Wednesday, May 23, 2012

अमेरिका ही नहीं, दुनिया का सच


बच्चों के साथ यौन बर्ताव, पोर्न फिल्मों में उनके इस्तेमाल और लैंगिक अपराध से उनके संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण विधेयक को मंगलवार को संसद ने पारित कर दिया। लैंगिक अपराध से बच्चों का संरक्षण विधेयक 2012 को लोकसभा ने आज मंजूरी दी। राज्यसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है। विधेयक पर हुई चर्चा के जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ ने कहा कि विधेयक के दायरे में 18 साल से कम उम्र के सभी बच्चे-बच्चियों को शामिल किया गया है। इसमें छह तरह के यौन बर्ताव के लिए कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। पोर्न फिल्मों में बच्चों के इस्तेमाल को भी इस विधेयक के तहत लाया गया है। कृष्णा तीरथ ने बताया कि विधेयक में प्रावधान किया गया है कि पुलिस को 30 दिन में बच्चे का बयान दर्ज करना होगा और एक साल में मामले को हल करना होगा। इसके अलावा बच्चे की मर्जी से मुकदमा चलेगा। वह चाहे तो अपने घर या किसी अन्य जगह के चयन के लिए स्वतंत्र होगा। उन्होंने कहा कि यदि कोई पुलिस अधिकारी लैंगिक अपराध के मामले को दर्ज नहीं करता है तो उसके लिए भी कार्रवाई का प्रावधान विधेयक में किया गया है। विधेयक में भारतीय दंड संहिता से कहीं ज्यादा कड़े प्रावधान किए गए हैं। कृष्णा ने कहा, ‘ बुरी नीयत से यदि कोई बच्चों का पीछा भी करेगा तो विधेयक में इतने कड़े दंडात्मक प्रावधान किए गए हैं कि पीछा करने वाले या ऐसा इरादा करने वाले की रूह कांपेगी।
विधेयक के दुरूपयोग के बारे में कुछ सदस्यों की चिंताओं पर मंत्री ने कहा कि विधेयक में झूठी शिकायत पर भी सजा का प्रावधान किया गया है। स्कूल जाने वाले बच्चों के साथ कोई शिक्षक या स्कूल का कोई अधिकारी यदि लैंगिक अपराध करता है तो ऐसे मामलों में अव्वल दज्रे के दंड का प्रावधान किया गया है। उन्होंने बताया कि कम से कम दस साल की सजा और जुर्माने के अलावा अधिक से अधिक आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान विधेयक में किया गया है। जहां तक संभव होगा, ऐसे मामलों की जांच का काम महिला पुलिस अधिकारी ही करेगी और वह इंस्पेक्टर की रैंक से नीचे की अधिकारी नहीं होगी। बच्चों के साथ अप्राकृतिक यौनाचार को भी विधेयक के दायरे में लाया गया है। कुछ सदस्यों द्वारा निठारी कांड की चर्चा किए जाने पर कृष्णा ने कहा कि पहले इस तरह का कानून नहीं था और जो भी कार्रवाई होती थी भारतीय दंड संहिता के तहत होती थी। लेकिन अब कड़ा कानून बनने से चाहे गली में, सड़क पर, घर के भीतर या बाहर या होटल में कहीं भी कोई घटना होती है तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
23 मई 2012 , राष्ट्रीय सहारा, पेज न. 1
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गेहूं-निर्यात में बढ़ते कदम
सरकार ने केंद्रीय पूल से गेहूं निर्यात की प्रक्रिया शुरू कर दी है। स्टेट ट्रेडिंग कारपोरेशन (एसटीसी) ने केंद्रीय पूल से गेहूं निर्यात के लिए निविदा मंगाई है। इसमें विदेशी आयातक ही भाग ले सकेंगे और विपणन सीजन 2011-12 और 2012-13 का ही गेहूं निर्यात होगा। बंदरगाह पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर गेहूं उपलब्ध होगा। गेहूं निर्यात पर विचार इसलिए हो रहा है, क्योंकि खरीद में सुस्ती और विभिन्न रुकावटों के कारण कोई दो करोड़ टन गेहूं सड़ने की स्थिति में है। इस साल 9.02 करोड़ टन के रिकॉर्ड उत्पादन का अनुमान है। जहां तक सरकारी गोदामों का सवाल है, वे फिलहाल अनाज से अटे हैं। केंद्रीय पूल में 1 अप्रैल 2012 को 543.36 लाख टन खाद्यान्न का