यवहार किए जाने तथा उन्हें कम वेतन दिए जाने से असंतोष पैदा हुआ था। नौ अप्रैल को भारतीय मजदूर संयंत्र के प्रशासनिक कार्यालय में शांतिपूर्वक एकत्र हुए और अपने वेतन तथा ओवरटाइम का भुगतान डॉलर में करने की मांग करने लगे। जिसके बाद भारतीय श्रमिकों के खिलाफ दमन की कार्रवाई शुरू हुई। अंगोला से वतन लौटे राजनगर के गोबिंदपुर गांव के 28 वर्षीय अभिराम सामल ने बताया मैं केवल भगवान के आशीर्वाद से ही जिंदा हूं, मैं स्वदेश लौटने की उम्मीद छोड़ चुका था। सामल ने बताया कि विरोध जताने के लिए हुई बैठक में मैं भी था। अचानक फैक्ट्री मालिकों ने सशस्त्र पुलिस को शांतिपूर्वक एकत्र मजदूरों पर कार्रवाई करने का हुक्म दे दिया। इसके बाद श्रमिकों पर गोलियों की बौछार हो गई। हम सभी अपनी जान बचाने के लिए भागे। करीब छह किलोमीटर तक भागने के बाद हमने खुद को एक घने जंगल में पाया। दो दिन तक हम लोग जंगल में ही रहे। इस दौरान हमलोगों ने जंगली कंदमूल खाकर झरने का पानी पीकर अपना गुजारा किया। सामल के अनुसार जंगल से लौटने के बाद कइयों को अंगोला पुलिस ने पकड़ कर जेल में डाल दिया और पासपोर्ट जब्त कर लिए गए। उनके मुताबिक मैं भारतीय दूतावास अधिकारियों का अहसानमंद हूं कि उन्होंने हमारी सुरक्षित वापसी के लिए तेजी से काम किया। वहां फंसे भारतीय मजदूरों की सूची में से मेरा नाम छांटा गया। मैं उन 46 भारतीयों में शामिल था जो सरकार के त्वरित हस्तक्षेप के बाद स्वदेश लौटे हैं। दूसरी तरफ केंद्रापड़ा के जिला श्रम अधिकारी प्रदीप्त मोहंती ने बताया कि इनमें से दो श्रमिक सुरक्षित लौट आए हैं, लेकिन बहुत से प्रवासी श्रमिकों को अभी भी घर वापसी का इंतजार है। हम अंगोला में फंसे इन लोगों की मदद के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। मोहंती ने बताया कि प्रशासन के आकलन के अनुसार केंद्रपाड़ा के कम से कम 14 मजदूर अभी भी अंगोला की राजधानी लुआंडा से 600 किलोमीटर दूर सुम्बे में फंसे हैं। प्रदेश के करीब 120 मजदूरों को सुम्बे के सीमेंट संयंत्र में नौकरी मिली थी। इससे पहले ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी शनिवार को इस मामले में केंद्र से हस्तक्षेप करने की मांग की थी। इसके बाद केंद्र भी इस समस्या को लेकर सक्रिया हुआ था।
यूरोप में राजनीतिक तूफान
यूरोप महाद्वीप कर्ज के बोझ तले कराह रहा है। विश्व के सबसे छोटे किंतु सबसे धनी महाद्वीप पर परिवर्तन की हवा चल रही है। इसका सबसे अधिक असर राजनीतिक परिवर्तन के रूप में देखने को मिल रहा है। आयरलैंड से इटली तक अनेक देशों में खर्च में कटौती पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। छह मई को फ्रांस, ग्रीस, जर्मनी, सर्बिया, इटली और अर्मेनिया में हुए मतदान में यह आक्रोश परिवर्तन के रूप में सामने आया है। फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव में राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी को सरकारी खर्च में कटौती का नतीजा भुगतना पड़ा और समाजवादी नेता फ्रांसुआ ओलेंड ने उन्हें पटकनी दे दी। नए राष्ट्रपति के रूप में ओलेंड के उत्कर्ष में निहित है कि समाजवादी शासन अब फ्रांस और शेष यूरोप के वित्तीय संकट में अधिक हस्तक्षेप करेगा। ग्रीस में जनादेश ने दोनों प्रमुख पार्टियों को दंडित किया। कटौती विरोधी एलेक्सिस सिपराज के साइरिजा समूह को तगड़ा झटका लगा और उसे दूसरे स्थान पर सिमटना पड़ा। वामपंथी गठबंधन को सरकार के गठन का जनादेश मिला। यह गठबंधन देश के 130 अरब यूरो के बर्बर बचाव समझौते की शर्तो को राजनीतिक पक्षाघात बता रहा है। यूरोप की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति जर्मनी में पाइरेट पार्टी को राज्यों के चुनावों में तीसरी जीत हासिल हुई। छोटे उत्तरी राज्य श्क्लेसविग-होल्स्टेन में पार्टी को छह सीटें और 8.2 फीसदी वोट मिले। इन परिणामों के साथ ही पाइरेट्स पार्टी ने लगातार तीसरी जीत हासिल की और एक साल के अंदर यह हाशिये से मुख्यधारा में आ गई है। पाइरेट्स ने मार्च में सारलेंड में हुए चुनाव में चार सीटें जीती थीं और पिछले वर्ष बर्लिन के चुनाव में 15 संसदीय सीट हासिल की थी। सर्बिया में विपक्षी दल प्रोग्रेसिव पार्टी ने नजदीकी मुकाबले में बाजी मार ली। यहां नेताओं में सर्बिया के यूरोपीय संघ में होने के भविष्य के मुद्दे पर जंग छिड़ी थी। रूस समर्थित तोमिस्लाव निकोलिक की प्रोग्रेसिव पार्टी को 24 फीसदी वोट मिले जबकि राष्ट्रपति बोरिस तादिक की पार्टी डेमोक्रेट्स महज 22.09 प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाई। इटली के कॉमेडियन बेपे ग्रिलो के जमीन से जुड़े फाइव स्टार आंदोलन और वाम दलों को स्थानीय निकाय चुनावों में सबसे अधिक सीटें मिलीं। खर्च में कटौती से त्रस्त मतदाताओं ने पूर्व प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी की पार्टी और उसके सहयोगी दलों को नकार दिया। चुनाव 942 शहरों में हुए थे और इनमें सबसे अधिक फायदा ग्रिलो को हुआ, जो राजनेताओं की खिल्ली उड़ाते हैं और इटली के यूरो के दायरे से निकलने के समर्थक हैं। मारियो मोंटी के प्रधानमंत्री के रूप में चुने जाने के बाद यह इटली में पहला चुनाव था। आर्मेनिया में, राष्ट्रपति सिर्ज सरगिसाइन की वफादार पार्टी ने 131 सीटों वाले संसदीय चुनाव में अधिकांश में जीत हासिल की। यह चुनाव आर्मेनिया में चार साल पहले हुए चुनावों में सरगिसाइन के चुनाव के विरोध में भड़के दंगे के चार साल बाद हुए थे। वह आर्मेनिया की आजादी के बाद के तीसरे राष्ट्रपति थे। ऑर्गेनाइजेशन फॉर सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप ने इन चुनावों में धांधली का आरोप लगाया था। यूरोप के छह देशों में हुए चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण फ्रांस के राष्ट्रपति का चुनाव था, इसलिए इस पर विस्तार से चर्चा की जरूरत है। फ्रांस में पिछले 24 साल में पहली बार समाजवादी राष्ट्रपति बना है। फ्रांसुआ ओलेंड की जीत के विश्व पर दूरगामी और व्यापक प्रभाव पड़ेंगे। इस समय विश्व यूरोप के कर्ज, अफगानिस्तान