Monday, December 3, 2012

मेनन का बीजिंग मिशन


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भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन एक अहम दौरे के तहत चीन पहुंच गए हैं। उनकी इस यात्रा के दौरान जाहिर तौर पर चीन के कुछ विदा हो रहे और कुछ नए नेताओं के साथ बातचीत का दौर चलना है। यह पहली बार है जब कोई वरिष्ठ भारतीय अधिकारी चीन के नए नेतृत्व से सीधे मुखातिब होगा। मेनन पर दोहरी जिम्मेदारी है। वह चीन के साथ सीमा वार्ता पर भारत के विशेष प्रतिनिधि के तौर पर चीनी समकक्ष स्टेट काउंसलर देई बिंग्गुओ के साथ भी बातचीत करेंगे, जो अगले साल मार्च में सेवानिवृत्त हो रहे हैं। भारत के वरिष्ठ राजनयिकों की मानें तो मेनन और देई के बीच होने वाली इस मुलाकात को औपचारिक विशेष प्रतिनिधि स्तरीय वार्ता के तौर पर नहीं देखा जाएगा, बल्कि मेनन तो चीन के नए नेतृत्व को सिर्फ सीमा विवाद और अन्य द्विपक्षीय मुद्दों की याद दिलाने का काम करेंगे। यह दौरा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के एक दशक में एक बार होने वाले नेतृत्व परिवर्तन से भारत के जुड़े रहने का एक आधार बनाने के लिए है। मेनन की यह यात्रा कई मायनों में देई की विदाई के तौर पर भी रहेगी, जिनके साथ मेनन ने विशेष प्रतिनिधि स्तरीय प्रक्रिया के तहत कई दौर की सीमा वार्ता की है। 3-4 दिसंबर को चीनी वार्ताकारों से होने वाली मेनन की इस बातचीत में दोनों देशों के लिए दो महत्वपूर्ण परिणाम सामने आने की उम्मीद है। एक, विशेष प्रतिनिधि स्तर की उनकी औपचारिक वार्ता के दौरान दोनों विशेष प्रतिनिधि अपनी-अपनी सरकार के सामने सीमा वार्ता की प्रगति रिपोर्ट सामने रख सकेंगे। दूसरा, मेनन नवनिर्मित पोलित ब्यूरो स्थायी समिति के सात सदस्यों में से एक या दो से भी व्यक्तिगत तौर पर मिलेंगे। हालांकि अभी इस बातचीत पर मुहर लगनी बाकी है। इस बात की भी संभावना है कि मेनन ली केक्यांग से भी बात करें, जो मार्च में नए नेतृत्व के सत्ता संभालने के बाद नंबर दो की हैसियत वाले नेता रहेंगे। ली प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की जगह लेंगे। देई के साथ होने वाली मेनन की बातचीत का आधार व्यापक होने की उम्मीद है। इसमें वे मुद्दे उठेंगे जिन्हें दोनों देश प्रतिनिधि स्तरीय वार्ता के पहले के दौर में सुलझाने की कोशिश करते रहे हैं। यह सारा माहौल अनौपचारिक होगा, जिसमें औपचारिक वार्ता की रूपरेखा आकार लेगी। यह रूपरेखा इस बातचीत के दौरान अंतिम रूप नहीं ले सकेगी, क्योंकि इस पर पहल करना नए चीनी नेतृत्व पर निर्भर करता है। इसका स्पष्ट मतलब है कि विशेष प्रतिनिधि स्तरीय वार्ता प्रक्रिया के तहत अगले दौर की बातचीत सिर्फ और सिर्फ नए चीनी नेतृत्व के सत्ता संभालने के बाद ही संभव हो सकेगी। भारत और चीन दोनों ने ही विशेष प्रतिनिधि स्तरीय सीमा वार्ता पर एक दूसरे के समक्ष अपनी-अपनी संतुष्टि जाहिर की है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद पर अब तक 15 दौर की वार्ता हो चुकी है। इनमें से पिछलीं दस वार्ता विशेष प्रतिनिधि स्तर की ही थीं, जो वर्ष 2003 से शुरू हुई थीं। 