स्टॉक था। इसमें करीब 200 लाख टन गेहूं है। चालू सीजन में सरकारी खरीद का लक्ष्य 318 लाख टन है। खुले बाजार में गेहूं का दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम है इसीलिए सरकारी केंद्रों पर ज्यादा गेहूं जा रहा है। ऐसे में सरकारी खरीद 335 लाख टन से भी ज्यादा होने का अनुमान है। गेहूं निर्यात के प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाने से छह साल में पहली बार भारत सरकारी गेहूं भंडार को बेचने के लिए निर्यात बाजार का सहारा ले रहा है। हालांकि गेहूं का बड़े पैमाने पर निर्यात आसान नहीं है क्योंकि वैिक अनाज बाजार में सभी प्रमुख गेहूं निर्यातक- रूस, ऑस्ट्रेलिया व यूक्रेन आदि देशों के पास भारी भरकम अनाज का भंडार है। गुणवत्ता के मामले में भी भारतीय गेहूं दूसरे निर्यातक देशों के मुकाबले कमजोर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के मुकाबले यूक्रेन, रूस और ऑस्ट्रेलिया का गेहूं सस्ता भी है। फिर भी युगांडा, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, दुबई, और खाड़ी देशों को गेहूं की जरूरत है, लिहाजा इन देशों में भारतीय गेहूं के लिए बाजार हो सकता है। अब केंद्रीय पूल से गेहूं के निर्यात में भी सबसे बड़ी समस्या वित्तीय प्रबंधन की हो सकती है। क्योंकि गेहूं की खरीद व भंडारण की लागत साल 2012-13 में करीब 18.22 रु पये प्रति किलोग्राम रहने की संभावना है, वहीं अमेरिकी गेहूं की वैिक औसत कीमतें जनवरी-मार्च के दौरान 15.06 रुपये प्रति किलोग्राम थीं। यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने सितम्बर, 2011 में गेहूं निर्यात पर रोक हटाई थी तथा निर्यातकों को खुले बाजार से गेहूं खरीद कर निर्यात की अनुमित दी थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय गेहूं महंगा होने के कारण सितम्बर से अब तक 7.2 लाख टन गेहूं का ही निर्यात हो पाया है। इस साल भारत के लिए गेहूं का निर्यात करना इसलिए भी जरूरी है ताकि केंद्रीय पूल में नए स्टॉक के लिए जगह बन सके। यदि गेहूं का निर्यात नहीं हुआ, तो कई परेशानियां पैदा हो सकती हैं। ज्यादातर राज्यों में भी अनाज भंडारण क्षमता के मामले में स्थिति अच्छी न होने के कारण किसान धरने-प्रदर्शन पर उतर आए हैं। वे मजबूरी में आढ़तियों को एमएसपी से कम भाव पर अपना गेहूं बेच रहे हैं। सरकार ने इस बार गेहूं का एमएसपी 1285 रु पये प्रति क्ंिवटल तय किया है। गौरतलब है कि कुल स्टॉक के मुकाबले भंडारण क्षमता काफी कम होने के कारण चालू सीजन 2012-13 में सरकार को लगभग पचास फीसद खाद्यान्न गोदामों के बाहर खुले आसमान के नीचे आधे- अधूरे तिरपालों के सहारे ही रखना होगा। निश्चित रूप से गेहूं के निर्यात से जहां भंडारण की कमी से संबंधित चुनौती से कुछ तात्कालिक बचाव होगा, वहीं किसानों को भविष्य में फसल की बिक्री और अच्छे मूल्य की आशा बंधेगी। मार्च 2012 में संसद में पहली कृषि समीक्षा में भी भंडारण की आवश्यकता पर जोर झलका है। छोटे किसानों के लिए भंडारण की और ज्यादा जरूरत है। भंडारण सुविधा के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता है। यद्यपि सरकार ने यह जरूरत पूरा करने के लिए वेयरहाउसिंग सेक्टर में 100 फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति भी दे रखी है और विभिन्न टैक्स रियायतें देकर निवेशकों को प्रोत्साहित करने का प्रयास भी किया जा रहा है। लेकिन निवेशकों के कदम वेयरहाउसिंग सेक्टर की ओर धीमी गति से बढ़ रहे हैं। चूंकि पर्याप्त खाद्यान्न भंडारण का संबंध अच्छी विदेशी मुद्रा की कमाई से भी जुड़ गया है अत: खाद्यान्न भंडारण की अच्छी व्यवस्था से खाद्यान्न निर्यात करके