युद्ध, ईरान पर गतिरोध और वैश्विक कूटनीति के संकट से गुजर रहा है। संभवत: ओलेंड की जीत के पीछे उनके इस नायाब विचार का बड़ा हाथ रहा कि वह अमीरों पर 75 फीसदी कर लादेंगे और उन कंपनियों पर करों की दर बढ़ाएंगे जो अपने लाभ को व्यापार में निवेश करने के बजाय अंशधारकों को भारी लाभांश दे रही हैं। इसके विपरीत सरकोजी ने फ्रांस में कर की दरों को कम करने का वादा किया था, जो विश्व में सबसे अधिक हैं। यद्यपि उन्होंने बिक्री कर को बढ़ाने की बात भी की थी। ओलेंड के अनोखे प्रस्ताव के खिलाफ इंटरनेट पर टिप्पणियों की बाढ़ आ गई थी। इनमें कहा गया था कि अमीरों पर मोटा कर लगाने का नतीजा यह होगा कि वे फ्रांस से बोरिया-बिस्तरा समेटकर अमेरिका में बस जाएंगे। इस प्रकार एक झटके में अमेरिका का वित्तीय संकट खत्म हो जाएगा और फ्रांस आर्थिक दलदल में और गहरा धंस जाएगा। सरकोजी की हार के फ्रांस और विश्व पर तात्कालिक और दीर्घकालीन राजनीतिक निहितार्थ होंगे। फ्रांस में राजनीतिक उत्तराधिकार के लिए समाजवादियों और धुर दक्षिणपंथियों के बीच सत्ता संघर्ष छिड़ जाएगा। विश्व पर यह असर पड़ेगा कि ओलेंड अमेरिका के उतने करीब नहीं होंगे, जितने सरकोजी थे। ईरान और सीरिया के मुद्दे पर सरकोजी का वाशिंगटन को कट्टर समर्थन अब ओलेंड के समय में कम हो जाएगा। नए राष्ट्रपति सरकोजी द्वारा लिए गए विदेश नीति पर अनेक फैसलों को पलट भी सकते हैं। संभावना है कि वह अफगानिस्तान में फ्रांस की सैन्य उपस्थिति को कम कर देंगे, जबकि सरकोजी ने इसमें वृद्धि की थी और फ्रांसिसी सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस लाएंगे। इसके अलावा ओलेंड कूटनीतिक दबंगई के लिए अन्य देशों में सैनिक भेजने की नीति से भी पल्लू झाड़ सकते हैं। सरकोजी ऐसा करने में जरा भी नहीं हिचकते थे। इसका ताजा उदाहरण है गद्दाफी के खिलाफ नाटो के हवाई हमलों में फ्रांस ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। ओलेंड के सामने तात्कालिक काम प्रधानमंत्री के नाम की घोषणा करना है। इस पद पर वह ज्यां मार्क आयरोल्त के नाम की घोषणा कर सकते हैं। समाजवादी संसदीय समूह के महत्वपूर्ण नेता होने के साथ-साथ ज्यां मार्क के जर्मनी के साथ भी अच्छे रिश्ते हैं। ओलेंड की प्राथमिकता में सबसे ऊपर जर्मन चांसलर एंजेला मार्केल के साथ मिलकर काम करना होगा, जिन्होंने ओलेंड की दावेदारी को समर्थन दिया था। तो यूरोपीय चुनावों का क्या मतलब निकलता है? नतीजों से साफ हो जाता है कि धुर-वाम और धुर-दक्षिण दोनों तरह की पार्टियों को लाभ हुआ है, जिन्होंने पूरे यूरोप में व्याप्त आर्थिक संकट का दोहन किया है। यूरोप में हालिया राजनीतिक रुझान धुर-वाम और धुर-दक्षिण सशक्तिकरण के पक्ष में है। चुनावों में अतिवादी पार्टियों की पहचान, उनके लक्ष्यों और मूल्यों पर मुहर लगी है जबकि मुख्यधारा के उम्मीदवारों को उनकी गलतियों की सजा दी गई है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
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