2008 में इस स्तर पर पांच दौर की वार्ता के बाद दोनों देशों के बीच राजनीतिक मानकों और सीमा विवाद सुलझाने के लिए दिशा-निर्देश वाले सिद्धांतों पर एक समझौता हुआ। इसने सीमा विवाद पर भारत-चीन के बीच होने वाली वार्ता के पहले चरण के समाप्त होने का संकेत दिया। मेनन ने इस वार्ताके एक-एक चरण का संज्ञान लिया है और पिछले हफ्ते ही उन्होंने नई दिल्ली में कहा था, हम सीमा विवाद का हल निकालने के लिए किसी समझौते पर पहुंचने की रूपरेखा पर सहमति बनाने की प्रक्रिया में हैं। हमारा अगला कदम तीसरा चरण होगा, जो वास्तव में सीमा पर कोई सहमति बनाने के लिए ही है। फिलहाल हम दूसरे चरण में हैं। इसी साल जनवरी में हुए भारत-चीन सीमा वार्ता के अंतिम चरण में दोनों पक्ष एक कदम और आगे बढ़े जब भारत-चीन सीमा मामले पर समन्वय और विचार-विमर्श के लिए एक कामकाजी तंत्र का गठन किया गया। वरिष्ठ राजनयिकों के स्तर पर नई प्रक्रिया का शुरू होना नियंत्रण रेखा पर शांति कायम करने के लिहाज से एक अतिरिक्त सुरक्षा चक्र का काम करेगा। इस नई प्रक्रिया के तहत पहली बैठक जनवरी में हुई थी। मेनन के बीजिंग जाने से कुछ दिन पहले ही इस नई प्रक्रिया के तहत दूसरी बैठक 29-30 नवंबर को नई दिल्ली में हुई। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व पूर्वी एशिया के संयुक्त सचिव गौतम बांबावाले ने किया। इस प्रतिनिधिमंडल में विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के प्रतिनिधि और भारतीय सेना तथा भारत-तिब्बती सीमा पुलिस के सदस्य भी शामिल थे। चीनी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व राजदूत वांग जियादू ने किया। इसमें सीमा और समुद्री मामलों के विभाग, विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के विशेष प्रतिनिधि भी शामिल थे। इस बैठक के बाद चीनी प्रतिनिधिमंडल ने विदेश सचिव रंजन मथाई से भी बात की। नई प्रक्रिया के तहत हुई दूसरी बैठक में वरिष्ठ राजनयिकों और सुरक्षा अधिकारियों ने इस बात की समीक्षा की कि जनवरी में हुई पहली बैठक के बाद भारत-चीन के सीमाई इलाकों में आपसी विश्वास और सहयोग के माहौल में कितना विकास हो पाया है। इस बैठक के खत्म होने पर विदेश मंत्रालय ने संक्षिप्त बयान में कहा कि दोनों पक्षों ने एक दूसरे को जानकारी दी कि दोनों देशों के मिले-जुले प्रयासों से शांति कायम रह सकी। दोनों प्रतिनिधिमंडलों में इस बात पर भी चर्चा हुई कि दोनों पक्षों में विश्वास बहाली और शांति को बनाए रखने के लिए और कौन से कदम उठाए जाने चाहिए? दोनों प्रतिनिधिमंडलों ने खुले व्यापार का स्वागत किया। विदेश मंत्रालय के इस बयान में यह भी बताया गया कि दोनों प्रतिनिधिमंडलों के बीच कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए अतिरिक्त रूट की तलाश पर भी चर्चा जारी है। चीन और भारत एशिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं हैं। इन दोनों का द्विपक्षीय व्यापार 100 बिलियन डॉलर के आसपास है। इतना ही नहीं, कुछ आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक दशक के भीतर 300 बिलियन डॉलर के आंकड़े को भी पार कर जाएगा। दोनों परमाणु शक्ति संपन्न और दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश अब वह गलती नहीं दोहरा सकते जो आधी सदी पहले की गई थी और जिसे लेकर दोनों देशों में युद्ध भी हुआ। यह मानवता के हित में होगा कि भारत और चीन जितना जल्दी संभव हो सौहा‌र्द्रपूर्ण तरीके से अपने सीमा विवाद का हल निकाल लें। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

Dainik Jagran National Edition 3-12-2012 Page 7 ns’k fons’k)