खाली होते हुए विदेशी मुद्रा भंडार को भी भरा जा सकेगा। अच्छे खाद्यान्न भंडारण द्वारा यूरो और डॉलर की कमाई विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने में मददगार हो सकती है। अच्छी भंडारण क्षमता और खाद्यान्न की उत्पादकता बढ़ाकर खाद्यान्न के निर्यात को विदेश व्यापार का प्रमुख अंग भी बनाया जा सकता है। देश में खाद्यान्न उपलब्धता का वर्तमान परिदृश्य चिंताजनक है। खाद्य एवं कृषि संबंधी कुछ नए वैिक अध्ययन संदेश दे रहे हैं कि भारत में छोटे किसानों को खुशहाल बनाने पर सबसे अधिक ध्यान देना होगा। इस संदर्भ में सी रंगराजन समिति की रिपोर्ट उल्लेखनीय है जिसमें कहा गया कि देश के 4 करोड़ 60 लाख छोटे किसानों को पर्याप्त भंडारण सुविधा, आसान कर्ज और खेती के समुचित संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। अब देश में कृषि बाजारों का आधुनिकीकरण किए जाने और उन्हें बहुवांछित बुनियादी ढांचा मुहैया कराने की भी महती आवश्यकता है। यह भी ध्यान देना होगा कि खाद्य सुरक्षा के लिए हम जिस तरह गेहूं और चावल की उत्पादकता बढ़ाने की योजना बना रहे हैं, उसी अनुपात में उन्हें रखने के लिए माकू ल भंडारण सुविधा भी स्थापित करनी होगी। इस कार्य में आने वाली अड़चनों को रोकना होगा। यह ध्यान देना होगा कि भारत से खाद्यान्न निर्यात के लिए प्रतिस्पर्धी देशों के समकक्ष निर्यात की रणनीति तैयार हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश में कृषि सुधारों के तहत खाद्यान्न उत्पादकता वृद्धि, वेयरहाउसिंग सेक्टर के आधुनिकीकरण तथा भारतीय कृषि सेक्टर को मजबूत आधार दिया जाएगा और खाद्यान्न निर्यात को देश के निर्यात का एक अभिन्न अंग बनाया जाएगा। तभी खाद्यान्न सुरक्षा और किसान का सबलीकरण हो सकता है।
जयंतीलाल भंडारी , 23 मई 2012 , राष्ट्रीय सहारा, पेज न. 10
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अमेरिका ही नहीं, दुनिया का सच
अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव का परिदृश्य लगभग साफ हो गया है। राष्ट्रपति बराक ओबामा डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार होंगे, जबकि रिपब्लिकन पार्टी की ओर से उनके प्रतिद्वंद्वी मिट रोमनी होंगे। 11 से 13 मई के बीच हुए सव्रेक्षण को आधार बनाया जाए तो ओबामा के 43 प्रतिशत के मुकाबले रोमनी को 46 प्रतिशत मत प्राप्त होंगे। अप्रैल के अंतिम सव्रेक्षण में दोनों को समान रूप से 46 प्रतिशत मत मिले थे। यानी रोमनी का ग्राफ बढ़ रहा है। जाहिर है, समलैंगिक शादियों की वकालत ओबामा का जन समर्थन बढ़ाने में कामयाब नहीं हुई और रोमनी का पूरा फोकस देश की अर्थव्यवस्था पर है। विदेश नीति, रक्षा नीति आदि बातें वे इसी के ईर्द-गिर्द कर रहे हैं। नवम्बर तक चुनाव अभियान के अंत तक हमें ऐसे कई उतार- चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं। वस्तुत: ओबामा के नेतृत्व में अमेरिका ने आर्थिक मोच्रे पर वैसा प्रदर्शन नहीं देखा है जैसी उम्मीद थी। इस समय चुनौतियां ज्यादा और उम्मीदें कम वाली स्थिति है। इसलिए ओबामा खेमे की कोई एक रणनीति सर्वाधिक उपयुक्त मानी जा सकती है तो यही कि वह लोगों के अंदर उम्मीद और आत्मविास पैदा करें। हाल में एबीसी न्यूज को दिये साक्षात्कार में ओबामा ने जो कुछ कहा, उसका प्रत्यक्ष उद्देश्य यही लगता है, लेकिन उसके निहितार्थ इससे ज्यादा गहरे और कुछ हद तक पूरी दुनिया, के लिए प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा है कि हमारे पास 100 से 200 साल तक सफल रहने के सारे संसाधन उपलब्ध हैं। हमारे पास अब भी दुनिया के अच्छे कर्मचारी हैं, उम्दा विविद्यालय, बेहतरीन वैज्ञानिक, अच्छे उद्यमी और बेहतर बाजार व्यवस्था है।..कभी- कभी आप सुनते हैं कि अमेरिका का कद घट रहा है या चीन तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन आप दुनिया में कहीं भी जाइए और लोगों से पूछिए कि वे किस देश को पसंद करते हैं तो उनका जवाब वही होगा जो हमारे पास है। अमेरिका अभी दुनिया के लिए पसंदीदा जगह बना हुआ है। यानी अमेरिका के बाहर के लोगों ने भी महाशक्ति या जीने व काम करने की बेहतर जगह के रूप में हमारी मृत्युगाथा नहीं लिखी है। तो आवश्यकता अमेरिका की आंतरिक क्षमता में विास तथा कल बेहतर होगा, इसका आत्मविास कायम रखने की है। सारे संसाधनों का योजनाबद्ध तरीके से समुचित उपयोग करके हम अपनी आंतरिक स्थिति संतोषजनक अवस्था में वापस ला सकते हैं और वि में अपना स्थान बनाए रख सकते हैं।
वि की जटिल परिस्थितियों में कोई देश खासकर अमेरिका अपनी भौगोलिक सीमाओं के अंदर की आवश्यकता के आलोक में ही संसाधनों का मूल्यांकन नहीं कर सकता। वि घटनाक्रम से निरपेक्ष रहना अमेरिका के लिए कतई संभव नहीं। लेकिन इस पर विचार करने की बजाय इसके साथ उन्होंने जो दूसरी बातें कहीं, वे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि अब देश की राजनीति का जोर अगली पीढ़ी के भविष्य की चिंता के बजाए चुनाव जीतने पर होता है। अगर हम इस सोच से बाहर निकल पाएं तो बेहतर होगा। ओबामा ने कहा कि वह देश में ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जहां कोई भी मेहनत करने पर लक्ष्य हासिल करने में सक्षम हो। मूल बात यही है। इन दोनों को साथ मिलाकर देखें तो यह दुनिया का भी सच है। अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया में यही हो रहा है। सरकारें सत्ता में आतीं हैं और अपने तरीके से काम आरंभ करतीं हैं। उनमें कुछ तात्कालिक तौर पर कठोर अलोकप्रिय कदम भी होते हैं, जिनके परिणाम आने में समय लगता है। कुछ कदम चुनौतियों का सामना करने में सक्षम नहीं होते और उनके संशोधन परिवर्तन की आवश्यकता होती है, पर तब तक समय निकल चुका होता है। चुनाव का समय हो जाता है और उसमें विरोधी पार्टियां ऐसा हमला करतीं हैं कि मुख्य फोकस राजनीतिक समर्थन बढ़ाना या बनाए रखना हो जाता है। यह प्रवृत्ति पूरी दुनिया में बढ़ रही है। भले अमेरिका ने संसदीय लोकतंत्र का 230 साल से ज्यादा का समय पार कर लिया हो, पर उसका राजनीतिक चरित्र अन्य देशों के समान या उससे थोड़ा ही अलग है। ओबामा ने फरवरी 2009 में पद संभाला और 2011 की अंतिम तिमाही से ही चुनावी माहौल बनने लगा। यानी राजनीतिक समर्थन की चिंता से मुक्त होकर काम करने के लिए केवल ढाई वषर्। यही स्थिति अन्य देशों की है। वर्तमान आर्थिक संकट की गहराई और इसका चरित्र पूर्व के संकटों से काफी ज्यादा और कई मायनों में अलग भी है। सघन भूमंडलीकरण के कारण इसके कारक तत्व देश के साथ उससे बाहर भी हैं और एक-दूसरे से गुंथे हुए भी। जाहिर है, इन्हें ठीक से समझने तथा फिर से गाड़ी को पटरी पर लाने के लिए जितने गहरे विमर्श और उसके अनुसार काम करने की जरूरत है, उसके लिए समय और राजनीतिक लोकप्रियता के भय से मुक्त माहौल चाहिए। पर नेताओं को ये दोनों उपलब्ध नहीं हैं। यूरोप में एक पर एक 11 सरकारें बदल गईं। कुछ बदलने की कगार पर हैं। ग्रीस देश भयानक राजनीतिक अस्थिरता के चक्र में फंस गया। इटली में किसी तरह मिली- जुली सरकार काम कर रही है। अरब जगत में राजनीतिक परिवर्तनों की अस्थिरता सामने है। अमेरिका में चुनाव की अप्रत्यक्ष पण्राली के कारण प्रत्यक्ष राजनीतिक अस्थिरता का खतरा बेशक न हो, लेकिन संसद के दोनों सदनों (प्रतिनिधि सभा एवं सीनेट) में बहुमत का अंकगणित पलटने से सरकार परेशानी में होती है। पहले जॉर्ज बुश को इसका सामना करना पड़ा और अब ओबामा जूझ रहे हैं। उनके कई सुधार विधेयक आवश्यक समर्थन के अभाव में लटक गये हैं। अमेरिका पर ही फोकस करें तो इस समय पूरा माहौल अजीबोगरीब है। लोगों को संकट से मुक्ति चाहिए, योग्यतानुसार रोजगार चाहिए, स्वास्थ्य-सुविधाएं चाहिए, कर्ज वापसी लायक धन चाहिए, कंपनियों को सेवा या उत्पाद बेचने के लिए बाजार चाहिए, बैंकों को कर्ज वापस लेने या बाजार में कर्ज देने का अवसर चाहिए..। सूची लंबी है और सब कुछ तुरंत चाहिए। जिस जीवन दर्शन, शिक्षा-व्यवस्था, राजनीतिक व आर्थिक ढांचे से समय का वर्तमान चक्र निर्धारित हुआ है, उसमें परिस्थिति समझकर कष्ट झेलने और प्रतीक्षा के सामूहिक धैर्य का संस्कार लगभग समाप्त है। फटाफट परिणाम चाहिए। यह संभव नहीं। क्या यही स्थिति संकट में फंसे दूसरे देशों की नहीं है? अपने लायक संसाधन ज्यादातर देशों के पास हैं और बाहर से सहयोग व सहकार की भी संभावना नष्ट नहीं हुई है, किंतु धैर्य के साथ योजनाबद्ध उपयोग का माहौल खत्म हो रहा है। प्रतिद्वंद्वी राजनीति पार्टियां और सक्रिय सामाजिक संगठन अमेरिका ही नहीं, दुनिया में सरकारों को विफल बताकर इसी प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं। यह आत्मघाती स्थिति है और इससे बाहर निकलने का कोई संकेत नहीं मिल रहा है। ओबामा की पीड़ा यही है। ओबामा की लाख आलोचना करें लेकिन उन्हें झूठा या जनता को गुमराह करने वाला नहीं कहा जा सकता है। उनके विचारों से भी कोई असहमत हो, पर अमेरिका व दुनिया के लिए उनका एक सपना था जिसे उन्होंने विजय के बाद के भाषणों में व्यक्त किया, पर छह-सात महीना बीतने के साथ ही उन्हें भान होने लगा कि यह दौर दीर्घकालीन योजनाओं पर काम करने की अनुमति नहीं दे सकता और प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल भी अपनी राजनीति में सरकार को समय देने की मानसिकता में नहीं हैं। संसदीय लोकतंत्र वाले कमोबेश सभी देशों में आज राजनीतिक दल जन समर्थन बढ़ाने के लिए प्रतिद्वंद्वी को कठघरे में खड़ा करने और लोकप्रिय मुद्दों पर बावेला मचाने की भूमिका निभा रहे हैं। शासन में संयम एवं शालीन व्यवहार करने वाले दल का व्यवहार विपक्ष में आते ही अचानक बदल जाता है। आज जबकि राजनीतिक नेतृत्व को ज्यादा धैर्य एवं संयम दिखाना चाहिए और फटाफट परिणाम चाहने वाले वर्ग को दिशा देने की आवश्यकता है, ठीक इसके उलट व्यवहार का अंधा दौर न जाने अलग-अलग देशों और समुच्चय रूप में पूरी दुनिया को किस मुकाम पर ले जाएगा।


ब्रिटेन जाने वाले भारतीयों को कराना होगा टीबी टेस्ट


कैमरन सरकार ने एक नया फरमान जारी कर कहा है कि ब्रिटेन आने के ख्वाहिशमंद भारत समेत 67 देशों के नागरिकों को अब वीजा आवेदन के साथ टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) का परीक्षण कराना होगा। परीक्षण और इसके इलाज पर आने वाला खर्च भी उन्हें खुद ही वहन करना होगा। ब्रिटेन के आव्रजन मंत्री डेमियन ग्रीन ने टीबी की प्री इंट्री स्क्रीनिंग का दायरा 15 देशों के अलावा 67 अन्य देशों में लागू करने का फैसला सोमवार को सार्वजनिक किया। इससे भारत, चीन, अफगानिस्तान और नेपाल भी इसकी जद में आ गए हैं। बांग्लादेश और पाकिस्तान पहले ही इस सूची में थे। ब्रिटेन में बसने के ख्वाहिशमंद गैर यूरोपीय देशों के नागरिकों पर पहले ही तमाम बंदिशें लागू करने को लेकर कैमरन सरकार पर नस्लीय भावना से काम करने का आरोप लग चुका है। ग्रीन ने सफाई दी है कि इससे ब्रिटिश एयरपोर्टो पर ऐसे स्वास्थ्य परीक्षण से बचा जा सकेगा और करीब चार करोड़ पौंड की बचत हो सकेगी। हालांकि टीबी परीक्षण उन्हीं वीजा आवेदकों को कराना होगा जो छह माह से ज्यादा समय के लिए ब्रिटेन आना चाहते हैं। कम अवधि की व्यापारिक यात्रा, पर्यटन या रिश्तेदारों से मिलने के लिए वीजा चाहने वालों को ऐसे परीक्षण से नहीं गुजरना होगा। ब्रिटिश सरकार ने सफाई दी है कि यह नियम उन्हीं देशों पर लागू किया गया है जो टीबी के मामलों में विश्व स्वास्थ्य संगठन की संवेदनशील देशों की सूची में शामिल हैं। ग्रीन का कहना है कि 2011 में उनके देश में टीबी के 9,000 मामले सामने आए हैं जो 30 साल में सर्वाधिक है। खास बात है कि यूरोपीय देशों को ऐसे परीक्षण के दायरे से बाहर रखा गया है। देश से बाहर रहे ब्रिटिश नागरिकों पर भी यह परीक्षण अनिवार्य नहीं किया गया है। इंपीरियल कालेज लंदन ने हालिया शोध में कहा था कि ब्रिटिश एयरपोर्ट पर टीबी परीक्षण की मौजूदा प्रक्रिया भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के निवासियों में क्षय रोग के गुप्त मामलों को नहीं खोज पाती। अगर टीबी के सर्वाधिक मामलों वाले भारतीय उपमहाद्वीप के नागरिकों का गहन परीक्षण किया जाए तो क्षय रोग के 92 फीसदी गुप्त मामलों को रोका जा सकता है।

अंगोला में जिंदगी और मौत से जूझ रहे भारतीय श्रमिक

अंगोला के सीमेंट फैक्ट्री में काम कर रहे भारतीय श्रमिकों की स्थिति दयनीय है। ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले से काम की तलाश में अंगोला गए श्रमिक ने भारत लौटने के बाद जो आपबीती सुनाई है, उससे उनकी दर्दनाक स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। वेतन को लेकर उठे विवाद को लेकर अंगोला पुलिस की बर्बर कार्रवाई के बाद कई भारतीय श्रमिकों को जंगल में जाकर अपनी जान बचानी पड़ी थी। भारतीय श्रमिकों में से कई अभी भी सीमेंट संयंत्र में फंसे हुए हैं। अंगोला में भारतीय श्रमिकों के त्रासदी की कहानी की शुरुआत मई के पहले सप्ताह से हुई। इस अफ्रीकी देश का सीमेंट कारखाना भारतीय मजदूरों के बल पर चलता है। वहां कार्यरत 1800 मजदूरों में से एक हजार भारतीय मूल के हैं। भारतीय मजदूरों के साथ खराब व्यवहार किए जाने तथा उन्हें कम वेतन दिए जाने से असंतोष पैदा हुआ था। नौ अप्रैल को भारतीय मजदूर संयंत्र के प्रशासनिक कार्यालय में शांतिपूर्वक एकत्र हुए और अपने वेतन तथा ओवरटाइम का भुगतान डॉलर में करने की मांग करने लगे। जिसके बाद भारतीय श्रमिकों के खिलाफ दमन की कार्रवाई शुरू हुई। अंगोला से वतन लौटे राजनगर के गोबिंदपुर गांव के 28 वर्षीय अभिराम सामल ने बताया मैं केवल भगवान के आशीर्वाद से ही जिंदा हूं, मैं स्वदेश लौटने की उम्मीद छोड़ चुका था। सामल ने बताया कि विरोध जताने के लिए हुई बैठक में मैं भी था। अचानक फैक्ट्री मालिकों ने सशस्त्र पुलिस को शांतिपूर्वक एकत्र मजदूरों पर कार्रवाई करने का हुक्म दे दिया। इसके बाद श्रमिकों पर गोलियों की बौछार हो गई। हम सभी अपनी जान बचाने के लिए भागे। करीब छह किलोमीटर तक भागने के बाद हमने खुद को एक घने जंगल में पाया। दो दिन तक हम लोग जंगल में ही रहे। इस दौरान हमलोगों ने जंगली कंदमूल खाकर झरने का पानी पीकर अपना गुजारा किया। सामल के अनुसार जंगल से लौटने के बाद कइयों को अंगोला पुलिस ने पकड़ कर जेल में डाल दिया और पासपोर्ट जब्त कर लिए गए। उनके मुताबिक मैं भारतीय दूतावास अधिकारियों का अहसानमंद हूं कि उन्होंने हमारी सुरक्षित वापसी के लिए तेजी से काम किया। वहां फंसे भारतीय मजदूरों की सूची में से मेरा नाम छांटा गया। मैं उन 46 भारतीयों में शामिल था जो सरकार के त्वरित हस्तक्षेप के बाद स्वदेश लौटे हैं। दूसरी तरफ केंद्रापड़ा के जिला श्रम अधिकारी प्रदीप्त मोहंती ने बताया कि इनमें से दो श्रमिक सुरक्षित लौट आए हैं, लेकिन बहुत से प्रवासी श्रमिकों को अभी भी घर वापसी का इंतजार है। हम अंगोला में फंसे इन लोगों की मदद के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। मोहंती ने बताया कि प्रशासन के आकलन के अनुसार केंद्रपाड़ा के कम से कम 14 मजदूर अभी भी अंगोला की राजधानी लुआंडा से 600 किलोमीटर दूर सुम्बे में फंसे हैं। प्रदेश के करीब 120 मजदूरों को सुम्बे के सीमेंट संयंत्र में नौकरी मिली थी। इससे पहले ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी शनिवार को इस मामले में केंद्र से हस्तक्षेप करने की मांग की थी। इसके बाद केंद्र भी इस समस्या को लेकर सक्रिया हुआ था।

यूरोप में राजनीतिक तूफान


यूरोप महाद्वीप कर्ज के बोझ तले कराह रहा है। विश्व के सबसे छोटे किंतु सबसे धनी महाद्वीप पर परिवर्तन की हवा चल रही है। इसका सबसे अधिक असर राजनीतिक परिवर्तन के रूप में देखने को मिल रहा है। आयरलैंड से इटली तक अनेक देशों में खर्च में कटौती पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। छह मई को फ्रांस, ग्रीस, जर्मनी, सर्बिया, इटली और अर्मेनिया में हुए मतदान में यह आक्रोश परिवर्तन के रूप में सामने आया है। फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव में राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी को सरकारी खर्च में कटौती का नतीजा भुगतना पड़ा और समाजवादी नेता फ्रांसुआ ओलेंड ने उन्हें पटकनी दे दी। नए राष्ट्रपति के रूप में ओलेंड के उत्कर्ष में निहित है कि समाजवादी शासन अब फ्रांस और शेष यूरोप के वित्तीय संकट में अधिक हस्तक्षेप करेगा। ग्रीस में जनादेश ने दोनों प्रमुख पार्टियों को दंडित किया। कटौती विरोधी एलेक्सिस सिपराज के साइरिजा समूह को तगड़ा झटका लगा और उसे दूसरे स्थान पर सिमटना पड़ा। वामपंथी गठबंधन को सरकार के गठन का जनादेश मिला। यह गठबंधन देश के 130 अरब यूरो के बर्बर बचाव समझौते की शर्तो को राजनीतिक पक्षाघात बता रहा है। यूरोप की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति जर्मनी में पाइरेट पार्टी को राज्यों के चुनावों में तीसरी जीत हासिल हुई। छोटे उत्तरी राज्य श्क्लेसविग-होल्स्टेन में पार्टी को छह सीटें और 8.2 फीसदी वोट मिले। इन परिणामों के साथ ही पाइरेट्स पार्टी ने लगातार तीसरी जीत हासिल की और एक साल के अंदर यह हाशिये से मुख्यधारा में आ गई है। पाइरेट्स ने मार्च में सारलेंड में हुए चुनाव में चार सीटें जीती थीं और पिछले वर्ष बर्लिन के चुनाव में 15 संसदीय सीट हासिल की थी। सर्बिया में विपक्षी दल प्रोग्रेसिव पार्टी ने नजदीकी मुकाबले में बाजी मार ली। यहां नेताओं में सर्बिया के यूरोपीय संघ में होने के भविष्य के मुद्दे पर जंग छिड़ी थी। रूस समर्थित तोमिस्लाव निकोलिक की प्रोग्रेसिव पार्टी को 24 फीसदी वोट मिले जबकि राष्ट्रपति बोरिस तादिक की पार्टी डेमोक्रेट्स महज 22.09 प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाई। इटली के कॉमेडियन बेपे ग्रिलो के जमीन से जुड़े फाइव स्टार आंदोलन और वाम दलों को स्थानीय निकाय चुनावों में सबसे अधिक सीटें मिलीं। खर्च में कटौती से त्रस्त मतदाताओं ने पूर्व प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी की पार्टी और उसके सहयोगी दलों को नकार दिया। चुनाव 942 शहरों में हुए थे और इनमें सबसे अधिक फायदा ग्रिलो को हुआ, जो राजनेताओं की खिल्ली उड़ाते हैं और इटली के यूरो के दायरे से निकलने के समर्थक हैं। मारियो मोंटी के प्रधानमंत्री के रूप में चुने जाने के बाद यह इटली में पहला चुनाव था। आर्मेनिया में, राष्ट्रपति सिर्ज सरगिसाइन की वफादार पार्टी ने 131 सीटों वाले संसदीय चुनाव में अधिकांश में जीत हासिल की। यह चुनाव आर्मेनिया में चार साल पहले हुए चुनावों में सरगिसाइन के चुनाव के विरोध में भड़के दंगे के चार साल बाद हुए थे। वह आर्मेनिया की आजादी के बाद के तीसरे राष्ट्रपति थे। ऑर्गेनाइजेशन फॉर सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप ने इन चुनावों में धांधली का आरोप लगाया था। यूरोप के छह देशों में हुए चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण फ्रांस के राष्ट्रपति का चुनाव था, इसलिए इस पर विस्तार से चर्चा की जरूरत है। फ्रांस में पिछले 24 साल में पहली बार समाजवादी राष्ट्रपति बना है। फ्रांसुआ ओलेंड की जीत के विश्व पर दूरगामी और व्यापक प्रभाव पड़ेंगे। इस समय विश्व यूरोप के कर्ज, अफगानिस्तान युद्ध, ईरान पर गतिरोध और वैश्विक कूटनीति के संकट से गुजर रहा है। संभवत: ओलेंड की जीत के पीछे उनके इस नायाब विचार का बड़ा हाथ रहा कि वह अमीरों पर 75 फीसदी कर लादेंगे और उन कंपनियों पर करों की दर बढ़ाएंगे जो अपने लाभ को व्यापार में निवेश करने के बजाय अंशधारकों को भारी लाभांश दे रही हैं। इसके विपरीत सरकोजी ने फ्रांस में कर की दरों को कम करने का वादा किया था, जो विश्व में सबसे अधिक हैं। यद्यपि उन्होंने बिक्री कर को बढ़ाने की बात भी की थी। ओलेंड के अनोखे प्रस्ताव के खिलाफ इंटरनेट पर टिप्पणियों की बाढ़ आ गई थी। इनमें कहा गया था कि अमीरों पर मोटा कर लगाने का नतीजा यह होगा कि वे फ्रांस से बोरिया-बिस्तरा समेटकर अमेरिका में बस जाएंगे। इस प्रकार एक झटके में अमेरिका का वित्तीय संकट खत्म हो जाएगा और फ्रांस आर्थिक दलदल में और गहरा धंस जाएगा। सरकोजी की हार के फ्रांस और विश्व पर तात्कालिक और दीर्घकालीन राजनीतिक निहितार्थ होंगे। फ्रांस में राजनीतिक उत्तराधिकार के लिए समाजवादियों और धुर दक्षिणपंथियों के बीच सत्ता संघर्ष छिड़ जाएगा। विश्व पर यह असर पड़ेगा कि ओलेंड अमेरिका के उतने करीब नहीं होंगे, जितने सरकोजी थे। ईरान और सीरिया के मुद्दे पर सरकोजी का वाशिंगटन को कट्टर समर्थन अब ओलेंड के समय में कम हो जाएगा। नए राष्ट्रपति सरकोजी द्वारा लिए गए विदेश नीति पर अनेक फैसलों को पलट भी सकते हैं। संभावना है कि वह अफगानिस्तान में फ्रांस की सैन्य उपस्थिति को कम कर देंगे, जबकि सरकोजी ने इसमें वृद्धि की थी और फ्रांसिसी सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस लाएंगे। इसके अलावा ओलेंड कूटनीतिक दबंगई के लिए अन्य देशों में सैनिक भेजने की नीति से भी पल्लू झाड़ सकते हैं। सरकोजी ऐसा करने में जरा भी नहीं हिचकते थे। इसका ताजा उदाहरण है गद्दाफी के खिलाफ नाटो के हवाई हमलों में फ्रांस ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। ओलेंड के सामने तात्कालिक काम प्रधानमंत्री के नाम की घोषणा करना है। इस पद पर वह ज्यां मार्क आयरोल्त के नाम की घोषणा कर सकते हैं। समाजवादी संसदीय समूह के महत्वपूर्ण नेता होने के साथ-साथ ज्यां मार्क के जर्मनी के साथ भी अच्छे रिश्ते हैं। ओलेंड की प्राथमिकता में सबसे ऊपर जर्मन चांसलर एंजेला मार्केल के साथ मिलकर काम करना होगा, जिन्होंने ओलेंड की दावेदारी को समर्थन दिया था। तो यूरोपीय चुनावों का क्या मतलब निकलता है? नतीजों से साफ हो जाता है कि धुर-वाम और धुर-दक्षिण दोनों तरह की पार्टियों को लाभ हुआ है, जिन्होंने पूरे यूरोप में व्याप्त आर्थिक संकट का दोहन किया है। यूरोप में हालिया राजनीतिक रुझान धुर-वाम और धुर-दक्षिण सशक्तिकरण के पक्ष में है। चुनावों में अतिवादी पार्टियों की पहचान, उनके लक्ष्यों और मूल्यों पर मुहर लगी है जबकि मुख्यधारा के उम्मीदवारों को उनकी गलतियों की सजा दी गई है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे